"महामहिम राष्ट्रपति जी, माननीय लोकसभा अध्यक्ष, देश भर के राज्य विधानमंडलों के सम्मानित पीठासीन अधिकारी, मीडियाकर्मी मित्रों, भाइयों और बहनों!
मैं पीठासीन अधिकारियों की इस विशिष्ट सभा के 80 वें संस्करण में आकर वास्तव में प्रसन्न हूं। मैं पीठासीन अधिकारियों को 'लोकतंत्र के मंदिरों के मुख्य पुजारी' (हाई प्रीस्ट्स) कहना पसंद करता हूं। आपको इन मंदिरों के 'गर्भगृह/पवित्रतम स्थल' की पवित्रता को बनाए रखने का उत्तरदायित्व दिया गया है ।
हम अपने 'राज्य' को तब उसकी सबसे अच्छी स्थिति में मानते हैं जब 'राज्य' के तीनों अंगों में से प्रत्येक अंग निर्धारित अधिदेश के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु उसके लिए निर्दिष्ट अधिकार क्षेत्र में संविधान में विहित तरीके से अपनी पूरी क्षमता से काम करे। हमारे संविधान ने शक्तियों के पृथक्करण की तर्ज पर इन तीनों अंगों में से प्रत्येक के लिए स्पष्ट अधिकार क्षेत्र को निर्धारित किया है, हालांकि एक बहुत औपचारिक तरीके से नहीं ।
1748 में मोंटेस्क्यू द्वारा ' शक्तियों के पृथककरण' के सिद्धांत की उत्पत्ति विधायी, कार्यकारी और न्यायिक शक्तियों के एक अंग या एक व्यक्ति में केंद्रित होने से निरंकुशता और अत्याचार से बचने की उनकी असल चिंता का परिणाम था। फिर भी, विधायी और कार्यकारी शक्तियां 19 वीं शताब्दी के मध्य तक एक ही अंग या संस्था बनी रही। पृथक अधिकार क्षेत्र अस्तित्व में उनके बाद से ही यह टकरावों और तनावों की गाथा रही है। स्वतंत्रता के बाद से भारत भी कोई अपवाद नहीं है। इसलिए, हमारे लिए इन तीनों अंगों के सामंजस्यपूर्ण कार्यकरण का जायजा लेना उपयुक्त है ।
प्रत्येक अंग का दूसरों के कार्यों में हस्तक्षेप किए बिना अपना काम करना ही सामंजस्यपूर्ण कार्यकरण है। इसके लिए पारस्परिक सम्मान, जिम्मेदारी और संयम की भावना का होना आवश्यक है। दुर्भाग्यवश इन अंगों द्वारा अपनी सीमाएं लांघने के कई उदाहरण हैं।
हम कुछ अवसरों पर विधायिका के प्रति जवाबदेही की उपेक्षा करते हुए कार्यपालिका के अतिक्रमणों से परिचित हैं । ऐसे मामले सामने आए हैं जब प्रत्यायोजित 'अधीनस्थ विधान' के तहत बनाए गए नियमों ने संसद द्वारा अधिनियमित मूल विधानों के प्रावधानों का उल्लंघन किया। कई बार कार्यपालिका द्वारा नागरिकों के अधिकारों और स्वतंत्रता का उल्लंघन भी बिल्कुल स्पष्ट दिखाई देता है।
कभी-कभी, विधायिका ने भी सीमा लांघी है । 39 वें संविधान संशोधन द्वारा राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधान मंत्री के चुनाव को 1975 की परिस्थितियों में न्यायिक समीक्षा के दायरे से परे रखना ऐसा एक उदाहरण है।
कुछ न्यायिक फैसले दिए गए हैं जिन्होंने हस्तक्षेप की एक विशिष्ट छाप छोड़ी है।
इन कार्रवाइयों के परिणामस्वरूप संविधान द्वारा तय की गई रूपरेखा धुंधली हो गई है जिसे रोका जा सकता था। इन कार्रवाइयों से यह सवाल उठा कि राज्य के तीनों अंगों को किस तरह स्वयं के सर्वोच्च होने की भावना के साथ कार्य करने की बजाय संविधान में निहित अधिकार क्षेत्र की पवित्रता का सम्मान करना चाहिए?
महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या हमारे संविधान में इन तीनों अंगों में से किसी के भी 'सर्वोच्च' होने की परिकल्पना की गई है?
1955 में, 'राम जावाया बनाम पंजाब राज्य' मामले में, उच्चतम न्यायालय ने यह फैसला किया "हमारा संविधान, राज्य के एक अंग या भाग द्वारा, उन कार्यों को किए जाने की परिकल्पना नहीं करता जो अनिवार्य रूप से किसी दूसरे अंग के हैं"। इसके द्वारा, यह निष्कर्ष निकालना तर्कसंगत है कि समकक्षों में प्रथम' का सिद्धांत तीनों अंगों में से किसी पर भी लागू नहीं होता है। । 2002 में 'पी. रामचंद्र राव बनाम कर्नाटक राज्य' के मामले में शीर्ष अदालत ने कहा कि "उच्चतम न्यायालय स्वयं एक राज्यसत्ता में दूसरी राज्यसत्ता नहीं मानता है अथवा राज्य की निरंकुश शाखा के रूप में कार्य नहीं करेगा। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डा.ए.एस.आनंद ने यह माना कि "यह कहना कि न्यायपालिका संविधान की संरक्षक है, का यह अर्थ नहीं है कि विधायिका और कार्यपालिका समान रूप से संविधान की रक्षा के लिए नहीं हैं। राष्ट्र की प्रगति के लिए, तथापि, यह जरूरी है कि राज्य के सभी तीनों अंग पूर्णत: एक दूसरे का सम्मान करते हुए कार्य करें"।
सामंजस्यपूर्ण कार्यकरण के लिए यह खोज इस महती सभा में विचार-विमर्श का मुख्य विषय है।
यह खोज भारत में हम सभी के लिए नई नहीं है। कई शताब्दियों पहले, भारतीय संतों ने सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व की उम्मीद की थी । ऋग्वेद में उन्होंने कहा था,
"समानी व आकूति: समाना हृदायनि व:।
समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति"
(आइए हम एक साझा लक्ष्य द्वारा प्रेरित हों, एक साझा प्रतिबद्धता और एकजुट हों और उदान्त विचारों द्वारा इससे हम सद्भाव के साथ और खुशमिजाज वातावरण में काम कर पाएंगे)
जब प्रत्येक अंग का समावेशी लक्ष्य और व्यापक जनहित उद्देश्य होगा तो सहक्रियाशील कार्यकरण की नींव रखी जाएगी। इस भावना को आपसी सम्मान और जिम्मेदारी की उच्च भावना के साथ निरंतर संरक्षित और पोषित करना होगा।
आजादी के बाद से, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों ने सुधारात्मक हस्तक्षेप करने के अलावा सामाजिक-आर्थिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में कई दूरगामी निणर्य दिए हैं । लेकिन कभी-कभी इस बात पर चिंता जताई गई है कि क्या न्यायपालिका विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रही है। इस बात को लेकर बहस हुई है कि क्या कुछ मुद्दों को वैध रूप से सरकार के अन्य अंगों के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए था या नहीं। उदाहरण के लिए, दीपावली पर आतिशबाजी; दिल्ली के रास्ते से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से वाहनों के पंजीकरण और आवाजाही पर उपकर; 10 या 15 वर्षों के बाद कतिपय प्रकार के वाहनों के उपयोग पर प्रतिबंध; पुलिस जांच की निगरानी करना; कॉलेजियम, जिसे संविधानेतर निकाय कहा जाता है, द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका को किसी भी भूमिका से वंचित करना; पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने से संबंधित राष्ट्रीय न्यायिक जवाबदेही आयोग अधिनियम को अमान्य करने जैसे कुछ उदाहरण दिए जा रहे हैं जिन्हें न्यायपालिका के हस्तक्षेप के मामलों के तौर पर देखा जा रहा है।
अत:, राज्य के तीनों अंगों के कार्यकरण में सामंजस्य न होने को लेकर कुछ चिंताएं हैं। हमारा संविधान राज्यों के तीनों अंगों के बीच नियमों और सामंजस्य की पालना सुनिश्चित करने के लिए नियंत्रण और संतुलन का प्रावधान करता है । यह एक निर्धारित स्थिति है कि संविधान सर्वोच्च है और तीनों अंगों में से कोई भी सर्वोच्च नहीं है। चूंकि महामहिम राष्ट्रपति जी इस मुद्दे पर अधिक प्रकाश डालेंगे, मैं अब पीठासीन अधिकारियों और विधानमंडलों के मुद्दों पर बात करना चाहूंगा।
यूनानी दार्शनिक सुकरात ने कहा है कि विधानमंडलों का कार्य गंभीर प्रकृति का होता है क्योंकि वे उन तरीकों पर चर्चा करते हैं जिनका हमें अपने जीवन में अनुसरण करना चाहिए। विधायिका लोकतंत्र की आधारशिला है जो कार्यपालिका और न्यायपालिका के कार्यों के लिए आधार प्रदान करती है। न्यायिक समीक्षा, जिसे हमारे संविधान की 'बुनियादी विशेषताओं' में से एक घोषित किया गया है, विधायिका पर कतिपय प्रतिबंध लगाती है। कानून निर्माताओं को आवश्यकता पड़ने पर न्यायिक निर्णयों को रद्द करके भी अपने अधिकार क्षेत्र की रक्षा करने की स्वतंत्रता है।
विधायिका के महत्व को देखते हुए, संसदीय लोकतंत्र के प्रयोजन को आगे बढ़ाने मे पीठासीन अधिकारियों की प्रमुख भूमिका होती है। वर्षों से कुछ जनधारणा विधायिका और उसके सदस्यों के खिलाफ बनी है। बार-बार व्यवधान, विधिनिर्माताओं का सदनों के भीतर और बाहर आचरण, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले विधिनिर्माताओं की बढ़ती संख्या, चुनावों में धनबल की वृद्धि, विधिनिर्माताओं द्वारा सत्ता का घमंड इस नकारात्मक धारणा के कुछ कारण हैं।
1997 में हमारी स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती के अवसर पर, संसद के दोनों सदनों ने सर्वसम्मति से अन्य बातों के साथ-साथ प्रश्न काल में व्यवधान न करने, सदस्यों के सभापीठ के आसन के पास न जाने जैसे संकल्पों को अपनाया है । लेकिन इसका प्राय: उल्लंघन किया जाता है।
प्रश्नकाल में लगातार व्यवधान का हवाला देते हुए, 2014 में राज्य सभा में इसका समय म.पू 11.00 बजे से दोपहर 12.00 बजे कर दिया गया। 2010-14 के दौरान, प्रश्नकाल के केवल 32.39 प्रतिशत समय का उपयोग किया गया जबकि 67.61 प्रतिशत कीमती समय व्यवधानों और मजबूरन स्थगनों के कारण बर्बाद हुआ। लेकिन, प्रश्नकाल का समय का बदले जाने के बाद, अगले वर्ष यानी 2015 में प्रश्नकाल के केवल 26.25 प्रतिशत समय का लाभ उठाया गया। 2015-19 की पांच साल की अवधि के दौरान, प्रश्नकाल के केवल 41.39 प्रतिशत समय का लाभ उठाया गया हालांकि यह सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए उससे मौखिक जवाब के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न पूछने के लिए एक प्रभावी साधन है जो सदन के 'निरीक्षण' संबंधी कामकाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। वास्तव में, पिछले 30 वर्षों में, प्रश्नकाल के लिए उपयोग किए जाने वाले समय में कमी आ रही है। यह निश्चित रूप से चिंता का विषय है।
पीठासीन अधिकारियों का सम्मेलन नियमित रूप से देश में विधानमंडलों के कामकाज का जायजा लेता रहा है और उनके कामकाज में सुधार के लिए सिफारिशें करता रहा है। 1978 में पीठासीन अधिकारियों के भुवनेश्वर सम्मेलन में चर्चा और 1985 में लखनऊ सम्मेलन में अंगीकरण के आधार पर, विभाग संबंधित संसदीय स्थायी समितियों (डीआरएससी) की प्रणाली को 1993 में लागू किया गया था। संसद की ये समितियां जिनकी वर्तमान में संख्या 24 है उन्हें भेजे जाने वाले विधेयकों, अनुदान मांगों तथा समितियों द्वारा चुने गए अन्य मुद्दों की विस्तृत संवीक्षा करके एक सराहनीय कार्य कर रही हैं। मैं राज्य सभा की 8 समितियों के कार्य-निष्पादन की नियमित रूप से समीक्षा कर रहा हूं तथा इन समितियों ने पिछले तीन वर्षों के दौरान उपस्थिति, बैठकों की औसत अवधि इत्यादि में पर्याप्त सुधार दिखाया है। मैं पीठासीन अधिकारियों से राज्यों के सभी विधानमंडलों सभाओं में इस तरह की समितियों की शुरूआत करने के लिए आवश्यक कदम उठाने का आग्रह करता हूं।
'ऋग्वेद' में, 'सभा अध्यक्ष' के लिए आवश्यक है कि वह राज्य के मामलों में पारंगत, अनुभवी, चतुर हो, राजनीति में नौसिखिया न हो, निष्पक्ष, विद्वान, प्रबुद्ध ईमानदार, परोपकारी और सीखने और उम्र में परिपक्व हो। मैं आप सभी से संबंधित विधानमंडलों के कार्यकरण में सुधार करने के लिए इन गुणों का सदुपयोग करने का आग्रह करता हूं। नियमों, परंपराओं तथा सभापीठ के पूर्व के नियमों और अपने स्वयं के ज्ञान और अनुभवों से युक्त एवं सहायता प्राप्त लोकतंत्र के मुख्य पुजारी के रूप में आप लोकतंत्र के मंदिरों की पवित्रता को बनाए रखने के लिए आवश्यक सब कुछ करेंगे।
लोकतंत्र के मंदिरों में 'शिष्टाचार, गरिमा और सभ्यता' को केवल तीन 'डी' अर्थात् 'वाद-विवाद, चर्चा और निर्णय' का पालन करके ही बनाए रखा जाएगा। निरंतर होने वाले व्यवधानों से विधानमंडलों की प्रतिष्ठा को गंभीर क्षति पहुंचती है। कार्यकरण में सामंजस्य की कमी से राज्य के तीनों अंगों की वैधता को गंभीर क्षति पंहुचेगी।
मैं इस महत्वपूर्ण सम्मेलन को सरदार पटेल के 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' के पास आयोजित करने और एक सुसंगत विषय चुनने में माननीय लोकसभा अध्यक्ष की व्यक्तिगत रुचि के लिए के लिए उनकी सराहना करता हूं। इस वर्ष पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में पहली बार महामहिम राष्ट्रपति जी, उपराष्ट्रपति और प्रधान मंत्री की भागीदारी राष्ट्र निर्माण के लिए राज्य के तीन अंगों के सामंजस्यपूर्ण कार्यकरण तथा विधानमंडलों के कार्यकरण को बेहतर बनाने में पीठासीन अधिकारियों की भूमिका को दिए गए महत्व का एक स्पष्ट संकेत है।
मैं आप सभी को क्रिसमस, सुखद, स्वस्थ और समृद्ध वर्ष 2021, संक्रांति, पोंगल तथा लोहड़ी की शुभकामनाएं देता हूं । आप सभी का धन्यवाद!"










