28 जुलाई, 2019 को हैदराबाद में विश्व मानव तस्करी रोधी दिवस के अवसर पर ट्रेनिंग मैन्युअल ऑन होम मैनेजमेंट फॉर होम्स मेंट फॉर सेक्स ट्रैफिक्ड विक्टिम्स का विमोचन करने के पश्चात् सभा में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गय

हैदराबाद | जुलाई 28, 2019

“मानव तस्करों से बचाए गए पीड़ितों के आश्रय गृहों के लिए गृह प्रबंधन प्रशिक्षण पुस्तिका को जारी करने के इस अवसर पर उपस्थित होकर मुझे बहुत प्रसन्नता हो रही है।

सबसे पहले मैं डॉ. सुनीता कृष्णन और उनके जो कि मानव तस्करी-विरोधी एक अग्रणी संगठन है, के एनजीओ 'प्रज्जवला' द्वारा किए जा रहे उत्कृष्ट कार्य की सराहना करना चाहूंगा।

मुझे यह जानकर खुशी हुई कि 1996 में छोटी सी शुरुआत करने वाले संगठन 'प्रज्जवला' की आज पूरे भारत में मौजूदगी है और यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी काम कर रहा है। यह वास्तव में ध्यान देने योग्य बात है कि 'प्रज्जवला' का कार्य मानव तस्करी के पीड़ितों के लिए रोकथाम, संरक्षण, बचाव, पुनर्वास और समाज की मुख्यधारा में उनके फिर से शामिल होने के सभी पांच स्तंभों को समाविष्ट करता है।

मुझे यह देखकर खुशी हुई कि 'प्रज्जवला' अब मानव तस्करी के पीड़ितों के हक में आवाज़ उठाने वाली और उनके लिए समग्र सेवाएं सुरक्षित करने के लिए प्रयासरत राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सबसे शक्तिशाली आवाजों में से एक बन गया है।

मेरे प्यारे बहनो और भाइयो,

मानव तस्करी केवल एक सामाजिक बुराई ही नहीं बल्कि उससे भी कहीं अधिक है। यह स्वयं मानवता के विरुद्ध ही एक हिंसक अपराध है। यह एक ऐसा खतरा है जो मानव अधिकारों, न्याय और गरिमा के सभी बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन करता है और इसे अक्सर आधुनिक काल की दासता कहा जाता है।

प्रत्येक वर्ष वैश्विक स्तर पर हजारों पुरुष, महिलाएं और बच्चे तस्करों के चंगुल मे फंस जाते हैं। पीड़ितों के मूल निवास का देश, पारगमन का देश अथवा गंतव्य देश के रूप मे दुनिया का लगभग प्रत्येक देश इस तस्करी से ग्रस्त है।

कुछ मामलों में तस्कर पीड़ितों से छल करते हैं, उन्हें ठगते हैं और शारीरिक रूप से विवश करते हैं और अन्य मामलों मे इन पीड़ितों से झूठ बोला जाता है, उन पर हमला किया जाता है, धमकाया जाता है या चालाकी से उनसे अमानवीय, गैर-कानूनी और अन्यथा अस्वीकार्य परिस्थितियों में काम करवाया जाता है।

मानव तस्करी पूरी दुनिया में एक संगठित अपराध बन चुका है। इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि यह एक ऐसा अपराध है जो अक्सर सामने होते हुए भी आसानी से नज़र नहीं आता जबकि वह लोगों के जीवन तथा देशों के सामाजिक, आर्थिक ढांचों को बर्बाद कर रहा होता है।

यह वास्तव मे चिंता का विषय है कि भारत भी बलात्श्रम या यौन उत्पीड़न के लिए पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की तस्करी की समस्या का सामना कर रहा है। '2016 में भारत में अपराध की रिपोर्ट' के वार्षिक आंकड़ों में उजागर हुआ है कि भारत के सभी राज्यों में मानव तस्करी के मामले सामने आए हैं।

सौभाग्य से सरकार के अनवरत प्रयासों और प्रज्जवला, 2016 जैसे समर्पित नागरिक समाज समूहों के कार्यों के कारण हम 23,000 से भी अधिक पीड़ितों की मुक्ति देख पाए हैं।

हम इस सर्वाधिक घृणित अपराध को मानव के जीवन पर कहर बरपाने नहीं दे सकते। यहां तक कि यदि एक भी मानव पीड़ित है तो वह 'बहुत से पीड़ितों' के बराबर है।

प्यारे बहनो और भाइयो,

मुझे विश्वास है कि सरकारी एजेंसियां, नागरिक समाज और गैर-सरकारी संगठन मानव तस्करी के विरुद्ध लड़ाई को अटल, दृढ़ और अनवरत तरीके से आगे ले जाने के लिए अपने प्रयासों को समन्वित करेंगे। मानव तस्करी के विरुद्ध युद्ध को तब तक जारी रखना होगा जब तक इसके अंतिम पीड़ित को बचा नहीं लिया जाता, उसका पुनर्वास नहीं कर दिया जाता और इसके अंतिम अपराधी को सजा नहीं मिल जाती।

हमारे संविधान की आधारशिला का निर्माण करने वाले मौलिक अधिकार प्रत्येक नागरिक को स्वतन्त्रता के अखंडनीय अधिकार और शोषण व सभी प्रकार के बलात्श्रम , बाल श्रम, तस्करी के विरुद्ध अविच्छेद्य अधिकार की गारंटी देते हैं।

इस देश के प्रत्येक नागरिक के पास सुरक्षित और गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार है।

हमारा संविधान हम में से प्रत्येक नागरिक को ये पावन दायित्व सौंपता है कि हम मानव तस्करी को मिटाने के लिए अथक प्रयास करें। इस कार्य के लिए पूरे समाज को एकजुट होना होगा।

इस अपराध की प्रकृति और पीड़ितों को बचाने और उनके पुनर्वास पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए हमें यथासंभव प्रयास करने चाहिए।

मानव तस्करी के पीड़ितों को सामान्य जीवन जीने और समाज की मुख्यधारा से फिर से जुड़ने के लिए अपनी सहायता और समर्थन देने के लिए भी लोगों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

तस्करी से मुक्त कराए गए व्यक्तियों को विभिन्न सेवाएं प्रदान करने वाले सभी हितधारकों के लिए पीड़ितों और तस्करी से उन पर होने वाले प्रभाव को समझना सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात है। सभी हितधारकों को पीड़ितों के शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, वित्तीय और आध्यात्मिक स्वास्थ्य पर उनके साथ हुई हिंसा, क्रूरता, दुर्व्यवहार और शोषण से पड़ने वाले प्रभाव को पहचानना चाहिए।

जबकि अपराध का प्रभाव उस उद्देश्य पर निर्भर करता है जिसके लिए संबंधित इंसान की तस्करी की गई है, आमतौर पर यह देखा गया है कि यौन तस्करी के पीड़ित अपने शरीर और अपने मानस दोनों पर गंभीर आघात की पीड़ा झेलते हैं।

ये पीड़ित शर्मिंदगी और अपराध बोध से ग्रस्त होते हैं और अक्सर अपनी इस दुर्दशा के लिए स्वयं को ही किसी तरह जिम्मेदार ठहराते हैं और स्वयं को दोष देते हैं। इसी तरह की परिस्थितियों से बहुत से पीड़ितों को मुक्त कराया जाता है।

तस्करी से मुक्त कराए गए पीड़ित स्वस्थ हों पाएँ और सामान्य जीवन जी सकें इसके लिए एक समर्थनकारी और सहायक तंत्र का सृजन सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। उनकी चिकित्सकीय सहायता, परामर्श और उपचार सुनिश्चित करवाने के साथ ही साथ हमें पीड़ितों के लिए शिक्षा, प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने होंगे।

बाल पीड़ितों के मामले में विशेष ध्यान रखे जाने की जरूरत है क्योंकि वे अत्यधिक सदमे और आघात से गुज़रते हैं उन्हें पूरी तरह से ठीक होने के लिए उच्च स्तर की देखभाल की आवश्यकता होगी।

वर्ष 2013 में संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने 30 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करी विरोधी दिवस के रूप मे निर्दिष्ट किया था। संयुक्त राष्ट्र के इस संकल्प में घोषणा की गई थी कि ऐसा एक दिन 'मानव तस्करी के पीड़ितों की स्थिति को लेकर जागरूकता फैलाने और उनके अधिकारों के प्रचार व संरक्षण के लिए' आवश्यक है।

अंतर्राष्ट्रीय दिवस चिंताजनक मुद्दों पर लोगों को शिक्षित करने, वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और संसाधनों को जुटाने, और मानवता की उपलब्धियों की सराहना करने व उन्हें सुदृढ़ करने के अवसर होते है।

जब पीड़ितों को शोषणकारी परिस्थितियों से मुक्त कराया जाता है और वे ऐसी हिंसा के परिणामस्वरूप गंभीर प्रभावों से पीड़ित होते हैं, तब अंतत: अपने पुनर्वास की दिशा में उनकी पहली और सबसे आवश्यक जरूरत एक सुरक्षित स्थान और आश्रय की होती है।

देखभाल और सुरक्षा के लिए बनाए गए सुरक्षा गृह ऐसे गंभीर अत्याचारपूर्ण हालातों से आने वाले पीड़ितों के समग्र पुनर्वास के लिए एक समर्थनकारी वातावरण का सृजन करने के मामले में गंभीर चुनौतियों का सामना करते हैं।

मैं समझता हूं कि इस संकट ने डॉ. सुनीता कृष्णन द्वारा इस गृह प्रबंधन पुस्तिका को विकसित किए जाने की नींव रखी। मुझे पूरा विश्वास है कि यह पुस्तिका ऐसे ज्ञान और कौशल का निर्माण करेगी जिससे तस्करी किए गए पीड़ित की विशिष्ट मनोवैज्ञानिक स्थितियों से निपटने और गृह प्रबंधन के लिए कानूनी रूप से स्वीकार्य तरीकों पर एक समझ पैदा करने में सहायता मिलेगी।

यह मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि सरकार और एनजीओ द्वारा चलाए जाने वाले सभी आश्रय गृह इस गृह प्रबंधन पुस्तिका को उपयोग में लाएंगे जो कि डॉ. सुनीता कृष्णन और प्रज्जवला के अति निपुण स्टाफ के दो दशक से भी अधिक लंबे सामूहिक अनुभवों का परिणाम है।

जहां सरकारी कारवाई महत्वपूर्ण हैं वहीं इस अपराध को रोकने का दारोमदार हम सभी पर है। हमारी मेहनत और साहस वास्तव में ज़िन्दगियां बचा सकता है।

मैं एक बार पुनः डॉ. सुनीता कृष्णन और 'प्रज्जवला' को बधाई और अपनी शुभकामनाएं देता हूं और आशा करता हूं कि वे आने वाले दिनों में भी मानवता की इस असाधारण सेवा को जारी रखेंगे।

धन्यवाद!

जय हिंद!