27 जुलाई, 2019 को मुंबई में राज्य निर्वाचन आयोग, महाराष्ट्र द्वारा स्थापित प्रथम लोकतंत्र पुरस्कार प्रदान करने के उपरांत सभा में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

मुंबई | जुलाई 27, 2019

"आपके बीच आना और ऐसे विषय पर, जो मेरे दिल के करीब है, पर अपने विचारों को साझा करना मेरे लिए खुशी की बात है।

सबसे पहले मैं महाराष्ट्र राज्य के स्थानीय-स्वशासन के विभिन्न हितधारकों का अभिनंदन करता हूं और प्रथम लोकतंत्र पुरस्कारों के सभी पुरस्कार विजेताओं को बधाई देता हूं।

मैं राज्य चुनाव आयुक्त, श्री जे.एस. सहारिया को आयोग की इस शानदार पहल के लिए विशेष रूप से बधाई देता हूं।

जैसा कि हम जानते हैं, 1992 में 73वें और 74वें एतिहासिक संशोधनों के माध्यम से संविधान में संशोधन किया गया था ताकि स्थानीय स्वशासन (एलएसजी) को राष्ट्र निर्माण में उसका सही स्थान मिल सके।

इस वर्ष जब हम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी की 150वीं जयंती मना रहे हैं, हमें याद रखना चाहिए कि वे शक्तियों के विकेंद्रीकरण के सबसे बड़े पक्षधर थे और उनका मानना था कि प्रत्येक गाँव को अपने मामलों के लिए स्वयं जिम्मेदार होना चाहिए। गांधी जी का कहना था कि “पंचायत राज में केवल पंचायत की आज्ञा का पालन किया जाएगा और पंचायत केवल अपने बनाए कानून के माध्यम से ही काम कर सकती है”। महात्मा गांधी ने हमेशा स्वशासन और ग्राम स्वराज की बात की, जहां उन्होंने लोकतंत्र की सच्ची भावना और नागरिकों की भागीदारी की कल्पना की थी।

प्रिय बहनों और भाइयों, पूरी तरह कार्यशील और जमीनी स्तर पर उत्तरदायी शासन प्रणाली के लिए देश में लोकतांत्रिक नींव को और मजबूत करना अत्यंत आवश्यक है।

ग्रामीण स्थानीय निकायों को आर्थिक और राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने के लिए 73वें संविधान संशोधन को अधिनियमित किया गया। अधिनियम के अनुसार, राज्य चुनाव आयोगों और वित्त आयोगों की स्थापना के अलावा 29 मदों को स्थानीय निकायों को हस्तांतरित किया जाना है। इसने लोगों की भागीदारी के साथ ग्राम सभाओं को बनाने के अलावा स्थानीय निकायों के लिए संसाधनों को बढ़ाने, महिलाओं के लिए एक तिहाई और तीनों स्तरों में अपनी आबादी के अनुपात में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटें आरक्षित करने का भी उपबंध किया।

स्थानीय निकायों को संवैधानिक रूप से सशक्त किए हुए भले ही 26 साल से अधिक बीत गए हों, परन्तु अब भी शक्तियों का हस्तांतरण और कार्य संतोषजनक प्रतीत नहीं होते हैं।

मैं सदा पंचायती राज निकायों को सशक्त बनाने के लिए पर्याप्त धन, कार्यों और कार्यकर्ताओं-इन तीन बातों को विकसित करने की आवश्यकता पर बल देता रहा हूं। जब लोग अपने मामलों में स्थानीय स्तर पर स्वयं भाग लेंगे, तो लोकतंत्र अधिक सार्थक और मजबूत होगा।

सभी राज्यों को शक्तियों के हस्तांतरण के संबंध में उनके द्वारा की गई प्रगति की समीक्षा करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी 29 विषय तत्काल स्थानीय निकायों को हस्तांतरित हो जाएं। इस पर आगे देरी करना संवैधानिक अधिदेश का उल्लंघन करने के समान होगा।

मुझे खुशी है कि वर्तमान सरकार ने 14 वें वित्त आयोग की सिफारिशों को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लिया है, जिसने 2015-2020 के लिए पंचायतों को दो लाख दो सौ बयानवें करोड़ (रु 200, 292.2 करोड़) प्रदान किए हैं, जो 13वें वित्त आयोग द्वारा दिए गए अनुदान से तीन गुणा अधिक है। अनुदानों को, अतीत के विपरीत, जब वे ब्लॉक और जिलों सहित सभी तीन स्तरों के लिए हुआ करते थे, सीधे ग्राम पंचायतों को स्थानांतरित कर दिया जाता है। 13वें वित्त आयोग की तुलना में ग्रामीण स्थानीय शासन का हिस्सा कुल आवंटन के 0.5 प्रतिशत से बढ़कर 2 प्रतिशत हो गया है।

मैं हर पांच साल में स्थानीय निकायों के चुनाव कराने को अनिवार्य बनाने की आवश्यकता पर भी बल देता रहा हूं जिसमें राज्य सरकारों को उन्हें स्थगित करने की गुंजाइश न हो।

महाराष्ट्र में सामाजिक सुधारों और राजनीतिक सुधारों की बहुत लंबी परंपरा रही है। नए राज्य महाराष्ट्र के गठन के तुरंत बाद 1961 में, तत्कालीन सरकार ने राज्य में अधिक विकेन्द्रीकृत शासन प्रक्रिया के लिए स्थानीय स्वशासन तंत्र का अध्ययन करने के लिए वी.पी. नायक समिति का गठन किया। इसने देश के अन्य राज्यों के लिए एक मिसाल कायम की और यह अभी भी भारत के किसी भी राज्य द्वारा की जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण पहल है।

महाराष्ट्र को 1961 में स्थापित इस आधार पर केवल आगे बढ़ना है। इसलिए महाराष्ट्र में स्थानीय शासन की महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण है।

राज्य चुनाव आयोगों, जिन्हें स्थानीय स्वशासनों के लिए चुनाव कराने की शक्तियां दी गई हैं, को हमेशा यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ये चुनाव स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से आयोजित किए जाएं। एक जीवंत और मजबूत राज्य चुनाव आयोग एक प्रभावी लोकतंत्र की आधारशिला है। राज्य चुनाव आयोगों की जिम्मेदारी है कि वे यह सुनिश्चित करें कि राजनीतिक व्यवस्था और शासन के महत्वपूर्ण संस्थानों के प्रति विश्वास की कमी न हो। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि चुनावों की शुचिता से कभी समझौता न किया जाए।

इसी प्रकार, राज्य सरकारों का यह कर्तव्य है कि राज्य चुनाव आयोगों के मूल्यांकन के अनुसार सभी संसाधनों को प्रदान करें ताकि स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से चुनाव कराने में उनकी मदद की जा सके।

मैं राज्य चुनाव आयुक्त श्री जे.एस.सहारिया को राज्य में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए उनके द्वारा अपनाई गई नवीन और अभिनव प्रथाओं के लिए बधाई देना चाहता हूं। । मुझे बताया गया है कि हाशिए पर रह रहे और कमजोर समूहों को राजनीतिक प्रक्रिया में लाने में उनके प्रयासों से न केवल पिछले चार वर्षों में मतदान पंजीकरण में लगभग 12% वृद्धि करने के मामले में उचित परिणाम मिले हैं बल्कि उन्हें स्थानीय निकाय चुनावों में लड़ने के लिए सशक्त बनाने में भी मदद की है। मुझे यह जानकर भी खुशी हुई कि महाराष्ट्र राज्य चुनाव आयोग ने सभी उम्मीदवारों के नामांकन पत्रों और हलफनामों के डिजिटलीकरण, सुशासन के लिए लोकतंत्र संस्थान (आईडीईजीजी) की स्थापना और स्थानीय स्व-शासन चुनावों में ईवीएम के 100% उपयोग जैसी महत्वपूर्ण पहलें की है।

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भारत आर्थिक विकास के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि विकास के प्रतिफल का समान वितरण हो। इसलिए लोकतांत्रिक प्रथाओं में विशेष रूप से जमीनी स्तर पर व्यक्तियों को प्रशिक्षित करना आवश्यक हो जाता है।

मैं विभिन्न लोगों और संस्थानों द्वारा किए गए अनुकरणीय कार्यों को मान्यता देने के उद्देश्य से "लोकतंत्र पुरस्कारों" की स्थापना के लिए राज्य चुनाव आयोग की सराहना करता हूं।

लोगों की भागीदारी के बिना चुनाव पूरे नहीं किए जा सकते। लोगों की भागीदारी चुनाव लड़ने और हर पांच साल में मतदान में हिस्सा लेने तक सीमित नहीं है। जब मैं "लोगों की भागीदारी" की बात करता हूं, तो मैं चुनावों के बारे में लोगों को लगातार प्रोत्साहित करने और उत्साहित करने के महत्व का उल्लेख करता हूं। सुरक्षा कर्मियों और नागरिक समाज संगठनों सहित विभिन्न एजेंसियों द्वारा किए गए प्रयासों को पहचानना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

मैं इस बात पर भी जोर देना चाहूंगा कि ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों को यथासंभव अधिक से अधिक कार्य सौंपने का समय आ गया है।

मैं विभिन्न राज्य सरकारों से भी अनुरोध करता हूं कि वे संविधान के अनुरूप स्थानीय स्वशासन से संबंधित राज्य के कानूनों में संशोधन सहित चुनावी सुधार करें।

भारत ने अपने सभी चुनावों में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार प्रदान करके और स्थानीय स्वशासन में अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों के लिए और महिलाओं के लिए न्यूनतम 33% तक सीटों को आरक्षित करके एक महान सामाजिक क्रांति की शुरुआत की है। इसने उन बंधनों को तोड़ने का काम किया है, जिन्हें जाति और समुदाय के नाम पर खड़ा किया गया था।

आज हमारे लोकतंत्र के उत्सव के रूप में इन पुरस्कारों को प्रदान करने के अवसर पर यह उपयुक्त होगा कि मैं हमारे द्वारा विकसित लोकतंत्र, हमारे विधायिकाओं के कामकाज और सांसदों और विधायकों के आचरण के बारे में अपने कुछ विचारों और चिंताओं को साझा करूं।

राज्यसभा के पीठासीन अधिकारी के रूप में पिछले दो वर्षों के दौरान राज्य सभा में कुछ सदस्यों के व्यवहार से मैं अत्यधित व्यथित हूं।

संसद संविधान सभाओं के नियमों, प्रथाओं, सभापीठ द्वारा पहले दिए गए विनिर्णयों और सदस्यों के लिए आचार संहिता के आधार पर कार्य करती है। राज्य सभा के सभापति के रूप में मुझे इस बात से पीड़ा होती है जब सदस्य इनकी अवहेलना करते हैं, जिससे अव्यवस्था उत्पन्न होती है और परिणामस्वरूप जनता की नजर में वरिष्ठों की सभा की प्रतिष्ठा कम हो जाती है।

वरिष्ठों की सभा होने के कारण राज्य सभा के सदस्यों पर उदाहरण के द्वारा नेतृत्व प्रदान करने की एक विशेष जिम्मेदारी है। इस सत्र के दौरान कुछ सदस्यों ने मनमानी करते हुए कुछ अवसरों पर आधिकारिक पत्रों को फाड़ डाला और उन्हें सभापीठ की ओर फेंका।

इस तरह का आचरण हमारे संसदीय लोकतंत्र के कामकाज के बारे में अच्छा संकेत नहीं देता है।

आज इस अवसर पर मैं गर्व के साथ कहता हूं कि यह हमारे देश के लोग हैं जिन्होंने अधिक से अधिक संख्या में चुनावों में नियमित रूप से मतदान करके और संसद और राज्य विधानसभाओं में अपने प्रतिनिधियों को चुनकर लोकतंत्र की सच्ची भावना को आत्मसात किया है।

ऐसा करने के बाद वे अपने प्रतिनिधियों से अपेक्षा करते हैं कि उनका आचरण सर्वश्रेष्ठ हो और वे अगले पांच वर्षों में लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उन्हें सक्षम बनाकर उनके जीवन में बदलाव लाने के लिए भरसक प्रयास करें।

हालाँकि मुझे इस अवसर पर यह कहते हुए दुख हो रहा है कि विधानसभाओं में चुने हुए प्रतिनिधियों का आचरण अक्सर हमारे लोगों की लोकतांत्रिक भावना से मेल नहीं खाता है।

लोकतंत्र प्रमुख रूप से - वाद-विवाद, चर्चा और निर्णय से संबंधित है और इन्हें अव्यवस्था, व्यवधान और विधान बनने में देरी से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है जो कि लोकतंत्र की भावना की उपेक्षा करने के अलावा और कुछ नहीं है"।

संसद और राज्य विधानसभाओं के मूल कार्य हैं......... विधान बनाना जिसका अर्थ है हमारे देश के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के लिए कानून बनाना; विचार-विमर्श जिसका अर्थ है सार्वजनिक महत्व के मुद्दों को उठाना और जवाबदेही जिसका अर्थ है वर्तमान कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करना।

यदि सांसद और विधायक नारेबाजी करने, सभापति के समक्ष वेल में एकत्र होने और कार्यवाही में व्यवधान डालने का सहारा लेते हैं, तो वे केवल विधायिकाओं के इन तीन प्रमुख कार्यों को संकट में डाल रहे हैं। इससे संसदीय लोकतंत्र को अत्यधिक क्षति पहुंचती है और लोगों में, जो इसके संरक्षक हैं, निराशा पैदा होती है।

हर चुनाव में जनता चुनी हुई सरकारों को एक निश्चित जनादेश देती है। तत्पश्चात्, चुनी हुई सरकारें अगले कुछ वर्षों में लोगों से किए गए वादों को पूरा करने का प्रयास करती हैं। लोगों के इस जनादेश का सम्मान करना और वर्तमान सरकारों को जनादेश के अनुसार परिणाम देने में मदद करना ऐसी विधायिकाओं के कामकाज का एक अनिवार्य सिद्धांत होना चाहिए।

विपक्षी दलों का चुनावों के दौरान सरकारों द्वारा किए गए वादों को पूरा करने की मांग करना उनका अधिकार तथा उत्तरदायित्व है। यदि सरकारें लोगों से किए गए वादो से विचलित होती हैं तो विपक्ष उनका विरोध कर सकता है और उन्हें ऐसा करना चाहिए और जिसके लिए संसद और राज्य विधानसभाओं में विभिन्न प्रभावी उपकरण उपलब्ध हैं।

मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों दोनों की एक-दूसरे की व्यापक चिंताओं को ध्यान में रखते हुए हमारी विधायिकाओं के प्रभावी कार्यकरण को सुनिश्चित करने की साझा जिम्मेदारी है।

विधायिकाओं के कामकाज को रोकने का मतलब है लोकतंत्र को कमजोर करना और लोगों को धोखा देना।

आगे बढ़ने का सबसे अच्छा तरीका है .. विपक्ष को अपनी बात कहने का अधिकार देना और सरकार को अपनी नीतियां लागू करने देना। लोकतंत्र किसी विधायिका के प्रत्येक भाग की "संख्या" के बारे में है। जिसके पास सबसे ज्यादा संख्या होती है वह सरकार चलाता है और जिनके पास संख्या कम होती है उन्हें यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि सरकारें लोगों द्वारा दिए गए जनादेश से नहीं भटकें।

सत्ताधारी और विपक्षी दलों को एक-दूसरे को दुश्मन या विरोधी नहीं समझना चाहिए। इसके बजाय उन्हें लोगों की भलाई और देश के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन में संयुक्त हितधारकों के रूप में कार्य करना चाहिए।

हमारे राष्ट्र को प्रभावी और जिम्मेदार सरकारों और उतने ही प्रभावी और जिम्मेदार विपक्ष दोनों की आवश्यकता है। यदि उनमें से कोई भी कमज़ोर हो जाता है, तो देश के लिए यह हितकारी नहीं है।

यह संसद और राज्य विधानसभाएं ही हैं जो सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों दोनों को अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए पर्याप्त अवसर देती हैं। सांसदों और विधायकों को हमेशा इस प्रमुख सिद्धांत द्वारा मार्गदर्शन लेना चाहिए ताकि हमारी विधायिकाएं उस परिवर्तन का जीवंत साधन बन सकें जो लोग चाहते हैं।

मैं संसद के सदस्यों और विशेष रूप से राज्य सभा के सदस्यों से यह उम्मीद करता हूं कि वे अपने अनुकरणीय आचरण और सदन के प्रभावी संचालन हेतु योगदान के माध्यम से हमारी विधायिकाओं के रूपान्तरण में नेतृत्व प्रदान करें।

कुछ दिनों पहले देश ने देखा कि लोक सभा के एक सदस्य ने एक महिला पीठासीन अधिकारी जो सभा का संचालन कर रही थीं, के बारे में कुछ आपत्तिजनक टिप्पणी की। उस सदन के सदस्यों ने उस सदस्य की टिप्पणियों पर नाराजगी जताई, जो जायज थी। महिलाओं का अनादर करना हमारी सभ्यता में नहीं है। संसद और अन्य विधानसभाओं में इस तरह का व्यवहार और टिप्पणियां हमारे संसदीय लोकतंत्र की प्रतिष्ठा को क्षति पहुंचाती हैं और इससे बचा जाना चाहिए।

राज्य सभा के पीठासीन अधिकारी के रूप में मैंने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि सदन के कामकाज के सभी पहलुओं में विपक्ष को अपनी बात कहने की अनुमति दी जानी चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि यही एक तरीका है जिससे हम अपने संसदीय लोकतंत्र को अधिक सार्थक बना सकते हैं। मैंनें सदा सभी संबंधित व्यक्तियों द्वारा संतुलन की भावना और सामंजस्य के भाव पर जोर दिया है।

हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। लोकतंत्र की गुणवत्ता के मामले में भी हमें सर्वश्रेष्ठ होना होगा।

मैं देश की सभी विधायिकाओं में सत्तारूढ़ और विपक्षी दोनों पक्षों से आग्रह करता हूं कि वे इस प्रकार की परस्पर सम्मान और सामंजस्य की भावना का अनुसरण करें।

मुझे विश्वास है कि लोकतंत्र पुरस्कार लोगों को लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को मजबूत करने के लिए उत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगे। ये पुरस्कार और सम्मान दूसरों को प्रेरित करते हैं कि वे उत्कृष्टता हासिल करें।

मुझे बताया गया है कि महाराष्ट्र राज्य चुनाव आयोग ने चुनावी प्रक्रिया में एकरूपता लाने के लिए लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की तर्ज पर सभी स्थानीय स्व-शासनों के लिए समान लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम का मसौदा तैयार किया है। मुझे विश्वास है कि राज्य सरकार मसौदे की जांच करेगी और उचित कार्रवाई करेगी।

धन्यवाद

जय हिन्द!"