30 नवंबर, 2019 को देहरादून, उत्तराखंड में पेट्रोलियम और ऊर्जा अध्ययन विश्वविद्यालय के 17वें दीक्षांत समारोह के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

देहरादून | नवम्बर 30, 2019

"मेरे प्रिय छात्रों,

मुझे आप सभी के इस महान संस्थान के पोर्टल से स्नातक होने पर गौरव और अभिमान के इन पलों को साझा करते हुए आज अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है।

मैं आप सभी को अनेक वर्षों की अथक और कड़ी मेहनत के बाद, इन प्रतिष्ठित डिग्रियों को अर्जित करने पर हार्दिक बधाई देता हूँ। आप वास्तव में इन उपाधियों और पुरस्कारों के योग्य हैं, जो आज आपको प्रदान किए जा रहे हैं।

मैं उन अभिभावकों को भी बधाई देता हूँ जिनके बच्चे आज स्नातक की डिग्री पूरी कर रहे हैं। मैं शिक्षण बिरादरी को अपने स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में हमारे देश के भविष्य का सावधानीपूर्वक और समर्पित रूप से प्रोत्साहन देने के लिए भी बधाई देता हूँ।

मैं इस अवसर पर इस विश्वविद्यालय के संस्थापकों को उनकी दूरदर्शिता और 16 साल पहले, 2003 में इस संस्थान को बनाने के लिए की गई अग्रणी पहल के लिए बधाई देता हूँ। मुझे बताया गया है कि यूपीईएस के 15000 से अधिक पूर्व छात्र पहले से ही 700 से अधिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों में काम कर रहे हैं।

मुझे यह जानकर खुशी हुई कि यूपीईएस के अपने स्वयं के दो परिसर हैं जिनमें 06 स्कूल हैं। यह वास्तव में उल्लेखनीय है कि 11,000 से अधिक नियमित छात्र इन स्कूलों में चलाए जा रहे 90 विशेष कार्यक्रमों में स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर अध्ययन कर रहे हैं।

मैं विश्वविद्यालय की तेल और गैस, विद्युत, अवसंरचना, सूचना प्रौद्योगिकी, विमानन, पोत परिवहन, मोटर वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के उच्च विकास क्षेत्रों में उद्योग केंद्रित शिक्षा प्रदान करने के लिए सराहना करता हूँ।

मुझे यह भी बताया गया है कि छात्रों को भर्ती करने के लिए कई कंपनियाँ प्रति वर्ष परिसर का दौरा करती हैं और मुझे यह जानकर काफी खुशी हुई है कि पहले स्नातक बैच से ही, योग्य छात्रों के कैंपस प्लेसमेंट में वृद्धि हुई है।

मुझे यह जानकर भी खुशी हुई कि यूपीईएस में सभी विषयों के छात्र उद्योग या कॉर्पोरेट इंटर्नशिप के लिए आवेदन करते हैं।

यह वास्तव में खुशी की बात है कि यूपीईएस अपने संकाय के लिए "अभिज्ञात" नाम से एक "इंडस्ट्री अटैचमेंट" मॉड्यूल चलाता है। इस प्रकार समकालीन उद्योग दृष्टिकोण को कक्षाओं में शामिल किया गया है।

मैं लगभग 60 से अधिक विश्वविद्यालयों और संस्थानों के साथ समझौता ज्ञापनों के माध्यम से 05 महाद्वीपों में अपनी पहचान स्थापित करने के लिए भी संस्थान की सराहना करता हूं।

मैं विशेष रूप से यह जानकर उत्साहित हूँ कि यूपीईएस कई परियोजनाओं पर "नीति आयोग " के साथ मिलकर काम कर रहा है और ऊष्मायन/उद्यमिता तथा स्टार्ट-अप पर भी ध्यान केंद्रित कर रहा है।

मैं एक बार फिर से आप सभी को इस महत्वपूर्ण अवसर पर बधाई देता हूं।

मेरी प्यारी बहनों और भाइयों,

आज दुनिया का ध्यान भारत पर टिका हुआ है। यह दुनिया की अधिकांश प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बहुत तेज गति से बढ़ रहा है। यहाँ बड़ी तादाद में युवा आबादी है जिसकी 50 प्रतिशत जनसंख्या 25 वर्ष से कम आयु की है।

हमारे पास एक संभावित जनसांख्यिकीय लाभांश है, जिसका लाभ उठाया जाना शेष है।

लेकिन यदि समावेशी एवं सतत वृद्धि तथा विकास के लिए इस जनसांख्यिकीय लाभांश का इस्तेमाल करना और इसका लाभ उठाना है, तो हमारे युवाओं को क्षेत्र विशेष पर केंद्रित शिक्षा, कौशल और विशेषज्ञता से लैस करना होगा।

कई रोजगार रिपोर्टों में बताया गया है कि हाल के दिनों में युवाओं के रोजगार में कमी आई है। हमें यह समझना चाहिए कि हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जो अभूतपूर्व दर से विकास कर रही है और बदल रही है।

प्रगति की गति का निर्धारण करने का परिभाषित कारक तकनीकी प्रगति है।

कोई भी संस्थान तकनीकी प्रगति और व्यवधान की अप्रत्याशितता से खुद को अलग नहीं रख सकता है। संस्थानों की सफलता इस बात में नहीं है कि हम अगले कुछ वर्षों में क्या करेंगे, बल्कि इसमें है कि हम भविष्य के लिए तत्पर पेशेवर बनाने में कितने सक्षम हैं।

भारत को संपूर्ण शिक्षा प्रणाली पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। हमें परिवर्तन को अपनाना होगा या फिर पीछे रहने का जोखिम उठाने के लिए तैयार रहना होगा।

हमारे शैक्षिक संस्थानों को भविष्य की आवश्यकताओं को भाँप लेने और उनके साथ सामंजस्य स्थापित करने, प्रगति करने और व्यवधानों को हल करने में सक्षम होना चाहिए।

हमें रटन्त विद्या वाली शिक्षण पद्धति को त्याग देना चाहिए और विविध प्रकार की जानकारी, समस्याओं के समाधान, निर्णय लेने और विश्लेषण करने को अपनाने पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

स्कूलों में डिजिटल कौशल के साथ-साथ सोचने-समझने के सिद्धांतों को पेश किया जाना चाहिए।

छात्रों को वास्तविक जीवन के माहौल में क्या अपेक्षित है, इसके बारे में जागरूक किया जाना चाहिए और उनका मार्गदर्शन किया जाना चाहिए और उन्हें इसकी सलाह दी जानी चाहिए।

चौथी औद्योगिक क्रांति आसन्न ही है और मैं अपने शिक्षण संस्थानों से आग्रह करता हूँ कि वे ज्ञान और कौशल हासिल करके बड़ी छलांग लगाएँ।

आज हमारे देश में 900 से अधिक विश्वविद्यालय हैं। लेकिन दुनिया के शीर्ष 200 विश्वविद्यालयों में एक भी विश्वविद्यालय का नाम अंकित नहीं है। केवल अधिक-से-अधिक विश्वविद्यालय बनाना ही पर्याप्त नहीं है। संख्याएँ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन गुणवत्ता उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।

सर्वप्रथम, हमारे विश्वविद्यालयों को दुनिया के शीर्ष 100 संस्थानों में शामिल होने का उद्देश्य रखना चाहिए, जिससे भारत वैश्विक ज्ञान का सबसे चर्चित केंद्र बन सके।

भारत सरकार शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए कई पहल कर रही है, जिनमें निष्ठा और अर्पित जैसे शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम, प्रधान मंत्री इनोवेटिव लर्निंग स्कीम, ध्रुव और 20 संस्थानों को इंस्टीट्यूशन ऑफ एमिनेंस (सर्वश्रेष्ठ संस्थान) का दर्जा देने की घोषणा करना शामिल हैं।

किंतु सरकार अकेली विश्व स्तरीय शिक्षा प्रणाली बनाने में सफल नहीं होगी।

हमारे सभी सार्वजनिक और निजी, दोनों तरह के संस्थानों को सरकार के साथ मिलकर काम करना होगा।

उन्हें व्यापक रूप से शिक्षण प्रविधियों, अनुसंधान नीतियों को नई दिशा देकर और वैश्विक संस्थानों के बराबर उच्च शैक्षणिक मानक स्थापित करके व्यवस्थित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।

केवल अकादमिक रूप से दक्ष स्नातकों को तैयार करना ही पर्याप्त नहीं है।

छात्रों में केवल ज्ञान संबंधी कौशल का ही विकास नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उनमें सांस्कृतिक जागरूकता और समानानुभूति, दृढ़ता और धैर्य, टीम वर्क और नेतृत्व क्षमता सहित सामाजिक और भावनात्मक कौशल, जिसे ‘व्यावहारिक कौशल' भी कहा जाता है, को विकसित करने पर जोर दिया जाना चाहिए।

शिक्षा मानवता की प्रगति की नींव होती है। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं होता है, बल्कि शिक्षा का अर्थ सशक्त बनाना, ज्ञान और बुद्धि प्रदान करना तथा उच्च गुणवत्ता वाले गुणों से युक्त दिल और दिमाग के साथ एक समग्र व्यक्तित्व का निर्माण करना होता है।

भारत का समग्र शिक्षा संबंधी एक लंबा और शानदार इतिहास रहा है। प्राचीन भारत में शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना ही नहीं होता था, बल्कि बुद्धिमता का अर्जन करना भी होता था।

भारत को 'विश्वगुरु' के नाम से जाना जाता है, जहाँ नालंदा, विक्रमशिला और तक्षशिला जैसे शानदार विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई। प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली ने चरक और सुश्रुत, आर्यभट्ट, भास्कराचार्य, चाणक्य, पतंजलि और अन्य कई प्रतिभाशाली विद्वान दिए हैं। उन्होंने विविध क्षेत्रों में दुनिया के सामूहिक ज्ञान में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।

स्वामी विवेकानंद ने एक बार कहा था कि “शिक्षा केवल सूचना का ढेर नहीं होती है जिसे हम आपके मस्तिष्क में ठूँस दें और जो आपके पूरे जीवन में उथल-पुथल मचा दे। हमें जीवन-निर्माण, मानव-निर्माण, चरित्र-निर्माण और विचारों को आत्मसात करना आना चाहिए। ”

भारत सांस्कृतिक रूप से, हमेशा से अपनी असंख्य भाषाओं और बोलियों, शास्त्रीय नृत्य और संगीत विधाओं, लोक कलाओं की अनेक सुविकसित परंपराओं, उत्तम वास्तुकला, अद्भुत व्यंजनों, सभी प्रकार की शानदार पोशाकों और अनेक क्षेत्रों सहित जीवन के सभी चरणों में महान विविधता समेटे रहा है।

विश्व धरोहरों के लिए इन समृद्ध विरासतों का न केवल पोषण और संरक्षण किया जाना चाहिए बल्कि इन्हें समृद्ध भी किया जाना चाहिए।

हमें छात्रों की रचनात्मकता और मौलिकता को विकसित करने और उन्हें परिवर्तन के प्रति प्रोत्साहित करने में मदद करने के लिए आधुनिक शिक्षा के साथ इस समृद्ध परंपरा को एकीकृत करना चाहिए।

मेरी प्यारी बहनों और भाइयों,

उद्यमशीलता की भावना को बढ़ावा देने के अलावा, शिक्षा को युवाओं में वैज्ञानिक भावना और नया करने की तीव्र इच्छा का पोषण करना चाहिए।

हमारे विश्वविद्यालयों को सिद्धांत और व्यवहार के बीच की खाई को पाटने और अनुसंधान को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने का प्रयास करना चाहिए।

हमारे विश्वविद्यालयों और संस्थानों को भारत और विदेशों में उद्योगों, अनुसंधान और विकास संबंधी प्रयोगशालाओं के साथ सामंजस्य स्थापित करना चाहिए।

हमें अपने तकनीकी संस्थानों में उद्यमिता शिक्षा भी प्रदान करनी चाहिए ताकि बड़ी संख्या में स्नातक केवल नौकरी की तलाश करने वाले न बनें, बल्कि उनमें कारोबार, नौकरियाँ और धन का सृजन करने के कौशल और विश्वास भी मौजूद हों।

मेरे प्यारे छात्रों,

भारत की ताकत उसके युवाओं में निहित है और आपके पास भारत को एक प्रमुख आर्थिक और तकनीकी शक्ति में बदलने की कुंजी है।

मुझे पूरी उम्मीद है कि आप सभी, भारत के लोगों को तकनीकी प्रगति का प्रतिफल देने की प्रतिबद्धता की अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को याद रखेंगे।

मैं एक बार फिर से उन सभी छात्रों को हार्दिक बधाई देता हूँ, जो आज अपनी डिग्री प्राप्त कर रहे हैं। आप सभी को एक अधिक समृद्ध, न्यायसंगत, सुरक्षित और स्वच्छ भारत तथा दुनिया के निर्माण में अपनी रोमांचक यात्रा के लिए शुभकामनाएँ।

मेरी शुभकामनाएँ आप सभी के साथ हैं क्योंकि आप लगभग असीमित संभावनाओं की इस रोमांचक दुनिया के सफ़र की शुरुआत कर रहे हैं।

धन्यवाद!

जय हिन्द!"