30 अप्रैल 2019 को नई दिल्ली में डॉ. राजाराम जयपुरिया स्मारक व्याख्यान में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा संबोधन

नई दिल्ली | अप्रैल 30, 2019

डॉ. भीम राव अंबेडकर के नाम पर बने इस शानदार कन्वेंशन सेंटर में आज यहां आकर प्रथम डॉ. राजाराम जयपुरिया स्मारक व्याख्यान देने में मुझे बेहद खुशी हो रही है।

मैं भारतीय संविधान के जनक बाबासाहेब अम्बेडकर के अपने पसंदीदा उद्धरणों में से एक उद्धरण के साथ शुरूआत करता हूं: “एक विचार का प्रसार करने की उतनी की आवश्यकता होती है जितनी कि एक पौधे को पानी देने की अन्यथा दोनों नष्ट हो जाएंगे और समाप्त हो जाएंगे।

अत: मुझे इस बात की खुशी है कि डॉ. राजाराम जयपुरिया ने जिन आदर्शों और मूल्यों का जीवन भर पालन किया, उन आदर्शों और मूल्यों को उनके उत्तराधिकारियों ने ध्यानपूर्वक विकसित किया है और हम आज यहां उनके विचार "गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों को सशक्त बनाना" के विचार पर चर्चा करने के लिए इकट्ठा हुए हैं।

तिरुक्कुरल कहते हैं, "केवल ज्ञान रूपी संपत्ति ही स्थायी है; अन्य कुछ भी वास्तविक संपत्ति नहीं है”।

डॉ. राजाराम जयपुरिया उद्योगपति होने के साथ-साथ शिक्षाविद् भी थे। उन्होंने निस्वार्थ भाव से स्वतंत्रता पूर्व काल के लोकोपकारी प्रवृत्ति वाले उद्योगपतियों की विरासत का अनुसरण किया, जो शैक्षणिक संस्थानों, तीर्थ यात्रियों के लिए मंदिरों और विश्राम गृहों की स्थापना करते थे और जो व्यवसाय की नहीं बल्कि सामाजिक सेवा की भावना से प्रेरित थे।

अपने दिवंगत पिता पद्म भूषण सेठ मंगतूराम जयपुरिया के नक्शेकदम पर चलते हुए, जिन्होंने 1945 में कलकत्ता में प्रसिद्ध जयपुरिया कॉलेज की स्थापना की थी, डॉ राजाराम जयपुरिया ने 1972 में कानपुर में के-12 स्कूल से शुरूआत करके पूरे भारत में कई शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना की और चार धाम वेद न्यास का भी संरक्षण किया जिसमें भारत के पांच धार्मिक केंद्रों में संस्कृत में 'प्रथम' से लेकर 'आचार्य' तक के स्तर तक की वैदिक शिक्षा दी गई थी।

उन्होंने जिन शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की उन सभी अकादमिक संस्थानों में पाठ्यक्रम और अध्यापन-विज्ञान में 'मूल्यों' और 'वैज्ञानिक प्रगति' के संदर्भ में पूर्व और पश्चिम के सर्वश्रेष्ठ मूल्यों को एक साथ मिलाया। मुझे यह जानकर बहुत खुशी हो रही है कि जयपुरिया समूह का प्रतीक चिह्न बृहदारण्यक उपनिषद के मेरे पसंदीदा उद्धरणों में से एक है: “तमसो मा ज्योतिर्गम्य”, जिसका अर्थ है “हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाओ”।

आज के व्याख्यान का विषय- शिक्षा, उद्यमिता और नैतिकता आयोजकों द्वारा उपयुक्त ही चुना गया है।

आज हम उद्योग 4.0 के युग में रह रहे हैं। इस युग में, भारत के पास तेजी से प्रगति करने और अधिकांश विकसित राष्ट्रों के साथ विकास के अंतर को पाटने का एक वास्तविक मौका है। हम पहली तीन औद्योगिक क्रांतियों का लाभ नहीं उठा पाए क्योंकि हमने पश्चिमी देशों के बराबर आने में बहुत देरी कर दी।

लेकिन नए डिजिटल युग और युवा भारतीयों की प्रतिभा के कारण और अपने जनसांख्यिकीय लाभ की स्थिति को देखते हुए हमारे पास आगे बढ़ने और नेतृत्व करने का एक वास्तविक अवसर है। उद्योग 4.0 को ज्ञान अर्थव्यवस्था भी कहा जाता है। नई अर्थव्यवस्था की भाषा डिजिटल है और मुझे पूरा विश्वास है कि हमारे युवा नए डिजिटल भारत की जिम्मेदारी लेंगे और देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे।

बेंगलुरु और हैदराबाद के साथ-साथ भारत का लगभग हर शहर सिलिकॉन वैली के रूप में विकसित हो रहा है। विश्व के सभी स्टार्ट-अप का एक तिहाई हिस्सा पहले से ही भारत में मौजूद है, जिसमें भारत केवल चीन और संयुक्त राज्य अमरीका से ही पीछे है।

हम अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, बिग डेटा, क्लाउड कंप्यूटिंग, 3 डी प्रिंटिंग, ब्लॉक चेन, मशीन लर्निंग और डिज़ाइन थिंकिंग जैसे शब्दों से अपरिचित नहीं हैं। अधिकांश नए स्टार्टअप इन्हीं तकनीकों द्वारा संचालित होते हैं। मुझे यह जानकर खुशी हुई कि आपके स्कूलों में पहले से ही अटल टिंकरिंग प्रयोगशालाएं हैं।

प्रिय बहनों और भाइयों,

भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और हम 10-15 वर्षों में तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर हैं। 1991 के बाद से, डॉलर के संदर्भ में मौजूदा कीमतों पर, हम 8.7% से अधिक चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर(सीएजीआर) से बढ़ रहे हैं और हमारी प्रति व्यक्ति आय 7% चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर(सीएजीआर)से बढ़ रही है। हमारी साक्षरता दर जो कि 1991 में 52% थी, 2018 में बढ़कर 79% हो गई है। भविष्य काफी उज्ज्वल लग रहा हैं।

भारत 1.35 अरब की विशाल जनसंख्या वाला देश है जिसकी प्रति व्यक्ति औसत वार्षिक आय 1928 डॉलर है और औसत जीवन प्रत्याशा 69 वर्ष है, लेकिन अच्छी बात यह है कि हमारी जनसंख्या का 66% हिस्सा 2020 तक 15 से 64 वर्ष के आयु समूह में होगा और कामकाजी जनसंख्या 2060 तक समान स्तर या उच्च स्तर पर ही रहेगी। 2020 में भारतीयों की औसत आयु केवल 29 वर्ष होगी। जबकि यह चीन और अमरीका में 37%, यूरोप में 44% और जापान में 50% होगी। इसका अर्थ है कि अगले चार दशकों तक भारत चीन, यूरोप और अमरीका जैसी पहले से विकसित और बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की आबादी की तुलना में युवा रहेगा।

ऐसा माना जा रहा है कि विश्व में, जहां लोगों की आयु तेजी से बढ़ रही है, आने वाले समय में विश्व स्तर पर कुशल श्रमिकों की कमी होगी। कौशल विकास को सुनिश्चित करके और युवाओं को विभिन्न व्यवसायों में नवीनतम प्रशिक्षण प्रदान करके भारत, देश के भीतर कुशल कामगारों की मांग को पूरा करने के अलावा, वैश्विक स्तर पर इस मांग को पूरा कर सकता है।

जनसांख्यिकीय लाभ अब भारत के पक्ष में है। हालांकि, भारत का जनसांख्यिकीय लाभ केवल तभी जनसांख्यिकीय विकास में बदल सकता है जब हम कौशल विकास पर तथा ज्ञान और कौशल के निरंतर उन्नयन पर ध्यान केन्द्रित करें। मुझे यकीन है कि कौशल विकास और उद्यमिता संबंधी राष्ट्रीय नीति कौशल से संबंधित सभी चुनौतियों का समाधान करेगी, जबकि राष्ट्रीय कौशल योग्यता फ्रेमवर्क (एनएसएफक्यू) औपचारिक शिक्षण व्यवस्था के साथ लोगों के कौशल को मानकीकृत और समेकित करने में मदद करेगा।

आज छात्र वास्तविक काल (रियल टाइम) में कहीं से भी सीख सकते हैं। प्रौद्योगिकी ने विभिन्न माध्यमों द्वारा दूरी से संबंधित बाधाओं को प्रभावी ढंग से समाप्त कर दिया है। अब हम सूचना और संचार प्रौद्योगिकी द्वारा संचालित दुनिया में रह रहे हैं और सूचना और संचार प्रौद्योगिकी- युक्त शिक्षा प्रदान करना आधुनिक समाज की अनिवार्य शर्त बन गया है। वास्तव में, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी क्रांति, शिक्षा क्षेत्र में एक प्रतिमान परिवर्तन का कारण बन रही है।

जैसा कि आप जानते हैं, मैसिव ऑनलाइन ओपन कोर्सेज़ (एमओओसी) का मंच सीखने और ज्ञान प्रसार में क्रांतिकारी बदलाव ला रहा है। भारत का "स्वयं एमओओसी" मंच विश्व के सबसे बड़े निशुल्क ऑनलाइन ई-लर्निंग प्लेटफार्म पोर्टल के रूप में उभरा है। यह सभी स्तरों पर शिक्षा तक पहुंच, समानता और गुणवत्ता प्राप्त करने के लिए बनाया गया है। 'स्वयं प्रभा' कार्यक्रम के अंतर्गत, उच्च गुणवत्ता वाले शैक्षिक कार्यक्रमों को डीटीएच चैनलों के माध्यम से प्रसारित किया जा रहा है। इसके अलावा मानव संसाधन और विकास मंत्रालय ने अपने राष्ट्रीय मिशन "एजुकेशन थ्रू आईसीटी" (एनएमई-आईसीटी) के अंतर्गत ई-पाठशाला की शुरुआत की है। संवादमूलक ई-कंटेंट में सामाजिक विज्ञान, कला, ललित कला, मानविकी, गणित, भाषा विज्ञान और भाषाओं के सभी विषयों के लगभग 70 विषय शामिल हैं।

छात्रों के स्कूलों में दाखिला लेने और उनके स्कूल छोड़ने के संबंध में भारत के सामने एक चुनौती है। हालांकि, हमारा सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) बढ़ कर 25.8 प्रतिशत तक पहुंच गया है, परन्तु यह 33 प्रतिशत के वैश्विक औसत और ब्राजील (46 प्रतिशत), रूस (78 प्रतिशत) और चीन (36 प्रतिशत) जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं से कम है। मात्र साक्षरता से नहीं बल्कि कौशल-युक्त साक्षरता से रोजगार में वृद्धि होगी। निजी संस्थानों को सरकार की कौशल-युक्त साक्षरता से संबंधित पहल को समर्थन प्रदान करना होगा। मैं आशा करता हूं कि भारत में कौशल-युक्त साक्षरता को बढ़ावा देने में जयपुरिया समूह प्रभावशाली रूप से भागीदारी करेगा ।

प्रौद्योगिकी, जीईआर अंतर को कम कर सकती है। उदाहरण के लिए, जयपुरिया कैम्पस ई-लर्निंग के माध्यम से दूरदराज के छात्रों को मदद की पेशकश करके अपनी वर्तमान 15000 छात्रों की संख्या से कई गुणा अधिक छात्रों को प्रशिक्षित कर सकता है। एक ग्राम स्कूल जिसमें प्राथमिक स्तर तक के शिक्षक और भौतिक अवसरंचना शामिल होते हैं, आभासी प्रयोगशालाओं के साथ दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से उच्च विद्यालय स्तर तक की शिक्षा प्रदान कर सकते हैं और सिमुलेटिड प्रयोग कर सकते हैं। प्रत्येक गांव में प्राकृतिक रूप से उपलब्ध संसाधनों की मदद से उच्च विद्यालय स्तर तक के पारंपरिक शिल्प विद्यालय खोले जा सकते हैं।

पाठ्यक्रम और पाठ्यचर्चा तथा अध्यापन को डिजाइन थिंकिंग और रचनात्मकता का उपयोग करके पुनर्जीवित करना होगा। रटने के स्थान पर व्यवहारिक शिक्षा को लाना होगा।

सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के उपयोग ने लाखों भारतीयों के, उनकी प्रयोग के अधिकांश क्षेत्रों में, जीवन को सहज बना दिया है - चाहे वह कृषि हो, उद्योग हो, व्यवसाय हो या सेवा हो।

अब समय आ गया है कि भारत स्वयं को ज्ञान और नवाचार के केन्द्र के रूप में पुन: स्थापित करे। ऐसा करने के लिए हमें विभिन्न क्षेत्रों में 21 वीं सदी की तेजी से बदलती जरूरतों को पूरा करने के लिए अपनी उच्च शिक्षा प्रणाली का पूरी तरह कायापलट करना होगा। पाठ्यक्रम और अध्यापन को नया रूप देने के अलावा, स्वयं कर के सीखने की पद्धति पर जोर देना चाहिए। छात्रों के बीच उद्यमशीलता की भावना पैदा करने पर अधिक ध्यान केन्द्रित होना चाहिए। इसके लिए औद्योगिक तंत्र के संपर्क में आना अनिवार्य है और हमारे शैक्षणिक संस्थानों को स्थानीय उद्योगों के साथ सक्रिय संबंध विकसित करने चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि छात्र पाठ्यक्रम के हिस्से के रूप में प्रशिक्षण प्राप्त करें। हमें रोजगार ढूंढने वालों के स्थान पर अधिक से अधिक रोजगार सृजन करने वालों की आवश्यकता है और हमारी शिक्षा प्रणाली के पाठ्यक्रम को इस आवश्यकता के अनुसार नया रूप दिया जाना चाहिए।

भारत ने दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्टार्ट-अप केन्द्र होने का गौरव पहले ही प्राप्त कर लिया है और हमें भारत को स्टार्ट-अप में सर्वश्रेष्ठ बनाने की आवश्यकता है।

एक अत्यधिक महत्वपूर्ण पहलू एक ऐसी शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता से संबंधित है जो समाज की प्रगति के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करे, जो नैतिकता, आचरण और मानवतावाद के मूल्यों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता पर आधारित हो। दुर्भाग्य से, जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में आचरण और नैतिक दृष्टिकोण में हम हर ओर एक गिरावट देख रहे हैं। इस अवांछनीय प्रवृत्ति को रोकने के लिए शिक्षा को बड़ी भूमिका निभानी होगी। आइए, हम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के उन दूरदर्शी शब्दों को याद करें, जिन्होंने कहा था: "जो शिक्षा चरित्र को नहीं ढालती वह बिलकुल व्यर्थ है"।

युगों तक भारत विश्व गुरु था। तक्षशिला और नालंदा जैसे हमारे प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों ने अन्य क्षेत्रों के छात्रों और विद्वानों के लिए अपने दरवाजे खोले। हमारे सदियों पुराने आदर्श, "वसुधैव कुटुम्बकम" के अनुरूप, हमने हमेशा वैश्विक समुदाय के साथ ज्ञान साझा करने में विश्वास किया है।

शिक्षा विकास का सबसे महत्वपूर्ण साधन है और यह सभ्यता की निरंतर प्रगति और मानवता की समृद्धि के लिए बच्चों और युवाओं को दिया जा सकने वाला सबसे अच्छा उपहार है।

बहनों और भाइयों,

हम सभी अपने मूल स्थान, माता-पिता और शिक्षकों, जिन्होंने हमारे करियर को रूपाकार दिया, के बहुत ऋणी हैं। । हमें समाज के कल्याण के लिए व्यक्तिगत रूप से कुछ समय समर्पित करने की आदत विकसित करनी चाहिए।

हमारा प्राचीन दर्शन हमें एक-दूसरे की देखभाल करने और साझा करने का मूल्य सिखाता है। यह प्रत्येक नागरिक की सामूहिक जिम्मेदारी है कि वह लोगों के जीवन में एक सकारात्मक बदलाव लाने के लिए अपनी ओर से कुछ न कुछ करे। प्रत्येक व्यक्ति को स्थिति, पद और राजनीतिक विचारों पर ध्यान दिए बिना दूसरों के कल्याण के लिए काम करना चाहिए, महिलाओं और कमजोर वर्गों को सशक्त बनाने को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। स्मारक व्याख्यान महान व्यक्तियों द्वारा की गई सेवा को याद करने और उनके जीवन से प्रेरणा लेने का अवसर प्रदान करते हैं।

हमें युवाओं को प्रेरित करने और उनका सही दिशा में मार्गदर्शन करने के लिए इन व्याख्यानों को मंच के रूप में उपयोग में लाना चाहिए। हमें युवाओं को सहिष्णुता की परंपराओं का पालन करने और देश की बहुलतावादी संस्कृति का सम्मान और उसकी रक्षा करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। भविष्य का भारत युवा लोगों के सपनों, महत्वाकांक्षाओं, चरित्र और क्षमता से संचालित होना चाहिए।

हमें वर्गीय और लैंगिक असमानता, अशिक्षा, गरीबी, जलवायु परिवर्तन और समाज के वंचित लोगों की जरूरतों जैसी गंभीर समस्याओं पर स्वस्थ और शिष्ट चर्चा की संस्कृति को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।

शिक्षा को, जो कि राष्ट्र निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण घटक है, उच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। 21 वीं सदी की ज्ञान अर्थव्यवस्था की जरूरतों के अनुरूप पाठ्यक्रम को नया रूप देने के लिए शिक्षा प्रणाली पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।

बच्चों को शिक्षा से सेवा और स्वयंसेवा जैसे पहलुओं को सीखना चाहिए। इससे छात्र दूसरों की जरूरतों और कष्टों के प्रति संवेदनशील बनने चाहिए।

हमें अपने महान राष्ट्र की विविधतापूर्ण और समृद्ध विरासत तथा संस्कृति के बारे में बच्चों को शिक्षा देकर उनमें एकता की भावना पैदा करनी चाहिए। स्वतंत्रता सेनानियों, समाज सुधारकों और प्रख्यात वैज्ञानिकों की जीवनी की प्रेरक कहानियों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए ताकि युवा महापुरुषों के जीवन के बारे में पढ़कर प्रेरित हो सकें।

प्रिय छात्रों,

अपनी बात समाप्त करने से पहले मैं कहना चाहता हूं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में वृद्धि के साथ, आप के पास अनेक रास्ते और अवसर होंगे और आपको इनका लाभ उठाना चाहिए। पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम की सलाह को याद रखें कि अपने समक्ष ऊंचे लक्ष्य रखें और अपने सपनों को साकार करने के लिए समर्पण के साथ काम करें तथा नए भारत का निर्माण करें, जो गरीबी, अशिक्षा, भय, भ्रष्टाचार, भुखमरी और भेदभाव से मुक्त होगा।

मैं एक महान उद्योगपति, शिक्षाविद, उद्यमी, समाजसेवी और इन सब से बढ़कर एक महान व्यक्ति के नाम पर और उनकी स्मृति में इस स्मारक व्याख्यान के आयोजन के लिए जयपुरिया ग्रुप ऑफ एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस को बधाई देता हूं।

मुझे डॉ. राजाराम जयपुरिया द्वारा भावी पीढ़ी को दिए गए उपहार के संबंध में गौरवगान करने के लिए आज आप सब से जुड़कर खुशी हो रही है।

जय हिन्द!"