25 फरवरी, 2021 को तिरुवनंतपुरम में पी. परमेश्वरनजी स्मृति व्याख्यान के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया अभिभाषण

तिरुवनंतपुरम | फ़रवरी 25, 2021

“बहनों और भाईयों,
मैं प्रथम पी. परमेश्वरन स्मृति व्याख्यान देने के लिए स्वयं को यहां आपके बीच पाकर वास्तव में गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ। श्री परमेश्वरन जी, जो बहुत लोगों के लिए एक अनुकरणीय व्यक्ति थे, एक बहु आयामी व्यक्तित्व के धनी थे। वे एक महान लेखकर, वक्ता, एक कवि और सामाजिक दार्शनिक थे जिन्होंने अपने राष्ट्रवादी मिशन, जिसे उन्होंने अपने जीवन के मिशन के रूप में लिया था, को आगे बढ़ाने के लिए निरंतर कार्य किया।
अपनी रचनाओं, भाषणों और अन्य बौद्धिक क्रियाकलापों के माध्यम से, श्री परमेश्वरन जी ने केरल में बौद्धिक चर्चा के स्वरूप को बदल दिया। उन्होंने युवाओं के बीच स्वामी विवेकानन्द, श्री अरविन्दों, श्री नायारण गुरु और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों और शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार किया। उन्होंने केरल में रामायण माह (जुलाई-अगस्त) मनाने की निरमूल परम्परा को पुन: प्रचलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी जो वर्तमान में एक लोकप्रिय पर्व बन गया है।
श्री परमेश्वरन जी नि:संदेह केरल - एक ऐसा राज्य जिसके पास ऐसे महान बुद्धिजीवियों की एक समृद्ध विरासत है जिन्होंने सांस्कृतिक जागरण और आध्यात्मिक पुनरूद्धार करने का कार्य किया, की महान हस्तियों में से एक हैं।
8वीं सदी में, जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने अद्वैत वेदान्त के अपने दर्शन के माध्यम से भिन्न-भिन्न विचाराधाराओं और परिपाटियों का एकीकरण किया। गीता, जो हमारी बौद्धिक परम्परा में सुपुप्त अवस्था में थीं, को श्री शंकराचार्य ने पुन: प्रचलित किया और अद्वैत की अपनी उत्कृष्ट विचाराधारा के साथ इसे हमें वापस दिया। यह अद्वैत कोई नई विचारधारा नहीं थी बल्कि इसे उपनिषदों से निकाला गया था।
बाद में, रामानुज और माधव जैसे आचार्यों ने भी महान समाज सुधारकों की भूमिका निभायी। श्रृंगेरी मठ से जुड़े संत विधारण्य ने विजयनगर साम्राज्य के संस्थापकों हरिहर और बुक्का राय को अत्यधिक प्रभावित किया। हाल ही में, श्री रामकृष्ण मिशन मठ के स्वामी रंगनाथानन्द, चिन्मय मिशन के स्वामी चिन्मयानन्द ने भारत के आध्यात्मवाद और सांस्कृतिक परंपरा के देत के रूप में कार्य किया। माता अमृतानंदमयी भी इसी मार्ग पर चल रही है।
केरल में आधुनिक समय में, श्री नारायण गुरु ने बौद्धिक और सुधार दोनों के क्षेत्रों में अद्वैत को एक प्रेरणा स्रोत बनाया। अपने प्रवचनों और साहित्यिक रचनाओं दोनों में गुरु ने अद्वैत को व्याख्या और प्रेरणा की शक्ति बनाया। यदि श्री नारायण गुरु नहीं होते तो केरल सामाजिक और बौद्धिक पतन के अंधकार में डूब जाता। श्री परमेश्वनजी ने अपनी पुस्तक "श्री नारायण गुरु, द प्राफट ऑफ रेनसान्स" में नारायण गुरु के जीवन और शिक्षाओं को सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया है। इस पुस्तक में गुरु को आधुनिक समय में शांतिपूर्ण सामाजिक परिवर्तन के पथप्रदर्शक के रूप में प्रदर्शित किया गया है जो एक ऐसी विरासत है जिसे हमारे प्राचीन ऋषियों के साथ संबद्ध किया जा सकता है।
इस बौद्धिक परम्परा की मजबूत पृष्ठभूमि के कारण ही भारत इसके द्वारा युगों से सामना किए गए उतार-चढ़ाव के बावजूद एक जीवंत राष्ट्र या सभ्यता बना हुआ है।
बहनों और भाइयों,
संस्कृति और सभ्यता के संदर्भ में भारत की बौद्धिक परम्परा पांच हजार वर्षों के दौरान कायम रही। यह बौद्धिक परम्परा भारत के सामाजिक ताने-बाने के साथ गूंथी हुई थी और इससे भारत की विविधताओं के बावजूद इसकी बुनियादी एकता को कायम रखने में मदद मिली। 2003 में, यूनेस्को ने वैदिक परम्परा को मानवता की मौखिक और अमूर्त विरासत की श्रेष्ठ कृति घोषित किया। प्रो. ए.एल. वाशम जैसे विद्वानों ने समुक्ति की कि भारत और अधिकांश एशिया के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन पर दो महान संस्कृत महाकाव्यों या इतिहास 'महाभारत' और 'रामायण' का गहरा प्रभाव पड़ा है जो हिन्दू चिंतन और दर्शन का स्रोत हैं। भारत की बौद्धिक परम्परा जिसका उद्गम गंगा, सरस्वती, कावेरी, कृष्णा और गोदावरी की घाटियों में हुआ, पिछले पांच हजार वर्षों के दौरान विकसित और समृद्ध हुई। यह उपनिषदों और बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म की कई विचारधाराओं के माध्यम से विकसित हुई।
अपनी संस्कृति और ज्ञान परम्परा के लिए हम अपने वैदिक ऋषियों के अत्यधिक ऋणी हैं। ये ऋषि (सिद्ध पुरुष और संत) महज ज्ञानी नहीं थे अपितु उन्होंने उन्होंने महान सुधारकों-कर्मयोगियों के रूप में भी काम किया। उन्होंने अपने ज्ञान और आध्यात्मिक अनुभव का समाज की भलाई के लिए उपयोग किया। उन्होंने एक व्यवस्थित सामूहिक मानव जीवन की परिकल्पना की जिसमें सभी का कल्याण (सर्वभूत हिते) सुनिश्चित हो। उन्होंने धर्म-आध्यात्म से युक्त मूल्यों पर आधारित व्यवहार पद्धति का प्रतिपादन किया।
परमेश्वरनजी ने 'गीता' को एक ऐसी व्यापक जीव विज्ञान के रूप में प्रचलित किया जिससे केरल और शेष भारत में विद्यमान सामाजिक समस्याओं का समाधान हो सकता है। इस प्रयोजनार्थ, उन्होंने कई सेमिनार और परिचर्चाएं आरंभ किए तथा पंचायत स्तरीय 'स्वाध्याय समितियां शुरू की। वे संस्कृत, योग और गीता के अध्ययन को संघटित करना चाहते थे जिसके लिए उन्होंने एक नया शब्द 'संयोगी' गढ़ा। इस संबंध में, तिरुवनंतपुरम में वर्ष 2000 में एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया गया जिसमें समूचे भारत से 1500 विद्वानों, युवाओं और संतो ने भाग लिया। परमेश्वरनजी ने केरल से संबंधित विकास के मुद्दों और अन्य सामाजिक, सांस्कृतिक समस्याओं पर चर्चा करने के लिए केरल में बड़ी संख्या में सेमिनार आयोजित किए।
परमेश्वरनजी एक महान संस्था निर्माता थे। वे 1977 से 1981 के दौरान नई दिल्ली स्थित दीनदयाल अनुसंधान संस्थान के निदेशक रहे। उन्होंने 1982 में तिरुवनंतपुरम में भारतीय विचार केन्द्रम की स्थापना की और इसे केरल के एक अग्रणी अध्ययन और अनुसंधान केन्द्र के रूप में विकसित किया। वे 1984 में विवेकानन्द केन्द्र, कन्याकुमारी के उपाध्यक्ष तथा 1995 में इसके अध्यक्ष बने और अने जीवन के अंतिम दिनों तक इस पद पर रहे। उन्होंने इन सभी संस्थाओं के विकास को एक नया आयात दिया और इनसे जुड़े कामकारों और अन्य कर्मचारियों का सुयोग्य मार्गदर्शन किया।
परमेश्वरनजी ने सैकड़ों की संख्या में लेख प्रकाशित किए हैं तथा लगभग 25 पुस्तकें लिखीं हैं। उनकी पुस्तक "दिसाभोता थिन्टे दर्शनम्" के लिए उन्हें केरल साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया। वे मंथन (नई दिल्ली) और "प्रगति" (तिरुवनंतपुरम) पत्रिकाओं के सम्पादक थे। वे विवेकानन्द केन्द्र की मासिक पत्रिका 'युवा भारती' तथा त्रैमासिक पत्रिका 'विवेकानन्द केन्द्र पत्रिका' के संपादक भी थे। कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों के अलावा राष्ट्र के प्रति उनकी सेवाओं के लिए उन्हें 2004 में पद्मश्री और 2008 में पद्म विभूषण पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। परमेश्वरनजी ने अनेक युवाओं को लेखन और अनुसंधान के क्षेत्र में दीक्षित किया।
वे 1957 से 1968 तक केरल में भारतीय जनसंघ के राज्य आयोजन सचिव रहे। 1969 में उन्होंने अखिल भारतीय महासचिव और बाद में उपाध्यक्ष का प्रभार ग्रहण किया। 1975-77 के दौरान आपातकाल में उन्हें जेल में रखा गया।
परमेश्वरनजी ने 70 वर्ष के अपने समूचे सार्वजनिक जीवन के दौरान एक सादगीपूर्ण, अनुशासित और संत जैसा जीवन व्यतीत किया। यद्यपि वे एक दूरदृढ़ता, राजनेता और दिग्गज बुद्धिजीवी थे, फिर भी वे मिलनसार और सभी के लिए उपलब्ध रहते थे। वे एक उच्च कोटि के तपस्वी और मानवतावादी थे। उनके जीवन से हमें राष्ट्र को सर्वोपरि - चाहे जाति हो, संप्रदाय हो, क्षेत्र हो या पंथ हो - रखने की प्रेरणा मिलती है।
मैं वर्तमान पीढ़ी से श्री परमेश्वरनजी द्वारा दिखाए गए रास्ते पर चलने तथा एक और अधिक सशक्त, सुखी और समृद्ध भारत - एक ऐसा भारत जो जातिवाद और भ्रष्टाचार जैसी सामाजिक बुराइयों से मुक्त हो ..... एक ऐसा भारत जो अपनी समृद्ध सांस्कृतिक और अध्यात्मिक विरासत पर गर्व करे, बनाने का आह्वान करता हूँ।
धन्यवाद

जयहिन्द.”