25 जनवरी, 2021 को हैदराबाद में डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम मिसाइल कॉम्प्लेक्स में दो नई सुविधाओं का उद्घाटन करने के बाद वैज्ञानिक समुदाय को भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

हैदराबाद | जनवरी 25, 2021

“डीआरडीओ के अध्यक्ष डा. जी. सतीश रेड्डी, श्री एमएसआर प्रसाद, महानिदेशक, मिसाइल एवं सामरिक प्रणाली (एमएसएस), डीआरडीओ के सभी वैज्ञानिकों और मेरे प्रिय बहनों और भाइयों,
डीआरडीओ की मिसाइल कलस्टर प्रयोगशालाओं से जुड़े वैज्ञानिकों को संबोधित करना अत्यंत प्रसन्नता का विषय है। आप में से कई लोगों ने हमेशा से चुनौतीपूर्ण रहे रक्षा विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपना योगदान देकर सफलता प्राप्त की है। आप सभी को डीआरडीएल के परिसर में संबोधित करना गर्व का भी विषय है, यह भारत में मिसाइल विकास और उत्पादन संबंधी समग्र गतिविधियों का प्रमुख सुविधा केन्द्र है।
जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भारत की मिसाइल प्रौद्योगिकी विकास की यात्रा की शुरुआत वर्ष 1961 में डीआरडीएल की स्थापना के साथ हुई है, जब स्वदेशी मिसाइल विकसित करने की आवश्यकता महसूस की गई थी। तीनों सैन्य बलों के लिए स्वदेश निर्मित मिसाइलों की व्यापक श्रृंखला को विकसित करने के उद्देश्य से डीआरडीओ के वैज्ञानिकों और प्रौद्योगिकीविदों ने एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (आईजीएमडीपी) की शुरुआत की है। आईजीएमडीपी का सफल नेतृत्व भारत के महानतम सपूतों में से एक, भूतपूर्व राष्ट्रपति, डा. एपीजे अब्दुल कलाम द्वारा किया गया था।
हाल ही में, मुझे चेन्नई में डा. कलाम पर "अब्दुल कलाम - निनैवूगलुक्कूल मानरामिल्लई" शीर्षक से एक पुस्तक का लोकार्पण करने का अवसर प्राप्त हुआ था, जिसका अनुवाद है "अब्दुल कलाम - अमर स्मृतियां"। यह पुस्तक तमिल भाषा में डा. एपीजे अब्दुल कलाम की भांजी डा. एपीजेएम मरईकायर और जाने-माने अंतरिक्ष वैज्ञानिक डा. वाईएस राजन द्वारा लिखी गई है।
मैं भाग्यशाली हूं कि मुझे डा. कलाम से कई बार मिलने और बातचीत करने का मौका मिला, जब वह डीआरडीओ में थे और बाद में जब वह भारत के राष्ट्रपति बने। लेकिन मैं जब भी उनसे मिला उनकी सादगी, उनके अथाह ज्ञान और भारत को एक महाशक्ति बनाने की उनकी तीव्र इच्छा ने मुझे सदैव आश्चर्यचकित किया। उनके कुशल नेतृत्व के अंतर्गत आईजीएमडीपी कार्यक्रम की सफलता ने सामरिक रक्षा प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता की नींव रखी।
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना देश के लिए न केवल निर्णायक या सामरिक महत्ता वाला है बल्कि यह राष्ट्रीय गौरव की दृष्टि से भी अनिवार्य है। मैं यह जानकर प्रसन्न हूं कि डीआरडीओ के मिसाइल कलस्टर के वैज्ञानिक डा. कलाम की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं और उन्होंने अत्याधुनिक मिसाइल प्रणाली की नई पीढ़ी को विकसित किया है।
हाल ही में जिन कुछ मिसाइलों का सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया है उनमें क्यूआरएसएएम, एसएमएआरटी, एमपीएटीजीएम, उपग्रह-भेदी मिसाइल और हाइरपसोनिक टैक्नोलॉजी डिमोंस्ट्रेटर शामिल हैं।
मुझे यह बताया गया है कि लॉकडाउन की चुनौतियों और कोविड-19 महामारी के खतरों के बावजूद, वैज्ञानिकों ने मिसाइल विकास कार्यक्रमों के महत्वपूर्ण पड़ावों को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत की है और क्यूआरएसएएम (सतह से हवा में मार करने वाली क्विक रिएक्शन मिसाइल), एमआरएसएएम (सतह से हवा में मार करने वाली मीडियम रेंज की मिसाइल), एसएएडब्ल्यू (स्मार्ट एंटी - एयर फील्ड वैपन), एसएमएआरटी (सुपरसोनिक मिसाइल असिस्टेड रिलीज ऑफ टॉरपीडो), एमपीएटीजीएम (मैन पोर्टेबल एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल), पैसिव होमिंग हैड सीकर का इस्तेमाल करते हुए एनजीआरएएम (नई पीढ़ी की एंटी रेडिएशन मिसाइल), एचईएलआईएनए के फ्लाइट नियंत्रित परीक्षण कार्यक्रम, 'नाग' के यूज़र असिस्टेड परीक्षण, स्वदेशी बूस्टर का इस्तेमाल करके ब्रह्मोस के फ्लाइट परीक्षण, एचएसटीडीवी के लिए 20 सेंकड के लिए हाइपरसोनिक क्रूज के लैंड वर्जन और प्रौद्योगिकी प्रदर्शन के विकास संबंधी परीक्षणों को सफलतापूर्वक पूरा किया है। कोविड-19 महामारी के कारण उत्पन्न हुई चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए ये सभी उपलब्धियां सराहनीय हैं।
प्रिय बहनों और भाइयो,
भारत और शेष विश्व ने कोविड-19 महामारी के प्रकोप के कारण सामान्य गतिविधियों में अभूतपूर्व विघ्न का सामना किया है। जीवन वास्तव में थम गया था और सभी वर्गों के लोग, विशेषरूप से गरीब इस महामारी से बुरी तरह से प्रभावित हुए थे।
तथापि, भारत सरकार ने महामारी के प्रतिकूल प्रभावों को कम करने के लिए त्वरित कार्रवाई की थी। लोगों की सहायता के साथ, हम देश में नोवल कोरोना वायरस के फैलाव को नियंत्रित करने में सफल हुए हैं। वैज्ञानिकों ने भी इतने कम समय में टीके का विकास किया है, जिसके फलस्वरूप, आज लाखों लोगों का टीकाकरण किया जा रहा है।
मुझे आशा है कि यह टीका शीघ्र ही भारत के हर नागरिक तक पहुंच जाएगा और महामारी समाप्त हो जाएगी।
कोविड महामारी के खिलाफ भारत की जंग इस वायरस पर काबू पाने में हमारी सफलता की गाथा कहती है। इस जंग के बहादुर हीरो भारत के लोग, पुलिस बल, चिकित्सक समुदाय, वैज्ञानिक, प्रौद्योगिकीविद और अनिवार्य सेवा तथा आवश्यक वस्तुओं के प्रदाता हैं, जिन्होंने इस राष्ट्रीय जरूरत के समय संक्रमित होने का खतरा उठाकर भी पूरे मन से अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह किया है।
हमारे किसान महामारी के दौरान लगाए गए प्रतिबंधों के कारण आई कठिनाइयों के बावजूद वर्ष 2019-20 में 296.65 मिलियन टन के खाद्यानों के रिकॉर्ड उत्पादन की उपलब्धि हासिल करने के लिए विशेष प्रशंसा के पात्र हैं।
नि:संदेह, महामारी से अर्थव्यवस्था और लोगों की आजीविका गंभीर रूप से प्रभावित हुई है। साथ ही, इस स्थिति ने हमें अपनी शक्तियों और क्षमताओं को प्रदर्शित करने का एक अवसर भी प्रदान किया है।
सरकार, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, प्रवर्तकों, वाणिज्यिक और औद्योगिक उद्यमों ने इस चुनौती को स्वीकार किया और उत्कृष्ट नवोन्मेषी उत्पादों, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों को लेकर आए और स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली को बेहतर बनाया। ये सभी प्रयास हमारी शक्ति को दर्शाते हैं और भारत को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में अग्रसर हैं। अत:, इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि अब हम स्वदेशी टीके को अन्य देशों को निर्यात कर रहे हैं।
मैं यह जानकर बहुत प्रसन्न हूँ कि मुख्य रूप से डीआरडीओ के सामरिक रक्षा अनुसंधान एवं विकास से जुड़े होने के बावजूद, संगठन ने कोरोना वायरस महामारी के विरूद्ध लड़ने के राष्ट्रीय अभियान को खुले दिल से सहायता प्रदान की है। लॉकडाउन के ही दौरान, डीआरडीओ के वैज्ञानिकों ने वायरस को नियंत्रित करने के लिए उपकरणों, सुरक्षा उपकरणों और जीवन रक्षक उपकरणों जैसे कई तकनीकी समाधान प्रदान करने के लिए कड़ी मेहनत की। यह अत्यंत प्रशंसनीय है कि दिल्ली में 1000 बिस्तरों वाला सरदार वल्लभभाई पटेल कोविड अस्पताल स्थापित करने के लिए डीआरडीओ के कर्मचारियों ने उत्साहपूर्वक दान किया। केवल 12 दिनों में 1000 बिस्तरों वाला एक अस्पताल स्थापित करके डीआरडीओ ने सिर्फ अपनी क्षमताओं का ही प्रदर्शन नहीं किया बल्कि यह भी साबित कर दिया कि युद्ध जैसी स्थितियों में भी वह कितनी तेजी से काम कर सकता है। मैं चाहता हूँ कि डीआरडीओ अपने सामने आने वाली प्रत्येक तकनीकी चुनौती को इसी जज्बे के साथ सामना करे।
मैं यह जानकर भी प्रसन्न हूँ कि मिसाइल क्लस्टर के वैज्ञानिकों ने अपनी कड़ी मेहनत, समर्पण और दृढ़ता के बल पर भारत को मिसाइल प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पूर्ण आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के बहुत करीब पहुँचा दिया है। मुझे यह बताया गया है कि रक्षा मंत्रालय ने हाल में आकाश मिसाइल प्रणाली को उन वस्तुओं की सूची में डाल दिया है जिनका अब आयात नहीं किया जाएगा। इसका अर्थ यह है कि अब भारत इस तरह की मिसाइल प्रणाली के मामले में आत्मनिर्भर हो गया है और इसलिए अब हमारी सशस्त्र सेनाओं को इस तरह की मिसाइल प्रणालियों का आयात करने की कोई जरूरत नहीं होगी। इस बात को ध्यान में रखते हुए डीआरडीओ द्वारा प्राप्त की गई यह उपलब्धि उल्लेखनीय है कि भारत ने वर्ष 2018 में मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण समझौते (एमटीसीआर) पर हस्ताक्षर किए थे जिसका अर्थ हुआ कि भारत की विकसित देशों द्वारा विकसित इस उच्च कोटि की मिसाइल प्रौद्योगिकी तक पहुँच नहीं थी और इसे मिसाइल प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कई सीमाओं का सामना करना पड़ता था।
डीआरडीओ ने बहुत उचित ढंग से एमटीसीआर के दौरान पेश आए संकट को स्वदेशी मिसाइल प्रणाली की रेंज का विकास करके अवसर में बदल दिया है।
भारत रक्षा उत्पादों के सबसे बड़े आयातक देश के अपने स्वरूप को अब रक्षा उत्पादों के सबसे बड़े निर्यातक देश के रूप में बदलने का प्रयास कर रहा है। भारत के रक्षा प्रौद्योगिकी पारितंत्र ने सरकार को यह विश्वास दिलाया है कि वह आगामी पांच वर्षों में 101 हथियारों, प्लेटफॉर्मों, और उपकरणों के आयात पर प्रतिबंध लगा सके। सरकार ने आगामी चार वर्षों में 35,000 करोड़ रुपये मूल्य के रक्षा उत्पादों के निर्यात का लक्ष्य भी निर्धारित किया है।
आत्मनिर्भर रक्षा प्रौद्योगिकियों को विकसित करने में डीआरडीओ के वैज्ञानिकों और प्रौद्योगिकीविदों के सराहनीय प्रयासों के बावजूद, भारत के रक्षा उत्पादों के निर्यात में वृद्धि के लिए अभी भी पर्याप्त अवसर हैं, जो हाल में हुई सात गुणा वृद्धि के बावजूद अभी भी बहुत कम है। यह दर्शाता है कि निर्यात योग्य रक्षा प्रौद्योगिकी के विकास की अपार संभावनाएं हैं। वैज्ञानिकों और प्रौद्योगिकीविदों को न केवल देश की भावी रक्षा आवश्यकताओं को ही पहचानना है बल्कि ऐसी प्रौद्योगिकियों की भी पहचान करनी है जिनका निर्यात किया जा सके।
आत्मनिर्भर प्रौद्योगिकियाँ स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देंगी, रोजगार के अवसर पैदा करेंगी और मूल्यवान विदेशी मुद्रा कमाने का जरिया बनेंगी। इसलिए, आत्मनिर्भर प्रौद्योगिकियाँ अर्थव्यवस्था के विकास और राष्ट्र को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करती हैं। प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के 'आत्म निर्भर भारत' और 'वोकल फॉर लोकल' के लिए किए गए आह्वान ने आत्म निर्भरता की अवधारणा को एक नई प्रेरणा प्रदान की है। इस परिदृश्य में, डीआरडीओ के लिए यह आवश्यक है कि वह अपना ध्यान रणनीतिक रक्षा प्रौद्योगिकियों की ओर लगाए और जिन गतिविधियों को निजी क्षेत्र के सक्षम भागीदारों द्वारा किया जा सकता है उन्हें आउटसोर्स करे।
मानवीय ज्ञान का प्रौद्योगिकीय परिदृश्य भी काफी तेजी से बदल रहा है। भविष्य में सेना के उपयोग में आने वाले हथियार/प्रणालियाँ काफी हद तक तेजी से विकसित होती हुई कृत्रिम बौद्धिकता, क्वांटम प्रौद्योगिकी, असममित प्रौद्योगिकी और स्मार्ट सामग्रियों के क्षेत्रों पर निर्भर करेंगी। मैं यह जानकर प्रसन्न हूँ कि डीआरडीओ ने भविष्य में सैन्य अनुप्रयोगों के संबंध में अनुसंधान करने के लिए आठ अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी केन्द्र स्थापित किए हैं और भविष्य की प्रौद्योगिकियों पर कार्य करने के लिए पहले ही युवा वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं स्थापित कर दी हैं।
मुझे विश्वास है कि डीआरडीओ के वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीविद अपनी क्षमता और प्रतिबद्धता से भारत को इतना आत्मनिर्भर बना देंगे कि "आत्मनिर्भर भारत" उस स्थिति को प्राप्त कर लेगा जहाँ पूरा विश्व 'भारत पर निर्भर' हो जाएगा।

जय हिन्द!”