26 नवम्बर, 2019 को संसद के केन्द्रीय कक्ष में भारत के संविधान को अंगीकार किए जाने की 70वीं वर्षगांठ को संविधान दिवस के रूप में मनाए जाने के लिए आयोजित समारोह में भारत के उप-राष्ट्रपति तथा राज्य सभा के सभापति श्री एम.वेंकैया नायडु का भाषण

नई दिल्ली | नवम्बर 26, 2019

आदरणीय राष्ट्रपति जी, माननीय लोकसभाध्यक्ष श्री ओम बिरला जी, माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी, केन्द्रीय मंत्रीगण, संसद सदस्य तथा अन्य प्रतिष्ठित आमंत्रित व्यक्ति और मीडिया के मेरे मित्रो !

आरंभ में, मैं भारत के संविधान को अंगीकार किए जाने की 70वीं वर्षगांठ के इस शुभ अवसर पर अपने देशवासियों को अपनी हार्दिक शुभकामनाएं देता हूँ। एक 'सार्वभौम, समाजवादी, धर्म निरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य' के रूप में उभर कर सामने आने की हमारे देश की इस यात्रा में यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना है। आज ही के दिन 70 वर्ष पूर्व 'हम भारत के लोगों' ने स्वयं को यह संविधान दिया जिसके द्वारा 'भारत का संघ' अस्तित्व में आया।

हमारा संविधान कोई जड़ पाषाण प्रतिमा नहीं है बल्कि यह एक जीवंत दस्तावेज है, एक ऐसा दस्तावेज है जिसे भारत के चुनिंदा सर्वोत्कृष्ट मस्तिष्कों और संवेदनशील हृदयों ने रूपाकार दिया था।

यह एक ऐसा दस्तावेज है जिससे निरंतर हमारा वास्ता पड़ता रहता है और हम निरंतर अपनी राज व्यवस्था और शासन प्रणाली को इस दस्तावेज के रूप में आकार देने का प्रयास करते रहते हैं।

इस दस्तावेज को हमने 103 बार संशोधित किया है, जिससे यह परिलक्षित होता है कि हम कितनी सक्रियता से यह सुनिश्चित करने में लगे हैं कि तेजी से रूपांतरित हो रहे इस देश में इसकी प्रासंगिकता मंद न पड़ जाए।

इस अवसर पर मैं उन लाखों स्वतंत्रता सेनानियों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ जिन्होंने हमें स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र नागरिक बनाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। मैं संविधान सभा के सदस्यों और विशेष रूप से डा.बी. आर.अम्बेडकर के प्रति भी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ जिन्होंने हमें यह संविधान दिया जो विश्व का वृहत लिखित संविधान है।

इस विकट कार्य को पूर्ण करने में लगभग 3 वर्षों का समय लगा। प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में डा. अम्बेडकर ने 60 संविधानों का अध्ययन किया और हमारे समाज की गहन जानकारी और आधुनिक भारत के निर्माण की आवश्यकताओं की जानकारी रखते हुए उन्होंने पांडित्यपूर्ण रीति से इस दस्तावेज के निर्माण-कार्य का समन्वयन किया। इस दस्तावेज पर व्यापक बहस हुई। संविधान सभा में वास्तव में 2473 संशोधन उपस्थित किए गए। इसमें अमरीका, इंगलैंड, तत्कालीन सोवियत संघ, आयरलैंड, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, आस्ट्रेलिया और जापान सहित अनेक देशों के संविधानों से उनकी अनेक विशेषताएं ली गईं।

संविधान का मसौदा पेश करते हुए अपने समापन भाषण में डा. बी.आर.अम्बेडकर ने इस कार्य के पूर्ण होने पर गहरा संतोष व्यक्त किया। साथ ही, उन्होंने भारत के भविष्य को लेकर स्पष्ट रूप से अपनी आशंकाएं भी व्यक्त कीं। उन्होंने कहा था "क्या भारतीय अपने देश को अपने संप्रदाय से ऊपर रखेंगे या अपने संप्रदाय को देश से ऊपर रखेंगे? मैं नहीं जानता। किंतु इतना निश्चित है कि यदि हमारे देश में राजनीतिक दल अपने संप्रदाय को देश से ऊपर रखते हैं तो हमारी स्वतंत्रता दूसरी बार संकट में पड़ जाएगी और शायद सदा के लिए समाप्त हो जाएगी। हम सबको दृढ़तापूर्वक इस संभावना का निराकरण करना चाहिए। हमें अपने रक्त की अंतिम बूंद के साथ अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए दृढ़ निश्चयी होना चाहिए।"

सकारात्मकता की बात करेंगे तो उन्होंने "न केवल दस्तावेज के रूप में बल्कि यथार्थ में लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए" तीन महत्वपूर्ण सुझाव दिए।

डा. अम्बेडकर ने अनुभव किया कि "हमें अपने राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र भी बनाना चाहिए।"

प्रिय सदस्यों,

ये समुक्तियां आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी कि 1949 में थीं। ये हमें अपनी लोकतांत्रिक यात्रा के मार्ग में निरूत्साहित करने वाले बाधाओं से बचाने के लिए मार्गदर्शक का कार्य करती हैं।

गत सत्तर वर्षो में हमारा लोकतांत्रिक अनुभव बहुत हद तक सकारात्मक ही रहा है सिवाय आपात काल के उस अंधकारमय दौर के, जब संविधान की अवमानना केवल इसलिए की गई कि हमने डा. अम्बेडकर द्वारा दी गई अनेक चेतावनियों में से एक चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया। किंतु यह हमारे देश के लचीलेपन, हमारे संसदीय लोकतंत्र के सशक्त ढांचे, सशक्त निर्वाचन-प्रणाली और उससे सबसे बढ़कर संवैधानिक प्रावधानों के माध्यम से असहमति व्यक्त करने की लोगों की क्षमता का एक ज्वलंत उदाहरण है जिसने हमें तानाशाही की गिरफ्त में आने से रोका।

गत सात दशकों में हमें अत्यंत गौरव के साथ पीछे मुड़ कर देखना चाहिए कि हमारे देश ने न केवल अपने लोकतांत्रिक संविधान का पालन किया है बल्कि इस दस्तावेज में नए प्राण फूंकने और लोकतांत्रिक चरित्र को सुदृढ़ करने में भी अत्यधिक प्रगति की है।

हमने उत्तरोत्तर रूप से 'जन' को अपने 'जनतंत्र' के केन्द्र में रखा है और हमारा देश न केवल सबसे बड़े जनतंत्र के रूप में, बल्कि एक ऐसे देश के रूप में उभर कर सामने आया है जो निरंतर पल्लवित होने वाली संसदीय प्रणाली के साथ जीवंत, बहुलतावादी संस्कृति का उज्ज्वल प्रतीक है और हमारे संविधान ने मुक्त समाज के अधिकारों की रक्षा करने में रक्षोपाय का कार्य किया है।

हमने न केवल मूल अधिकारों पर और संविधान की प्रस्तावना के अनुरूप एक समावेशी, विकसित भारत के निर्माण के लिए उत्तरोत्तर रूप से अपनी नीतियों एवं कार्यक्रमों को साकार करने पर ध्यान केंद्रित किया है बल्कि हम शासन-प्रणाली में भी रूपांतरण कर रहे हैं।

यह वास्तव में एक आदर्श परिवर्तन है जिसमें लोग अब निष्क्रिय और मूकदर्शक या 'लाभार्थी' नहीं रह गए हैं, बल्कि परिवर्तन लाने वाले सक्रिय अभिकर्ता हैं।

अधिकारों और उत्तरदायित्वों को अब एक ही सिक्के के दो पहलुओं के रूप में देखा जाता है। तथापि मूल कर्तव्यों पर अधिक बल दिए जाने की आवश्यकता है। मूल कर्तव्यों के महत्व का उल्लेख करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि ये मूल कर्त्तव्य भी मूल अधिकारों की भांति महत्वपूर्ण हैं (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान छात्र संघ बनाम अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, 2001) न्यायालय ने यह निर्णय भी दिया है कि ये कर्तव्य राज्य पर भी लागू होते हैं।

जब तक हममें से प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने उत्तर दायित्व का निर्वहन नहीं करेगा तब तक अन्य लोगों के अधिकारों को मूर्त रूप नहीं दिया जा सकता है।

यदि हम राष्ट्रीय उद्देश्यों और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन निष्ठा एवं प्रतिबद्धता के साथ करें तो विकास पथ पर देश तीव्र गति से अग्रसर होगा और हमारा लोकतंत्र अधिक परिपक्व लोकतंत्र बनेगा। यही कारण है कि माननीय प्रधानमंत्री ने हमसे'सुधार, प्रदर्शन और परिवर्तन' का आह्वान किया है।

हमारा उद्देश्य है अपने राष्ट्र का रूपांतरण करना। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विश्व में हमारा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन हो। हमें 'विचारशील' व्यक्ति भी बनना चाहिए और यह देखना चाहिए कि हम मौजूदा प्रक्रियाओं एवं प्रणालियों को कैसे 'सुधार' सकते हैं।

नवाचार को हमें कार्य और जीवन संबंधी अपने पहलुओं में समाविष्ट करना चाहिए।

अंतत: हमें प्रगतिशील होना चाहिए और सभी क्षेत्रों में अपने देश को 'रुपांतरित' करने का लक्ष्य रखना चाहिए।

हमें अपने इतिहास के ऐसे महत्वपूर्ण संक्रांति काल में हैं, जहां हम एक प्रमुख विश्व अर्थव्यवस्था के रूप में निरंतर विकास कर रहे हैं।

हम समावेशी विकास के ऐसे रूपांतरकारी पथ पर अग्रसर हो रहे हैं जिसका निर्माण हमारी जनसंख्या, लोकतंत्र तथा मांग और प्रशिक्षित कार्य बल तथा व्यापक नेटवर्क की क्षमताओं के माध्यम से हुआ है।

हम निरंतर अपने लोकतंत्र को कार्यशील बनाए हुए हैं और यह सुनिश्चित करने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं कि इसका लाभ सब तक पहुंचे, विशेषकर उन तक जो विकास गाथा से छूट गए हैं।

हमारे लिए यह उपयुक्त समय है कि हम अपने समृद्ध मानव संसाधन पर ध्यान केंद्रित करें।

यही समय है कि हम संविधान में प्रस्तावित कर्तव्यों को याद रखें।

यही उपर्युक्त समय है कि प्रत्येक नागरिक इस उत्साहपूर्ण भावी यात्रा का हिस्सा बनने की शपथ ले और अपनी अंतर्निहित प्रतिभा को उपयोग में लाए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि हम अपना कार्य करते हैं और भली-भांति करते हैं, जैसाकि भगवान कृष्ण ने भगवद् गीता के प्राचीन भारतीय ग्रंथ में अर्जुन से कहा था।

प्रिय माननीय सदस्यों!

यद्यपि जीवन, स्वतंत्रता, समानता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि से संबंधित मूल अधिकारों की रक्षा करना सर्वथा आवश्यक है, तथापि यह उचित समय है कि हम नागरिकों के रूप में राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को गंभीरता से लें। अधिकारों के साथ कर्तव्य और दायित्व भी जुड़े होते हैं।

राष्ट्र-निर्माण केवल सरकारों का ही दायित्व नहीं हो सकता है। नागरिकों को भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। हमारे संविधान में राष्ट्र के प्रति 'नागरिकों के मूल दायित्वों के रूप में 11 कर्तव्यों को सूचीबद्ध किया गया है।

मूल कर्तव्यों में से मैं ऐसे कुछ कर्तव्यों पर यहां विशेष प्रकाश डालना चाहूंगा जिन्हें मैं महत्वपूर्ण समझता हूं:-

पहला कर्तव्य है हमारे देश की संप्रभुत्ता, एकता एवं अखंडता की रक्षा करना। हमारे इस स्वप्न को कोई पंथ या सिद्धांत धूमिल न करे। राष्ट्रीय एकता और अखंडता के अलावा अन्य कोई विचार हमारे मस्तिष्क में नहीं आना चाहिए।

इससे संबंधित एक अन्य कर्तव्य है कि विभिन्न धर्मों, भाषायी तथा क्षेत्रीय या संप्रदाय से संबंधित विविधताओं में सौहार्द की भावना को बढ़ावा देना।

दूसरा है, 'महिलाओं की गरिमा' के लिए जो अपमानजनक प्रथाएं हैं, उनकी भर्त्सना करना। ऐसे देश में जहां पारंपरिक रूप से महिलाओं को गौरवपूर्ण स्थान दिया गया है, उस देश में महिलाओं के साथ भेदभाव करने की दुर्भाग्यपूर्ण प्रवृत्ति है और छिटपुट मामलों में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार तथा हिंसा भी होती है।

तीसरा है, प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करना जो हमारे अस्तित्व और जीवन की बेहतर गुणवत्ता के लिए अत्यंत अनिवार्य है।

चौथा है, हमें विरासत में प्राप्त भाषाओं और साहित्य के साथ-साथ समृद्ध धरोहर और संस्कृति को संरक्षित करने का दायित्व। हमें सभी भारतीय भाषाओं के विकास पर विशेष ध्यान देना होगा। यदि हम उज्ज्वल भविष्य चाहते हैं तो हमें प्रकृति और संस्कृति की रक्षा करनी होगी।

पांचवां है, प्रबल नागरिक शिष्टाचार विकसित करने और स्वच्छता तथा मर्यादित आचरण सुनिश्चित करने और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करने तथा हिंसा का शपथपूर्वक त्याग करने का दायित्व।

छठवां कर्तव्य है 'उत्कृष्ठता के लिए उद्यम'। हमें साधारण व्यक्ति बनने से बचना चाहिए। हम जो भी कार्य करते हैं, उसमें गुणवत्ता के प्रति चेतनता निहित होनी चाहिए। हम किस प्रकार से अपना कार्य करते हैं, किस प्रकार से लोक सेवाएं प्रदान करते हैं, किस प्रकार से हम पढ़ाते हैं, किस प्रकार से अपनी संस्थाएं चलाते हैं, किस प्रकार से हम अपने विधानमंडलों और संसद में बहस करते हैं, इस सभी मामलों में हमें गुणवत्ता को लेकर समझौता नहीं करना चाहिए। उत्कृष्टता एक जीवन-शैली होनी चाहिए।

इस अवसर पर हम अपने देश के नागरिकों में उनके मूल कर्तव्यों के प्रति चेतना का प्रसार करने का संकल्प लें। इस चेतना के संवर्धन के उपाय के रूप में, मैं यह सुझाव दूंगा कि उपयुक्त स्तर पर मूल कर्तव्यों को पाठ्यचर्चा में शामिल किया जाए, मूल कर्तव्यों की सूची को देश के सभी शैक्षिक संस्थाओं, कार्यालयों और सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शित किया जाना चाहिए और उपयुक्त अभियानों के माध्यम से हमें युवाओं के संपर्क में आना चाहिए।

संविधान ने परिभाषित अधिकार क्षेत्र सहित राज्य के तीन अंगों नामत: विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका का सृजन किया है। प्रत्येक अंग को दूसरे के कार्यक्षेत्र का अतिक्रमण किए बिना अपने अधिदेश के अनुसार कार्य करने दिया जाए। कभी-कभार होने वाले तकरारों या मतभेदों के लिए संवैधानिक व्यवस्था ने अभी तक बखूबी कार्य किया है। हमें साथ मिलकर और प्रभावशाली रूप से कार्य करने के नए तरीके भी खोजने चाहिए।

हम अपनी स्वतंत्रता, संसदीय लोकतंत्र और अपने देश के गणराज्य होने से संबंधित रोमांयक दौर से गुजर रहे हैं। राज्य सभा का ऐतिहासिक 250वां सत्र इस समय चल रहा है जबकि हम संविधान को अंगीकार किए जाने की 70वीं वर्षगांठ आज मना रहे हैं। हम महात्मा गांधी की 150वीं जयंती भी मना रहे हैं जिन्होंने हमारे स्वतंत्रता संग्राम को व्यापक जन आंदोलन में परिवर्तित कर दिया या और जिसके कारण हमें स्वतंत्रता प्राप्त हुई थी। हम शीघ्र ही अपनी स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ मनाने जा रहे हैं।

राज्य सभा के ऐतिहासिक 250वें सत्र के अवसर पर स्मारिका खंड, सिक्का और डाक-टिकट जारी करने के लिए मैं राष्ट्रपति जी का आभारी हूँ। मैं वित्त मंत्रालय, डाक विभाग और संचार मंत्रालय को भी धन्यवाद देना चाहूँगा।

इस महत्वपूर्ण अवसर पर मैं सम्मानपूर्वक डा. बी.आर. अम्बेडकर जी को श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहूंगा जो हमारी इस महान मातृभूमि के विख्यात पुत्र हैं और जिन्होंने अपने व्यापक ज्ञान और असाधारण वैचारिक दृष्टि से भारत के इतिहास पर अमिट छाप छोड़ी है।

इस शुभ अवसर पर, हमें भारत के संविधान में उपबंधित पद्धतियों का अक्षरश: पालन करके इसमें प्रतिपादित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रयास करने का संकल्प लेना चाहिए। आइए, अपने कर्तव्यों के निर्वहन में हम उत्कृष्टता का परिचय दें। हम भारतवासी जिस प्रकार से अपने आदर्श राष्ट्र का स्वप्न देखते हैं, उसे हमें साकार करने के लिए देश सेवा के प्रति मानसिक रूप से स्वयं को तैयार करना होगा।

आज संविधान दिवस के महत्वपूर्ण अवसर पर, संविधान की मान्यताओं और मर्यादाओं के संरक्षण और संवर्धन के प्रति पुन: संकल्पबद्ध हों। लोकतांत्रिक गणराज्य में सचेत नागरिकों के सक्रिय और सार्थक प्रयास आवश्यक शर्त हैं।

अत: संविधान में निहित आदर्शों और मर्यादाओं की पूर्ति के लिए जरूरी है कि नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ मूल कर्तव्यों का आस्थापूर्वक पालन करें और अपने निजी, सामुदायिक और व्यावसायिक जीवन में नागरिक कर्तव्यों को आत्मसात करें।

संविधान दिवस के पावर अवसर पर स्वतंत्रता आंदोलन के आदर्शो और अपने संविधान निर्माताओं की आशाओं और अपेक्षाओं का श्रद्धापूर्वक स्मरण करें और उन्हें पूरा करने का संकल्प लें।

सदियों से गुलामी के बंधन में जकड़े इस देश को एक आधुनिक और प्रगतिशील संवैधानिक दृष्टि देने के लिए, मैं श्रद्धेय डा. बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर जी के प्रति हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करता हूं, उनकी पुण्य स्मृति को विनम्रतापूर्वक नमन करता हूं।