31 अगस्त, 2019 को हैदराबाद में इंडियन स्कूल ऑफ बिज़नेस में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

हैदराबाद | अगस्त 31, 2019

"डेक्कन वार्ता के दूसरे संस्करण का उद्घाटन करने के लिए हैदराबाद के इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस में आज यहां आना मेरे लिए बहुत खुशी की बात है।

मैं आर्थिक क्षेत्र में सभी राष्ट्रों के समक्ष उत्पन्न महत्वपूर्ण और सामयिक चुनौतियों पर विचार-विमर्श करने के लिए इतनी विविध और प्रतिष्ठित सभा को एक समान मंच पर लाने के लिए विदेश मंत्रालय और आईएसबी दोनों को बधाई देना चाहता हूं।

यह देखना सुखद है कि इस वार्ता में अत्यधिक रूचि ली गई है और इसे अपार समर्थन मिला है। आर्थिक कूटनीति को अपनी अर्थव्यवस्था के भीतर विकास को बढ़ावा देने और अन्य देशों में वृद्धि और विकास को बढ़ावा देने के रूप में मजबूत करना भारत की विदेश नीति का एक प्रमुख आधार है, और हम इसे मजबूत करने के लिए सक्रिय प्रयास कर रहे हैं।

हम वैश्वीकरण के एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जिसमें दुनिया पहले से कहीं ज्यादा जुड़ी हुई है। हालांकि, यह भी सच है कि हम जिस "ग्लोबल विलेज" के आदी हो गए हैं, वह अभूतपूर्व तरीकों तेजी से बदल रहा है। इस तेजी से बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक परिदृश्य में प्रत्येक देश को सावधानीपूर्वक तैयार की गई रणनीतिक, गतिशील और सुचारू प्रतिक्रियाओं को अपनाना होगा।

बहनों और भाइयो,

व्यापार और वाणिज्य के पुराने तरीके निरंतर बदलाव की प्रक्रिया में हैं - नियम-आधारित, भेदभाव-रहित और सर्व-समावेशी बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली जो संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन और अंतर्राष्ट्रीय कानून के आसपास केंद्रित है, को अनिश्चित भविष्य का सामना करना पड़ रहा है।

इस स्थिति से किसी भी देश को कोई लाभ नहीं होता, लेकिन यह विकासशील देश हैं जो आर्थिक सहयोग की प्रक्रियाओं से अलग-थलग महसूस कर रहे हैं और उन्हें गिरावट का अधिकतम परिणाम भुगतना पड़ रहा है।

इन परिवर्तनों को देखते हुए, यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि हम वैश्विक निर्णय लेने में उभरते बाजारों और विकासशील देशों की अधिक भागीदारी सुनिश्चित करके वैश्विक अभिशासन को अधिक प्रतिनिधिपरक, बनाने के प्रयासों का समर्थन करें।

इसकी असफलताओं और कमियों के बावजूद, हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं ने संभावनाओं की दुनिया खोल दी है।

भारत जैसे युवा, गतिशील और विकासशील देश के लिए वैश्वीकरण ने दुनिया के बाजारों तक पहुंच को सुगम बना दिया है और इसने भारत की आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया के साथ मिलकर आज के युवा भारतीयों के लिए रोजगार का बाजार बुनियादी तौर पर अलग बना दिया है, जो कुछ दशकों पहले हुआ करता था। यह इसलिए संभव हो पाया क्योंकि हमने वैश्वीकरण की प्रक्रिया को अपनाया और इसे अपने लिए कारगर बनाया।

भारत विश्व की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था है जो वैश्विक आर्थिक वृद्धि में 15 प्रतिशत से अधिक का योगदान देती है और आने वाली कई सदियों तक वैश्विक आर्थिक मजबूती में योगदान देती रहेगी।

जैसा कि हम सभी जानते हैं, 21वीं सदी एशियाई सदी के नाम से जानी जा रही है और एशिया और उससे आगे शांति, सुरक्षा और विकास के संवर्धन में भारत की एक अहम भूमिका है।

भारत जलवायु परिवर्तन, प्रौद्योगिकी विभाजन, व्यापार विवाद, आतंकवाद, संयोजकता और समुद्री खतरों जैसी कई साझी चुनौतियों का समाधान करने के लिए एक नियम-आधारित बहुपक्षीय क्रम का समर्थन करता है। । लेकिन जब हम एकपक्षीयवाद और संरक्षणवाद के मुद्दों का सामना कर रहे हैं, तो हमें इस तथ्य के प्रति सचेत होने की आवश्यकता है कि पहले भारत और अन्य विकासशील देशों ने ही मौजूदा बहुपक्षीय प्रणाली में सुधार के लिए स्पष्ट आह्वान किया था ताकि विकासशील देशों का वैश्विक अभिशासन में अधिक मत हो। नतीजतन, हम बहुपक्षवाद पर यथास्थिति के पक्षधर नहीं है।

संरक्षणवादी प्रवृत्तियों की प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने के लिए हमें सुधारवादी बहुपक्षीयवाद की आवश्यकता है। हमें अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक, वित्तीय और व्यावसायिक संस्थानों में अत्यावश्यक सुधार लाने की आवश्यकता है ताकि वे जमीनी वास्तविकताओं को और अधिक स्पष्ट रूप से प्रस्तुत कर सकें और नई चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हो सकें।

भौतिक और डिजिटल दोनों तरह से बढ़ा हुआ क्षेत्रीय संपर्क, व्यापार को बढ़ावा दे सकता है और समृद्धि और विकास लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। हालांकि, इस तरह की पहलों को सफल और सतत होने के लिए उन्हें पारदर्शी, समावेशी होना चाहिए और संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सिद्धांतों का सम्मान करना चाहिए।

भारत अंतर-क्षेत्रीय व्यापार को विस्तार देने के लिए अपने पड़ोसी देशों के साथ द्विपक्षीय स्तर और बीआईएमएसटीईसी (बिम्स्टेक) और हिन्द महासागर क्षेत्र (आईओआर) जैसे क्षेत्रीय मंचों के माध्यम से संपर्क अवसंरचना में वृद्धि पर विशेष ध्यान केन्द्रित कर रहा है। हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में भारत की दृष्टि एसएजीएआर (सागर)- क्षेत्र में सबकी सुरक्षा और वृद्धि पर आधारित है। भारत सभी के लाभ के लिए महासागरों को खुला, सुरक्षित और मुक्त रखने के सभी प्रयासों का समर्थन करेगा।

अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका की अपनी आधिकारिक यात्राओं के दौरान, मैंने व्यक्तिगत रूप से दक्षिण के देशों के साथ मजबूत आर्थिक और निवेश संबंधों की जबरदस्त क्षमता देखी है। ऐसे अनेक अनुपूरक हैं, जिनका पारस्परिक लाभ के लिए दोहन किया जा सकता है।

विकासपरक दृष्टिकोण के साथ प्रभावी आर्थिक कूटनीति इस क्षमता को वास्तविक रूप देने के लिए महत्वपूर्ण है। भारत ने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि आर्थिक जुड़ाव से देशों को कर्ज के जाल में नहीं फंसना चाहिए और न ही उनके विकास के लिए स्थान को सीमित करना चाहिए। विकास भागीदारी टिकाऊ मॉडल पर आधारित होनी चाहिए, जो उचित और उपयुक्त हो, और स्थानीय प्राथमिकताओं और क्षमताओं द्वारा निर्देशित हों।

अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों को हमारे विकास भागीदारी कार्यक्रम के तहत भारत द्वारा दिए गए समर्थन में शिक्षा, ऊर्जा और कौशल विकास और विघटनकारी प्रौद्योगिकियों के महत्वपूर्ण क्षेत्रों को शामिल किया जा रहा है जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, साइबर सुरक्षा के मुद्दे आदि शामिल हैं।

इस प्रकार, हम ई-आईटीईसी कार्यक्रम, टेली-मेडिसिन और टेली-एजुकेशन और पैन-अफ्रीका ई-नेटवर्क परियोजना लाए हैं। ये ऐसे क्षेत्र हैं जिनकी अफ्रीका के पारंपरिक विकास साझेदारों ने अनदेखी की है। लेकिन भारत अब हमारी विकास साझेदारी के इन बहुत महत्वपूर्ण आयामों को सुधारने पर कार्य कर रहा है।

बहनों और भाइयो,

प्रौद्योगिकी वर्तमान आर्थिक और व्यापार प्रणाली को आकार देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है। पिछले 2-3 दशकों में तीव्र वैश्विक आर्थिक एकीकरण को अनिवार्य रूप से आईटी क्रांति द्वारा बढ़ावा दिया गया था। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इंटरनेट ऑफ थिंग्स जैसी नई डिजिटल प्रौद्योगिकियां वैश्विक आर्थिक गतिविधि को पुनर्जीवित करने के लिए बहुत जरूरी प्रोत्साहन प्रदान कर सकती हैं। साथ ही, हमें इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि वे प्रौद्योगिकी / डिजिटल विभाजन को बढ़ा सकते हैं और इन प्रौद्योगिकियों पर सुरक्षा और नियंत्रण से संबंधित वैध चिंताओं के कारण वैश्विक व्यापार के विभागीकरण की ओर ले जा सकते हैं।

भारत का मानना है कि विकासशील देशों के लिए चौथी औद्योगिक क्रांति में शामिल होने और लोगों के जीवन को सकारात्मक रूप से बदलने के लिए नई तकनीकों को अपनाना एक आवश्यकता है। इसके लिए, हमें वैश्विक और क्षेत्रीय स्तरों पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए उपयुक्त रूपरेखाओं को देखना होगा जो डिजिटल विभाजन से बच सकें और यह सुनिश्चित कर सकें कि चौथी औद्योगिक क्रांति एक समावेशी क्रांति हो।

इस संदर्भ में, यह दोहराया जाना उचित होगा कि भारत आईसीटी और डिजिटल प्रौद्योगिकियों के लिए एक खुले, सुरक्षित, स्थिर, सुलभ और गैर-भेदभावपूर्ण वातावरण का समर्थन करता है और आईसीटी से संबंधित सुरक्षा मुद्दों पर चर्चा में संयुक्त राष्ट्र की केन्द्रीय भूमिका को मानता है।

भारत इस मामले पर संयुक्त राष्ट्र के एक ओपन-एंड वर्किंग ग्रुप की स्थापना का स्वागत करता है, साथ ही सरकारी विशेषज्ञों के समूह (जीजीई) के एक नए संस्करण की शुरूआत का भी स्वागत करता है।

प्रौद्योगिकी साझेदारी को भी नवोन्मेष और स्वदेशीकरण को बढ़ावा देना चाहिए ताकि उससे सतत लाभ हो। यह सीधे क्षमता निर्माण और मानव संसाधन के उचित कौशल से संबंधित है। उच्च शिक्षा और तकनीकी प्रशिक्षण में सहयोग इस संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है। मुझे यह जानकर खुशी हुई कि आज की वार्ता के दौरान आप इन दोनों विषयों पर विचार-विमर्श करेंगे।

मुझे विश्वास है कि आपने हैदराबाद शहर में इस वार्ता को आयोजित करने की प्रासंगिकता पर ध्यान दिया होगा। हैदराबाद उन लीक से हटकर प्रौद्योगिकियों का केंद्र रहा है जो देश में नवोन्मेषों को प्रोत्साहन दे रही हैं, और डिजिटल युग की विभिन्न आकांक्षाओं को पूरा करने का प्रयास कर रही है। टी-हब का मुख्यालय इस शहर में है जो अपनी तरह का अकेला और सबसे बड़ा स्टार्ट-अप इनक्यूबेटर है और हमारी कंपनियों को एक नवोन्मेष-संचालित पारिस्थितिकी तंत्र प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

हैदराबाद भारत के उन पहले शहरों में से एक है जो आईटी/आईटीईएस क्षेत्र की वृद्धि का साक्षी है और देश के आईटी निर्यात में 11% से अधिक का योगदान देता है। इसके अलावा, हैदराबाद फार्मा, जैव प्रौद्योगिकी और चिकित्सा प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में भी तेजी से विकास कर रहा है, जिसमें हैदराबाद के पास जीनोम घाटी एशिया के प्रमुख जैव प्रौद्योगिकी और अनुसंधान और विकास केंद्रों में से एक है। आज, हैदराबाद अपने प्रतिभा पूल, जीवंत जीवन विज्ञान और प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र, प्रमुख अनुसंधान संस्थानों की उपस्थिति, तत्काल कब्जे वाले प्रयोगशाला स्थान की उपलब्धता और सक्रिय सरकारी समर्थन के लिए सभी प्रकार की जीवन विज्ञान कंपनियों के लिए गंतव्य की पसंद के रूप में उभरा है।

अंत में, मैं कहना चाहूंगा कि चुनौतीपूर्ण समय के बावजूद, मैं आशान्वित हूं कि हम वैश्विक व्यापार और आर्थिक जुड़ाव के लिए नए और उभरते अवरोधों को सामूहिक रूप से दूर कर सकते हैं, और सभी के लिए स्वीकार्य नवोन्मेषी और सतत समाधान तैयार कर सकते हैं। मुझे उम्मीद है कि आज आपके विचार-विमर्श इस प्रयोग में योगदान देंगे।

मैं वार्ता की पूर्ण सफलता की कामना करता हूं। और साथ ही, मेरी इच्छा है कि आपको वार्ता के बाद ही डेक्कन वार्ता के डेक्कन हिस्से को जानने और हैदराबाद शहर में उपलब्ध विभिन्न प्रकार के आतिथ्य को जानने का अवसर मिले।

धन्यवाद!