23 दिसंबर, 2019 को नई दिल्ली में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्रदान करने के बाद सभा में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | दिसम्बर 23, 2019

केन्द्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री, जूरी के अध्यक्ष और सदस्यों, सूचना और प्रसारण सचिव, फिल्म बिरादरी से प्रतिष्ठित मित्रों, बहनों और भाइयों।

मैं यहाँ 66वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार वितरण के विशेष अवसर पर आप सभी की गरिमापूर्ण उपस्थिति के बीच स्वयं को पाकर सौभाग्यशाली मानता हूँ।

ये प्रतिष्ठित पुरस्कार भारतीय फिल्म उद्योग की समृद्धि और विविधता को दर्शाते हैं।

मैं भारतीय फिल्म उद्योग के पुरोधा व्यक्ति श्री अमिताभ बच्चन को प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के पुरस्कार से पुरस्कृत होने पर अपनी हार्दिक बधाई देना चाहता हूँ। मुझे खेद है कि वे अपनी अस्वस्थता के कारण इस समारोह में उपस्थित नहीं हो सके। मैं उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करता हूँ। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि श्री बच्चन स्वयं में एक संस्था के समान हैं। पाँच दशकों से भी अधिक समय से वह 'एंग्री यंग मैन' से लेकर एक 'वृद्ध पिता' तक जैसे विभिन्न किरदारों को निभाकर भारत और विदेशों में साधारण जन को सम्मोहित कर रहे हैं।

बच्चन जी सम्पूर्ण भारतीय फिल्म उद्योग के लिए प्रेरणा का एक सतत स्रोत हैं।

मैं अपनी सम्मानित जूरी को विशिष्ट पुरस्कार विजेताओं की सूची के संबंध में सामूहिक रूप से निर्णय लेने के लिए धन्यवाद देना चाहूंगा। फीचर फिल्म श्रेणी में 400 से अधिक प्रविष्टियों और गैर-फीचर श्रेणियों में 255 प्रविष्टियों को देखना और सामाजिक रूप से सर्वाधिक प्रासंगिक और सौंदर्यबोध योग्य फिल्मों का चयन करना काफी गहन और मंत्र मुग्ध कर देने वाला अनुभव रहा होगा।

मैंने देखा है कि गैर-फीचर फिल्में कन्या भ्रूण हत्या से लेकर बुनकरों के सामने आने वाली चुनौतियों जैसे कई विषयों पर फोकस करती हैं। वे मानव तस्करी से बचे बहादुर लोगों की कहानियों, दत्तक-ग्रहण की नैतिकता काल्पनिक पात्रों से लेकर जी. डी. नायडु जैसे वास्तविक जीवन के नायकों की जीवन यात्रा को प्रदर्शित करने वाली फिल्मों के बारे में बताती हैं ।

इस वर्ष की फीचर फिल्में उतनी ही भावनाओं के बारे में हैं जितनी कि वे बुद्धिमत्ता के बारे में हैं। हमारे बीच प्रतिभाशाली बाल कलाकार हैं जिन्होंने हमें असीम भावनाओं को दिखाया है। फिल्मों के गुलदस्ते में, हमारे पास ऐसी फिल्में हैं जो रूढ़ियों को तोड़ती हैं और अंधविश्वासों पर संवेदनशीलता से हमला करती हैं। हम फिल्म निर्माता की कल्पना के माध्यम से देखते हैं कि रूढ़िवादी परंपराएं कैसे आधुनिक समाधान देती हैं।

मुझे यह जानकर भी बहुत खुशी हुई है कि सर्वोत्तम फीचर फिल्म का पुरस्कार महिलाओं के संघर्ष पर बनी फिल्म को जाता है। यह महिलाओं द्वारा अपने दमनकारी परिवेश की चुनौती से पार पाने के लिए उनके एक साथ मिलकर काम करने की कहानी है।

इन पुरस्कारों में फिल्मों की एक विशाल श्रृंखला है। यहाँ ऐसे पुरस्कार भी हैं जो सर्वोत्तम ध्वनि और सर्वोत्तम खामोशी के लिए है। ऐसी ध्वनियाँ जो हमें छोटे भारतीय ग्रामों, कस्बों और शहरों में ले जाती हैं। विभिन्न भारतीय भाषाओं जो हमारी संस्कृति को समाये हुई है, में परस्पर पुरस्कार जो वातावरण के बारे में हमारी जागरूकता को बढ़ाते है, पुरस्कार जो प्रश्न पूछते हैं और अन्य जो उनका समाधान देते हैं।

मुझे लगता है कि भारत के दर्शनीय स्थलों के उपयोग के तरीकों को विकसित करने के लिए फिल्म बिरादरी और सरकार के बीच बड़े स्तर पर सहयोग हेतु विशाल अवसर हैं।

मुझे यह जानकर खुशी हुई कि उत्तराखंड राज्य को सबसे अधिक फिल्म अनुकूल राज्य के लिए पुरस्कार मिला है। मैं राज्य में फिल्म निर्माण को सुगम बनाने के लिए सरकार को बधाई देता हूँ।

सतत विकास के लिए सामूहिक रूप से प्रयासरत रहते हुए हम पर्यटन क्षेत्र को बढ़ावा दे सकते हैं और भारत की सांस्कृतिक विविधता को दुनिया के सामने प्रदर्शित कर सकते हैं।

प्रिय बहनों और भाइयों,

जैसा कि आप सभी जानते हैं, सिनेमा न केवल मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय साधन है अपितु एक प्रभावशाली साधन भी है। 1913 में भारत में बनी पहली फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' से लेकर फिल्मों ने लोगों को रोमांचित किया है और उनके दिलों में खास जगह अर्जित की है।

सिनेमा की कोई भौगोलिक या धार्मिक सीमा नहीं होती क्योंकि यह सार्वभौमिक भाषा बोलता है और प्राकृतिक भावनाओं को छूता है। राज कपूर की 'आवारा हूँ' आज भी रूस में लोकप्रिय बनी हुई है। पिछले कुछ वर्षों में, बॉलीवुड और अन्य भाषाओं की भारतीय फिल्मों ने वैश्विक लोकप्रियता अर्जित की है।

विदेशों में मेरी यात्राओं के दौरान, मुझे भारतीय फिल्मों की लोकप्रियता के बारे में जानकार सुखद आश्चर्य हुआ। वास्तव में, एक बाल्टिक देश के एक उच्चाधिकारी ने मुझे बताया कि वे बॉलीवुड फिल्मों को देखना कितना पसंद करते हैं। और अभी हाल ही के समय में, 'बाहुबली' जैसी फिल्मों ने यह साबित किया है कि भारतीय फिल्म उद्योग तकनीकी रूप से श्रेष्ठ फिल्में बनाने मे सक्षम है।

इन वर्षों के दौरान, सिनेमा हमारी सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न अंग बन गया है। प्रत्येक वर्ष हमारे देश में विभिन्न भाषाओं में बनने वाली फिल्मों की आश्चर्यचकित करने वाली संख्या न केवल फिल्मों की लोकप्रियता अपितु इस बात का भी प्रमाण है फिल्म उद्योग देशभर में हजारों परिवारों को आजीविका भी प्रदान करता है।

चूंकि फिल्में समाज पर गहरा प्रभाव डाल सकती हैं, इसलिए मुझे लगता है कि सिनेमा को सामाजिक बदलाव के माध्यम के रूप में कार्य करना चाहिए।

प्रिय बहनों और भाइयों,

कला की सार्वभौमिक भाषा होती है। यह भाषा लोगों के दिल और दिमाग तक आसानी से पहुँचती है। यह भावनाओं का संचार करती है, मूल्यों को प्रसारित करती है और सामाजिक मानदंडों को आकार देने में मदद करती है। यह व्यवहार को प्रभावित करती है और धारणाओं को बदल सकती है। यह लोगों को उत्तेजित कर सकती है और उनमें उत्साह की अनुभूति पैदा कर सकती है या असंतोष को शांत कर सकती है और परेशान मन को सांत्वना प्रदान कर सकती है। यह हमें खुलकर हंसा सकती है और अत्यधिक रुला भी सकती है।

कला समाज के भीतर जो कुछ भी घटित होता है उसे केवल दोहराती ही नहीं है बल्कि भविष्य की कल्पना भी करती है और अप्रत्यक्ष रूप से समाज को आकार देती है।

एक तरह से, कला न केवल संपूर्ण मनोरंजन करती है, बल्कि एक शिक्षाप्रद कार्य भी करती है। मेरे विचार में, फिल्म निर्माताओं को इस शक्तिशाली माध्यम के लोगों पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में सचेत होना चाहिए। लोगों को शिक्षित करने और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाना चाहिए। लक्ष्य चुनौतियों और सामाजिक समस्याओं की एक कलात्मक प्रस्तुति पर होना चाहिए और टकरावों का इस तरह से समाधान करना चाहिए जिससे सामाजिक एकता और नैतिक सिद्धांत को मजबूत हो है। फिल्म के माध्यम को समाज में नजरिए में बदलाव लाने का प्रयास करना चाहिए जैसाकि स्वच्छता, लैंगिक समानता और जातिगत भेदभाव जैसे कई समकालीन मुद्दों पर काफी कम फिल्मों में किया गया है।

हमें महिलाओं के खिलाफ हिंसा की मौजूदा प्रवृत्ति का मुकाबला करने के लिए एक मजबूत संदेश देना होगा।

मैं देश के कुछ हिस्सों में महिलाओं के खिलाफ बलात्कार और हिंसा की घटनाओं से देश के प्रत्येक समझदार नागरिक की तरह ही बहुत परेशान था। कोई भी सभ्य समाज महिलाओं के खिलाफ इस तरह के घृणित कृत्यों को स्वीकार नहीं कर सकता है।

राष्ट्र को न केवल इस तरह के अत्याचारों की एक सुर में निंदा करनी चाहिए बल्कि उन्हें रोकने के लिए दृढ़ संकल्प के साथ काम भी करना चाहिए। मानसिकता बदलनी होगी। बच्चों में सही मूल्यों और दृष्टिकोण को विकसित करने में माता-पिता की बहुत बड़ी भूमिका होती है। इसी तरह मीडिया की भी।

सिनेमा भी सही मूल्यों को बढ़ावा देने में एक प्रमुख भूमिका निभा सकता है। यह सोचना शायद गलत है कि एक संदेश प्रधान फिल्म को दर्शकों द्वारा स्वीकार नहीं किया जाएगा। सामाजिक संदेश वाली फिल्म मनोरंजक होने के साथ-साथ व्यावसायिक रूप से सफल भी हो सकती है। हाल के वर्षों में, 'थ्री इडियट्स' एक ऐसी फिल्म थी।

यह याद रखना चाहिए कि रुपहले पर्दे पर जो कुछ दिखाया जाता है, उससे युवा, अतिसंवेदनशील मन बहुत प्रभावित होते हैं। इसलिए, मैं फिल्म निर्माताओं और अन्य लोगों से फिल्म उद्योग में हिंसा, अशिष्टता और अश्लीलता पर अंकुश लगाने के काम में अगुवाई करने की अपील करता हूं।

लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं है। प्रत्येक फिल्म निर्माता को यह सुनिश्चित करने के लिए एक सचेत प्रयास करना चाहिए कि संवाद, चरित्र चित्रण और वेशभूषा में भारत की संस्कृति, रीति-रिवाजों, प्रथाओं और परंपराओं को प्रदर्शित किया जाए। सिनेमा को परिवार प्रणाली को मजबूत करने और लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को बढ़ावा देने में भी मदद करनी चाहिए।

वास्तव में, सिनेमा उद्योग को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे भारतीय सभ्यता की संस्कृति, परंपरा, मूल्य और लोकाचार कमजोर होता हो। भारतीय फिल्मों में दुनिया भर के दर्शकों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश होता है। वे बाहरी दुनिया को 'भारतीयता' की महत्वपूर्ण झलक देती हैं। हमें सांस्कृतिक कूटनीति की दुनिया में प्रभावी बनने की आवश्यकता है।

मैं एक बार फिर आज यहां उपस्थित सभी पुरस्कार विजेताओं को बधाई देता हूं। यह उत्सव का क्षण है, हमारी अतीत की उपलब्धियों पर गर्व करने का क्षण है और उत्साहपूर्ण आशावादी होने का क्षण है जो हमें भावी अवसरों के बारे में उत्साहित करता है। मुझे उम्मीद है कि वर्ष 2020 में कलात्मक और रचनात्मक पूर्णता की निरन्तर बढ़ती हुई भावना दिखाई देगी क्योंकि भारतीय सिनेमा उत्कृष्टता की और अधिक ऊंचाइयों को छूने के लिए निरन्तर प्रयासरत है।

जय हिन्द!