27 सितंबर, 2019 को नई दिल्ली में परमेश्वर टू पीपी नामक पुस्तक का विमोचन करने के उपरांत भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया अभिभाषण

नई दिल्ली | सितम्बर 27, 2019

गणमान्य आमंत्रितगण और मीडिया के मित्रों!

मेरे लिए, 'परमेश्वर टू पीपी' पुस्तक का विमोचन दो मूल्यों का प्रतीक है, जिनमें से एक का संबंध उन मूल्यों से है जो किसी व्यक्ति को उनके पूरे पेशेवर करियर में प्रिय होता है और दूसरा है पारिवारिक मूल्य जिसे हमारे समाज में सर्वाधिक प्रिय माना जाता है।

संसद और न्यायपालिका हमारे संसदीय लोकतंत्र के तीन स्तंभों में शामिल है। संसद के संबंध में यह कहा जाता है कि जब सदस्यों के पास तथ्य नहीं होते तो वे सभापति के आसान के समक्ष आ जाते हैं। न्यायालयों के बारे में यह कहा जाता है कि जब वकीलों को कानून की जानकारी नहीं होती तो वे अपने स्वर को तेज कर लेते हैं।

स्वर्गीय श्री पावनी परमेस्वर राव, जो 'पीपी’ के रूप में जाने जाते हैं, अपने 40 साल के लंबे करियर में उन मूल्यों से बंधे थे जिन्हे आमतौर पर ‘पुरानी दुनिया' का माना जाता है, और फिर भी हमारे देश के सर्वश्रेष्ठ विधि विशेषज्ञों में से एक के रूप में उभरे। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत लगभग 400 रुपये प्रति माह कमाने वाले कानून के शिक्षक के रूप में की और आगे बढ़ते हुए एक प्रभावशाली वकील के रूप में अपने समय के एक सेकंड से कम अंश से भी उतनी ही रकम कमाने वाले बने।

पीपी न तो आकर्षक थे और न ही तेजतर्रार। न्यायालय में जब न्यायपीठ उनके दृष्टिकोण का समर्थन नहीं करती थी तो वे नाटकीय व्यवहार का सहारा नहीं लेते थे। उन्होंने कभी अपनी आवाज ऊंची नहीं की और कभी भी न्यायालय के प्रति अशिष्ट नहीं हुए। श्री अभिषेक मनु सिंघवी के शब्दों में, 'संयम, संतुलन और समरूपता' जैसे गुण पीपी को परिभाषित करते थे। पीपी हमेशा वाणी या आचरण में अशिष्टता से दूर रहे और उन्होंने विचाराधीन मुद्दे को कभी तुच्छ नहीं बनाया। उनकी वकालत की पहचान नैसर्गिक संतुलन, संयम और आनुवंशिक सज्जनता थी जो या तो अंतर्निहित आंतरिक शांति और स्थिरता की अभिव्यक्ति थी या ध्यान के कुछ विशेष तरीके द्वारा सीखी गई थी। पीपी ने हमेशा ग्राहक को 'अन्नदाता' माना। आज विमोचन की जाने वाली पुस्तक के अपने एक लेख में पीपी ने लिखा है कि ‘वकालत एक पेशा है, व्यवसाय नहीं’।

पीपी की बहू श्रीमती महालक्ष्मी पावनी, और किताब के भावार्थ से पता चलता है कि उन्हें अपने प्रभावशाली ससुर से कभी भी अपेक्षित खुला समर्थन और सहयोग नहीं मिला। अपने परिचित और संबंधियों के लिए पीपी का मंत्र था "जो आप चाहते हैं उसके योग्य बने और कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं है"। जब प्रसन्न होकर महालक्ष्मी ने पीपी को बताया कि उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में निर्दिष्ट किया गया है, तो पीपी ने कहा कि 'यह इतना आसान कब से हो गया है ’। पीपी ने उच्चतम न्यायालय बार एसोसिएशन के उपाध्यक्ष पद के लिए भी महालक्ष्मी के प्रतिद्वंद्वी का यह कहते हुए कि इस तरह का पद एक अधिक अनुभवी वकील के पास होना चाहिए, समर्थन किया।

मेरे विचार में, परमेश्वर 'पावर ऑफ प्रोप्राइटी’ के सिद्धांत में अपने असीम विश्वास के कारण पीपी बन गए और उन्होने देश के कानून द्वारा परिभाषित सत्य के अनुसरण में इसी सिद्धांत का पालन किया। इसलिए, इस पुस्तक का विमोचन पीपी के ऐसे उदात्त मूल्यों और आदर्शों के उत्सव का प्रतीक है।

लगता है कि श्रीमती महालक्ष्मी को उनके पेशे में अपेक्षित सीमा तक सहायता नहीं करने के लिए अपने ससुर से शिकायत थी। हालाँकि, इससे वह अपने दम पर उच्चतम न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता बन सकी और उन्हें अपनी उपलब्धियों पर गर्व हो सकता है। कदाचित पीपी ने ऐसा ही चाहा हो और महालक्ष्मी ने 'इच्छा करें और उसके लायक बनें' के उनके सिद्धांत को पुष्ट किया किया।

अपने ससुर से स्पष्ट प्रशंसा या समर्थन नहीं मिलने के बावजूद श्रीमती महालक्ष्मी पावनी ने पीपी के जीवन और विरासत के प्रति अपने सम्मान के कारण 'परमेश्वर टू पीपी' पुस्तक प्रकाशित करने की स्वयं जिम्मेदारी ली, जिसमें पीपी द्वारा लिखे गए 48 प्रकाशित लेखों के अलावा कई दिग्गज कानूनविदों द्वारा उन्हें दी गई सारगर्भित श्रद्धांजलि शामिल है। मेरे विचार में यह पुस्तक एक संक्षिप्त वृतांत तैयार कैसे करें, विषय की समुचित रूपरेखा बनाकर मुकदमें को कैसे प्रस्तुत करें, विश्लेषण की स्पष्टता के साथ मुकदमें में बहस कैसे करें, अदालत में और साथी पेशेवरों के साथ कैसा आचरण करें सहित अनेक विषय के संबंध में कानून के पेशेवरों और और कानून के छात्रों के लिए एक उपयोगी मार्गदर्शिका के रूप में काम करेगी। भावी पीढ़ी के लाभ के लिए श्रीमती महालक्ष्मी द्वारा किया गया यह कार्य , मेरे विचार में परिवार के मुखिया, जिन्होंने अपने परिवार के सदस्यों में जीवन के मूल मूल्यों और सिद्धांतों को स्थापित किया है, के प्रति कृतज्ञता के पारिवारिक मूल्यों से प्रेरित है। इसलिए, इस पुस्तक का विमोचन भी ऐसे मूल्यों का उत्सव है।

पीपी के साथ मेरा साझा जुड़ाव यह है कि उन्होने भी मेरे गृहनगर नेल्लोर से स्नातक किया था। लंबे समय से दिल्ली में रहने के कारण, मुझे पीपी के शीर्ष पर पहुँचने की कुछ जानकारी थी परंतु इस पुस्तक में शामिल उनके कुछ लेखों को पढ़ने पर मुझे उनके विचार और जीवन के बारे में बेहतर जानकारी मिली।

पीपी उच्चतम न्यायालय के कुछ ऐतिहासिक निर्णयों के साथ जुड़े थे जिन्होंने मिसाल कायम की। मुझे इस पुस्तक से पता चला कि ए. आर. अंतुले मामले में अपील करने के अधिकार की उनके जोरदार और सफल बहस के पश्चात 'क्यूरेटिव पिटीशन' के अस्तित्व में आने में पी.पी. की महत्वपूर्ण भूमिका थी। क्यूरेटिव पिटीशन तब दायर की जाती है, जब न्यायालय द्वारा की गई गलती को सुधारने के लिए दायर समीक्षा याचिका खारिज कर दी जाती है। धर्मनिरपेक्षता हमारे संविधान की मूल संरचना में निहित है, को स्पष्ट करने के अलावा उन्होने एसआर बोम्मई मामले में 'कॉमन थ्रेड' के सिद्धांत को भी स्थापित किया। उच्चतम न्यायालय की संबंधित पीठों ने कई मौकों पर संविधान और कानूनों की व्याख्या करने के नजरिए को व्यापक बनाने में पीपी के विश्लेषण और प्रस्तुति की सराहना की है, भले ही वे उन मुकदमों को नहीं जीत पाए।

यह जानकर खुशी हो रही है कि पीपी एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला मामले, केशवानंद भारती मामले, एमएस गिल बनाम चुनाव आयोग मामले, एसआर बोम्मई मामले, जेएमएम रिश्वत का मामले, मतदाता अधिकार पर पीयूसीएल मामले, चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की जानकारी के संबंध में सूचना के अधिकार के संबंध में पी.यू.सी.एल. मामले, अयोध्या मामले, बेस्ट बेकरी मामले, एंट्री टैक्स मामले, 2 जी स्पेक्ट्रम मामले इत्यादि जैसे कई ऐतिहासिक मामलों से जुड़े थे।

हालांकि पीपी ने एडीएम जबलपुर मामले में तत्कालीन महान्यायवादी नरेन डे की सहायता की थी, लेकिन लगता है कि उन्हें नागरिकों के मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण कर संविधान में संशोधन करने के संबंध में कुछ आपत्ति थी। यद्यपि पीपी दाण्डिक कार्यवाही से सांसदों की प्रतिरक्षा के लिए पुरजोर बहस करते हुए, झामुमो सांसदों को रिश्वत के मामले में बरी करवाने में सफल रहे परंतु राजनीति के स्तर में गिरावट को देखकर उनका हृदय परिवर्तित हो गया। अपने एक लेख में उन्होंने लिखा था और मैं उद्धृत करता हूँ, 'सार्वजनिक नैतिकता की मौजूदा स्थितियों में, मुझे नहीं लगता कि ऐसा कोई विशेषाधिकार उचित है'।

अपने सौम्य आचरण और संयम के लिए जाने जाने वाले पीपी ने 'पेरिल्स ऑफ फीयरलेस डेमोक्रेसी’ पर अपने लेख में लिखा है कि "पेशेवर आचरण और शिष्टाचार के नियमों के अनुसार यह अपेक्षित है कि एक वकील अदालत को उचित सम्मान देते हुए निडर होकर अपना मामला पेश करे।" हालाँकि, उन्होने स्मरण किया कि किस प्रकार न्यायाधीश द्वारा कानून की व्याख्या के तरीके पर खुले तौर पर सवाल उठाने पर उन्हें न्यायाधीश का कोपभाजन बनना पड़ा था।

2 जी स्पेक्ट्रम मामले में उनकी सफलता के बाद, पीपी के पास न्यायालय के लिए एक सलाह थी। उन्होंने लिखा है कि "मेरा विचार है कि राष्ट्र को प्रभावित करने वाले दूरगामी आर्थिक परिणामों वाले मामलों में, न्यायालय के लिए बेहतर होगा कि वह समुचित रूप से राहत को तैयार करने में वित्तीय विशेषज्ञों की सहायता ले।"

टी. एन. शेषन के बहु-सदस्यीय केंद्रीय चुनाव आयोग के कथन का सफलतापूर्वक विरोध करने के बाद भी पीपी ने केन्द्रीय निर्वाचन आयोग को एक प्रभावी संस्थान बनाने के लिए शेषन की प्रशंसा की है और कहा है कि शेषन अपने कठोर तरीकों के बिना बेहतर व्यक्ति हो सकते थे।

इस पुस्तक के एक लेख में पीपी ने दो नक्सलियों, जिन्होंने एक वन ठेकेदार की गोली मार कर हत्या कर दी थी, की मौत की सजा को कम कर आजीवन कारावास में बदल देने के न्यायमूर्ति स्वर्गीय चिन्नाप्पा रेड्डी के फैसले का विरोध किया। न्यायमूर्ति रेड्डी ने अपने फैसले में लिखा है और मैं उद्धृत करता हूं 'जो लोग अपनी अंतरात्मा के अनुसार वास्तविक और भावुक इरादे से कार्य करते हैं, उन्हें कठोरतम सजा नहीं मिलनी चाहिए।' पीपी को इस तरह के तर्क से आपत्ति थी।

अयोध्या मामले में शीर्ष अदालत द्वारा दलीलें सुने जाने के परिप्रेक्ष्य में, यह स्मरण करना प्रासंगिक होगा कि 'क्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के निर्माण से पहले हिंदू मंदिर या कोई हिंदू धार्मिक ढांचा अस्तित्व में था' के प्रश्न पर संविधान के अनुच्छेद 143 (1) के तहत राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय से परामर्श के संबंध में इस पुस्तक के एक लेख में पीपी ने क्या लिखा था। पीपी ने लिखा था और मैं उद्धृत करता हूँ ; "सभी पांच न्यायाधीशों ने सर्वसम्मति से राष्ट्रपति द्वारा मांगी गई सलाह का जवाब देने से इनकार कर दिया। अगर संविधान पीठ ने राष्ट्रपति द्वारा मांगी गई सलाह का जवाब दिया होता, तो जो विवाद बार-बार होने वाले सांप्रदायिक तनाव का स्रोत बन गया है, वह हमेशा के लिए समाप्त किया जा सकता था। अपनी बारी आने पर मैंने न्यायालय से निवेदन किया और व्यापक जनहित में इसका उत्तर दिया।"

पीपी के पास एक स्वतंत्र मस्तिष्क था और वह एक परंपरागत वकील नहीं थे। वे उन सिद्धांतों पर चलते थे जिन पर वे विश्वास करते थे और कानून की सीमाओं और अदालतों में शिष्टाचार के सिद्धांतों के तहत कार्य करते थे। वह 'पुरानी दुनिया के आकर्षण' के सच्चे प्रतिनिधि थे और वर्तमान पीढ़ियों द्वारा अनुकरण के योग्य हैं।

प्रिय बहनों और भाइयों,

कुछ प्रमुख विधि विशेषज्ञों और अन्य लोगों की उपस्थिति में पीपी जैसे प्रख्यात विधिवेत्ता के जीवन और योगदान को याद करने के पश्चात, हमारे देश में न्यायपालिका की वर्तमान स्थिति को संक्षेप में देखना उचित होगा।

पिछले कुछ वर्षों में हुए कई सुधारों ने हमारी न्यायिक प्रणाली को अधिक मजबूत और उत्तरदायी बनाया है। लेकिन हमें अभी लंबा रास्ता तय करना है। सर्वाधिक अत्यावश्यक न्यायिक सुधार न्याय देने में होने वाले विलंब को समाप्त करना और न्याय प्रणाली की दक्षता में सुधार है।

सरकार को न्यायिक प्रणाली में बड़ी संख्या में लंबित रिक्तियों को भरने में और अधिक सक्रिय होने की आवश्यकता है ताकि न्याय में विलंब से बचा जा सके।

यह सर्वज्ञात है कि हमारे पास कई प्रतिष्ठित वकील हैं और अदालतों में विद्वान न्यायाधीश हैं। फिर भी समय पर और किफ़ायती न्याय सुनिश्चित करके हमारी न्यायपालिका में आम आदमी के विश्वास को और बढ़ाने के लिए न्याय देने के प्रक्रिया सुधार का इंतज़ार कर रही है। विभिन्न स्तरों की अदालतों में कुल 3 करोड़ से अधिक के लंबित मुकदमें गहरी चिंता का विषय है। हाल ही में, भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने कहा कि एक हजार से अधिक मामले 50 वर्षों से लंबित हैं और 2 लाख से अधिक मामले 25 वर्षों से लंबित हैं। लगभग 90 लाख लंबित दीवानी मामलों में से, 20 लाख से अधिक ऐसे चरण में हैं, जहां सम्मन तक भेजे नहीं गए हैं।

न्यायपालिका को सामूहिक रूप से न्याय देने में देरी के मुद्दे पर ध्यान देने की जरूरत है। विभिन्न स्तरों पर अपेक्षित संख्या में न्यायाधीश के रूप में पर्याप्त अवसंरचना और सहायक भौतिक अवसंरचना को सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। सक्षम न्यायाधीशों और उत्कृष्ट अधिवक्ताओं की उपलब्धता को सुनिश्चित करने की भी आवश्यकता है। देश में कानूनी शिक्षा की गुणवत्ता पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। कानून के छात्रों और वकीलों द्वारा इस पेशे के नैतिक मानकों का पालन किया जाना चाहिए।

देश में न्याय वितरण की गति और गुणवत्ता आर्थिक विकास पर भारी असर डालती है क्योंकि यह निवेश के प्रवाह को प्रभावित करती है। बेहतर होगा यदि विभिन्न स्तरों पर तैनात न्यायाधीशों को उभरते कानूनों के विभिन्न तकनीकी और विशेष शाखाओं और आनुषंगिक मुद्दों और प्रक्रियाओं के बारे में स्वयं न्यायपालिका द्वारा आयोजित विशेष अभिविन्यास कार्यक्रमों में अवगत कराया जाए।

जहां तक विभिन्न अदालतों में चुनाव संबंधी मामलों के लंबित होने की बात है, उन्हें शीघ्र निपटाने की जरूरत है।

राजनीतिक नेताओं के खिलाफ चुनाव याचिकाओं और दाण्डिक मामलों को समयबद्ध तरीके से उच्च न्यायालयों की विशेष पीठों द्वारा जल्दी से निपटाया जाना चाहिए। अगर जरूरत पड़े तो छह महीने या एक साल के भीतर ऐसे मामलों को तेजी से निपटाने के लिए अलग न्यायपीठ का गठन किया जा सकता है।

अन्य न्यायिक और विधायी सुधार हैं, जिसका मैं सुझाव देना चाहूंगा।

मैं यह दोहराना चाहूंगा कि दल बदलने वाले विधायिका के सदस्य को अयोग्य ठहराने के मामलों में, विधायी निकायों के अध्यक्ष को शीघ्रता से निर्णय लेना चाहिए। यहाँ भी, दलबदल-निरोधक कानून को अक्षरश: लागू नहीं किया जाता है और अध्यक्ष या सभापति की निष्क्रियता के कारण, विधायक नई पार्टी में बने रहते हैं और कुछ मामलों में, सरकार में मंत्री भी बन जाते हैं। न्याय के इस तरह के मज़ाक को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।

इन मामलों में कोई भी देरी न्यायिक और विधायी निकायों में जनता के विश्वास को कम करती है।

मैं सुझाव दूंगा कि हमारे पास विशेष न्यायिक अधिकरण होने चाहिए जो यथोचित समय के भीतर, या कहें कि छह माह या अधिकतम एक वर्ष में मुकदमों पर फैसला दें। मैं यह भी सुझाव दूंगा कि हम अपने संविधान की 10वीं अनुसूची पर फिर से विचार करें, जिसमें दलबदल विरोधी प्रावधान है, ताकि इस तरह के मामलों का समयबद्ध निपटान सुनिश्चित किया जा सके और खामियों को दूर करके इसे और प्रभावी बनाया जा सके।

समय आ गया है कि मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) विकसित की जाए जिसमें अनुमेय स्थगन की संख्या निर्दिष्ट किया जाए और शामिल विषय की प्रकृति के आधार पर मामलों के निपटान के लिए समय सीमा निर्धारित की जाए। न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं को त्वरित न्याय देना सुनिश्चित करने के लिए समय के अनुशासन का पालन करने और एसओपी के अनुसार चलने की आवश्यकता है।

प्रिय बहनों और भाइयों,

सरकार ने उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या में 10% की वृद्धि की है, लेकिन मुझे चिंता है कि यह अभी भी अपर्याप्त है।

उच्चतम न्यायालय की न्यायपीठ का विस्तार करना और प्रायोगिक आधार पर विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग न्यायपीठों के गठन का सुझाव विधि और न्याय संबंधी संसदीय स्थायी समिति द्वारा दिया गया है।

जैसा कि विधि आयोग ने सुझाव दिया है, दिल्ली में एक संविधान पीठ और चार क्षेत्रों- दिल्ली, चेन्नई/हैदराबाद, कोलकाता और मुंबई में अपीलीय पीठों में सर्वोच्च न्यायालय के विभाजन की आवश्यकता है।

मैं इस सिफारिश से सहमत हूं। मुझे लगता है कि यह सही समय है क्योंकि भारत जैसे विशाल देश में वादियों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है और भारी मात्रा में धन और ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है।

अनेक सिविल और दाण्डिक मामले 25 से अधिक वर्षों से लंबित हैं। इससे मुझे लगता है कि हमें न केवल सर्वोच्च न्यायालय का विस्तार करने, बल्कि काम को संवैधानिक प्रभाग और कई कानूनी प्रभागों या अपील न्यायालयों में विभाजित करने की भी आवश्यकता है।

जैसा कि विधि आयोग ने सुझाव दिया है, मैं चाहूंगा कि सर्वोच्च न्यायालय के दो प्रभाग हों, एक संवैधानिक मामलों को देखे और दूसरा अपील का काम देखे। इस सुझाव पर उच्चतम न्यायालय के साथ-साथ सरकार द्वारा भी गंभीर विचार किए जाने और निर्णय लिए जाने की आवश्यकता है क्योंकि इससे उच्चतम न्यायालय को संवैधानिक मुद्दों के लिए अधिक समय देने और इसे आम लोगों के लिए अधिक सुलभ बनाने में सहायता मिलेगी।

जहां तक शीर्ष न्यायालय के चार क्षेत्रों में विभाजन की आवश्यकता की बात है, संविधान के अनुच्छेद 130 में लिखा है: "उच्चतम न्यायालय दिल्ली में अथवा ऐसे अन्य स्थान या स्थानों में अधिविष्ट होगा जिन्हें भारत का मुख्य न्यायमूर्ति, राष्ट्रपति के अनुमोदन से समय-समय पर, नियत करे"।

अंत में, मैं ब्रिटेन के संसद सदस्य और प्रख्यात कानूनविद डेविड पैनिक को उद्धृत करना चाहूँगा,"न्यायाधीश नश्वर प्राणी हैं परंतु उन्हें एक ऐसा कार्य करने के लिए कहा जाता है जो वास्तव में दिव्य है।" हां, समय पर न्याय दिया जाना सुनिश्चित करना एक दिव्य कार्य है और न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं को पात्र व्यक्ति को न्याय दिलाने से जुड़ी दिव्यता को बनाए रखने के कार्य के लिए आगे आना चाहिए।

श्री पी पी राव उन दुर्लभ विधि विशेषज्ञों में से एक हैं, जिन्होंने न्याय दिलाने में अपना पूरा जीवन लगा दिया है।

मुझे ऐसी पुस्तक का विमोचन कर प्रसन्नता हुई है जो पीपी के मन और जीवन तथा कानून को बनाए रखने और आनुषंगिक प्रक्रियाओं को समृद्ध करने में चार दशकों तक उनके विशिष्ट योगदान को उद्घाटित करती है।