26 फरवरी, 2018 को नई दिल्ली में प्रधान मंत्री श्रम पुरस्कारों को प्रदान करने के उपरांत भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | फ़रवरी 26, 2018

“"मैं उन लोगों का सम्मान करने वाले इस कार्यक्रम से जुड़कर वास्तव में प्रसन्न हूं जो हमारे राष्ट्र की संवृद्धि एवं विकास के लिए मूक परंतु सार्थक योगदान करने वाले हमारे लाखों बहुमूल्य कार्यबलों में से है। 'शक्ति' वह बल है जो जीव वैज्ञानिक और यांत्रिक सहित सभी प्रक्रियाओं को चलाती है। हम लोग आज यहां 'श्रम शक्ति', जो उत्पादन की कई ऐसी प्रक्रियाओं को संचालित कर रही है जो आर्थिक संवृद्धि एवं विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं, की महत्ता को रेखांकित और स्वीकार करने के लिए एकत्र हुए हैं।

मेरे विचार से यह हमारे प्रचुर श्रम बल जो लगभग 450 मिलियन है और जिसके 2022 तक 600 मिलियन से अधिक हो जाने की संभावना है, की 'श्रम शक्ति' का उत्सव है। श्रम पुरस्कार उत्पादन पारितंत्र की प्रक्रियाओं के संपूर्ण पहलुओं को मान्यता और प्रोत्साहन देता है क्योंकि पुरस्कार विजेताओं का चुनाव निष्पादक के उत्कृष्ट रिकार्ड, कर्तव्य के प्रति उच्च कोटि की प्रतिबद्धता, उत्पादकता, सुरक्षा, गुणवत्ता, प्रमाणित अभिनव क्षमता, संसाधनों के संरक्षण, बुद्धिमत्ता एवं असाधारण साहस के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के आधार पर किया जाता है। ये ही गुण हैं जिनके माध्यम से हमारा लाखों कार्यबल आर्थिक विकास के पहिए को रात-दिन चला रहा है।

इसी कारण मैं यह कहने का साहस करता हूं कि यह वास्तविक जीडीपी पर्व है। इससे मेरा तात्पर्य है 'ग्रोथ ड्राइविंग पावर' जिनमें से आज 'ग्रेट डेडिकेटेड पर्सन्स' को सम्मानित किया जा रहा है और ये दोनों जीडीपी, 'ग्रौस डोमेस्टिक प्रोडक्ट' के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, जीडीपी अर्थात अंतत: जो हम सभी के लिए महत्वपूर्ण है।

इस अवसर पर मैं उन लाखों कार्यबल को सलाम करता हूं जो अर्थव्यवस्था के पहिए को चलाने के लिए रात-दिन काम कर रहे हैं और श्रम पुरस्कारों के विजेताओं को शुभकामनाएं देता हूं। मैं समझता हूं कि छ: वर्षों का ये पुरस्कार आज प्रदान किया जा रहा है। इस अवसर पर मैं यह कहना चाहूंगा कि यह उपयुक्त होगा यदि ये महत्वपूर्ण सम्मान इतने लंबे अंतराल के बजाए प्रति वर्ष प्रदान किए जाएं।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने किसी दिन कहा था कि भारतीय अर्थव्यवस्था एक दुर्बल अर्थव्यवस्था से विश्व अर्थव्यवस्था के प्रधान इंजन के रूप में परिवर्तित हो गयी है। हमारे लाखों कार्यबल के योगदान के बिना यह संभव नहीं हो सकता था। परंतु अधिक महत्वपूर्ण यह है कि नए आर्थिक क्षितिज का विस्तार करने के लिए अभी भी विशाल क्षमता का दोहन किया जाना शेष है। यह हमारे कार्यबल की उत्पादकता में सुधार की मांग करता है ताकि हमारी अर्थव्यवस्था उच्च संवृद्धि के मार्ग को कायम रख सके।

भारत एक प्राचीन सभ्यता है परंतु इसके पास विश्व में युवाओं की सर्वाधिक जनसंख्या है। हमारी जनसंख्या का 65% 35 वर्षों से कम उम्र वालों का है और कार्यक्षम आयु (15-64 वर्ष) वाले लोगों की जनसंख्या 25% से अधिक है। इसे ही भारत के लिए जनसांख्यिकीय लाभांश कहा जा रहा है जिसका उपयुक्त पहलों एवं हस्तक्षेपों के माध्यम से पूरी क्षमता के साथ उपयोग किए जाने की आवश्यकता है। यह एक बड़ी चुनौती और साथ-ही-साथ एक अवसर है जिससे चूकने या डगमगाने का खतरा हम नहीं उठा सकते।

प्रमुख चुनौती हमारे कार्यबल की उत्पादकता में सुधार करना है। उत्पादकता में वृद्धि हमारे देश एवं अन्य उभरते हुए बाजारों में सार्वजनिक चर्चा का प्राथमिक विषय नहीं है। उत्पादकता में वृद्धि विकसित विश्व की तुलना में ऐसी अर्थव्यवस्थाओं के लिए अधिक महत्व रखती है, चूंकि यह निरंतर उत्पादकता वृद्धि ही है जो कि लंबे समय में इन देशों में जीवन स्तर को बढ़ा सकती है। यदि कामगार प्रति घंटे अधिक उत्पादन करता है तो साझा करने हेतु अधिक उत्पाद और आय होता है। प्रति कामगार प्रति घंटे वस्तु एवं सेवाओं के उत्पादन के रूप में मापी जाने वाली श्रम उत्पादकता संयुक्त राज्य अमेरिका एवं अन्य विकसित देशों में, विशेषकर 2008 की वैश्विक वित्तीय मंदी के बाद से बहुत ही धीमी गति से बढ़ रही है। धीमी उत्पादकता वृद्धि उत्पादन क्षमता में लंबी अवधि में धीमी गति को सूचित करता है।

वार्षिक उत्पादकता वृद्धि में छोटा सा अंतर एक पीढ़ी के जीवन स्तर में बड़ा अंतर ला सकता है। इस पर ध्यान दिलाया गया कि 2% प्रति वर्ष की उत्पादकता वृद्धि लगभग 35 वर्षों में जीवन स्तर को दुगुना कर सकती है। इसका तात्पर्य है कि प्रत्येक पीढ़ी अपनी वर्तमान पीढ़ी की अपेक्षा महत्वपूर्ण रूप से बेहतर होगी। परंतु यदि उत्पादकता वृद्धि धीमी हो, जैसे 1 % प्रति वर्ष, तो इसका तात्पर्य है कि औसत जीवन स्तर को दुगुना होने में 70 वर्ष लगेंगे। इसलिए यह अनिवार्य है कि कार्यस्थल एवं घर दोनों जगह एक समर्थकारी वातावरण को सुनिश्चित करके हमारे कार्यबल की उत्पादकता में सुधार करने हेतु सभी आवश्यक पहल एवं हस्तक्षेप किए जाएं।

इस प्रकार उत्पादकता में वृद्धि करना विकासशील अर्थव्यवस्थाओं द्वारा पेश की जा रही सर्वाधिक महत्वपूर्ण चुनौतियों में से है। उनके लिए एक अतिरिक्त चुनौती यह है कि अर्थव्यवस्था के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में उत्पादकता में सुधार करने के अलावा उन्हें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि कार्यबल अर्थव्यवस्था के सर्वाधिक प्रभावी क्षेत्रों में जाए। विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को प्राय: अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के बीच उत्पादकता के बड़े अंतर के द्वारा भी चित्रित किया जाता है जो अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के बीच श्रम एवं अन्य संसाधनों के अप्रभावी आवंटन का सूचक है।

केवल श्रम और संसाधनों को अधिक उत्पादक क्षेत्रों की ओर ले जाने से भी उत्पादकता एवं आर्थिक संवृद्धि में समग्र बढ़ोतरी सुनिश्चित की जा सकती है। तथापि अध्ययनों से यह सिद्ध हुआ है कि इस बात पर विश्वास करने का कोई कारण नहीं है कि यह प्रक्रिया अवश्यंभावी और स्वचालित है। अनेक अफ्रीकी और लैटिन देशों में देखा गया है कि श्रमिक वैश्वीकरण के प्रत्युत्तर से गलत दिशा में चले जाते हैं। कुछ अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि जहां वैश्वीकरण के प्रत्युत्तर में कई औपचारिक क्षेत्रों के व्यवसायों की क्षमता में वृद्धि हुई, वहीं साथ ही अधिशेष श्रमबल भी विस्थापित हो गए। कई विस्थापित कामगार अंतत: अनौपचारिक क्षेत्र में वापस लौट गए जो निम्न उत्पादकता द्वारा पहचाने जाते हैं।

तथापि 1990 से भारत का अनुभव इस रूप में काफी बेहतर है कि कृषि से श्रमिकों का स्थानांतरण अर्थव्यवस्था के अधिक उत्पादक क्षेत्रों, विशेषकर विनिर्माण की ओर हुआ है। वस्तुत:, आर्थिक उदारीकरण के बाद से उत्पादकता में सर्वाधिक तीव्र वृद्धि सेवा क्षेत्र के पश्चात् विनिर्माण क्षेत्र में ही हुई है। तथापि, हाल का आंकड़ा दर्शाता है कि देश में समग्र श्रम उत्पादकता विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के अनुरूप कम हुई है। हमें अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों के अनुभवों से बचने के बारे में सजग रहने की आवश्यकता है। उत्पादकता में सुधार हेतु श्रम गहन क्षेत्रों जैसे कपड़ा, चमड़े की वस्तुएं इत्यादि पर विशेष ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।

'मेक इन इंडिया' की वास्तविक चुनौती श्रम गहन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में उच्च उत्पादकता वाली नौकरियों का सृजन करना है। इस दिशा में गहन प्रयास किया जा रहा है। चीन द्वारा अपनी अर्थव्यवस्था को पुनर्संतुलित करने तथा निर्यात पर निर्भरता के प्रयास को कम करने के प्रयास से भारत के लिए एक बड़ा अवसर है कि आगे आए और विश्व के लिए श्रम गहन उत्पादों के विनिर्माण के लिए अपना स्थान बनाए। हमारे देश के कुछ श्रम गहन क्षेत्रों में लघु संगठित कंपनियों का प्रभुत्व है, जहां उत्पादकता में वृद्धि एक बड़ा मुद्दा है। हमारे उत्पादों को वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए इसका प्रभावी रूप से समाधान करने की आवश्यकता है। अल्पसमयावधि में हमारी जनता के जीवन स्तर में वृद्धि करने के लिए अर्थव्यवस्था के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में कार्यबल के उत्पादकता के उपयुक्त स्तर को सुनिश्चित किए जाने की आवश्यकता है।

मित्रो!

बदलते समय के साथ कार्य की रूपरेखा भी बदल रही है। हाल की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि देश का 37% कार्यबल वर्ष 2022 तक नई भूमिकाओं वाली नौकरियों में नियोजित हो जाएगा। फिक्की नैसकॉम एवं एर्न्सर ऐंड यंग की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2022 तक देश के अनुमानित 600 मिलियन कार्यबल उन नौकरियों में परिनियोजित हो जाएंगे जो वर्तमान में अस्तित्व में नहीं हैं। इसमें यह भी कहा गया है कि विकसित बाजारों की घातांकीय तकनीकों द्वारा अगले पांच वर्षों में उत्पादकता में 15-20% वृद्धि की संभावना है। हमें चौथी औद्योगिक क्रांति की इस पृष्ठभूमि में इन परिवर्तनों एवं चुनौतियों के लिए तैयार रहना चाहिए। हमें, जो समय बर्बाद हुआ है और जो अवसर हम चूक गए है, उनकी प्रतिपूर्ति करनी है।

भारत को विश्व की आर्थिक उम्मीद के रूप में संबोधित किया जा रहा है। यह चित्र आकर्षक और जटिल दोनों है क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था का तेजी से विस्तार हो रहा है और हम विश्व की सर्वाधिक युवा जनसंख्या के रूप में उभर रहे हैं। जैसे-जैसे चौथी औद्योगिक क्रांति आगे बढ़ेगी, नए कौशल की आवश्यकता हमारी बढ़ती हुई युवा जनसंख्या को चुनौती देती जाएगी।

उन शैक्षिक कार्यक्रमों का विकास करने के लिए, जो बाजार की जरुरतों के अनुरूप हो, संस्थाओं, विद्यालय प्रणालियों एवं नियोक्ताओं के बीच अधिक सहयोग के साथ-साथ शिक्षा एवं कौशल में वृद्धि हेतु त्वरित और प्रभावी पहल करने की तत्काल आवश्यकता है। स्वीट्जरलैंड, जर्मनी एवं ऑस्ट्रिया ने इसका सफलतापूर्वक प्रबंधन किया है। रोजगार योग्य कौशल को विकसित करने और बाजार की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए शैक्षिक दिशा का प्रारूप बनाने हेतु सभी पणधारियों के बीच सफल सहयोग समय की मांग है।

इन बदलते समय और सामने आने वाले जनांकिकीय चुनौतियों के परिप्रेक्ष्य में उत्पादकता तथा रोजगारपरकता में सुधार हेतु वर्तमान में कई कदम उठाए जा रहे हैं ताकि हमारे राष्ट्र की आर्थिक क्षमता का पूरी तरह उपयोग हो। बड़े पैमान पर कौशल उन्नयन एवं प्रौद्योगिकी अंगीकरण कार्यक्रम को अब विशेष जोश, ध्यान एवं उद्देश्य के साथ चलाया जा रहा है।

रोजगारपरकता, उत्पादकता में सुधार तथा धारणीय उद्यम विकास को सहायता पहुंचाकर एवं समावेशी संवृद्धि के द्वारा निर्धनता को कम करने के लिए कौशल विकास एक महत्वपूर्ण चालक है। यह उच्च आय वृद्धि एवं विकास को सुगम बनाता है। उत्पादकता में वृद्धि कुशल और स्वस्थ जनशक्ति की उपलब्धता, प्रौद्योगिकीय उन्नयन तथा अभिनव प्रक्रियाओं एवं समष्टि अर्थशास्त्रीय रणनीतियों से होता है।

विकसित देशों से प्राप्त प्रमाणों से यह परिलक्षित होता है कि शिक्षा एवं कौशल में निवेश अर्थव्यवस्था को उच्च संवृद्धि वाले क्षेत्रों की ओर बढ़ने में सहायता करता है और निम्न वेतन-निम्न कौशल विकास के लक्षणों के समूह को तोड़ता है। भारत जैसे विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के संबंध में, उच्च वृद्धि वाले क्षेत्रों के कुशल जनशक्ति संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने, प्रशिक्षण अवसंरचना में बढ़ा हुआ निवेश करने तथा यह सुनिश्चित करने की भी चुनौती है कि अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में भी कुशल जनशक्ति है। उत्पादकता वृद्धि में कार्यस्थल पर प्रशिक्षण एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

पिछले कुछ वर्षों के केंद्रित प्रयासों से आगे कौशल पारितंत्र का निर्माण किया गया है और सहलग्नता एवं उच्च रोजगार क्षमता को प्राप्त करने हेतु कार्यक्रम मौजूद है। परंतु अभिष्ट लक्ष्य प्राप्त करने हेतु और अधिक किए जाने की त्वरित आवश्यकता है। इनमें श्रम बल के शैक्षिक स्तर में सुधार, गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण तक पहुंच में सुधार, विभिन्न पणधारियों में बेहतर समन्वय, कौशल सुपुर्दगी ढांचे का सुदृढ़ीकरण, निजी क्षेत्र की भागीदारी का सुदृढ़ीकरण तथा वित्तीय संसाधनों में वृद्धि करना एवं प्रणालीगत सुधार शामिल हैं।

जहां कार्यबल की उत्पादकता, बढ़ती जनसंख्या के लिए रोजगार के मुद्दों पर तथा आर्थिक विकास दर को बढ़ाने की आवश्यकता के लिए मानवीयता के साथ श्रम कानूनों में सुधार के संबंध में राजनैतिक आम सहमति बनाने की अनिवार्य आवश्यकता है। हम ऐसे नियमों के साथ नहीं रह सकते जो नौकरी के अधिक अवसरों के सृजन के मार्ग में आते हैं। ऐसे नियम जो किसी उद्यम को चलाना कठिन बना देते हैं, उन पर दोबारा विचार किए जाने की आवश्यकता है। इस बात की व्यापक स्वीकृति है कि मौजूदा श्रम कानून बढ़ते हुए निवेश प्रवाह के मार्ग में आड़े आ रहे हैं। यदि यह स्थिति है, तो क्या समाधान की तलाश के लिए उनका परीक्षण नहीं किया जाना चाहिए?

हमारा विशाल कार्यबल हमारे राष्ट्र की प्रगति के लिए बहुत बड़ा योगदान कर रहा है। एक उपयुक्त आर्थिक प्रणाली को सुनिश्चित करके उनकी चिंताओं, आवश्यकताओं एवं आकांक्षाओं का समाधान किया जाना चाहिए। साथ ही, कार्यबल में शामिल होने की आकांक्षा रखने वालों के लिए हमें पर्याप्त अवसर पैदा करने की आवश्यकता है।

मैं एक बार पुन: सभी श्रम पुरस्कार विजेताओं को शुभकामना देता हूं। ये पुरस्कार, जैसाकि मैंने पहले कहा है उन लाखों कामगारों के योगदान एवं त्याग का उत्सव है, जो हमारे ध्वज को ऊंचा रखने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं।

जय किसान! जय जवान! जय कामगार!”