30 दिसंबर, 2017 को कोलकाता में कोलकाता चैंबर ऑफ कॉमर्स के 187वीं वर्षगांठ समारोह में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु का भाषण

कोलकाता | दिसम्बर 30, 2017

मुझे कोलकाता चैंबर ऑफ कॉमर्स के 187वें वार्षिक समारोह में भाग लेकर अपार खुशी हो रही है। मुझे बताया गया है कि यह केवल भारत का ही नहीं, वरन पूरे एशिया का सबसे पुराना वाणिज्य और उद्योग संघ है।

मुझे बताया गया है कि संघ के अभिलेखों के अनुसार व्यापार सम्मेलन का विचार सर्वप्रथम 5 जुलाई, 1830 को आयोजित एक बैठक में रखा गया था, जिसमें कोलकाता के लगभग 200 व्यवसायियों ने भाग लिया था और श्री सैमुअल स्मिथ की अध्यक्षता में कोलकाता व्यापार संघ का प्रादुर्भाव हुआ ।

इस प्रकार व्यापार और वाणिज्य को प्रोत्साहित करने और व्यवसाय तथा औद्योगिक विकास में तेजी लाने के लिए पहली बार किसी व्यवसाय संगठन की नींव भारत की तत्कालीन राजधानी कोलकाता में रखी गई।

वर्ष 1977 में कोलकाता व्यापार परिषद का नाम "कोलकाता चैंबर ऑफ कॉमर्स" हो गया। मुझे खुशी है कि यह महती सभा 180 वर्षों से भी ज्यादा समय से कोलकाता और देश के विकास में अपना योगदान दे रही है।

मुझे यह उल्लेख करते हुए खुशी हो रही है कि कोलकाता चैंबर ऑफ कॉमर्स फाउंडेशन जरूरतमंद और होनहार छात्रों, विद्वानों और उद्यमियों को अध्ययन, अनुसंधान और सामाजिक-आर्थिक, वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीय विकास से संबंधित क्रियाकलापों के लिए छात्रवृत्तियाँ, वजीफा और पुरस्कार तथा अन्य प्रकार की सहायता प्रदान करता है। इस फाउंडेशन ने, जैसाकि मुझे बताया गया है, अन्य कार्यों के अतिरिक्त कारगिल, सुनामी और भूकंप पीड़ितों को सहायता प्रदान की है।

मैं उत्कृष्ट खिलाड़ियों और "प्रभा खेतान पुरस्कार" के माध्यम से महिलाओं को पहचान दिलाने के लिए इस फाउंडेशन की सराहना करता हूँ।

मैं विशेषतः इस क्षेत्र में और सामान्यतः देश के आर्थिक विकास में प्रचुर योगदान करने के लिए कोलकाता चैंबर्स की प्रशंसा करता हूँ।

मित्रों, जैसाकि आप सभी जानते हैं, भारत 2018 में 7.2 प्रतिशत और 2019 में 7.4 प्रतिशत की संभावित सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर के साथ एक बार फिर से विश्व की तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था बनने के लिए तैयार है। कुछ अनुमानों के अनुसार भारत 2018 में विश्व की पाँचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और आगामी 10-15 वर्षों में तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।

अर्थव्यवस्था के वृहद बुनियादी तत्व मजबूत होने से देश विकास कर रहा है, ऐसे में विकास के लाभ प्रत्येक वर्ग तक पहुँचने चाहिए और हम जो विकास कर रहे हैं, उसका समावेशी होना आवश्यक है। यदि कुछ वर्ग समृद्धि से अनछुए रह जाते हैं तो विकास का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। हम सभी को महात्मा गांधी, डॉ. बी. आर. अंबेडकर और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के सपनों को पूरा करने का प्रयास करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विकास के लाभ अंतिम निर्धन व्यक्ति तक भी पहुंचे।

विभिन्न सुधार कार्यों की शुरुआत किए जाने के फलस्वरूप भारत विदेशी निवेश के लिए एक अति पसंदीदा स्थल बन गया है। 2016-17 में अभी तक का सर्वाधिक 43.4 बिलियन यूएस डॉलर का विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) प्राप्त हुआ है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के उज्जवल भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए मैं आपके जैसे वाणिज्य निकायों से यही अपेक्षा करूंगा कि आप युवाओं को कौशल प्रदान करने में सक्रिय भूमिका अदा करें, ताकि भारत अपनी विशाल युवा आबादी से जुड़ी संभावनाओं का अधिकतम लाभ उठा सके। काफी अवसर उपलब्ध हैं और देश के युवाओं की ऊर्जा को 'स्किल इंडिया', डिजिटल इंडिया, स्टैंड अप इंडिया और स्टार्ट-अप इंडिया जैसी पहलों के माध्यम से समुचित तरीके से उपयोग में लाए जाने की आवश्यकता है।

चूंकि आप सभी औद्योगिक पृष्ठभूमि से हैं, अतः आपलोग युवाओं के कौशल में सुधार लाए जाने की अत्यावश्यकता के संबंध में अन्य लोगों से अधिक जानते हैं, जिससे वे केवल नौकरियों के योग्य ही न बनें, वरन नौकरी का इच्छुक बने रहने के बजाय औरों को रोजगार देने वाले बनें।

मैं आप सभी से सीएसआर के तहत अपनी गतिविधियों को बढ़ाने और सरकार के विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधाएं मुहैया करवाने संबंधी प्रयासों को पूर्ण करने की अपील भी करता हूँ। जैसा कि 'राष्ट्रपिता' की प्रसिद्ध उक्ति है कि 'भारत अपने गांवों मे बसता है' और जब तक ग्रामीण क्षेत्र आर्थिक गतिविधियों के फलते-फूलते केंद्र के रूप में परिणत नहीं हो जाते, तब तक शहरों और गांवों के बीच खाई बढ़ती ही रहेगी और विकास एकांगी ही रहेगा। इसी तरह, महिलाओं को व्यावसायिक प्रशिक्षण देने, निरक्षरता का उन्मूलन करने, बच्चियों का सशक्तिकरण करने, डिजिटल अंतराल को मिटाने और 'स्वच्छ भारत' अभियान का समर्थन करने के लिए विशेष पहल करें।

संसदीय लोकतंत्र में नई ऊर्जा का संचार किया जाना

संसद भारतीय लोकतंत्र का प्राण-बिंदु और जनता के हितों और अधिकारों की संरक्षक है। यह लोकतंत्र का मंदिर और पवित्र लोक संस्था है। भारत की संसदीय व्यवस्था विगत वर्षों में परिपक्व हुई है और समय की कसौटी पर खरी उतरी है।

संसद भारत की लोकतांत्रिक राजनीति की केंद्रीय संस्था है। विगत वर्षों में लोगों की बदलती जरूरतों के कारण नए क्षेत्रों में कानून बनाने की आवश्यकता उत्पन्न हुई है और इस वजह से संसद की विधायी और निगरानी संबंधी भूमिका ज्यादा जटिल और वैविध्यपूर्ण है। सरकारी गतिविधियों की सीमा और परिमाण में अप्रत्याशित वृद्धि ने संसद की भूमिका को और भी महत्वपूर्ण बना दिया है, क्योंकि कार्यपालिका संसद के प्रति जवाबदेह है।

तथापि, संसद से निरंतर बढ़ती अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए इसे अपनी संरचनात्मक-कार्यात्मक आवश्यकताओं के साथ-साथ संचालन संबंधी प्रक्रियाओं के संपूर्ण स्वरूप की लगातार समीक्षा करने और इनके निपटान संबंधी संसाधनों को मजबूत करने की आवश्यकता है।

हमने विश्व के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में अभी तक 16 आम चुनावों का लगभग सफलतापूर्वक संचालन किया है। इसके अतिरिक्त, हमारी संसदीय प्रणाली ने "शक्ति का शांतिपूर्ण स्थानांतरण" सुनिश्चित किया है, क्योंकि यहाँ कभी भी किसी तरह के ऊहापोह, दबाव, तनाव की स्थिति नहीं रही है। भारत की संसदीय लोकतंत्र की इस उल्लेखनीय उपलब्धि पर हम सभी का गर्व करना उचित ही है।

भारत की बहु-दलीय प्रणाली में कई बार गठबंधन सरकारों के अपरिहार्य होने और संसदीय लोकतंत्र ने सदाशयी आलोचकों के विश्वास को कमजोर करने वाले अस्थिरता के खतरे के बावजूद हम इस तथ्य पर गर्व कर सकते हैं कि हमने काफी राजनैतिक स्थिरता देखी है।

हाल ही में देश में संसद के कार्यकरण की स्वयं संसदीय बिरादरी के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों से काफी आलोचना हुई है। यह आलोचना संसद और राज्य विधानमंडलों के कार्यकरण के तरीकों के कारण है। इस आलोचना के पीछे हाल के वर्षों में संसदीय कार्य की मात्रा और गुणवत्ता दोनों में आई गिरावट है।

विगत वर्षों में विधायी और अन्य कार्यों के संचालन हेतु संसद की सामान्य बैठकों के दिनों की संख्या और राष्ट्रीय महत्व के मामलों पर बहस के घंटों में काफी कमी आई है। यहां तक कि संसद की जो अपेक्षाकृत कम बैठकें होती है, उनमें भी प्राय: हंगामा किया जाता है।

यह चिंता का विषय है कि राजनैतिक दलों द्वारा अपने सदस्यों को नियंत्रित न कर पाने के कारण व्यवधान रोज की बात हो गई है। यह आवश्यक है कि राजनैतिक दल इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर एकमत हों, ताकि संसद और विधान मंडलों के बहुमूल्य समय उन मुद्दों पर व्यर्थ न हों, जिन्हें वाद-विवाद और बातचीत के माध्यम से सुलझाया जा सकता है।

परंतु दुर्भाग्यवश वर्तमान में 'सुचारु बहस और चर्चाएं, जो कि संसदीय लोकतंत्र की कसौटी है सदन में व्यवधान, विरोध और बलात स्थगन के कारण निष्प्रभावी हो गई हैं। कई अवसरों पर संसदीय कामकाज अवरुद्ध हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप जनता के धन और कार्य के घंटों का नुकसान होता है। परिणामस्वरूप संसद स्वयं को उन महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक मामलों पर चर्चा और वाद-विवाद करने में असहाय महसूस करती है, जो जनता और देश को प्रभावित करते हैं।

राजनैतिक दलों द्वारा इस बात पर गंभीरता से आत्म-निरीक्षण करने का समय आ गया है कि वे देखें कि कहीं संसद का इस्तेमाल राजनैतिक लाभ उठाने के लिए तो नहीं किया जा रहा है। हमें इस बात को अनिवार्यतः सुनिश्चित करना होगा कि संसद देश में शांति, प्रगति और संपन्नता लाने की दिशा में प्रभावी और उत्तरदायी तरीके से कार्य करे।

मित्रों, मुझे लगता है कि देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था के रूप में संसद, जो कि जनता की संप्रभु इच्छाशक्ति का प्रतिनिधित्व करती है, की भूमिका को मजबूत करने के लिए तत्काल सुधारात्मक कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। इसके अलावा लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए यह अति महत्वपूर्ण है कि जनता के मनोमस्तिष्क में संसद की गरिमामयी छवि बनी रहे।"