28 फरवरी, 2020 को ममल्लापुरम, तमिलनाडु में गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ़ आर्किटेक्चर एंड स्कल्पचर के छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों को भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

मामल्लपुरम | फ़रवरी 28, 2020

“बहनों और भाइयों,

मामल्लपुरम में आज आप सभी के बीच आकर मुझे खुशी हो रही है।

मामल्लपुरम नाम ही हमारे दिलों में श्रद्धा व आदर का भाव उत्पन्न करता है। शहर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासर, इसके भव्य हिंदू मंदिर, गुफाएं ओर नक्काशी देश और दुनिया के लोगों को मंत्रमुग्ध करती हैं।

यह एक दुलर्भ यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है जहां चार प्रकार के मंदिर स्मारक एक साथ विद्यमान हैं। इस शहर में निम्नलिखित हैं-

शॉर मंदिर:- सबसे पुराने संरचनात्मक पत्थर के मंदिरों में से एक।

रथ मंदिर:- विशालकाय भारतीय शैल कर्तित वासतुकला का आदर्श उदाहरण।

केव मंदिर:- और अर्जुनाज पेनन्स प्रायश्चित या डिसेन्ट ऑफ द गंगेज- जो दुनिया की सबसे बड़ी ओपन एयर चट्टान पर उभरी हुई नक्काशियों में से एक है।

इन स्मारकों में न केवल वासतुकला की महान विविधता देखी जा सकती है, बल्कि इसके विकास को भी देखा जा सकता है।

वास्तुकला की भव्यता के अलावा, मामल्लपुरम की पल्लव मूर्तियां एक दुर्लभ लालित्य और संतुलन को प्रदर्शित करती हैं।

मुझे लगता है कि वास्तुकला और मूर्तिकला कॉलेज के लिए इससे बेहतर जगह नहीं हो सकती।

यह शहर जो कभी प्राचीन पल्लव साम्राज्य का एक प्रमुख बंदरगाह था, प्राकृतिक सौंदर्य से भी समृद्ध है।

मामल्लपुरम जैसे स्थान पर संस्कृति और प्रकृति एक साथ पाई जाती हैं। और दोनों का सम्मान और संरक्षण करके हम भावी पीढी के लिए एक उज्ज्वल भविष्य का निमार्ण कर सकते हैं।

मेरे प्यारे युवा मित्रों,

कला और संस्कृति मानव जाति के मानसिक और भावनात्मक विकास के चरम की द्योतक हैं।

हम एक महान संस्कृति के उत्तराधिकारी होकर भाग्यशाली हैं। हमारी सभ्यता दुनिया की प्राचीनतम विद्यमान सभ्यताओं में से एक है।

हमारा अतीत शानदार रहा है क्योंकि हमने ‘विश्वगुरू’ के रूप में दुनिया पर राज किया है।

तमिलनाडु राज्य जो भारतनाट्यम का जन्म स्थान है तथा शास्त्रीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा का घर है, ने भारत की मिश्रित संस्कृति को काफी समृद्ध किया है।

आज में विविध कला रूपों, थप्पट्टम, ओइलाट्टम, करगट्टम, कार्र सिलांबम का साक्षी बनकर बहुत प्रसन्न हुआ। शास्त्रीय कला रूपों के साथ तमिलनाडु में लोक कला रूपों की भी उतनी ही समृद्ध परम्परा है।

भक्ति आंदोलन जिसने हिन्दू समाज के प्रत्येक वर्ग को गले लगाया तथा जो देश के प्रत्येक भाग में फैला, भारत के इस भाग में उत्पन्न हुआ।

तमिल भारत की शास्त्रीय भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त करने वाली पहली भाषा थी। इसका समृद्ध साहित्य प्रेरणा दायक है और इसके काव्य में सार्वभौमिक आकर्षण है।

तिरूक्कुरल का कालातीत ज्ञान आज भी हमारा मार्गदर्शन करता है। यह अपने सुख दुख साझा करने और एक दूसरे की देखभाल करने और वसुधैव कुटुम्बकम के मूल्यों को सिखाता है जब यह कहता है कि-

“जैसे प्राण मानव देह जुडे हैं,

प्यार जीवन का अभिन्न अंग है”।

तमिलनाडु के भव्य मंदिर जैसे मदुरै मीनाक्षी अम्मन मंदिर, तंजौर बृहदेश्वर मंदिर, श्री रंगम श्री रंगनाथस्वामी मंदिर हमारे वास्तुकारों और मूर्तिकारों की सर्वोच्च प्रतिभा और कौशल का एक शानदार प्रमाण हैं।

मेरे प्यारे युवा छात्रों,

इन स्मारको से आपकी कल्पना जागृत होनी चाहिए।

मास्टर वास्तुविद ‘स्थापथी’ जिसने इन भव्य मंदिरों की संकल्पना और निर्माण किया है की दृष्टि की गहराई के बारे में सोचिये।

ये स्मारक केवल कला रूप ही नहीं हैं, बल्कि इंजीनियरी के चमत्कार भी हैं।

हमारे इंजीनियरी के छात्रों को उन स्थापथियों से प्ररेणा लेनी चाहिए। उनको कल्पना करनी चाहिए कि उन्होंने इस तरह के समारकों, उनके द्वारा इस्तेमाल की गई तकनीकों, उनके द्वारा बनाई गई रूपरेखा और इतनी ज्यादा उचाइंयों पर मूर्तियों को तराशने के लिए बनाए गए प्लेटफार्मों को कैसे बनाया।

ये निर्माता कितने संसाधन सम्पन्न, कुशल और प्रतिब्द्ध रहे होंगे।

आप वास्तव में मामल्लपुरम के इस कॉलेज के छात्र होकर बहुत सौभाग्यशाली हो। यह पूरा शहर आपकी संख्या के विसतार के रूप में कार्य करता है। प्रत्येक नक्काशी प्रत्येक इमारत, प्रत्येक मूर्तिकला में अमूल्य संदेश छिपे हैं, आपको केवल उन पर ध्यान केंद्रित करने, उन्हें ग्रहण करने और आत्मसात करने की आवश्यकता है।

आज वास्तुकला और आयोजना विषयों का बहुत महत्व और अहमियत है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि 21वीं सदी में वास्तुकारों और योजनाकारों की भूमिका केवल मानव बस्तियों और इमारतों का अभिकल्प तैयार करने और उन्हें मूर्त रूप देने तक सीमित नहीं है।

तेजी से बदलती दुनिया की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अब वास्तुकारों को नवोन्मेषी और रचनात्मक होना होगा जिसमें डिजीटल तजकनीकें जीवन के हर पहलू को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

आज संरक्षण और संवहनीयता के दोहरे सिद्धांत आपकी सभी योजनाओं के मूल में होने चाहिए।

यह विशेष रूप से नए भवनों के डिजाइन में शामिल पेशेवरों के लिए महत्वपूर्ण है।

समय की जरूरत है कि पर्यावरण के अनुकूल भवनों को बढावा दिया जाए जो कम पानी का उपयोग करते हैं और ऊर्जा का अनुकूलन करते हैं और स्वचालित संचालन के साथ ‘स्मार्ट भवनों’ का निर्माण करने के लिए डिजीटल प्रौद्योगिकी का पूरा लाभ उठाये हैं।

भारत सरकार के अधीन ऊर्जा दक्षता ब्यूरो ने हरित भवनों के लिए ऊर्जा संरक्षण भवन संहिता की शुरूआत की है।

मैं आप में से प्रत्येक से इस संहिता को अपना समझकर अपनाने और दूसरों को ऊर्जा दक्ष भवनों के निमार्ण के लिए प्रेरित करने का आह्वान करता हूं।

तीव्रगति के बढते शहरीकरण के समाधान हेतु और शहरी क्षेत्रों में पलायन के प्रभावों को सीमित/नियोगित करने के लिए, ग्रामीण और परिनगरीय क्षेत्रों में उपलब्ध बुनियादी सुविधाओं को बढाने के तरीकों को विकसित करने की आवश्यकता है।

ऐसा करते समय निर्मित पर्यावरण को बेहतर बनाने और संवहनीय विकास की दिशा में काम करने के लिए परंपरा और प्रौद्योगिकी को समाहित करने की आवश्यकता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में भी शहरी क्षेत्रों के बराबर सुविधाएं उपलब्ध करवाना महत्वपूर्ण है।

इसके साथ-साथ यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ग्रामीण क्षेत्र कंक्रीट के जंगलों में तब्दील न हो जाएं। हमारा निर्मित वातावरण आधुनिकता और पंरपरा का एक उत्तम मिश्रण होना चाहिए।

वास्तुकारों और शहरी योजनाकारों के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि वे हमारी संस्कृति को बनाए रखें और बेहतर भविष्य के लिए प्रकृति की रक्षा करें।

मुझे यकीन है कि इस संस्था में शिक्षा प्राप्त करने से आपमें गतिशील और जिम्मेदार पेशेवर होने के लिए सही गुणों का विकास हुआ होगा।

प्रिय छात्रों,

भारत दुनिया में सबसे तेजी से बढती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और हम कदुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर अग्रसर हैं।

जब आप अपने स्वपनों को साकार करने और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कदम बढाएंगे तो आपको भरपूर अवसर मिलेंगे ।

आपको कभी भी बेपरवाह नहीं रहना चाहिए तथा हमेशा उत्कृष्टता प्राप्त करने काक लक्ष्य रखनी चाहिए।

आपको अपने क्षेत्र का अनुकरणीय बनना चाहिए और भारत की विकास गाथा में अग्र सक्रिय भागीदार बनना चाहिए।

यहां संत तिरूवल्लुवर के ज्ञान के अनन्त शब्द है। विरूक्कुरल में वे कहते हैं-

“जो चीज महान लोगों को साधारण लोगों से अलग करती है,

वह उनकी असंभव प्रतीत होने वाले काम को करने की क्षमता होती है”

जैसा कि आप सभी जानते हैं, इमारतो के डिजाइन तथा शहरों की योजना की तकनीकें पिछले कुछ वर्षों में विकसित हुई हैं और वे स्वस्थ और समृद्ध समाज बनाने में प्रमुख भूमिका निभाती हैं।

दुनिया के प्रमुख वैज्ञानिक विश्वविद्यालय केवल शिक्षण पर ध्यान केंद्रित नहीं कर रहे हैं, बल्कि नवाचार और उचित प्रौद्योगिकियों के विकास के केन्द्र बनने के लिए तत्पर हैं जो जन-जीवन तक पहुंचकर उनके जीवन में बदलाव ला सकते हैं।

मैं इस संस्था से अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने का आग्रह करता हूं जो हमारे शहरों को सुखद और सुरक्षित बना सकते हैं और हमारी इमारतों को हरी-भरी और अधिक लागत प्रभावी तथा सस्ती बना सकते हैं।

मुझे खुशी है कि यह संस्था मुर्तिकारों को प्रशिक्षण और कौशल प्रदान करके हमारी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

मुझे परिसर में स्टुको (सुधाई) पत्थर, धातु और काष्ठ मूर्तिकला वर्क स्टूडियो, वास्तुकला वर्क स्टूडियो और पारंपरिक पेंटिंग वर्क स्टूडियो का दौरा करने और भगवान वेंकटेश्वर की मूर्ति के दर्शन करने में बहुत खुशी हूई।

यह खुशी की बात है कि मामल्लपुरम के मुर्तिकार अभी भी नक्काशी के लिए हथौड़ा और छेनी तकनीक का उपयोग करते है और वे अभी भी विभिन्न शिल्पशास्त्रों में वर्णित समय लेने वाली प्रक्रिया का अनुसरण करते हैं।

यह वास्तव में प्रशंसा की बात है कि वर्तमान समय के मूर्तिकारों में असाधारण कौशल है और वे पल्लव युग की जटिल कलाकृतियों की प्रतिकृति बनाने की क्षमता रखते हैं।

इन विशिष्ट विशेषताओं के कारण, मामल्लपुरम की हाथ से तैयार की गई पत्थर की मूर्तियों को 2017 में भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग प्रदान किए गऐ थे।

यह मान्यता इस प्राचीन कला को बढावा देने में मदद करेगी और अपने व्यावसायिक हितों की रक्षा करने में कारीगरों और मूर्तिकारों को सुरक्षा प्रदान करेगी।

मुझे आशा है कि आप में से हर कोई इस महान राष्ट्र की अमूल्य संस्कृति और विरासत को सुरक्षित रखने और बढ़ावा देने के लिए प्रयासरत रहेगा और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ मिश्रित करेगा, तथा अपने अपने विषयों में महारथ हासिल करेंगे।

मैं आपके भावी प्रयासों में आप सभी को शुभकामनाएं देता हूं।

धन्यवाद,

जयहिंद!”