बिहार के सारण ज़िले (सिताब दियारा) में 11 अक्टूबर 2025 को लोक नायक जयप्रकाश नारायण की जयंती के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति द्वारा दिया गया भाषण ।

सारण, बिहार | सितम्बर 28, 2025

आज सारण जिले के सिताब दियारा की इस पावन धरती पर खड़ा होना मेरे लिए सम्मान और सौभाग्य की बात है। यह धरती भारत के महानतम नेताओं में से एक, एक सच्‍चे लोकनायक तथा न्याय व लोकतंत्र के सच्‍चे सारथी, लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी की जन्मस्थली है।

आज, हम यहॉं उनकी 123वीं जयंती मनाने के लिए एकत्रित हुए हैं। हम न केवल इस महान व्यक्तित्व को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं बल्कि हम एक ऐसे आदर्श का उत्सव मना रहे हैं जो राष्ट्र को स्वयं से, मूल्यों को सत्ता से और जनता की शक्ति को राजनीति से ऊपर रखते थे।

लोकनायक जयप्रकाश जी, या जिन्हें देश प्यार से 'जेपी' कहा जाता था, केवल एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे बल्कि वे लोकतंत्र के अंतरात्‍मा के सजग प्रहरी थे। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर 1970 के दशक में 'संपूर्ण क्रांति' के आह्वान तक, उनका जीवन नैतिक साहस, सादगी और त्याग की एक मिसाल बना रहा।

लोकनायक जी को सत्ता पाने की कोई लालसा नहीं थी। जब उन्हें देश के सर्वोच्च पदों की पेशकश की गई, तो उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया - जो यह दर्शाता है कि उनकी ताकत राजनीतिक महत्वाकांक्षा में नहीं बल्कि उनकी नैतिक प्रभुता में थी ।

राजनीति केवल सत्ता हासिल करने में नहीं है बल्कि जनता द्वारा सत्ता पर नियंत्रण रखने में है – यह कथन लोकनायक जी के लोकतंत्र के सच्चे मूल्यों और लोकाचार में उनके विश्वास को सही ढंग से दर्शाता है। उन्होंने सत्ता-लोलुप शासन के बजाय मूल्य-आधारित और नैतिक राजनीति में दृढ़तापूर्वक विश्वास किया।

आज हम अपने परमप्रिय नेता जयप्रकाश जी को श्रद्धापूर्वक याद तो कर ही रहे हैं लेकिन हमें उनकी धर्मपत्नी श्रीमती प्रभावती देवी के अटूट सहयोग एवं बलिदान को भी नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति निस्वार्थ योगदान देने हेतु ब्रह्मचर्य का संकल्प लिया था।

लोकनायक ने भूदान आंदोलन में सक्रिय और एक बहुत बड़ी भूमिका निभाई जिसके कारण इस आंदोलन को विश्वसनीयता मिली और इसे राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्‍त हुई। उन्होंने इस आंदोलन को नई ऊर्जा और गति प्रदान की, विशेष रूप से बिहार में जहाँ उन्होंने समुदायों को एकजुट किया और अनगिनत लोगों को निस्वार्थ भाव से जनहित में कार्य करने हेतु प्रेरित किया।

भ्रष्‍टाचार से ग्रस्‍त उस दौर में लोकनायक ने युवाओं की शक्ति में गहरा विश्‍वास जताया। उनका दृढ़तापूर्वक मानना था कि देश की युवा शक्ति में ही लोकतांत्रिक मूल्यों को पुनर्जीवित और पुनर्गठित करने की क्षमता है। वे सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए अहिंसा आधरित क्रांति के दर्शन में अटूट विश्वास रखते थे।

लोकनायक की ‘संपूर्ण क्रांति’ के लिए आह्वान केवल हथियारों का विद्रोह नहीं था, बल्कि विचारों की क्रांति थी। उन्होंने एक ऐसे राष्ट्र का सपना देखा था जहाँ शासन पारदर्शी हो, गरीब सशक्त हों, और युवा भारत के किस्‍मत गढ़ने में सक्रिय भागीदार बनें। उन्होंने बिना हिंसा के राष्ट्र निर्माण और सामाजिक पुनर्गठन के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया।

यह मेरे लिए एक व्यक्तिगत सम्‍मान और गौरव की बात है क्योंकि 'संपूर्ण क्रांति' आंदोलन से मेरा बहुत गहरा लगाव रहा था। उन्नीस वर्ष की आयु में, लोकनायक जी के आह्वान पर मैंने स्वयं को इस आंदोलन में झोंक दिया था। मैं कोयंबटूर में संपूर्ण क्रांति आंदोलन का जिला महासचिव था।

वे जनसशक्तिकरण के महान समर्थक थे जो हमेशा 'लोक शक्ति' (आम जनता की शक्ति) को राज्य शक्ति' (सत्ता की शक्ति) से ऊपर रखते थे।

लोकनायक ने पारदर्शिता, जवाबदेही, लोकसेवा और नैतिक साहस जैसे मूल्यों को हमेशा प्राथमिकता दी और आज भी भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं की ताकत इन्‍हीं पर टिकी है।

जब भारत विकसित भारत @2047 की ओर बढ़ रहा है, तो ऐसे में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आदर्शों और मूल्यों को आत्मसात करना एक जीवंत और समावेशी राष्ट्र निर्माण के लिए आवश्यक है।