भारत के माननीय उपराष्ट्रपति द्वारा 28 सितंबर, 2025 को पटना में 'उन्मेष' (अंतर्राष्ट्रीय साहित्य महोत्सव) के तीसरे संस्करण के समापन समारोह में दिया गया भाषण

पटना, बिहार | सितम्बर 28, 2025

मैं तेजस्‍विनी और परोपकारी भारत माता के पावन चरणों को स्‍पर्श कर उन्‍हें नमन करता हॅूं।

बिहार की भूमि धर्म, संस्‍कृति और ज्ञान की भूमि है।

भारत के उपराष्ट्रपति का पद ग्रहण करने के बाद बिहार राज्‍य का यह मेरा पहला दौरा है। ऐसे भव्‍य सांस्कृतिक कार्यक्रम में 550 प्रख्‍यात हस्तियों के साथ भाग लेना मेरे लिए बहुत ही गौरव और सम्मान की बात है।

इस महान अवसर पर, मंच पर मेरे साथ विराजमान गणमान्य व्यक्ति; संसद सदस्य के रूप में कार्य करने के दिनों से मेरे पुराने मित्र, बिहार के माननीय राज्यपाल श्रीमान आरिफ मोहम्मद खान जी; बिहार के हमारे प्रिय माननीय उपमुख्यमंत्री श्रीमान विजय कुमार सिन्हा जी; माननीय पर्यटन मंत्री श्री राजू कुमार सिंह जी; मेरे सचिव श्री अमित खरे जी और हमारे संस्कृति मंत्रालय के सचिव श्रीमान विवेक अग्रवाल जी; साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. महादेव कौशिक जी और यहाँ उपस्थित मेरे प्रिय भाइयों और बहनों!

भाषाओं के बंधनों को तोड़कर हम यहाँ 'उन्मेष' के मंच पर इकट्ठा हुए हैं, ताकि हमारे देश के महान साहित्य को सही पहचान और प्रतिनिधित्व मिल सके।

हमारे संस्कृति मंत्रालय के अथक प्रयासों से आज विभिन्न भाषाओं के मनीषी साहित्यकार एक ही मंच पर एकत्रित हुए हैं। हमें अपने लेखन, अपनी रचनाओं और अपने ज्ञान को एक-दूसरे के साथ साझा करने का एक अभूतपूर्व अवसर मिला है।

हम आज बिहार की राजधानी पटना की धरती पर एकत्रित हुए हैं। अध्यात्म के प्रति बिहार का योगदान मात्र इतिहास तक ही सीमित नहीं है, वरन यह आज भी वैश्विक स्तर पर करोड़ों जनमानस की प्रेरणा का स्रोत है। बौद्ध, जैन और हिंदू परंपराओं के संगम के रूप में बिहार को एक अद्वितीय आध्यात्मिक केंद्र माना जाता है।

बिहार हमारी ‘माता सीता’ की पावन जन्मभूमि है—उस माता की जिन्होंने न्याय की स्थापना के लिए अपने पूरे जीवन में बहुत कष्‍ट सहा।

इसके साथ ही, बिहार वह पावन स्थल है जहाँ राजकुमार सिद्धार्थ ने ज्ञान प्राप्त किया और भगवान गौतम बुद्ध बन गए।

बिहार भगवान महावीर की पावन जन्मस्थली भी है। भगवान महावीर 24वें और अंतिम जैन तीर्थंकर थे। उन्होंने अहिंसा का संदेश दिया, जिसे हमारे महान महात्मा गांधी जी ने एक अस्त्र के रूप मे अपनाया। इसी अहिंसा के संदेश के दम पर उन्होंने भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी और आज हमें पूरी दुनिया को अहिंसा का संदेश देने का अधिकार प्राप्त हुआ है।

भगवान महावीर के संदेशों ने भारत के लोगों की नैतिक और आध्यात्मिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया है।

किसी भी संस्‍कृति का विकास रातों-रात नहीं हो सकता है। इसमें महान विभूतियों का योगदान होता है और यही कारण है कि आज भारतीय संस्कृति इतनी महान है।

इसके बाद, बिहार का उस समय का नालंदा विश्वविद्यालय और विक्रमशिला विश्वविद्यालय विश्व के लिए बड़ा योगदान हैं। ये शिक्षा केन्‍द्र प्राचीन काल के एक 'बौद्धिक महाशक्ति' के रूप में बिहार की गौरवशाली स्थिति को प्रतिबिंबित करते हैं।

प्राचीन नालंदा विश्‍वविद्यालय कभी वैश्‍विक शिक्षा का केन्‍द्र माना जाता था जो सम्‍पूर्ण एशिया के विद्वानों को अपनी तरफ आकर्षित करता था। यह विश्‍वविद्यालय बौद्धिक जिज्ञासा, विविधता और उत्कृष्टता का प्रतीक के रूप में स्‍थापित था।

हमारा महान नालंदा विश्वविद्यालय भारत के 'विश्व गुरु' होने की स्थिति का जीवंत प्रतीक है।

मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सहयोग से केंद्र और राज्य सरकार ने नालंदा विश्वविद्यालय का पुनरूद्धार किया है। उन्होंने इसके सुधार, पुनरुद्धार और पुनर्निर्माण की पहल की है।

बिहार वह स्थान है जहाँ एक ओर मगध और मौर्य जैसे शक्तिशाली साम्राज्य फले-फूले, तो दूसरी ओर वैशाली के रूप में यह लोकतंत्र की जन्मस्थली भी बना।

हममें से कई लोग यह मानते हैं कि लोकतंत्र की शुरूआत पश्चिमी देशों से हुई थी लेकिन वास्‍तिवकता में लोकतंत्र की उत्‍पत्ति बिहार के वैशाली जिले में 2500 वर्ष पहले हुई थी।

प्रारंभिक लोकतांत्रिक शासन का एक उत्कृष्ट उदाहरण  वैशाली विश्‍व का प्रथम ज्ञात गणतंत्र था और यह लोकतंत्र के आधुनिक आदर्श बनने से बहुत पहले अस्तित्व में था। लोकतंत्र और सामूहिक शासन में यह भारत के सफल एवं शुरुआती प्रयोगों का उदारहण है। वैशाली स्वशासन और सामूहिक विवेक के प्रति भारत की प्राचीन प्रतिबद्धता का एक प्रतीक है।

सुदूर दक्षिण में, चोल साम्राज्य में लोकतंत्र के स्वरूप में प्रचलित 'कुदावोलाई' पद्धति प्रचलित था और इसी पद्धति से लोगों का चुनाव किया जाता था और केवल पात्र सदस्यों को ही शासन करने के लिए चयन किया जाता था। ग्राम सभाएँ, स्थानीय मामलों का प्रबंधन करती थीं और प्रतिनिधियों का चुनाव करने के लिए इसी कुदावोलाई पद्धति का उपयोग करती थीं।

इस प्रकार, भारत की संस्‍कृति, विचार और इसकी महानता चारों उत्‍तर से दक्षिण और पश्चिम से पूर्व चारो दिशाओं में एक समान है।

 चाहे महात्मा गांधी जी के नेतृत्व वाला चंपारण सत्याग्रह हो, या जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाला जेपी आंदोलन, बिहार हमेशा से सामाजिक बदलाव में आगे रहा है और लोकतंत्र की भावना को पुनर्जीवित किया है।

उन्नीस वर्ष की आयु में  मैंने लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में 'सम्पूर्ण क्रांति' आंदोलन में स्वयं को समर्पित कर दिया था और आगे चलकर मुझे सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन का जिला महासचिव बनाया गया।

लोकनायक जेपी जी की विरासत द्वारा आगे बढ़ाया गया 'संपूर्ण क्रांति आंदोलन' हमें याद दिलाता है कि बिहार हमेशा से परिवर्तन और चेतना की गढ़ रहा है।

राष्ट्रीय नेतृत्व में बिहार का योगदान उल्लेखनीय है। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और भारतीय लोकतंत्र के सजग प्रहरी जयप्रकाश नारायण शामिल जैसे राष्‍ट्रीय नेताओं को जन्‍म दिया है।

मिथिला चित्रकला की सांस्कृतिक परंपराएं, बिदेसिया जैसे लोक रंगमंच और छठ पूजा जैसे त्योहार हमारी महान और समृद्ध अमूर्त विरासत के जीवंत उदाहरण हैं।

विशेष रूप से छठ पूजा  विश्‍व का सबसे अनुशासित और पर्यावरण-अनुकूल त्योहारों में से एक है। इसमें सूर्य देव और प्रकृति की पूजा की जाती है जो नदियों एवं पवित्रता के साथ हमारे गहरे संबंध को दर्शाता है।

 छठ महापर्व इसलिए भी खास है, क्योंकि इसमें हम केवल उगते सूर्य की पूजा नहीं करते हैं  बल्कि ढलते सूर्य को भी उतने ही सम्मान से अर्घ्य देते हैं। यह हमारी उस महान संस्कृति का परिचायक है जो सिखाती है कि जब आप हमें सब कुछ दे रहे हैं, तब तो हम कृतज्ञ हैं ही, लेकिन जब आप अस्‍त हो रहे होते हैं, तब भी हमारा विश्वास और हमारी निष्ठा अडिग रहती है। हम सदैव आपका आभारी रहेंगे।

बिहार की भूमि सतत रूप से देश की प्रतिभाओं को जन्म देती आ रही है, जिनमें से कई सिविल सेवाओं, शैक्षणिक क्षेत्र, प्रौद्योगिकी और कानून के क्षेत्र में अपनी सेवाएँ प्रदान कर रहे हैं।

हम यहाँ केवल साहित्य का जश्न मनाने के लिए नहीं, बल्कि लिखे हुए शब्दों की अद्भुत शक्ति का जश्न मनाने के लिए इकट्ठा हुए हैं जो समाजों को नई दिशा देती है, विचारों में परिवर्तन लाती है और युगों-युगों तक जीवित रहने वाली विरासतों का निर्माण करती है।

लिखित शब्दों के इस उत्सव ने आज भौगोलिक सीमाओं को लांघते हुए दुनिया भर की प्रतिष्ठित विभूतियों, विद्वानों, कवियों और अनुवादकों को एक मंच पर ला खड़ा किया है। यह हमारे लिए गर्व का विषय है कि आज यहाँ लगभग 100 भाषाओं का प्रतिनिधित्व किया जा रहा है।

यह उत्‍सव 'उन्मेष', जैसा कि इसके नाम से ही स्‍पष्‍ट है, नए विचारों, नई आख्‍यानों और नए पहलुओं के 'जागरण' या उनके 'प्रकटीकरण का प्रतीक है।

यह विचारों में विविधता का उत्सव है और साहित्य की अनोखी भूमिका की पुष्टि करता है, जो भाषाई, सांस्कृतिक, भौगोलिक या वैचारिक किसी भी अंतर को पाटने में मदद करती है।

यूरोप के एक गणमान्य व्यक्ति ने मुझसे पूछा, आप लोग अलग-अलग भाषाएं बोलते हैं इसके बावजूद भी भारत इतना एकजुट कैसे है?' मैंने उत्तर दिया कि भले ही हम अलग-अलग भाषाएं बोलते हैं, लेकिन हम एक ही संकल्पना पर जीते हैं, और वह है धर्म।

मुझे पूरा विश्वास है और मुझे भरोसा है कि आपकी सारी साहित्यिक रचनाएँ, ज्ञान; आपका लेखन, आपकी सभी प्रतिभाएँ 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' के संकल्‍प को सुदृढ़ करेंगी और इसी अवधारणा पर हम अपना जीवन व्‍यतीत करना चाहते हैं।

मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि 'उन्मेष' साहित्यिक संस्कृति का एक आधार स्तंभ बना रहेगा, जो लेखकों, विचारकों और पाठकों की आने वाली पीढ़ियों को निरंतर आकर्षित करेगा। आपके ये सभी वर्तमान लेखन आने वाली पीढ़ियों के लिए एक समृद्ध विरासत छोड़ जाएंगे।
भारत 'एक' है और सदैव 'एक' ही रहेगा।

इन शब्दों के साथ, मैं आप सभी का धन्यवाद करता हूँ कि आपने मुझे अपने विचारों और दृष्टिकोणों को आपके साथ साझा करने का यह अवसर प्रदान किया है।

जय हिंद! जय भारत! भारत जिंदाबाद।

धन्‍यवाद !