22 जनवरी, 2021 को हैदराबाद से श्री नारायण गुरु की “नॉट मेनी बट वन” नामक कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद के वर्चुअल विमोचन के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

हैदराबाद | जनवरी 22, 2021

“आज यहाँ आप सब के समक्ष "नॉट मेनी बट वन" पुस्तक का विमोचन करते हुए मुझे बहुत प्रसन्नता हो रही है।’.
मैं अत्यंत खुश हूं कि टाटा ट्रस्ट ने यह पहल की है और श्री नारायण गुरूदेव की सभी रचनाओं के अधिप्रमाणित संस्करणों के प्रकाशन में सहायता प्रदान की है।
इन दोनों खंडों को प्रभावशाली स्वरूप में प्रस्तुत करने के लिए मैं पेंग्विन रैंडम हाउस का अभिनंदन करता हूं।
नारायण गुरू एक बहुआयामी प्रतिभा के धनी व्यक्ति, एक महान महर्षि, अद्वैत दर्शन के पुरोधा और एक प्रतिभ़ावान कवि थे जिन्होंने मलयालम, संस्कृत और तमिल में उत्कृष्ट कविताएं लिखीं। वे एक असाधारण समाज सुधारक थे, जिन्होंने सबके लिए मंदिरों में प्रवेश से संबंधित आंदोलन में और अछूतों के प्रति सामाजिक भेदभाव जैसी सामाजिक कुप्रथाओं के विरूद्ध चलाए गए आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई। इन सब के अलावा वह विश्व के सबसे महान तत्वज्ञानियों में से एक थे।
नारायण गुरूदेव ने देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने वाले वाइकॉम आंदोलन को बढ़ावा दिया जिसकी महात्मा गाँधी ने भी सराहना की। वह एक सच्चे संत थे जिन्होंने अपना पूरा जीवन मानवता के कल्याण में समर्पित कर दिया। उनके अनुसार विश्व भर में एक सार्वभौमिक जीवनी शक्ति, एक ही दैवी शक्ति व्याप्त है जो प्रत्येक व्यक्ति और वस्तुत: इस ब्रह्माण्ड के सभी जीवों में निवास करती है। उन्होंने अपनी कविताओं में भारतीयता के सार को प्रस्तुत किया और विश्व की दिखावटी विविधता में छुपी एकता पर प्रकाश डाला।
प्रिय बहनों और भाइयों,
शिवगिरी के एक प्रतिष्ठित संत के रूप में उन्होंने कट्टर परंपरावादियों के विरोध के बीच शिव की मूर्ति प्रतिष्ठित की, वे एक ऐसे व्यावहारिक सामाजिक कार्यकर्ता थे जिन्होंने शिवगिरी तीर्थयात्रा के हिस्से के रूप में स्वच्छता बनाए रखने, शिक्षा को बढ़ावा दे़ने, कृषि, व्यापार, हस्तशिल्पों और तकनीकी प्रशिक्षण जैसे आदर्शों का पालन करने पर ज़ोर दिया। वे एक सफल लेखक थे जिन्होंने ईशावास्य उपनिषद् और तिरूक्कुरल के अनुवाद सहित 45 रचनाएँ प्रकाशित कीं, वह भारत के आध्यात्मिक गुरूओं की लंबी और प्रख्यात वंशावली में एक चमकता सितारा है। वह आधुनिक भारत के उन अत्यधिक प्रभावी संतों में से एक हैं जिन्होंने भारत के सामंजस्य स्थापित करने, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और विविधता के लिए आदर जैसे अद्वितीय दर्शन को बढ़ावा देने और उसका प्रचार करने का प्रयास किया है।
इस प्राचीन भारतीय दर्शन को संगीत, नृत्य, कला और वास्तुकला जैसे कला के विविध रूपों में व्यक्त किया गया है।
यह नारायण गुरूदेव जैसे संत-दार्शनिकों द्वारा लिखी गई कविताओं और दिए गए प्रवचनों के माध्यम से दिए गए संदेशों का मर्म है।
यह समाज सुधार के उन आंदोलनों का आधार है जो उन असमानताओं और दुष्क्रिय विकृतियों को हटाने की माँग करते हैं जो सामाजिक एकजुटता और प्रगति के लिए एक खतरा है।
यह एक ऐसा दर्शन है जिसकी गहरी आध्यात्मिक जड़ें रामायण और महाभारत, वेदों और उपनिषदों, पुराणों और इतिहास जैसे अमर महाकाव्यों में हैं और हाल में इसकी नरायण गुरूदेव जैसे संतों की रचनाओं में विस्तार से व्याख्या की गई है।
विश्व के प्रति भारत का दृष्टिकोण सभी जीवों में एकरूपता होने की भावना पर ही अनिवार्य रूप से केंद्रित है क्योंकि हम "वसुधैव कुटुंबकम" (संपूर्ण विश्व एक परिवार है) और "एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति" ( सत्य केवल एक है, हालांकि विद्वान लोग इसे कई तरीकों से व्यक्त करते हैं) में विश्वास रखते हैं। हम, जैसा कि ईशावास्य उपनिषद की आरंभिक पंक्तियों में लिखा है "ईशावास्यम इदं सर्वम" (संपूर्ण ब्रह्मांड देवत्व की अभिव्यक्ति है) में भी विश्वास रखते हैं।    
यदि आप इसे सामाजिक-राजनीतिक पहलू से देखेंगे तो, यह लोकतांत्रिक लोकाचार का मर्म है जहां प्रत्येक व्यक्ति उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि कोई दूसरा व्यक्ति। यह विविधता में एकता का और साथ ही साथ विविधतापूर्ण विश्व में एकत्व के उत्सव का अभिज्ञान है।
भारत में, हम पारंपरिक रूप से यह मानते हैं कि मानव अस्तित्व में एक जीवंत विविधता है और चूंकि इस ब्रह्मांड में प्रत्येक कण समान दैवी ऊर्जा से अनुप्राणित है, तो किसी के बीच किसी भी प्रकार का मतभेद नहीं होना चाहिए। विविधता हमारे अस्तित्व की समृद्धता को बढ़ाती है और हमारे जीवन में उत्साह भरती है। विश्व के प्रति यह दृष्टिकोण पारस्परिक सम्मान, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और सतत् एवं समावेशी रूप से प्रगति प्राप्त करने के लिए सहयोगपूर्ण प्रयास का मार्ग प्रशस्त करता है।
नारायण गुरूदेव की रचनाएँ वो स्तोत्र हैं जो एकत्व की इस भावना से गूंज रही हैं और इसीलिए मुझे इन दोनो खंडों का शीर्षक "नॉट मेनी, बट वन" बहुत उपयुक्त लगता है। नारायण गुरूदेव के अनुसार, सभी के लिए केवल "एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर है" (ओरू जाति, ओरू मथम, ओरू दैवम, मनुष्यनु)। अपने आस-पास हम जो विविधता देखते हैं उसमें एक मूलभूत एकता व्याप्त है जिसे हमें निरंतर महसूस करते रहना चाहिए।
नारायण गुरूदेव एक योगी हैं जिन्होंने इस ब्रह्मांड के उद्गम और अद्वैत के सिद्धांत अथवा इस विषय पर चिंतन किया कि आत्मा और परमात्मा के बीच कोई अंतर नहीं है। पेशे से एक भौतिकविज्ञानी और नारायण गुरूदेव के एक समर्पित शिष्य होने के नाते, इन दो खंडों के लेखक ने संत की अलौकिक अंर्तदृष्टि और भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में की गई नवीनतम खोज के बीच एक बहुत ही रोचक तुलना की है। वेदान्त, क्वांटम सिद्धांत से मेल खाते हुए प्रतीत होते हैं। अलौकिक अंर्तदृष्टि स्ट्रिंग सिद्धांत से संबंधित नवीनतम सिद्धांतों और बहु-विश्व अवधारणा से मिलती-जुलती है।
लेखक ने श्री नारायण को वेद व्यास और आदि शंकराचार्य जैसे महान आध्यात्मिक गुरूओं की श्रेणी में रखा है। वास्तव में, वह उक्त दोनों की तरह एक महान दार्शनिक और एक कुशल कवि हैं।
श्री नारायण गुरूदेव को विज्ञान और प्रौद्योगिकी की संभावना का सहजबोध था और उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी को शिवगिरी तीर्थयात्रा के अभिसमयों के एक अभिन्न अंग के रूप में शामिल किया जाना चाहिए। 
चाहे भौतिक विज्ञान हो या तत्वमीमांसा, खोज अंतहीन है। वैज्ञानिक अब तक ब्रह्मांड के केवल 4 से 5 प्रतिशत हिस्से का ही पता लगा पाए हैं। शेष 95 से 96 प्रतिशत को डार्क मैटर की श्रेणी में डाला गया है जिसमें से 73 प्रतिशत को डार्क एनर्जी और 23 प्रतिशत को डार्क मैटर के रूप में श्रेणीबद्ध किया गया है। आज से हजारो वर्ष पूर्व वेदों में ब्रह्मांड की विशालता का और इस बात का उल्लेख है कि ब्रह्मांड का अधिकांश भाग मनुष्य की समझ से परे है।
श्री नारायण गुरूदेव का आद्यरूप दर्शनम (दर्शनमाला) जिसमें ब्रह्मांड के सृजन की व्याख्या की गई है, दैव दशकम् और आत्मोपदेश सत्कम् इस बात के कुछ उदाहरण हैं कि आलौकिक अनुभवों व अंर्तदिृष्ट तथा भौतिकविज्ञान के क्षेत्र में हाल ही हुई प्रगति में बहुत समानता है।
नॉट मेनी, बट वन के यह दो खंड-नेहा नानस्ति- नारायण गुरूदेव के कार्यों का अमूल्य संकलन है जो एक असाधारण चित्त के गहन विचारों और गुरूदेव द्वारा प्राप्त की गई आध्यात्मिक उन्नतियों को प्रकट करते हैं। प्रो. शशिधरन ने अपनी विद्ववतापूर्ण टिपणियों और अंतर्विषयक दृष्टिकोण से संत के संदेशों को स्पष्ट किया है।
मुझे विश्वास है कि ये खंड आधुनिक भारत के एक श्रद्धेय संत-दार्शनिक-सुधारक के विचारों को जानने का एक माध्यम साबित हो सकते हैं।
समकालीन वैश्विक संदर्भ में, जहां कई देशों और समुदायों का सामाजिक ताना-बाना घृणा, हिंसा, कट्टरता, सांप्रदायिकता और अन्य विभाजनकारी प्रवृत्तियों के कारण बिखर रहा है, वहाँ गुरूदेव के सार्वभौमिक एकत्व के दर्शन की एक विशेष प्रासंगिकता है।
इस प्रकार की किताबें भारतीय सभ्यता के मूल्यों की जड़ों को और अधिक गहराई से समझने में योगदान दे सकती हैं। भारत और साथ ही साथ संपूर्ण विश्व के पाठकों को भारतीय दर्शन की असाधारण सार्वभौमिकता और व्यापकता की झलक देखने को मिलेगी। हमें अपने सांस्कृतिक इतिहास के समृद्ध खजाने की गहराइयों में जाकर ऐसे असंख्य रत्नों की बार-बार खोज करनी होगी।
यह जानकर खुशी हुई कि अपनी कई राष्ट्र निर्माण गतिविधियों के सिलसिले में कई दशा और दिशा निर्धारक संस्थाएं स्थापित करने वाले टाटा समूह ने इस उत्कृष्ट संकलन के प्रकाशन में भी सहायता की है। किसी न किसी तरीके से, इस तरह की किताबें वर्तमान और भावी पीढ़ियों को भारत की अंतर्आत्मा को समझने में मदद करती हैं। यह नागरिकों की एक ऐसी पीढ़ी का निर्माण करने में मदद करती है जो अपनी विरासत को लेकर अधिक जागरूक हैं।
मैं श्री कृष्ण कुमार जी का धन्यवाद करता हूँ कि उन्होंने मुझसे यह आग्रह किया कि आज मैं इन खंडों का विमोमच करूँ। इस बड़ी जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा से निभाने के लिए मैं प्रो. शशिधरन का अभिवादन करता हूँ। मैं टाटा ट्रस्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री श्रीनाथ और पेंग्विन प्रकाशन के श्री अनिल धरकर को विशाल भारतीय सांस्कृतिक खजाने में से सर्वश्रेष्ठ कृतियों का प्रचार प्रसार करने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के लिए बहुत धन्यवाद देता हूँ।

जय हिंद!”