30 अगस्त, 2019 को हैदराबाद में समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एमपीईडीए) द्वारा आयोजित 5वें एक्वा एक्वरिया इंडिया 2019, भारत के अंतर्राष्ट्रीय एक्वाकल्चर शो के अवसर पर सभा में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

हैदराबाद | अगस्त 30, 2019

"भारत के अंतर्राष्ट्रीय जलीयकृषि कार्यक्रम 5वें एक्वा एक्वेरिया इंडिया का उद्धाटन करते हुए मुझे बहुत प्रसन्नता हो रही है जिसका आयोजन समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एमपीईडीए) द्वारा किया गया है।

मत्स्य पालन मेरे ह्दय के बहुत निकट है। मेरे सार्वजनिक जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा मेरे गृह राज्य आंध्र प्रदेश के तटीय निवासियों के कल्याण से संबंधित गतिविधियों से जुड़ा रहा है।

जैसाकि आप जानते हैं, एशिया विश्व का सबसे बड़ा मछली उत्पादक है और 2016 में, मत्स्य पालन और जलीय कृषि क्षेत्रों में संलग्न वैश्विक आबादी का 85 प्रतिशत भाग एशिया में था।

भारत में, 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ही मत्स्य पालन को विकास की अपार क्षमताओं वाले क्षेत्र के रूप में पहचान मिली। मशीनीकरण 1950 में आरंभ हुआ जिसके कारण उत्पादन और उत्पादन के बाद की गतिविधियों में क्रांति आई।

आज, भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश है जिसमें 2018-19 के दौरान 13.70 मिलियन मीट्रिक टन मछली उत्पादन हुआ है।

2017-18 में भारत के कुल निर्यात का लगभग 10 प्रतिशत मछली निर्यात है और जल कृषि निर्यातों का लगभग 20 प्रतिशत है। 7 बिलियन अमरीकी डॉलर की निर्यात आय के साथ भारत विश्व का चौथा सबसे बड़ा मछली निर्यातक देश है।

47,600 करोड़ रूपये से अधिक धनराशि के समुद्री उत्पाद निर्यात करने के अतिरिक्त, यह क्षेत्र भारतीय तट के दूरदराज के गाँवों में रहने वाले 14.5 मिलियन से अधिक लोगों को रोजगार के अवसर प्रदान करता है।

जीडीपी में मत्स्य पालन की 1 प्रतिशत हिस्सेदारी है और कृषि जीडीपी में लगभग 5.37 प्रतिशत हिस्सेदारी है।

समुद्र के साथ-साथ ताजे जल में कैप्चर और कल्चर मत्स्य पालन विधियों के माध्यम से विश्व में अनुमानित 178.8 मिलियन मीट्रिक टन मछली उत्पादन होता है। इसमें से अनुमानित 157.9 मिलियन मीट्रिक टन खाद्य मछली उत्पादन होता है।

विश्व की आबादी लगातार बढ़ रही है और भोजन की बढ़ती मांग उपलब्ध खाद्य संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डाल रही है।

अत: अब एक बिलियन से अधिक आबादी की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मछली उत्पादन को बढ़ावा देने की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है।

चूँकि 16 प्रतिशत से अधिक प्रोटीन की आपूर्ति मत्स्य पालन क्षेत्र से होती है, इसलिए इस क्षेत्र की पहचान खाद्य सुरक्षा में योगदान देने वाले प्रमुख कारक के रूप में की गई है।

अनुमानित वैश्विक प्रति व्यक्ति खाद्य मछली खपत 20.7 किलोग्राम प्रति वर्ष है। इसमें से 11.4 किलोग्राम (55 प्रतिशत) की पूर्ति जलीय कृषि से होती है और शेष कैप्चर मत्स्यपालन से होती है।

भारत के पास विशाल जलीय संसाधन हैं जिनमें सतत् उपयोग के लिए विविध प्रकार की मछलियाँ भी हैं।

हमारे देश में मछली की लगभग 2,200 प्रजातियाँ हैं जो विश्व में पाई जाने वाली मछली की सभी प्रजातियों का लगभग 11 प्रतिशत है।

8000 किलोमीटर से अधिक लंबे तट, 2.02 मिलियन वर्ग किमी. विशेष आर्थिक क्षेत्र, 0.5 मिलियन वर्ग कि.मी. महाद्वीपीय शेल्फ क्षेत्र के साथ भारत के पास अनुमानत: 3.9 मिलियन मीट्रिक टन दोहनयोग्य मत्स्य संसाधन है, जिसमें से वर्तमान में केवल लगभग 3.0 मिलियन मीट्रिक टन का ही दोहन किया जाता है।

इसके अलावा, देश में जलीय कृषि के लिए उपयुक्त लगभग 1.2 मिलियन हेक्टेयर संभावित खारा जल क्षेत्र और 5.4 मिलियन हेक्टेयर ताजा जल जलीय कृषि के लिए उपलब्ध है।

भारत के विशाल और विविध जलीय संसाधन जलीय कृषि खाद्य मछली उत्पादन के विस्तार के लिए उत्कृष्ट अवसर प्रदान करते हैं।

मेरे प्रिय बहनों और भाइयों,

यह सच है कि वैश्विक रूप से जलीय कृषि को मछली उत्पादन में वृद्धि करने का सर्वोत्तम विकल्प माना जाता है क्योंकि पारंपरिक क्षेत्र से उत्पादन में कमी आ रही है।

यह बहुत चिंता का विषय है कि भारत उसके पास उपलब्घ जलीय कृषि क्षमता के केवल कुछ भाग का ही दोहन कर पाता है।

भारत ताजे जल की जलीय कृषि के लिए उपलब्ध 2.6 मिलियन हेक्टेयर तालाबों और टैंकों के केवल लगभग 40 प्रतिशत भाग और कुल 1.2 मिलियन हेक्टेयर संभावित खारेजल के संसाधन के लगभग 15 प्रतिशत भाग का ही दोहन कर पाता है।

अन्य शब्दों में, इन क्षेत्रों में विस्तार की व्यापक संभावनाएं हैं।

8000 किलोमीटर से अधिक लंबे तट के साथ सागरीय कृषि के विकास की अपार संभावनाएं हैं जिसकी शुरूआत केवल कुछ वर्षों पहल शंबुक और सीप के उत्पादन से शुरू हुई है।

यह देखते हुए कि जलीय कृषि देश के अनेक भागों में उपयोग नहीं किए गए और कम उपयोग किए गए संसाधनों के उपयोग के माध्यम से आय और रोजगार की दृष्टि से सामाजिक-आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती है, इसलिए पर्यावरण अनुकूल मत्स्य पालन को ग्रामीण विकास, ग्रामीणों के लिए खाद्य और पोषण सुरक्षा के संवाहक के रूप में स्वीकार किया गया है।

वर्तमान में भारतीय ताजे जल के जलीय कृषकों द्वारा अपनाई जा रही कृषि प्रणाली से प्रतिवर्ष 1.5 से 4.5 टन/हेक्टेयर/वर्ष पैदावार मिलती है।

यह उत्पादकता चीन और इजराइल जैसे देशों की तुलना में बहुत कम है, जहां प्रतिवर्ष 10 से 15 टन/हेक्टेयर/वर्ष तक की पैदावार मिलती है।

हमारे देश में, 10-15 टन का गहन मत्स्य पालन केवल प्रयोग आधार पर किया गया है और वाणिज्यिक आधार पर इतना उत्पादन अभी भी एक सपना है।

विविधता लाने के लिए तैरते हुए और स्थिर पिंजरों में केज कल्चर अन्य विकल्प है।

हमारे जलीय कृषि पर्यावरण तंत्र की विविधता पेन कल्चर के लिए भी उपयुक्त स्थल प्रदान करती है।

तिलापिया जैसी प्रजातियों की अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बहुत मांग है जिसका अर्ध-गहन या गहन तालाब कल्चर सिस्टम, रेसवे सिस्टम, केज कल्चर सिस्टम आदि जैसी विविध कृषि प्रणालियां अपनाकर ताजे जल वाले वातावरण में उत्पादन किया जा सकता है।

वर्तमान में, झींगा तटीय जलीय कृषि प्रणालियों में उत्पादित की जाने वाली प्रमुख प्रजातियाँ हैं और यह देश में निर्यात केन्द्रित जलीय कृषि क्षेत्र है। 1990 की शुरूआत में आरंभ किया गया वाणिज्यिक झींगा मछली का उत्पादन वर्ष 2017-18 में शिखर पर पहुंचा जिसमें झींगा और स्कैंपी दोनों का 7,00,000 मीट्रिक टन उत्पादन किया गया।

झींगा मछली उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि भारत सरकार की वजह से संभव हुई है जिसने पैसिफिक सफेद झींगा मछली का नियंत्रित प्रयोग करने की अनुमति दी जिसका उद्देश्य वैश्विक बाजारों की मांग पूरा करने में इस प्रजाति की क्षमता का उपयोग करना है।

मेरे प्रिय बहनों और भाइयों,

अधिकतर एशियाई देश आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल से मछली उत्पादन में वृद्धि करने पर बल दे रहे हैं, क्योंकि यह एक सामान्य बात है कि समुद्र से मछली पकड़ने की विधि से उत्पादन करने से भविष्य में उत्पादन की मात्रा अधिक होना निश्चित नहीं है।

अध्ययनों से पता चलता है कि वाइल्ड कैप्चर मत्स्यपालन विधि से मछली पकडने में वास्तव में कमी आ रही है जबकि 1990 के दशक के मध्य में वैश्विक रूप से सबसे अधिक मछलियाँ पकड़ी गईं।

यह अनुमान है कि विश्व के महासागरों के प्राथमिक उत्पादन में 2100 तक 6 प्रतिशत की और कमी और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में 11 प्रतिशत कमी होने की संभावना है।

हमारा भावी दृष्टिकोण समुद्रों में मछली पकड़ने के प्रयासों को बढ़ाने पर केन्द्रित नहीं होना चाहिए, बल्कि नुकसानों को कम करके और मूल्य संवर्धन पर ध्यान केन्द्रित करके घटते मत्स्य पालन संसाधनों के विवकपूर्ण उपयोग पर होना चाहिए।

हमें घाटे को कम करने और मूल्य संबर्धन तथा आधुनिक जलीय कृषि प्रौद्योगिकियों और उत्पादों के विविधीकरण के माध्यम से मछली की निरन्तर बढ़ती हुई आवश्यकता की पूर्ति करने पर ध्यान केंद्रित किए जाने की आवश्यकता है।

एक तरफ हमें एफएओ कोड ऑफ कंडक्ट फॉर रेस्पांसिबल फिशरीज (सीसीआरएफ) सुनिश्चित करने पर ध्यान देना चाहिए। तटीय क्षेत्रों और उच्च समुद्री क्षेत्रों दोनों में मत्स्य संसाधनों की संवहनीयता के लिए ठोस मत्स्य पालन प्रबंधन और बेहतर प्रशासनिक ढांचे के जरिये मछली पालन संबंधी जिम्मेदार गतिविधियों का उचित संवर्धन, नियमन और निगरानी अनिवार्य है।

विशेष रुप से लुप्तप्राय समुद्री प्रजातियों जैसे सीमित संसाधनों के अंधाधुंध दोहन को सख्ती से रोकना चाहिए।

हमें समुद्री जल और ताजे जल के प्रदूषण की ज्वलंत समस्याओं का भी समाधान करना चाहिए। बेकार प्लास्टिक और अन्य घरेलू कचना, कीटनाशकों से निकलने वाले पदार्थ तथा औद्योगिक रसायन अंतत: जल स्रोतों में जाकर मिल जाते हैं जिसके जलीय जीवन और जीव-जन्तुओं के निवास पर घातक प्रभाव होते हैं।

ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे समुद्री और जलीय जीवन और जीवों पर निश्चित रूप से प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।

सभी खाद्य प्रणालियों में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से समन्वित रूप से निपटने की आवश्यकता है ताकि अधिकतम अवसर प्राप्त हो सकें और नकारात्मक प्रभाव कम हो सके तथा भोजन और रोजगार की व्यवस्था सुनिश्चित हो सके।

संवहनीयता और संरक्षण दो ऐसे स्तंभ होने चाहिए जिन पर हमारे मत्स्य पालन क्षेत्र का निर्माण हो सके।

मेरे प्रिय बहनों और भाइयों,

यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि कैप्चर मत्स्यपालन और जलीय कृषि दोनों के आर्थिक लाभों का अधिकतम हिस्सा प्राथमिक उत्पादकों अर्थात् मछुआरों और मत्स्य पालकों को मिले।

हमें ऐसी पहलों पर विशेष बल देना चाहिए जिनसे किसानों/मत्स्य पालकों की आर्थिक स्थिति में सुधार आए।

अनेक हस्तक्षेपों की आवश्यकता है।

उदाहरण के लिए, हमें बिचौलियों की भूमिका कम करनी चाहिए, फसल बीमा उपलब्ध कराना चाहिए, ऋण मिलना आसान बनाना चाहिए, शीत श्रृंखला विकसित करनी चाहिए, दूरदराज के क्षेत्रों को बाजारों से जोड़ना चाहिए और फसल भंडारण, हैंडलिंग और मूल्यसंवर्धन के लिए अवसंरचना उपलब्ध करानी चाहिए।

मुझे ज्ञात है कि सभी प्रकार की आवश्यक तकनीकी सहायता भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के तहत आठ मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थानों, कुछ अन्य अधिकृत संस्थानों जैसे राष्ट्रीय मात्स्यिकी विकास बोर्ड (एनएफडीबी) और अनेक गैर-सरकारी संगठनों जैसे एशियन फिशरीज सोसायटी इंडियन ब्रांच (एएफएसआईबी) द्वारा उपलब्ध कराई जा रही है। तथापि, जागरूकता फैलाने और किसानों/मत्स्य पालकों को सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए और अधिक कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।

मत्स्य पालन और जलीय कृषि बहु-आयामी विषय हैं जिसमें वैज्ञानिकों और प्रौद्योगिकी- विदों को एक टीम के रूप में कार्य करना होता है। इस प्रकार के कार्यक्रम का उद्देश्य न केवल नई प्रौद्योगिकी संबंधी ज्ञान और सूचना साझा करने हेतु मंच प्रदान करना होना चाहिए बल्कि इस ज्ञान को आम जनता, मत्स्य पालकों और प्राथमिक उत्पादकों तक पहुँचाना भी होना चाहिए।

अनुसंधान और विकास एजेंसियों के बीच मज़बूत संबंधों के साथ और अधिक अनुसंधान एवं विकास सहायता, मछली और झींगा हैचरी में अधिक निवेश, विविधतापूर्ण जलीय प्रजातियाँ, जलीय कृषि संपदाओं की स्थापना, फीड मिलें और अनुषंगी उद्योगों, सभी की इस विकास की गति को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों के रूप में पहचान की गई है।

समुद्रीय कृषि के लिए अपतटीय क्षेत्रों के उपयोग पर नीतिगत निर्णयों को भी ध्यान में रखना चाहिए।

जलीय कृषि का उल्लंघन करने पर उचित दंडीय प्रावधानों सहित विभिन्न उप-क्षेत्रों के लिए विनियम कार्य संहिता बनाकर सरल और कारगर बनाया जाना चाहिए।

अस्पष्टता और दोहराव से बचने के लिए विभिन्न योजनाओं और आबंटनों से जलीय कृषि के विकास के लिए कार्य कर रहे विभिन्न संस्थानों की गतिविधियों और जिम्मेदारियों को भी परिभाषित किया जाना चाहिए।

भारत सरकार अर्थव्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए नेतृत्व कर रही और सरकार ने लागत कम करके और उत्पादन, उत्पादकता तथा गुणवत्ता में सुधार करने के प्रयासों द्वारा 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने की परिकल्पना की है।

उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि करने और मछुआरों और मत्स्य पालकों को सम्मानजनक फार्मगेट कीमत का आश्वासन पूरा करने के लिए और साथ ही मत्स्य पालन क्षेत्र को अपेक्षित प्रोत्साहन देने के लिए बहुउद्देशीय नीतियां बनाने और उपाय करने की तत्काल आवश्यकता है जिससे इस क्षेत्र की स्थिति में व्यापक बदलाव आएगा।

मुझे पूर्ण आशा है कि तकनीकी सत्रों के दौरान सभी चर्चाएं हमारी संसाधन क्षमता के इष्टतम उपयोग के लिए जलीय कृषि संवहनीय विकास की दिशा में निर्देशित होंगी।

मैं इस उच्चस्तरीय तीन दिवसीय प्रदर्शनी का आयोजन करने के लिए एमपीईडीए को बधाई देता हूँ जिसमें प्रदर्शनी और तकनीकी सत्र शामिल हैं। इस प्रकार के कार्यक्रम नए विचारों और उन्नत प्रौद्योगिकी का संचार करके इस क्षेत्र में नई ऊर्जा प्रदान करने में सहायक होंगे। मुझे पूर्ण आशा है कि तकनीकी सत्रों के दौरान सभी चर्चाएं हमारी संसाधन क्षमता के इष्टतम उपयोग के लिए जलीय कृषि के संवहनीय विकास की दिशा में निर्देशित होंगी। मुझे इस प्रदर्शनी का उद्घाटन करके प्रसन्न्ता हो रही है और प्रदर्शनी की सफलता के लिए मेरी शुभकामनाएँ।

धन्यवाद!

जयहिन्द!"