28 सितंबर, 2019 को नई दिल्ली में 28वां सरस्वती सम्मान प्रदान करने के बाद सभा में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | सितम्बर 28, 2019

के.के. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा आयोजित 28वें सरस्वती सम्मान प्रस्तुति समारोह में यहां उपस्थित होकर मुझे बेहद प्रसन्नता हो रही है।

यह कार्यक्रम मुझे बहुत प्रिय है क्योंकि मुझे भारतीय भाषाओं के संवर्धन से विशेष लगाव है। मैं उस अवधारणा की सराहना करता हूं जिसके आधार पर 1991 में स्वर्गीय डॉ. के.के. बिड़ला, पूर्व संसद सदस्य ने भारतीय संस्कृति, साहित्य, कला, विज्ञान और शिक्षा को बढ़ावा देने के एक महान दृष्टिकोण के साथ इस फाउंडेशन की स्थापना की थी।

मैं सबसे पात्र व्यक्तियों को सम्मानित करने के लिए हमारे विशाल देश की विभिन्न भाषाओं के साहित्यक रचनात्मक सृजन के न्याय-निर्णय हेतु संरचना तैयार करने के लिए के.के. बिड़ला फाउंडेशन की सराहना करता हूं। यह एक उल्लेखनीय भाव है जो लेखकों को भारतीय भाषाओं में रचनात्मक रूप से अभिव्यक्त करने में सहायता करता है।

मुझे यह जानकर खुशी हुई कि इस फाउंडेशन द्वारा दिए गए पुरस्कारों को भारतीय साहित्य के क्षेत्र में सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार माना जाता है और मैं के.के. बिड़ला फाउंडेशन के प्रयासों के लिए उसकी अत्यधिक सराहना करता हूँ ।

प्रिय बहनों और भाइयों,

भाषा किसी भी संस्कृति की जीवन रेखा होती है। भारत कई भाषाओं का उद्गम स्थल है और हमें उन्हें संरक्षित करने, बढ़ावा देने और उनका प्रचार करने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। जब कोई भाषा समाप्त होती है तो उस भाषा से जुड़ी सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं और रीति-रिवाजों का क्षय होगा।

भाषा संरक्षण और विकास के लिए एक बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। मैं सदैव लोगों द्वारा अपनी मातृभाषा में बात करने का समर्थक रहा हूँ, सिवाय इसके कि जहाँ दूसरी भाषा में संवाद करना आवश्यक हो। मैं अंग्रेजी या किसी अन्य भाषा को सीखने के खिलाफ नहीं हूं। परन्तु कोई व्यक्ति अपनी मातृभाषा में प्रभावी ढंग से संवाद कर सकता है और बेहतर ढंग से अपनी बात स्पष्ट कर सकता है।

हालाँकि, भाषा संरक्षण और विकास केवल सरकार का काम नहीं है। इसे जन आन्दोलन का रूप लेना होगा। भाषाओं के संरक्षण और सुरक्षा के लिए सामुदायिक भागीदारी आवश्यक है।

मेरी राय में, प्राथमिक विद्यालय स्तर पर मातृभाषा का संवर्धन शुरू होना चाहिए। मैं सभी राज्य सरकारों को प्राथमिक विद्यालय तक मातृभाषा को अनिवार्य बनाने की सलाह देता रहा हूं। मेरा यह भी दृढ़ मत है कि देश भर में राज्य प्रशासन द्वारा सेवाओं में दक्षता और सेवाओं के परिदान में सुधार के लिए संबंधित स्थानीय भाषाओं का उपयोग बड़े पैमाने पर किया जाना चाहिए।

किसी भी भाषा को संरक्षित करने या बढ़ावा देने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि इसे दैनिक जीवन में बड़े पैमाने पर प्रयोग में लाया जाए। अधिक से अधिक लोगों को अपनी मूल भाषा का प्रयोग घर पर, समुदाय में, बैठकों में और प्रशासन में आरम्भ करना चाहिए।

जैसा कि आप सभी जानते हैं, राज्यसभा सदस्य अब संसद में 22 अनुसूचित भाषाओं में से किसी भी भाषा में बात कर सकते हैं और अपनी बातों को रख सकते हैं। इन भाषाओं का युगपत अनुवाद उपलब्ध कराया जाता है और सदस्य उन भाषाओं में से किसी भी भाषा में अपने विचारों को प्रभावी ढंग से संप्रेषित कर सकते हैं।

प्रौद्योगिकी की सहायता से अब हम विभिन्न भाषाओं में युगपत अनुवाद की सुविधा प्रदान करने में सक्षम हैं। हमें अपनी भाषाओं और संस्कृति को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के लिए प्रौद्योगिकी की शक्ति का दोहन करना चाहिए। सभी भारतीय भाषाओं में ऑनलाइन शब्दकोश, विश्वकोश, शब्दावली, शोध लेख और खोज योग्य डेटाबेस तैयार किए जाने चाहिए। पुरानी पांडुलिपियों की सुकर पुनर्प्राप्ति के लिए इन्हें इलेक्ट्रॉनिक रूप में संग्रहीत किया जाना चाहिए।

मेरा यह भी मानना है कि अधिक से अधिक लोगों को उनकी मूल भाषा में कविता, कहानी, उपन्यास और नाटक लिखने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

उन लोगों को गरिमा और गौरव की भावना का अहसास करवाया जाना अत्यधिक महत्वपूर्ण है जो अपनी मूल भाषा में बोलते है, लिखते हैं और संवाद करते हैं।

यहां मैं योग्यता और प्रतिभा को पहचान कर और उन्हें पुरस्कृत करके भाषाओं को बढ़ावा देने संबंधी प्रयासों के लिए के.के. बिड़ला फाउंडेशन जैसे संगठनों की सराहना और अभिनन्दन करता हूं।

भारतीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए विभिन्न हितधारकों द्वारा इस तरह के अधिक प्रयासों की आवश्यकता है। हमारे सभी राज्यों की बोलियों और लोक साहित्य में पर्याप्त सामग्री तैयार करने की तत्काल आवश्यकता है।

हमें यह मानना चाहिए कि समावेशी विकास के लिए भाषा सीखना एक उत्प्रेरक भी है।

मुझे खुशी है कि फाउंडेशन ने इस पुरस्कार का नाम "सरस्वती सम्मान" रखा है। आप इन पुरस्कार कार्यक्रमों के माध्यम से उन लेखकों को सम्मानित कर रहे हैं, जिन पर विद्या, ज्ञान, संगीत और शिक्षा की देवी माँ सरस्वती का आशीर्वाद है। साहित्य, ललित कला और अन्य सांस्कृतिक कलाकृतियों के निर्माण के माध्यम से अच्छे विचारों और ज्ञान का संरक्षण और प्रचार करना देवी सरस्वती की सच्ची पूजा है। यह "सरस्वती सम्मान" भी रचनात्मक उत्साह के प्रति एक श्रद्धांजलि है, जो हमारी परंपरा में देवी सरस्वती के आशीर्वाद से प्राप्त होता है। यह एक उत्साह है जो कल्पना को प्रज्वलित करता है, रचनात्मकता को बढ़ावा देता है और ज्ञान के प्रकाश को चारों ओर फैलाता है।

प्रिय बहनों और भाइयों,

अच्छी कविता, साहित्य और लेखन पढ़ने से न केवल नए विचारों का सूत्रपात होगा अपितु हमें हास्य, खुशी और आत्मा को संतुष्टि प्रदान करने वाली भावनाएं भी मिलेंगी।

मुझे अभी डॉ. के. शिवा रेड्डी को उनके तेलुगु काव्य-संग्रह 'पक्ककी ओट्टिगलाइट' के लिए सरस्वती सम्मान देने का गौरव मिला है।

डॉ. के. शिवा रेड्डी न केवल तेलुगु बल्कि भारतीय साहित्य के प्रमुख कवियों में से एक हैं और वे अपने विपुल लेखन और विषयों और रूपों के साथ सहजता से प्रयोग करने के साथ एक 'ट्रेंड सेटर' बन गए हैं।

चार दशक से अधिक के उनके साहित्यिक करियर में प्रगतिशील, क्रांतिकारी, विद्रोहपरक और मानवतावादी आंदोलनों से लेकर उस समय के सभी आंदोलनों और प्रवृत्तियों को शामिल किया गया है, जिसमें आधुनिकता के साथ-साथ उत्तर आधुनिकता का दौर भी शामिल है।

मार्क्सवाद से अत्यधिक प्रभावित होने के कारण वह वे शोषित और दमित लोगों के हिमायती रहे हैं। वह मजदूरों और समाज के हाशिए पर रहने वाले वर्गों के लिए अत्यधिक सहानुभूति रखते हैं।

उनकी पुस्तक 'पक्ककी ओट्टिगलाइट' उनके हाल ही के काव्य-संग्रहों में से एक है, जो विविध विषयों को रचनात्मक रूप से अभिव्यक्त करने की उनकी क्षमता को दर्शाती है।

वास्तव में डॉ. के. शिवा रेड्डी एक प्रतिभावान कवि हैं, जो अनवरत लेखन कार्य करते हैं। डॉ. रेड्डी को केंद्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार, गंगाधर मेहर राष्ट्रीय पुरस्कार और कबीर सम्मान पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

डॉ. शिवा रेड्डी के पास मार्क्स वाद से लेकर मानवतावाद तक के विषय में काव्य अभिव्यक्ति की एक पूरी श्रृंखला है। लेकिन, उनका दृढ़ विश्वास है कि सामान्यीकरण और सरलीकरण के लिए जीवन बहुत जटिल है।

डॉ. शिवा रेड्डी ने अपनी हाल ही की कविताओं में दुनिया के भौतिक और सामाजिक मुद्दों से लेकर मनोवैज्ञानिक संघर्षों और व्यक्ति की सत्य की खोज संबंधी अलग-अलग बारीकियों का बखूबी चित्रण किया है।

मैं के.के. बिड़ला फाउंडेशन विशेष रूप से श्रीमती शोभना भरतिया जी का यह पुरस्कार देने का अवसर प्रदान करने के लिए अत्यधिक आभारी हूँ। मैं तेलुगू साहित्य को समृद्ध बनाने में शानदार योगदान के लिए डॉ. के. शिवा रेड्डी को बधाई देता हूं।

धन्यवाद

जय हिन्द !