8 सितम्बर, 2017 को अन्तर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस के अवसर पर विज्ञान भवन में भारत के उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया अभिभाषण

नई दिल्ली | सितम्बर 8, 2017

51 वें अन्तर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस के राष्ट्रीय आयोजन के अवसर पर आप सभी के बीच में आकर मैं अत्यधिक प्रसन्न हूं।

साक्षरता को समर्पित आज का दिन बहुत ही विशेष दिवस है जिसे वर्ष 1965 में तेहरान में आयोजित हुई शिक्षा मंत्रियों की वर्ल्ड कांग्रेस की सिफारिश को यूनेस्कों द्वारा स्वीकार करने के पश्चात् विश्वभर में धूमधाम से मनाया जाता है।

यह दिन हमें सभी देशों के संरचनात्मक विकास में साक्षरता की महत्ता तथा विकास उत्प्रेरक के रूप में इसकी महत्वपूर्ण और केन्द्रीय भूमिका की याद दिलाता है। यह वह दिन है जब हम अपने स्वतंत्रता संग्राम और महात्मा गांधी के शब्दों को याद करते हैं जिन्होंने कहा था कि बड़े पैमाने पर निरक्षरता का होना पाप एवं शर्मनाक है जिसका शमन किया जाना चाहिए। यह वह दिन है जब हम पिछले 70 वर्षों में हुई अपनी प्रगति पर चिन्तन करते हैं, जैसा कि 15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि को पंडित नेहरू ने स्पष्ट तौर पर कहा था, "आम आदमी के लिए आजादी और अवसर बनाने, प्रत्येक पुरुष और महिला के लिए न्याय और जीवन की परिपूर्णता सुनिश्चित करने के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक संस्थाओं का गठन करना।"

जब हम विगत वर्षो के दौरान प्राप्त की गई अपनी उपलब्धियों पर गौर करते हैं तो हम पीछे मुड़कर गर्व के साथ यह देख सकते हैं कि हमने अपनी यात्रा के दौरान अनेक पड़ावों को पार किया है। 1947 में हमारी आबादी का केवल 18% हिस्सा ही पढ़ और लिख सकता था। आज, हमारी लगभग 74 प्रतिशत जनसंख्या ने बुनियादी साक्षरता कौशल प्राप्त कर लिया है। 95 प्रतिशत से अधिक बच्चे विद्यालय जाते हैं और लगभग 86 प्रतिशत नवयुवक व्यावहारिक रूप से साक्षर हैं। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। तथापि, हमें अपनी विगत की सफलताओं से प्रेरणा लेनी होगी और आने वाले वर्षों में आगे बढ़ना होगा।

निस्संदेह, हमें बहुत आगे तक जाना है। हम इस तथ्य को नकार नहीं सकते हैं कि आज लगभग 35 करोड़ युवा एवं वयस्क आबादी शिक्षित विश्व का हिस्सा नहीं है और इसलिए वे सम-सामयिक भारत की वृद्धि एवं विकास में प्रभावकारी ढंग से योगदान देने में असमर्थ हैं। इसके अलावा, स्कूल जाने वाले हमारे लगभग 40 प्रतिशत बच्चों को प्रारम्भिक शिक्षाचक्र पूर्ण करने के पश्चात् भी साक्षरता के बुनियादी कौशल कुशलता पूर्वक प्राप्त नहीं हो रहे है। हमारे सामने विकट चुनौती है जिसे पहचानने और व्यवस्थित तरीके से उसका समाधान करने की आवश्यकता है।

आज के दिन हमें अपनी सामूहिक उपलब्धियों का उत्सव मनाने का अवसर मिलता है। यह अथक प्रयासों का प्रेरणादायक आख्यान है। इस राष्ट्रीय प्रयास में अनेक व्यक्तियों और संस्थाओं ने योगदान दिया है। त्रावणकोर और बड़ौदा के प्रबुद्ध शासकों ने शिक्षा के अवसरों का विस्तार किया। महात्मा गांधी से प्रेरित होकर विल्दी फिशर और लौबाक ने 1953 में लखनऊ में लिटरेसी हाउस की स्थापना की। प्रौढ़ साक्षरता के लिए 1959 में ग्राम शिक्षण मुहिम जैसे सक्रिय अभियान हुए। 1990 में भारत सरकार के राष्ट्रीय साक्षरता मिशण के माध्यम से इसे उत्कृष्ट गति प्रदान हुई। इन प्रयासों की वजह से हमारी लगभग तीन चौथाई आबादी आज पढ़ और लिख सकती है।

यद्यपि, चुनौती अभी भी शेष है और मौजूदा भारतीय और वैश्विक संदर्भ में इसकी आवश्यकता और बढ़ गई है। सरकार यह मानती है, जैसाकि प्रधान मंत्री मोदी जी ने 5 सितम्बर, 2017 को जियामिन, चीन में ब्रिक्स सम्मेलन में दोहराया था: "हमारे विकास की कार्य सूची की आधारशिला 'सबका साथ, सबका विकास' अर्थात् : सामूहिक प्रयास, समावेशी विकास की धारणा में निहित है।" देश आगामी पांच वर्षों में नये भारत के निर्माण के लिए तीव्र विकास के मार्ग पर चलने का प्रयास भी कर रहा है। वैश्विक रूप से, जनवरी, 2016 में संयुक्त राष्ट्र में सभी राष्ट्रों द्वारा अंगीकृत दीर्घकालिक विकास के 2030 के एजेण्डा को क्रियान्वित करने के लिए हम प्रतिबद्ध हैं। वैश्विक एजेण्डे में "सार्वभौमिक साक्षरता से युक्त विश्व" की परिकल्पना की गई है तथा इस एजेण्डे में निर्धारित लक्ष्यों में से एक लक्ष्य विशेषकर युवा एवं प्रौढ़ साक्षरता पर केन्द्रित है जिसे 2030 तक प्राप्त किया जाना है।

दीर्घकालिक विकास लक्ष्यों का लक्ष्य 4.6 इस प्रकार है:

"2030 तक यह सुनिश्चित करना कि सभी युवा और अधिकांश वयस्क, पुरुष एवं महिलाएं दोनों साक्षरता एवं संख्यात्मक कौशल प्राप्त कर लें।"

यदि हमें तीव्र गति से आगे बढ़ना है और वर्ष 2030 तक साक्षर विश्व के लक्ष्य को हासिल करना है तथा भारत को यह सुनिश्चित करना है कि सभी युवा और अधिकांश वयस्क इन कौशलों को प्राप्त कर लें, तो हमें अपनी विगत कार्य-नीतियों की समीक्षा करनी होगी और इस बात का मूल्यांकन करने के पश्चात कि किन-किन से सफलता प्राप्त हुई है और किनसे नहीं, हमें अपने देश और देश के बाहर के सफल उदाहरणों से सीखना होगा। हमें उन विद्यार्थियों तक पहुँचने के लिए नए तौर-तरीकों की रूप रेखा तैयार करनी होगी जो अभी तक इसके दायरे में नहीं आ पाए हैं।

यह स्पष्ट है कि सरकार जिस प्रक्रिया का नेतृत्व कर रही है उसके लिए इसमें सिविल सोसाइटी और निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी को शामिल करते हुए सामूहिक प्रयास करना अपेक्षित होगा।

इस बात को स्पष्ट तौर पर समझते हुए कि नए भारत के निर्माण में साक्षरता एक उत्प्रेरक की भूमिका अदा कर सकती है, साक्षरता समाज का एक मिशन होना चाहिए।

मैं प्रसिद्ध तेलुगू कवि गुरजड़ा अप्पाराव के शब्दों का स्मरण करता हूँ जिन्होंने कहा था: "देशमंते मत्ति कादू, देशमंते मनुशूलई" (देश हमारे पैरों के नीचे मौजूद ज़मीन से नहीं अपितु उन लोगों से बनता है जो यहां रहते हैं।) लोगों के जीवन की गुणवत्ता से ही किसी देश की विशेषताओं का पता चलता है। यह विशेषता ही निर्धारित करती है कि विकास के लाभ किस प्रकार से साझा किए जाते हैं। हम समावेशी विकास करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। हमने गरीबों में से भी सबसे गरीब व्यक्तियों तक पहुँचने के लिए सोच-समझकर 'अंत्योदय' दृष्टिकोण को अपनाया है।

हम ऐसे कार्यक्रमों की रूपरेखा बनाते हैं जिसके लाभ से कोई भी वंचित न रह पाए। इस पृष्ठभूमि में और रेखांकित 'सबका विकास' के मार्गदर्शी सिद्धांत के अनुसार, यह स्वाभाविक है कि सहभागी, जीवंत एवं और अधिक समावेशी लोकतंत्र के निर्माण की दिशा में साक्षरता पहला अनिवार्य कदम है।

साक्षरता से व्यक्ति विशेष को संविधान के तहत प्रदत्त प्राप्त विभिन्न अधिकारों और हकदारियों तक पहुँचने और उनका उपयोग करने में सहायता मिलती है। यह देखने में आया है कि गरीबी, शिशु मृत्यु, जनसंख्या वृद्धि, लिंग आधारित असमानता जैसी समस्याओं का समाधान एक साक्षर समाज द्वारा बेहतर तरीके से हो सकता है। इसके अतिरिक्त, औपचारिक अधिगम के साथ-साथ आजीवन शिक्षा के सभी रूपों का प्रारम्भिक सोपान होने के अलावा साक्षरता व्यक्ति विशेष को आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक लाभों तक पहुँच स्थापित करने और उनका लाभ उठाने में समर्थ बनाती है।

भारतीय संदर्भ में, साक्षरता व्यक्तियों के साथ-साथ समाज, विशेषकर महिलाओं और समाज के वंचित वर्गों को सशक्त बनाने, उनके जीवन को रूपांतरित करने और उसकी गुणवत्ता में सुधार लाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

हमें द्विआयामी दृष्टिकोण जिसका हम पहले से अनुपालन कर रहे हैं, के माध्यम से सार्वभौमिक साक्षरता के लक्ष्य की प्राप्ति के प्रयास जारी रखने चाहिए। सर्वप्रथम, हमें प्री-प्राइमरी और स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना चाहिए जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि स्कूली शिक्षा उत्तीर्ण करने वाले सभी छात्रों के पास आवश्यक साक्षरता कौशल हो।

दूसरा, हमें उन लोगों को सीखने का अवसर प्रदान करना होगा जो कभी भी स्कूल नहीं गए अथवा जिन्होंने बीच में ही शिक्षा अधूरी छोड़ दी हो तथा ऐसे युवा एवं वयस्क जिन्हें अपनी आजीविका के अवसरों में विस्तार करने के लिए बुनियादी कौशल प्राप्त करने की आवश्यकता है।

किसी व्यक्ति के जीवन में और समग्र रूप से समाज में साक्षरता के महत्व को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने 'साक्षर भारत और सर्व शिक्षा अभियान' को प्रमुख कार्यक्रम के रूप में अपनाया है जिन्हें देशभर में क्रियान्वित किया जा रहा है। साक्षर कार्यक्रम मुख्यत: उन ग्रामीण क्षेत्रों, जिन जिलों में महिला साक्षरता कम है, में साक्षरता को बढ़ावा देने पर केन्द्रित है तथा इसने ग्राम पंचायत स्तर तक प्रौढ़ शिक्षा केंद्रों को बढ़ावा देने के लिए एक संस्थागत ढांचे के निर्माण में भी सहायता प्रदान की है। मुझे खुशी है कि समग्र रूप से सामाजिक विकास पर इसके संभावित बहुगुणक प्रभाव के कारण महिला साक्षरता पर इसका मुख्य बल है जिससे बेहतर स्वास्थ्य संबंधी परिणाम निकल रहे हैं और पोषण स्थिति का सृजन हो रहा है।

यह नोट करना वास्तव में मर्मस्पर्शी है कि प्रत्येक वर्ष एक करोड़ से अधिक प्रौढ़ शिक्षार्थी देशभर में होने वाली द्विवार्षिक शिक्षार्थी मूल्यांकन परीक्षाओं में बैठते हैं और लगभग 6.66 करोड़ शिक्षार्थियों ने मार्च, 2017 तक राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय संस्थान द्वारा आयोजित मूल्यांकन परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण की है जिसमें से लगभग 70 प्रतिशत महिलाएं हैं। मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि ये नव-साक्षर, जिनमें से अधिकांश महिलाएं हैं, 'साक्षर भारत को सक्षम भारत' बनाने की दिशा में हमारे कार्यक्रम के राज-दूत होंगे।

मैं यह जान कर हर्षित हूं कि राष्ट्रीय साक्षरता मिशन प्राधिकरण (एनएलएमए) न केवल प्रौढ़ शिक्षार्थियों को बुनियादी साक्षरता प्रदान करने का कार्य कर रहा है, अपितु विशेषत: ग्रामीण महिलाओं के संबंध में साक्षरता को चुनाव, वित्तीय और विधिक साक्षरता जैसे सामाजिक-आर्थिक विकास के अन्य पहलुओं के साथ जोड़ने के लिए विभिन्न एजेंसियों के साथ भागीदारी भी कर रहा है। मुझे बताया गया है कि वित्तीय साक्षरता के तहत एक करोड़ से अधिक साक्षर भारत शिक्षार्थियों को प्रधान मंत्री जन-धन योजना के तहत बैंकों में खाते खोलने और संचालित करने हेतु प्रेरित करने के लिए साक्षर भारत जिलों में विशेष अभियान चलाया गया। एनएलएमए प्रधान मंत्री सुरक्षा बीमा योजना के लिए सुरक्षा बंधन अभियान में भी सम्मिलित हुआ। एनएलएमए के राज्य भागीदारों, यथा राज्य साक्षरता मिशन प्राधिकरण (एसएलएमएएस), राज्य संसाधन केन्द्रों और जन शिक्षण संस्थानों ने एक करोड़ से भी अधिक लाभार्थियों को इस योजना के लाभ उठाने के लिए सफलतापूर्वक प्रेरित किया।

मुझे बताया गया है कि इन सभी पहलों के अतिरिक्त, एनएलएमए ने संबंधित ग्राम पंचायतों में शत-प्रतिशत साक्षरता हासिल करने के लिए साक्षर भारत को सांसद आदर्श ग्राम योजना (एसएजीवाई) के साथ जोड़ने के लिए भी सक्रिय पहल की है। साक्षर भारत जिलों में गोद लिए गए सांसद आदर्श ग्रामों का दौरा करने वाले अनेक संसद सदस्यों को इन प्रयासों की सराहना करने और इन कार्यकलापों का मार्गदर्शन करने का अवसर प्राप्त हुआ। सांसद आदर्श ग्रामों में किए गए अथक प्रयासों के अच्छे परिणाम प्राप्त हुए हैं और आशा करता हूं कि अन्य ग्राम पंचायतों में भी ऐसे प्रयास किए जाएंगे।

यदि साक्षरता कार्यक्रमों को सरकार के स्वच्छ भारत, प्रधान मंत्री जन धन योजना, प्रधान मंत्री सुरक्षा बीमा योजना, प्रधान मंत्री उज्ज्वला योजना, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, डिजिटल इंडिया मिशन और स्किल इंडिया मिशन जैसी पहलों के साथ सृजनात्मक रूप से जोड़ दिया जाए तो उनके परिणाम और भी बेहतर हो सकते हैं।

पिछले दशक में साक्षरता दर के संदर्भ में जो महत्पवूर्ण उपलब्धि हासिल हुई है, जैसा कि जनगणना आंकड़ों में प्रतिबिंबित हुआ है, वह प्रारंभिक शिक्षा के विस्तार के साथ-साथ विशेषत: साक्षर भारत सहित विभिन्न प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रमों के कार्यान्वयन का परिणाम है। इसके अतिरिक्त, सभी बच्चों के लिए आरटीई अधिनियम के लागू होने से प्रौढ़ निरक्षर जनसंख्या समूह में कमी करने में भी सहायता मिली है। तथापि, इन सभी महत्वपूर्ण नीतिगत हस्तक्षेपों के बावजूद भारत में निरक्षर व्यक्तियों की संख्या बहुत अधिक है। विश्व की कुल निरक्षर जनसंख्या का एक-तिहाई भाग भारत में है।

मेरे विचार में हम सभी के लिए वर्तमान में चल रहे कार्यक्रमों/कार्यकलापों की समग्र समीक्षा करने और उन महत्वपूर्ण क्षेत्रों, जिन पर अभी भी ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है, की पहचान करने के लिए यह सही अवसर है।

मैं यह जान कर हर्षित हूं कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने साक्षर भारत कार्यक्रम को और अधिक विषय-केंद्रित बनाने तथा यह सुनिश्चित करने के लिए, कि वर्ष 2022 तक सभी बच्चे, युवा और प्रौढ़ व्यक्ति और भी बेहतर कार्यकरण के लिए आवश्यक साक्षरता और संख्यात्मक कौशल अर्जित कर सकें, इस कार्यक्रम की पुनर्रचना करने का निर्णय लिया है। मैं यह जान कर भी हर्षित हूं कि साक्षर भारत कार्यक्रम के नए रूप में स्कूल/कॉलेज के छात्रों को भी शामिल किया जाएगा जिससे वे अपने निरक्षर अभिभावकों, दादा/दादी/नाना/नानी और अपने पड़ोसियों को पढ़ा सकें।

हमें साक्षरता कार्यक्रमों को और अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करना होगा। डिजिटल अधिगम सामग्री विभिन्न आयु वर्गों की अधिगम आवश्यकताओं को और भी प्रभावशाली ढंग से पूरा कर सकती है। यदि साक्षरता अधिगम को शिक्षार्थियों के दैनिक जीवन से जोड़ दिया जाए तो यह और भी सार्थक हो सकता है। समुदाय शिक्षा केन्द्रों को साक्षरता अधिगम और सामुदायिक अधिकारिता का केन्द्र बनाया जा सकता है।

मुझे प्रसन्नता है कि भारत यूनेस्को के नेतृत्व वाले 'ग्लोबल एलायंस फॉर लिटरेसी विदिन द फ्रेमवर्क ऑफ लाईफलाँग लर्निंग' कार्यक्रम का हिस्सा है। भारत अगले 15 वर्षों में विश्व के साक्षरता परिदृश्य को बदलने के इस वैश्विक प्रयास में अग्रणी योगदान दे सकता है।

अपनी बात समाप्त करने से पहले मैं प्रौढ़ साक्षरता के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने के लिए साक्षर भारत पुरस्कार प्राप्त करने वाले सभी व्यक्तियों को बधाई देता हूं। पुरस्कार प्राप्त करने वाले व्यक्तियों द्वारा किया गया उल्लेखनीय कार्य अन्य व्यक्तियों के लिए इस कार्यक्रम को अन्य ग्राम पंचायतों, जिलों और राज्यों तक ले जाने में प्रेरणादायक बन सकता है। मैं इस अवसर पर राज्य सरकारों, सिविल सोसाइटी संगठनों, गैर-सरकारी संगठनों, निगमित निकायों, बुद्धिजीवियों सहित सभी हितधारकों और अपने देशवासियों का आवाह्न करता हूं कि वे मिलकर भारत को पूर्ण साक्षर समाज में परिवर्तित करने का कार्य करें। मैं साक्षरता के क्षेत्र में सभी हितधारकों और लाभार्थियों से आग्रह करता हूं कि वे महात्मा गांधी और हमारे संविधान निर्माताओं के विज़न को पूरा करें। हमें साक्षर, शिक्षित, अधिकारिता-प्राप्त जनसंख्या के सुदृढ़ आधार पर नव-भारत का निर्माण करना है। हमें गुरूदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर के स्वतंत्रता के स्वर्ग के उस सपने का साकार करना है: "मन जहां डर से परे है और सिर जहाँ ऊंचा है, ज्ञान जहां मुक्त है; जहां संसार संकीर्ण घरेलू दीवारों से छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटा नहीं गया है।"
जय हिन्द।