30 दिसंबर, 2019 को वर्कला, केरल के शिवगिरी मठ में, 87वें शिवगिरी तीर्थयात्रा सम्मेलन के उद्घाटन के दौरान भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

वर्कला, केरल | दिसम्बर 30, 2019

ईश्वर की अपनी धरती केरल के वर्कला में पवित्र शिवगिरी मठ में 87 वें शिवगिरि मठ के उद्घाटन के शुभ अवसर पर आप सभी के साथ आज यहां आकर मुझे खुशी हो रही है।

श्री नारायण गुरु की उपस्थिति से पावन हुए शिवगिरि मठ में आना मेरे लिए बड़ा आध्यात्मिक अनुभव रहा है। इस महत्वपूर्ण दिन यहाँ आना मुझे बहुत खुशी देता है।

यह वर्ष शीघ्र ही समाप्त होने वाला है और हम सभी एक नई शुरुआत के लिए तत्पर हैं।

मुझे यकीन है कि यह अद्वितीय तीर्थयात्रा तीर्थयात्रियों के जीवन में भी एक नई शुरुआत होगी।

मुझे बताया गया है कि 1928 में इस तीर्थयात्रा या 'तीर्थदानम’ का विचार आया था। गुरु ने 'तीर्थदानम’ का उद्देश्य लोगों के समग्र विकास और समृद्धि के लिए उनमें व्यापक ज्ञान के विस्तार की कल्पना की और कुछ मानदंडों का पालन करने का सुझाव दिया।

प्रत्येक वर्ष श्री बुद्ध की शरीर, वचन, मन, अन्न और कर्म की पांच पवित्रताओं पर आधारित दस दिनों की संक्षिप्त मिताहार अवधि के पश्चात तीर्थयात्री पीले वस्त्रों में, जो उनकी भक्ति का प्रतीक है, शिवगिरिकलाद पहुंचते हैं।

तीर्थयात्रा प्रत्येक वर्ष तीन दिनों अर्थात 30 एवं 31 दिसंबर और 1 जनवरी के लिए होती है और प्रत्येक तीर्थयात्रा की बैठक के लिए मुख्य केंद्र-बिन्दु के रूप में गुरु द्वारा शिक्षा, स्वच्छता, धर्म, संगठन, कृषि, व्यापार और वाणिज्य, हस्तशिल्प और विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी विषयों का चुनाव किया गया था।

मुझे यह जानकर खुशी हुई कि तीर्थयात्रा बैठक में इन विषयों पर व्याख्यान देने के लिए विशेषज्ञों को आमंत्रित किया जाएगा। यह गुरु की इच्छा थी कि तीर्थयात्रियों को इन व्याख्यानों और तीर्थ यात्रा के अनुभवों से जो ज्ञान और विवेक प्राप्त होता है, उसका उपयोग उन्हें अपने दैनिक जीवन में अवश्य करना चाहिए।

गुरु ने निष्कर्ष निकाला कि ज्ञान और इसके उपयोग का आत्मसातीकरण और प्रसार शिवगिरी की इस तीर्थयात्रा का मुख्य लक्ष्य होना चाहिए, जो वास्तव में एक उदात्त आदर्श है।

मुझे यह जानकर खुशी हुई कि पहला शिवगिरीतीर्थदानम 1 जनवरी 1933 को आयोजित किया गया था।

यह वास्तव में उल्लेखनीय है कि भारत के माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्रमोदीजी सहित कई गणमान्य व्यक्तियों ने पवित्र तीर्थयात्रा के दौरान यहां आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लिया था।

यह प्रभावशाली बात है कि प्रतिभागियों की संख्या प्रति वर्ष तेजी से बढ़ रही है। मुझे यह जानकर खुशी हुई कि विश्व भर से, जीवन के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से 30 लाख से अधिक लोग, चाहे उनकी जाति, पंथ, धर्म या भाषा जो भी हो, इस 87वें तीर्थयात्रा समारोह में भाग लेंगे।

वर्ष-प्रति-वर्ष तीर्थयात्रियों की बढ़ती संख्या इस बात का स्पष्ट संकेत है कि शिवगिरी, सभी धर्मों के सम्मिश्रण के अवतार-गुरू के अनुयायियों के लिए उपासना का सर्वोच्च केंद्र बन गया है।

मेरी प्यारी बहनों और भाइयों,

श्री नारायण गुरु एक महान संत, समाज सुधारक, दार्शनिक और क्रांतिकारी मानवतावादी थे।

उनके जीवन और शिक्षाओं का प्रसार हमारे देश की सीमाओं से बाहर भी हुआ है और उसने विश्व भर के लोगों को प्रेरित किया है।

उनकी शिक्षाएं वर्तमान में, विशेष रूप से सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने के हमारे प्रयासों के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है।

यद्यपि श्री नारायण गुरु जन्म से हिंदू थे, लेकिन वे किसी भी धर्म के पक्षपाती नहीं थे। उन्होंने सभी धर्मों का समान रूप से सम्मान और आदर किया।

गुरु ने जाति व्यवस्था और लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ करने वाली अन्य सभी विभाजनकारी प्रवृत्तियों को साहसपूर्वक खारिज कर दिया।

मानवता के लिए स्वामीजी की यह सलाह हमेशा याद रखनी चाहिए कि 'मूल रूप में सभी धर्म समान हैं'।

उन्होंने यह भी कहा “मनुष्य को प्रगति करनी चाहिए चाहे उनका धर्म कोई भी हो। सभी इंसान माँ से पैदा होते हैं। ब्राह्मण और पराया दोनों एक ही तरह से पैदा होते हैं। इसलिए वे एक ही जाति, नरजाति (मानव जाति) के हैं।”

गुरु ने 10 फरवरी 1924 को अलुवा अद्वैत आश्रम में एशिया की प्रथम धर्म संसद बुलाई जिसमें लगभग सभी धर्मों के नेताओं ने भाग लिया।

गुरु ने घोषणा की कि मनुष्यों के बीच धर्म या ईश्वर का कोई भेद नहीं है और उन्होंने लोगों से सार्वभौमिक शांति, सद्भाव और समृद्धि को बढ़ावा देने के लिए हिंसा और धार्मिक संघर्षों से दूर रहने का आह्वान किया।

श्री नारायण गुरु "अद्वैत" के वास्तविक संदेश को लोगों की स्मृति में वापस लाए, जिसे उन्होंने "मानव की एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर" के रूप में जीवन के एक शक्तिशाली व्यावहारिक दर्शन में परिणत कर दिया।

उन्होंने कहा, "जाति के बारे में न पूछें, न बोलें, न सोचें"।¬¬¬

उन्होंने दक्षिण भारत के वंचित वर्गों के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1888 में अरुविप्पुरमिन में प्रसिद्ध शिवलिंग प्रतिष्ठा के पश्चात, गुरु ने मूर्तियों की स्थापना की और पूरे केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में कई मंदिरों की स्थापना की, लेकिन बाद में लोगों को प्रबुद्ध करने के लिए “शिक्षा के माध्यम से ज्ञान, संगठन के माध्यम से आत्मनिर्भरता, उद्योगों के माध्यम से आर्थिक विकास” का मंत्र देते हुए अन्य अभियान चलाए।

संगठन के माध्यम से जनता को एकजुट करने और उन्हें आत्म-विश्वासी और स्वाभिमानी लोगों का समुदाय बनाने के लिए उन्होंने 15 मई, 1903 को श्री नारायण धर्म परिपालन योगम की स्थापना की।

महान भारतीय कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने 1922 में शिवगिरी की यात्रा की और स्वामीजी के साथ एक घंटे तक बैठक की।

उन्होंने विजिटर बुक में लिखा, ''मैं दुनिया के विभिन्न हिस्सों का दौरा कर रहा हूं। इन यात्राओं के दौरान, मुझे कई संतों और महर्षियों के संपर्क में आने का सौभाग्य मिला है। लेकिन मुझे स्पष्ट रूप से स्वीकार करना होगा कि मैं कभी भी ऐसे व्यक्ति से नहीं मिला हूँ जो मलयालम के स्वामी श्री नारायण गुरु की तुलना में अधिक आध्यात्मिक हो और न ही ऐसे व्यक्ति से मिला हूँ जो आध्यात्मिक सिद्धि में उनके समतुल्य हो। मुझे यकीन है, दिव्य गौरव के स्वयंभू प्रकाश द्वारा प्रकाशमान चेहरा और सुस्पष्ट क्षितिज के किसी दूर के बिन्दु पर अपनी दृष्टि टिकाए उन आँखों को मैं कभी नहीं भूलुंगा”।

गुरु ने अंतर्जातीय विवाह और सहभोज का समर्थन किया। उन्होंने स्वयं कई अंतरजातीय विवाह संपन्न करवाए।

महात्मा गांधी ने 12 मार्च, 1925 को शिवगिरी की यात्रा की। आश्रम में एक दिन के प्रवास के पश्चात, गांधीजी ने गुरु के साथ कई विषयों, विशेष रूप से चातुर्वर्ण्य और उन दिनों में मौजूद जाति व्यवस्था पर चर्चा की।

यह पता चला है कि गुरु के साथ इस बैठक का गांधी के भविष्य के कार्यक्रमों, मुख्य रूप से अस्पृश्यता उन्मूलन के कार्यक्रम पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा।

मेरी प्यारी बहनों और भाइयों,

भारत को सभ्यता की पालना करने वाला और संस्कृति की जननी माना गया है। इसका एक गौरवशाली अतीत था, जिसके दौरान इसकी अर्थव्यवस्था फली-फूली। इसका समाज प्रबुद्ध, प्रगतिशील और समावेशी था और इसके सांस्कृतिक लोकाचार अपने श्रेष्ठतम जीवंत स्वरूप में थे।

इसे विश्व में ज्ञान की राजधानी, 'विश्वगुरु' माना जाता था।

यह प्रख्यात वैज्ञानिकों, डॉक्टरों, विद्वानों, दार्शनिकों, कवियों, शिक्षकों और नाटककारों का देश था। महिलाओं को समाज में बहुत सम्मानित स्थान प्राप्त था।

यह अंधकार और दुःख के समय में दुनिया का पथप्रदर्शक था।

आर्थिक और तकनीकी मोर्चों पर उल्लेखनीय प्रगति के बावजूद, राष्ट्र में अभी भी ऐसे क्षेत्र हैं, जहां जातिगत भेदभाव जैसी सामाजिक बुराइयाँ बनी हुई हैं।

हालांकि भारत ने आर्थिक और तकनीकी मोर्चों पर उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन मुझे डर है कि राष्ट्र में अभी भी ऐसे क्षेत्र हैं, जहां जातिगत भेदभाव जैसी सामाजिक बुराइयाँ बनी हुई हैं।

हम अशांति के समय में जी रहे हैं।

जाति, समुदाय और लिंग पर आधारित भेदभाव के बढ़ते मामले गंभीर चिंता का कारण हैं।

हमें अपने मन में जरा भी संदेह नहीं रखना चाहिए कि कहीं भी होने वाला अन्याय हर जगह न्याय के लिए खतरा है।

हमारे देश में जाति व्यवस्था एक दुष्चक्र है।

राम मनोहर लोहिया ने एक बार टिप्पणी की थी, “जाति अवसर को सीमित करती है। सीमित अवसर क्षमता को संकुचित करता है। संकुचित क्षमता आगे और अवसर को रोकती है। जहां जाति प्रचलन में है, अवसर और क्षमता लोगों के एक संकुचित दायरे तक सीमित है।"

यह समय हमारे लिए पुनरावलोकन करने और व्यावहारिक कदम उठाने का है।

भविष्य का भारत जाति-विहीन एवं वर्ग-विहीन होना चाहिए।

हम जिस राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं, वहाँ प्रत्येक व्यक्ति को समान अवसर उपलब्ध कराते हुए अपनी पूरी क्षमता का उपयोग करने और एक परिपूर्ण जीवन जीने का मौका मिलना चाहिए।

हमारे संविधान ने पहले ही अस्पृश्यता के घृणित और अमानवीय व्यवहार को अपराध घोषित कर दिया है।

सरकार कानून बना सकती है। इन कानूनों को सही रूप में लागू करना समाज की मानसिकता पर निर्भर करता है।

जाति व्यवस्था को दूर करने का आंदोलन समाज के दिल और दिमाग में आना चाहिए।

यह एक बौद्धिक क्रांति, एक करुणामय क्रांति, एक मानवतावादी क्रांति होनी चाहिए।

हमारा राष्ट्र विविधता और असहमति के फलने-फूलने के लिए एक सुरक्षित स्थान होना चाहिए।

हमें 'अन्य ’की धारणा को दूर करना चाहिए, यह गलत धारणा है कि आपसे किसी भी प्रकार से भिन्न कोई व्यक्ति आपकी अवमानना के लायक है।

हम सब एक हैं।

एकता की मजबूत डोर है, जो समय की कसौटी पर खरी उतरी है और जो इस विविधतापूर्ण राष्ट्र को एक साथ भाईचारे में बांधती है। प्रत्येक उत्तरवर्ती पीढ़ी को एकता की इस डोर को और मजबूत बनाने की आकांक्षा रखनी चाहिए क्योंकि यह एकता ही वह आधार है जिस पर इस राष्ट्र की स्थापना हमारे पूर्वजों ने की थी।

हम कभी भी विभाजित करने वाली ताकतों को हमें एकजुट करने वाली ताकतों से ज्यादा मजबूत न होने दें।

इस बात की चिंता बढ़ रही है कि हम जिस समाज में रहते हैं, उसके नैतिक मूल्यों में भी अवधारणात्मक गिरावट हुई है। हमें अपने राष्ट्र को नैतिक पवित्रता के रास्ते पर वापस लाना होगा।

आज हमें गुरु और उनकी शिक्षाओं की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा है।

सुधार के संबंध में गुरु का दृष्टिकोण मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक परिवर्तन के माध्यम से परिवर्तन लाने का था, न कि मजबूरी और जबरदस्ती के माध्यम से।

उनका मानना था कि जहां हृदय और मन का यह परिवर्तन नहीं हो, अन्य सभी चीजें सतही होने की संभावना है।

हमें आज इस परिवर्तन की आवश्यकता है।

मुझे आशा है कि पुनर्जागरण के वास्तुकार संत श्री नारायण गुरु द्वारा परिकल्पित यह तीर्थयात्रा ऐसे परिवर्तन की शुरुआत करेगी।

मुझे विश्वास है कि यह ज्ञान सभी धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के साधकों को गहन मार्गदर्शन देता रहेगा और एक मजबूत, संगठित, शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण समाज के निर्माण में अत्यधिक योगदान देगा।

हमें अपनी संस्कृति का पालन करने और उसकी रक्षा करने की बात याद रखनी चाहिए और इसपर गर्व महसूस करना चाहिए और महान संतों, सुधारकों से प्रेरणा लेनी चाहिए और एक बार पुनः एक आदर्श सभ्यता होने का गौरव प्राप्त करने की ओर बढ़ना चाहिए।

मैं इस महोत्सव के आयोजकों और तीर्थयात्रियों को अपनी शुभकामनाएं देता हूं।

महान गुरु की आत्मा सद्गुणों और पवित्रता के लिए हमारा मार्गदर्शन करती रहे।

धन्यवाद

जय हिन्द!"