5 सितम्बर, 2017 को शिक्षक दिवस के अवसर पर विज्ञान भवन, नई दिल्ली में स्कूली शिक्षकों को राष्ट्रीय पुरस्कार, 2016 प्रदान करने के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया अभिभाषण

नई दिल्ली | सितम्बर 5, 2017

आज शिक्षक दिवस के अवसर पर आपके बीच उपस्थित होने पर मुझे बेहद खुशी हो रही है। यह ऐसा दिन है जब हमारा देश राष्ट्र के विकास में शिक्षकों के असाधारण योगदान का उत्सव मनाता है। यह वह दिन है जब हम भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति, महान शिक्षक, महान बुद्धिजीवी, और हिंदू दर्शन के कुशल व्याख्याता डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को उनके जन्मदिवस पर श्रद्धापूर्वक याद करते हैं।

हमारे प्राचीन देश की सांस्कृतिक और शैक्षिक विरासत की पृष्ठणभूमि में मुझे आपके समक्ष अपने विचार व्यक्त करते हुए अत्यंत खुशी हो रही है।

भारतीय शिक्षा पद्धति का विकास स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ा हुआ है और यह सभी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के प्रति हमारे राष्ट्रनिर्माताओं की प्रतिबद्धता को प्रतिबिंबित करता है। इनमें से मैं कुछेक का ही नाम लूं तो गांधी जी, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, डा. बी. आर. अंबेडकर, पंडित मदन मोहन मालवीय और डा. जाकिर हुसैन इन सभी ने स्पष्टत: शिक्षा पर बल देते हुए उसे राष्ट्रीय विकास की सर्वाधिक महत्वपूर्ण आधारशिला के रूप में माना है।

वस्तुत:, आज का दिन हमारी उस समृद्ध सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को गर्व के साथ याद करने का दिन है, जो हमारी सामूहिक विरासत है। हमारा देश ऐसा देश है जहां शिक्षकों को प्रमुख स्थान दिया जाता रहा है और हमने उन्हें संस्कृत शब्द 'गुरु' की उपाधि से नवाजा है, जिसका अर्थ 'प्रकाश का स्रोत' है। वास्तव में, हमारी संस्कृति में शिक्षकों को जो आदर और सम्मान दिया जाता है, उसे इन लाइनों में स्पष्ट रूप से व्यक्त किया जा सकता है:

"गुरुर्व्रहमा" गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरा: गुरु साक्षात् परब्रह्मा तस्मै श्री गुरवे नम: अर्थात्- गुरु सृजनकर्ता बह्मा के समान है जो हमें शिक्षा की ओर उन्मुख करता है, वह पालक विष्णु के समान हमारी प्रतिभा का पोषण करता है और संहारक महेश्वर के समान संदेहों और नकारात्मक विचारों का संहार करता है, गुरु सर्वोच्च ईश्वर है और मैं ऐसे गुरु को प्रणाम करता हूं।

हम गुरुकुल पद्धति के उत्तराधिकारी हैं, जहां गुरु व शिष्य एक साथ रहते थे और स्नेहपूर्ण वातावरण में अध्ययन-अध्यापन करते थे। शैक्षिक अनुसंधान की यह पद्धति ऐसी पद्धति है जो शिक्षक और विद्यार्थी के बीच निरंतर संवाद पर आधारित है और इसमें 'विद्या' की अवधारणा 'अन्वेषण की प्रक्रिया' के समान है।

आप सभी भाग्यशाली हैं कि आपको अपनी कक्षाओं में प्रत्येक दिन और प्रत्येक मिनट छात्रों से संवाद के माध्यम से हमारे राष्ट्र के भाग्य का निर्माण कार्य का अनूठा अवसर मिलता है। आप अपने ज्ञान, कौशल और दृष्टिकोण के माध्यम से भारत के भविष्य को दिशा प्रदान कर रहे हैं।

यह एक कठिन कार्य है। यह बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य है और यदि यह कार्य भली-भांति संपन्न किया जाता है तो यह सर्वाधिक सुखदायी कार्य होता है। मेरे विचार से आप सभी शिक्षक 'भारत भाग्य विधाता' भारत के विकास को साकार रूप देने वाले हैं जो अथक रूप से छात्रों के व्यक्तित्व को आकार देने में अपना समय और ऊर्जा लगा रहे हैं और आगे चलकर ये छात्र उस नए भारत का निर्माण करेंगे जिसका हम सभी स्वप्न देख रहे हैं। शिक्षक समुदाय को अपने शब्दों और कर्मो के द्वारा युवाओं के चरित्र और उनके जाति संवेदनशील मस्तिष्कों को गढ़ने को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। महात्मा गांधी ने कहा था, "यदि शिक्षा से अच्छे चरित्र का निर्माण नहीं हो पाता है तो ऐसी अक्षर ज्ञान कराने वाली शिक्षा का कोई मूल्य नहीं हैं।"

स्वतंत्रता के पश्चात् गरीबी, अज्ञानता, बीमारियों और अवसरों की असमानता को दूर करने की दिशा में भारत ने बहुत विकास किया है। आज, देश के 95 प्रतिशत बच्चे स्कूल जाते हैं और आज हमारे देश में 1947 के मुकाबले कहीं अधिक विश्वविद्यालय और उच्च संस्थान हैं।

देश भर के 15 लाख प्राथमिक विद्यालयों में करीब 70 लाख शिक्षक 20 करोड़ बच्चों को पढ़ा रहे हैं। साक्षरता दर में निरंतर सुधार हो रहा है और 1947 में 18 प्रतिशत के मुकाबले वर्तमान में साक्षरता दर बढ़कर करीब 80 प्रतिशत हो गई है।

विदेशी शासकों ने हमें पढ़ाने, हमें शिक्षित करने की कभी परवाह नहीं की, क्योंकि हमारे देश के भविष्य में उनकी कोई रुचि नहीं थी। अब साक्षरता दर में निरंतर सुधार हो रहा है और इसमें और भी सुधार होना चाहिए। मुझे आशा है कि सरकार सभी जरूरी कदम उठाएगी ताकि कोई भी बच्चा स्कूली शिक्षा से वंचित न रहे, यह सरकार का मिशन होना चाहिए, यह सभी लोगों का दायित्व होना चाहिए। यह केवल शिक्षक का ही दायित्व नहीं है अपितु सभी जागरूक नागरिकों, माता-पिताओं, जन-प्रतिनिधियों और प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्त्तव्य है कि वे इस कार्य में शामिल हों और सुनिश्चित करे कि देश 100 प्रतिशत साक्षरता के लक्ष्य को हासिल करे।

यह कहने को कोई जरूरत नहीं है कि यदि भारत को अगले पांच वर्षों में शत-प्रतिशत साक्षरता की लक्ष्य हासिल करनी है तो शिक्षकों को इसमें गुरूत्तर दायित्व निभाना होगा।

लेकिन अभी भी बहुत कुछ हासिल किया जाना है और यह चिंता का विषय होना चाहिए कि राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षणों के अनुसार हाल के वर्षों में विद्यार्थियों के सीखने के स्तर में समग्र रूप से गिरावट दिखाई देती है। उच्च शिक्षा के संस्थानों में व्यापक रूप से अकादमिक मानकों में पर्याप्त सुधार लाने की जरूरत है।

स्कूली शिक्षा के समक्ष आज जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण चुनौतियां है, उनमें से एक है शिक्षा और शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार की जरूरत। यह प्रशंसनीय है कि हमने असाधारण प्रयास करके प्रत्येक बस्ती की पहुंच में विद्यालय स्थापित किए जाने का लक्ष्य हासिल किया है।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम से इस संकल्प को और अधिक मजबूती मिली है तथा प्रत्येक बच्चे को स्कूल तक लाने की दिशा में निरंतर जारी प्रयासों में सहयोग मिला है। तथापि, जिन बच्चों ने स्कूली पढ़ाई छोड़ दी है, उन पर विशेष ध्यान दिए जाने और उन्हें वापस स्कूल लाने के लिए सावधानीपूर्वक योजना बनाए जाने की जरूरत है और इस दिशा में शिक्षकों को उनकी जरूरतों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। किंतु इन बच्चों को स्कूल में लाने की जिम्मेदारी महज शिक्षकों पर नहीं है वरन यह सामूहिक रूप से समुदाय और माता-पिताओं की भी है जिन्हें स्कूल के साथ सक्रिय रूप से कार्य करना चाहिए।

आज के दिन हम शिक्षण के महान कार्य में शिक्षकों के सराहनीय और असाधारण योगदान को स्वीकार करते हुए उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान और उनकी उपलब्धियों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान करके अभिनंदन व्यक्त करते हैं। मुझे विश्वास है कि कई और ऐसे शिक्षक हैं जो आज यहां नहीं हे लेकिन वे उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं।

मैं आज इन पुरस्कारों को प्राप्त करने वाले आप सभी शिक्षकों को बधाई देता हूं और हमारे देश की कक्षाओं में शिक्षणरत अनेकों ऐसे नायकों के कार्य की भी हार्दिक सराहना करता हूं जिनके बारे में नहीं सुना गया है।

आज मैंने तेलंगाना के एक सेवारत आईपीएस अधिकारी डा. पी.एस. प्रवीण कुमार का लेख पढ़ा, उन्होंने लिखा है कि 'हमारा जीवन शिक्षकों के कारण है'। वे आगे लिखते हैं, 'आज अच्छे शिक्षक लुप्तप्राय हो गए हैं।' ईमानदारी से कहूं तो मैं आज जो कुछ भी हूं, वह अपने शिक्षकों की वजह से हूं। मैं जिस तरह बात करता हूं, जो कुछ पढ़ता हूं, मेरी वेशभूषा और मेरे कार्य, इन सभी पर मेरे शिक्षकों का गहरा प्रभाव पड़ा है।" श्री प्रवीण कुमार ने लिखा है कि उन्होंने मुझे जो भी कौशल सिखाए, उनसे मुझे अपना रास्ता बनाते हुए आगे बढ़ने और जीवन मूल्यों के प्रचार-प्रसार में सहायता मिली है। महान शिक्षकों की शिक्षाएं हममें जीवित रहती हैं, हम उन्हें अगली पीढ़ी को सौंपते हैं। हमारा जीवन उनके कारण है, वे अमर हैं।"

लोगों के चरित्र, उनकी क्षमता, उनके सामर्थ्य और उनके आचरण, अनुशासन, उनकी गतिशीलता और उनके समर्पण के आधार पर ही उनके बारे में निर्णय किया जाना चाहिए, उनका चयन और उनका चुनाव किया जाना चाहिए।

इक्कीसवीं शताब्दी में शिक्षा संबंधी अंतरराष्ट्रीय आयोग द्वारा यूनेस्को को सौंपी गई 1996 की एक रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षार्जन के चार स्तंभ हैं।

ज्ञान प्राप्त करने के लिए शिक्षार्जन: विश्व को बेहतर ढंग से समझने के लिए आवश्यक ज्ञान से युक्त साधन उपलब्ध कराना।

कुछ करने के लिए शिक्षार्जन: ऐसे कौशल प्रदान करना जिससे व्यक्ति वैश्विक अर्थव्यवस्था और समाज में कारगर ढंग से भागीदारी कर सके।

कुछ बनने के लिए शिक्षार्जन: आत्मविश्लेषणात्मक और सामाजिक कौशल प्रदान करना ताकि व्यक्ति सर्वप्रकार से सम्पूर्ण मनुष्य बनने की दिशा में अपनी ईष्टतम क्षमताओं का विकास कर सके।

शिक्षार्जन ताकि एक साथ मिलकर रह सकें: व्यक्तियों को समाज और मानवीय संबंधों के सभी स्तरों पर मानवाधिकारों, लोकतांत्रिक सिद्धांतों, अंतरसांस्कृतिक समझबूझ और सम्मान और शांति में निहित मूल्यों से परिचित करना ताकि विभिन्न व्यक्ति और विभिन्न समाज शांति और सौहार्द्र से रह सकें।

आज संपूर्ण विश्व आतंकवाद की समस्या का सामना कर रहा है। आतंकवाद राष्ट्र का दुश्मन है। हमें शुरुआत से ही अपने बच्चों को शिक्षा देनी चाहिए कि किसी भी तरह के आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता है। यह किसी क्षेत्र तक सीमित नहीं है, यह मानवता के लिए खतरा है और सभी लोगों को यह समझ जाना चाहिए कि आतंकवाद से सख्ती से निपटा जाना चाहिए। अब सभी देश इस समस्या को महसूस कर रहे हैं। ब्रिक्स नेताओं ने सामूहिक रूप से आतंकवाद की आलोचना की है।.

हमें अपने बच्चों को यह समझाना चाहिए और ऐसा व्यवहार करना चाहिए कि हम सभी एक हैं। जाति, नस्ल, लिंग, धर्म और क्षेत्र अलग-अलग क्यों न हों लेकिन भारत एक है। भारत एक राष्ट्र है, एक देश है और उसके लोग एक हैं। आपकी भाषाएं अलग-अलग हो सकती हैं। हो सकता है आप अलग-अलग भाषाएं बोलते हों। आपकी वेशभूषा भिन्न-भिन्न हो सकती है, आपकी भिन्न-भिन्न धर्मों में आस्थाएं हो सकती हैं, किंतु धर्म आराधना का एक तरीका होता है। हमें इन सब के बारे में चिंता नहीं करनी चाहिए, इसे व्यक्तियों पर ही छोड़ देना चाहिए। हमारा ध्यान संस्कृति पर होना चाहिए। संस्कृति जीवन जीने की शैली है। हमें मातृ भाषा के शिक्षण पर ध्यान देना चाहिए।

कई सफल शिक्षकों ने अपने स्कूलों को अपने ज्ञान, कौशल और दृष्टिकोण के माध्यम से खुशहाल शिक्षा केंद्रों के रूप में बदल दिया है, जिनमें से आप भी एक देदीप्यमान उदाहरण हैं।

डा. राधाकृष्णन ने कहा था, "देश की सर्वोत्तम प्रतिभाओं को शिक्षक होना चाहिए।" अच्छे शिक्षक अच्छे शिक्षु भी होते हैं। वे हर समय नई चीजें सीखते रहते हैं और विभिन्न स्रोतों से ज्ञान प्राप्त करते रहते हैं।

अच्छी जानकारी के अतिरिक्त, अध्यापकों के पास उस जानकारी को छात्रों तक प्रभावी रूप से संप्रेषित करने का कौशल भी होना चाहिए। उनमें जिज्ञासा को बढ़ाने, कक्षाओं में बातचीत के अवसर सृजित करने तथा बच्चों को खोजने, सोचने और अभिव्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित करने की योग्यता होनी चाहिए। उन्हें कक्षा में प्राप्त ज्ञान को विद्यार्थी के जीवन से सृजनात्मक रूप से जोड़ना चाहिए। हाल के समय में प्रौद्योगिकी सस्ती हो गई है और उसकी पहुंच सर्वव्यापी हो गई है।

यह जानकर खुशी हुई है कि भारत के 44 प्रतिशत ग्रामीण माध्यमिक विद्यालयों में कंम्प्यूटर हैं। अध्यापकों की सहायता के लिए प्रौद्योगिकी एक बहुत शक्तिशाली माध्यम बन सकती है। अनेक शिक्षक इन माध्यमों का प्रभावशाली तरीके से इस्तेमाल कर रहे हैं। उनमें से कुछ 'ऐप्स' भी तैयार कर रहे हैं। हमें ऐसे नव-प्रवर्तनों को बढ़ावा देना चाहिए जो हमारी ज्ञान-अर्जन प्रक्रिया को बेहतर बनाते हैं।

बेहतरीन अध्यापक जो अपने छात्रों के ऊपर अमिट छाप छोड़ते हैं, वे आदर्श रहे हैं और अपने हावभाव एवं आचरण के माध्यम से उन मूल्यों और व्यवहार के लिए उदाहरण प्रस्तुत करते हैं जो वे बच्चों को देना चाहते हैं।

कहा जाता है कि संस्कार ग्रहण किए जाते हैं। वे सिखाए नहीं जा सकते। आदर्शपूर्ण आचरण आदर्श विचारधारा से अधिक महत्वपूर्ण होता है। यदि शिक्षक दयालु और करुणामय होते हैं तो बच्चे दयालु और करुणामय होना सीखते हैं। छात्र कक्षा में धैर्य, सहिष्णुता और लोकतांत्रिक कार्यकरण का मूल्य जानेंगे जब शिक्षक इन मूल्यों को आत्मसात कर लेंगे और कक्षा में उसके व्यवहार में मूल्य परिलक्षित होंगे। p>

बच्चों में आलोचनात्मक, सृजनात्मक और विचारात्मक तथा समस्या का हल निकालने वाली योग्यताओं का विकास करने के लिए शिक्षक को अपने कौशल को निखारना होगा।

जैसे कि कहा गया है:-

"मध्यम दर्जे का अध्यापक बताता है,
उत्तम अध्यापक समझाता है
श्रेष्ठ अध्यापक करके बताता है,
महान अध्यापक प्रेरित करता है।"

आज हमें अधिक से अधिक महान अध्यापकों की आवश्यकता है। हमें अपनी कक्षाओं में प्रेरणादायी, परिवर्तनकारी नेतृत्व की आवश्यकता है।

केवल विशाल भवन विद्यालय को महान नहीं बनाता, बल्कि उसे शिक्षकों का समर्पण और प्रतिबद्धता महान बनाते हैं।

इस संदर्भ में, मैं स्वामी विवेकानंद के शब्दों का स्मरण करना चाहूंगा, जिन्होंने कहा था, यदि आप सच्चे नहीं हैं और विश्व के समूचे विज्ञान को जानते हैं, तो उससे आपको कोई मदद नहीं मिलेगी, आप पढ़ने वाली सारी पुस्तकों में दफ्ऩ हो जाएंगे, परंतु उसकी कोई अधिक सार्थकता नहीं रह जाएगी। यह तो दिल है जो लक्ष्य तक पहुंचता है, अपने दिल की सुनिए। एक निश्छल हृदय बौद्धिकता से परे भी देखता है, और उससे प्रेरणा ग्रहण करता है। ऐसा अध्यापक जो अपने हृदय से बच्चों को प्यार करता है, वही वास्तविक राष्ट्र निर्माता होता है जो ऐसे राष्ट्र की बुनियाद रख सकता है जो प्रगति और विकास के लिए प्रतिबद्ध है। .

हमें बच्चों के अनुकूल ऐसे और अधिक विद्यालयों की आवश्यकता है जहां के शिक्षक स्नेही, ओजस्वी और प्रेरणादायी हों।

उत्तम गुणवत्तापूर्ण पूर्व-प्राथमिक और बुनियादी शिक्षा एक विकसित भारत का निर्माण करने के लिए आवश्यक आधारभूत तत्व हैं। एक ऐसे देश में जहां पर ज्ञान और शिक्षा के प्रति ऐसी उच्च प्रतिबद्धता हो, हम खराब गुणवत्ता वाली शिक्षा को सही बने रहने दे सकते। जैसा 1964 में तत्कालीन शिक्षा मंत्री श्री एम. सी. छागला ने कहा था: हमारे संविधान निर्माताओं की मंशा यह नहीं थी कि हम ढांचे खड़े कर दें, वहां छात्रों को रख दें, अप्रशिक्षित शिक्षक दे दें, गुणवत्ताहीन पाठ्यपुस्तकें दे दें, उनके पास खेल के मैदान न हों, और यह कहें कि हमने अनुच्छेद 45 का पालन कर दिया है और हमारी प्राथमिक शिक्षा में विस्तार हो रहा है .... उनका मकसद था कि हमारे 6 से 14 साल के बच्चों को वास्तविक शिक्षा दी जानी चाहिए।"

'वास्तविक शिक्षा' का उद्देश्य होना चाहिए छात्रों के चहुँमुखी विकास को बढ़ावा देना। छात्रों का समग्र विकास होना चाहिए जिसमें स्व-रोजगार अथवा लाभकारी रोजगार के लिए शैक्षिक उत्कृष्टता एवं कौशल पर समान रूप से जोर दिया जाना चाहिए।

पाठ्यक्रम में भारत के नैतिक मूल्यों, संस्कृति तथा धरोहर को उचित महत्व दिया जाना चाहिए। इसके साथ-साथ शारीरिक प्रशिक्षण, शिल्प, खेल, एनसीसी प्रशिक्षण, संगीत और यहां तक कि बागवानी जैसे विषयों को छात्रों के समग्र विकास के लिए पाठ्यक्रमों में सम्मिलित किया जाना चाहिए। छात्रों का स्वास्थ्य बहुत महत्वपूर्ण है। एक स्वस्थ राष्ट्र समृद्ध राष्ट्र तो बन सकता है, परंतु एक समृद्ध राष्ट्र स्वस्थ राष्ट्र नहीं भी बन सकता है।

भारत को एक समय 'विश्व गुरू' के नाम से जाना जाता था, जहां विश्व भर से ज्ञान की तलाश करने वाले तमाम लोग हमारे प्राचीन स्थलों जैसे नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालयों में एकत्र होते थे। फ्रेडरिक मैक्सम्यूलर ने निम्नलिखित शब्दों में इसकी प्रशंसा की है:

"यदि मुझसे पूछा जाए किस अंबर के नीचे मानव मस्तिष्क ने अपने चुनिंदा उपहारों को सर्वाधिक विकसित किया है, जीवन की सबसे बड़ी समस्याओं पर सबसे ज्यादा गहराई से विचार किया है, और उनमें से कुछ का समाधान भी पाया है, जो उनका भी ध्यान आकृष्ट करने की पूरी पात्रता रखते हैं जिन्होंने प्लेटो और कान्ट का अध्ययन किया है - तो मैं भारत की ओर संकेत करूंगा।"

तथापि, कई आक्रमणों और औपनिवेशीकरण के परिणामस्वरूप भारत ने अपना सर्वश्रेष्ठ स्थान खो दिया। अब भारत के लिए पुन: वह समय आ गया है जब वह "विश्व गुरू", उत्कृष्ट शिक्षा केन्द्र के रूप में अपना स्थान पुन: प्राप्त करे। यह तब हो सकता है जब हम विश्व भर से सर्वश्रेष्ठ उदाहरणों से प्रेरणा लें जैसे कि प्राचीन महर्षियों ने सुझाव दिया था: आनो भद्रा: क्रतवो, यन्तु विश्वत:" जिसका अर्थ है "हमारे पास विश्व के चारों ओर से कल्याणकारी विचार आते रहें ।"

शिक्षकों को इसे एक पवित्र मिशन के रूप में लेना चाहिए, एक ऐसा मिशन जिसका उद्देश्य यह हो कि सभी बच्चे इक्कीसवीं सदी के नागरिक के लिए आवश्यक ज्ञान, कौशल तथा प्रवृत्ति प्राप्त कर सके।

हमें ऐसे और अधिक शिक्षक चाहिए जो हमारे बच्चों में लोकतंत्र, समता, स्वतंत्रता, न्याय, पंथनिरपेक्षता के मूल्यों के प्रति समर्पण, दूसरों के कल्याण की चिंता, मानवीय गरिमा तथा मानवाधिकारों के प्रति सम्मान उत्पन्न कर सकें। बच्चों को हमारी समृद्ध विरासत एवं गौरवपूर्ण इतिहास से अवगत कराया जाना चाहिए।

मैं समस्त पुरस्कार विजेताओं को बधाई देता हूँ, जिनकी सराहनीय व्यवसायिक प्रतिब्द्धता को इस पुरस्कार के माध्यम से मान्यता प्रदान की गयी है।

मै देश के समस्त स्तरों यथा पूर्व-प्राथमिक केन्द्रों, प्राथमिक विद्यालयों, उच्च विद्यालयों, महाविद्यालयों तथा विश्व विद्यालयों पर शिक्षकों से आह्वान करता हूँ कि वे अपने आपको पुन:समर्पित करें और यह शपथ लें कि वे अध्ययन कक्षों को खुशहाल शिक्षण केन्द्रों के रूप में परिवर्तित कर देंगे और समूचे शिक्षातंत्र को आज के विद्यमान स्तर से कहीं अधिक ऊंचाई पर ले जाएंगे।

मुझे विश्वास है कि सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि अवसंरचना की दृष्टि से शिक्षा तंत्र तथा अनुकूल कार्य-वातावरण को काफी सुदृढ़ किया जाए जहां शिक्षार्जन की गुणवत्ता मुख्य हो।

मैं आशा करता हूँ कि एक नए भारत की विकास संरचना में मानव विकास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और आजीवन शिक्षार्जन को आधारशिला बनाने में नया बल मिलेगा।

हम अतीत की उपलब्धियों पर निर्भर नहीं रह सकते। और न ही हम विशिष्टता के कुछ ही क्षेत्रों पर संतुष्ट रह सकते हैं। हमें एक ऐसे तंत्र की आवश्यकता है जो सभी बच्चों, किशोरों और युवाओं की ज्ञानार्जन संबंधी आवश्यकताओं की प्रभावशाली रूप में पूर्ति करे और अनवरत रूप से नवप्रवर्तन करता रहे।

हमें ऐसे शिक्षकों की आवश्यकता है जिनके पास हमारे देश में शिक्षा की तस्वीर को बदलने के लिए अपेक्षित योग्यता, आत्मविश्वास एवं समर्पण हो। उन्हें हर घर से सभी बच्चों को नामांकित करने के लिए समुदाय के सदस्यों और माता-पिताओं के साथ मिलकर कार्य करना चाहिए जैसे कि गुजरात, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में शिक्षक करते रहे हैं।

यदि भारत को फिर विश्व ज्ञान का केन्द्र बनाना है तो शिक्षकों सहित समूचे शिक्षा तंत्र को 'सुधार, प्रदर्शन और परिवर्तन' के संदेश को आत्मसात् कर लेना चाहिए।

इस पावन अवसर पर देश भर के सभी शिक्षकों को पुन: बधाई देता हूँ और आने वाले वर्षों में ज्ञान-अर्जन को बढ़ावा देने वाली लंबी रोमांचक यात्रा के लिए शुभकामनाएं देता हूँ।
जय हिंद।