26 सितंबर, 2019 को पुणे, महाराष्ट्र में पुण्यभूषण फाउंडेशन द्वारा आयोजित एक समारोह में प्रख्यात पुरातत्वविद् डॉ. जी.बी. डेगलुरकर को पुण्यभूषण पुरस्कार प्रदान करने के बाद सभा में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

पुणे, महाराष्ट्र | सितम्बर 26, 2019

“मुझे महाराष्ट्र के सांस्कृतिक केन्द्र, पुणे, जो कि ऐतिहासिक, फिर भी आधुनिक शहर है, में आकर और प्रतिष्ठित पुण्यभूषण पुरस्कार प्रदान करने में बहुत खुशी का अनुभव हो रहा है।

यह नागरिको को मिलने वाला निश्चित ही एक अद्वितीय पुरस्कार है, जो पुणे शहर की महान सांस्कृतिक परंपरा के साथ अच्छी तरह से मेल खाता है।

मैं छत्रपति श्री शिवाजी महाराज के इस ऐतिहासिक शहर की यात्रा करने और भारत के इस महानतम राजा को नमन करने के लिए हमेशा उत्सुक रहता हूं । जब भी मैं इस शहर में आता हूं, मैं महान राष्ट्रवादियों, समाज सुधारकों और शिक्षाविदों द्वारा पोषित इस शहर की समृद्ध विरासत से प्रेरणा लेता हूं।

पुणे हमेशा से देशभक्ति, समानता और शिक्षा का केंद्र रहा है और इसने देश भर से लोगों को आकर्षित किया है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इस पुण्यनगरी को 'सामाजिक कार्यकर्ताओं का केन्द्र' बताया था।

मैं इस अवसर पर महान समाज सुधारक-युगल महात्मा ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले; भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे बड़े नेताओं में से एक लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक; महान उदारवादी विचारक जस्टिस महादेव गोविंद रानाडे और डॉ. गोपाल कृष्ण गोखले; प्रसिद्ध ओरिएंटोलॉजिस्ट डॉ. आर. जी. भंडारकर; शिक्षाविद डॉ. धोंडो केशव कर्वे और समाज सुधारक महर्षि विठ्ठल रामजी शिंदे और कई अन्य नेताओं को सच्चे मन से अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं

मुझे यह जानकर भी खुशी है कि जिन नागरिकों ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों में असाधारण योगदान दिया है, उन्हें समय-समय पर पहचाना और सम्मानित किया जा रहा है। ये सम्मान दूसरों को प्रेरणा देने का कार्य करते हैं।

मैं हमारे स्वतंत्रता संग्राम की महानतम 'तिकड़ी' - शहीद भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु की स्मृति में पुण्यभूषण फाउंडेशन’ द्वारा किए गए प्रयासों की सराहना करता हूं। मुझे इस बात की जानकारी है कि हुतात्मा राजगुरु पुणे जिले के राजगुरुनगर से संबंध रखते हैं।

आज के इस समारोह में हमारे स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा दिए गए बलिदानों को याद करने और उनका सम्मान करने के लिए आयोजक सराहना के पात्र हैं। हम अपनी स्वतंत्रता के लिए उनके ऋणी हैं। मैं इस अवसर पर राष्ट्रवाद के इन महान योद्धाओं और अनगिनत गुमनाम नायकों को नमन करता हूं, जिन्होंने भारत माता की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन कुर्बान कर दिया।

मुझे यह जानकर भी प्रसन्नता हुई कि भारत रत्न पंडित भीमसेन जोशी, डॉ. बानू कोयाजी, डॉ. आर.एन. दांडेकर, श्री शांतनुराव किर्लोस्कर, श्री बी के एस अयंगर, श्री मोहन धारिया जी, डॉ. जयंत नारालीकर जैसे दिग्गज और कई अन्य व्यक्ति पूर्व में पुण्यभूषण पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। पुरस्कार पाने वालों ने अपने द्वारा चुने हुए क्षेत्रों में सराहनीय योगदान दिया है और हर भारतीय को गौरवान्वित किया है।

इस अवसर पर मैं विश्व प्रसिद्ध डेक्कन कॉलेज पोस्ट ग्रेजुएट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के माध्यम से भारतीय पुरातत्व के क्षेत्र में अपने दीर्घकालिक योगदान के लिए पुण्यभूषण पुरस्कार प्राप्त करने पर डा. जी. बी. देगलूरकर को विशेष रूप से बधाई देता हूं।

प्रिय मित्रों,

गुरु का सम्मान करना, प्रतिभा और योग्यता को मान्यता देना भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। यह भारत की समृद्ध परंपराओं के केंद्र में है। एक सफल व्यक्ति को पदक या पुरस्कार राशि के साथ पुरस्कृत करना, दूसरों को अपने-अपने क्षेत्र में अच्छा कार्य करने के लिए प्रेरित करना है।

जैसा कि आप जानते हैं, पुरातत्व विज्ञान और पुरातत्व स्थल ऐसे सेतु हैं जो वर्तमान को हमारे अतीत से जोड़ते हैं। पुरातत्व विज्ञान एक रोचक विषय है जो ठोस प्रमाणों के माध्यम से इतिहास की हमारी समझ को बढ़ाता है। इस विशेषता के कारण यह किसी भी अन्य मानव विज्ञान की तुलना में अधिक विश्वसनीय हो सकता है।

पुरातत्व विज्ञान अतीत के विभिन्न पहलुओं का खुलासा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह प्रागैतिहास और आद्य-इतिहास की जानकारी का प्राथमिक स्रोत है और यह अतीत के विभिन्न पहलुओं का खुलासा करने में मानव जाति के लिए बहुत उपयोगी है। मेरा मानना है कि इसमें इतिहास का 'पुनर्निर्माण' करने और 'पुन: सही’ करने की अद्भुत क्षमता है।

पुरातत्व विज्ञान विभिन्न संस्कृतियों और सभ्यताओं में विविधता को सामने लाने में मदद करता है। यह न केवल ’अन्य 'सभ्यताओं की खोज करने में मदद करता है, बल्कि हमारी 'स्वयं' की पुन: खोज करने में भी मदद करता है।

पुरातत्व विज्ञान जैसे विषय हमें अपने अतीत से जोड़कर हमारी जड़ों को पुन: खोजने में एक अमूल्य भूमिका निभाते हैं।

भारत एक विशाल और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश है। जनवरी, 2019 की स्थिति‍ के अनुसार हमारे यहां राष्ट्रीय महत्व के 3,600 से अधिक स्मारक हैं जिनको भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) सुरक्षा और संरक्षा प्रदान कर रहा है। ये पुरातात्विक स्थल हमारे अतीत के अवशेष हैं और हमारी सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के प्रतीक हैं। हमारा गौरवशाली इतिहास इन स्मारकों में सन्निहित है।

इतिहास और संस्कृति सभी की है। महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों के संरक्षण में सरकार के प्रयासों को मजबूत करने में लोगों की भागीदारी आवश्यक है।

यह देश के प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह स्मारकों की सुरक्षा और संरक्षण करे और उन्हें भावी पीढ़ियों तक पहुंचाए।

सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों, निजी क्षेत्र की कंपनियों और साथ ही व्यक्तियों को स्थलों को गोद लेने और हमारी विरासत के संरक्षण में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

आगा खान ट्रस्ट जैसे नामी गैर सरकारी संगठनों ने कुछ शहरों में स्मारकों के जीर्णोद्धार का काम आरंभ किया है। इसी प्रकार श्रीरंगम में श्री रंगनाथ स्वामी मंदिर के संरक्षण और जीर्णोद्धार का कार्य सरकार द्वारा दानकर्ताओं की मदद से किया गया था।

छात्रों में इन स्मारकों और उनके महत्व के बारे में और अधिक जागरूकता पैदा करने की भी आवश्यकता है। स्कूलों और कॉलेजों को छात्रों के लिए नजदीकी पुरातात्विक और ऐतिहासिक स्मारकों के दौरों का आयोजन करना चाहिए और छात्रों को उन स्मारकों पर नियमित स्वच्छता अभियान में शामिल करना चाहिए।

भारतीय सभ्यता सबसे पुरानी सभ्याताओं में से एक है और कई मायनों में अनोखी है। ऐतिहासिक विकास के क्रम में उन्नीसवीं शताब्दी के शुरुआत में कर्नल मीडोस टेलर ने भारत में पुरातत्व पर शुरूआती काम किया। हालांकि, उनकी दिलचस्पी दक्षिण भारतीय मैगालिथ पर अधिक केंद्रित रही। तथापि, 1861 में अलेक्जेंडर कनिंघम और 1863 में रॉबर्ट ब्रूस फूटे ने बाद के समय में देश के प्रागैतिहासिक पुरावशेषों का अन्वेषण और अभिलेखन शुरू किया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना 1861 में अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा की गई थी, जिसका उद्देश्य पुरातात्विक अनुसंधान करना और भारत में सांस्कृतिक स्मारकों की सुरक्षा और संरक्षण था।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना के साथ, हजारों इतिहासकार पुरातत्व विज्ञान के साथ-साथ भारत-विद्या का अध्ययन करने के लिए आकर्षित हुए। मुझे प्रसिद्ध पुरातत्वविद् बी.बी.लाल का उल्लेख करना है जिन्होंने पुरातत्व के क्षेत्र में असाधारण योगदान दिया है और जिनके अन्वेषण कार्य में पुरापाषाण काल से लेकर प्रारंभिक ऐतिहासिक काल तक की व्यापक श्रृंखला शामिल है। इसके अलावा इसी पुणे शहर से- डॉ. आर. आर. भंडारकर, डॉ. एच. डी. संकलिया, डॉ. आर.एन. दांडेकर, डॉ. एस.बी. देव, डा. एम. के. धवलिकर, डॉ. ज़ेड. डी. अंसारी, डॉ. श्रीमती शोभना गोखले, डॉ. नागराज राव, डॉ. एम.एस. मेटे ने इस विशिष्ट क्षेत्र में विशेष योगदान दिया, हालांकि यह 19 वीं और 20 वीं शताब्दी में यूरोपीय देशों में उत्पन्न हुआ और विकसित हुआ। हड़प्पा सभ्यता की खोज एक विषय के रूप में पुरातत्व विज्ञान में असीम संभावनाओं का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। और इस बात को ध्यान में रखते हुए मेरा मानना है कि डा. देगलूरकर भी दिग्गज पुरातत्वविदों के इस विशेष संघ में शामिल हैं उनकी शानदार परंपरा का हिस्सा हैं।

इसलिए भारत में पुरातत्व-विज्ञान, संस्कृत छात्रवृत्ति और संग्रहालय संबंधी अध्ययन को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए विशेष रूप से पुणे के डेक्कन कॉलेज और भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट को विशेष सम्मान देने में मुझे कोई संकोच नहीं है।

मैं भारत के विभिन्न हिस्सों में उत्खनन के माध्यम से डा. देगलूरकर की खोजों से विशेष रूप से प्रभावित हूं। जब उन्होंने क्रमश: महाराष्ट्र के जालना जिले में 'भोकरदान' और इटली में 'पोम्पेई' स्थलों से एक समान आइवरी डॉल्स का उत्खनन किया, तो उन्होंने निर्णायक रूप से यह सिद्ध किया कि सातवाहन शासन के दौरान इस क्षेत्र में रोमन व्यापारियों की उपस्थिति थी। इसी तरह डॉ. देगलूरकर ने 'प्रतिमा-विज्ञान' के क्षेत्र में भी चिरस्थायी योगदान दिया।

पुरातात्विक अध्ययन के क्षेत्र में हुई हालिया प्रगति को ध्यान में रखते हुए कई इतिहासकार, संस्कृत के विद्वान और भारत में विभिन्न विचारधाराओं से संबंध रखने वाले पुरातत्वविद लंबे समय से इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि क्या रामायण और महाभारत 'इतिहास' हैं या 'काव्य'।

मुझे लगता है कि इतिहास, पुरातत्व विज्ञान, मानव शास्त्र, प्रतिमा-विज्ञान, पुरालेख विज्ञान और समाजशास्त्र जैसे विभिन्न शैक्षणिक विषयों को एक साथ लाने का समय आ गया है। मुझे विश्वास है कि इस तरह के बहु-विषयक दृष्टिकोण से हम साहित्य, इतिहास और पुरातात्विक आंकड़ों के बीच एक मजबूत सहसंबंध को स्थापित करने में सक्षम हो पाएंगे। मुझे विश्वास है कि इस दृष्टिकोण से हमें भारत के महाकाव्यों के पाठ और पुरातात्विक अध्ययन में मूल रूप से योगदान करने में मदद मिलेगी।

मुझे आशा है कि इतिहासकार और पुरातत्वविद, जो संस्कृत परंपरा का अनुसरण करते हैं, इस चुनौती का सामना करेंगे और अधिक ठोस प्रमाणों के साथ हमें अतीत के छिपे हुए तथ्यों का पता लगाने में समर्थ बनाएंगे और हमारी समृद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को नई दिशा देंगे।

अमेरिका के सबसे प्रसिद्ध लेखकों और हास्यकारों में से एक मार्क ट्वेन ने हमारे देश का खूबसूरती से वर्णन किया है। मैं उद्धृत करता हूं: "भारत मानव जाति का उद्गम स्थल है, मानव वाक शक्ति की जन्मभूमि है, इतिहास की जननी है, पौराणिक कथाओं का खज़ाना है और परंपरा का संग्रहागार है। मनुष्य के इतिहास में हमारी सबसे मूल्यवान और शिक्षाप्रद सामग्री भारत में ही संजोयी गई है"(अनकोट)।

पुणे शहर ने कई मौकों पर देश का मार्गदर्शन किया है। मुझे विश्वास है कि पुणे शैक्षिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक संस्थानों की उच्च गुणवत्ता की महान विरासत पर खरा उतरेगा और भारत-विद्या, संस्कृत और प्राचीन इतिहास में अनुसंधान करने के लिए एक प्रेरणा प्रदान करेगा।

मैं एक बार फिर डा. जी. बी. देगलूरकर को प्रतिष्ठित पुण्यभूषण पुरस्कार प्राप्त करने के लिए बधाई देता हूं और आज मुझे इस समारोह में आमंत्रित करने के लिए पुण्यभूषण फाउंडेशन को धन्यवाद देता हूं। पुणे के प्रबुद्ध दर्शकों का आज शाम इस कार्यक्रम में उपस्थित होने के लिए मेरा विशेष धन्यवाद।

जयहिन्द।"