21 जुलाई, 2019 को हैदराबाद में अमेरिकन दि एसोसिएशन ऑफ फिजिशियन ऑफ़ इंडियन ओरिजिन (एएपीआई) द्वारा आयोजित 13वें वैश्विक स्वास्थ्य सेवा शिखर सम्मेलन 2019 के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

हैदराबाद | जुलाई 21, 2019

"सर्वप्रथम मैं भारतीय मूल के चिकित्सकों के अमरकी संघ (एएपीआई) को आज हैदराबाद में इस वैश्विक स्वास्थ्य शिखर सम्मेलन का आयोजन करने के लिए बधाई देता हूँ।

मुझे यह बताया गया कि भारतीय अमरीकी चिकित्सा पेशेवरों के एक समूह द्वारा 1982 में स्थापित 'भारतीय मूल के चिकित्सकों के अमरीकी संघ (एएपीआई)' की परिकल्पना अमेरिका में विदेशी चिकित्सा स्नातकों को पेश आने वाले अप्रवासन और लाइसेसिंग संबंधी मुद्दों का समाधान करने के लिए की गयी थी।

मुझे यह जानकर खुशी हुई कि आज एएपीआई संयुक्त राज्य अमेरिका में सबसे बड़ा गैर-लाभकारी सजातीय चिकित्सा संगठन है जो 60,000 से अधिक कार्यरत चिकित्सकों और 20,000 चिकित्सा विद्यार्थियों, निवासियों और भारतीय मूल के अध्येताओं के हितों की रक्षा करता है।

यह वास्तव में उल्लेखनीय है कि एएपीआई के कई सदस्य शिक्षा क्षेत्र में अनेक नेतृत्वपूर्ण पदों पर हैं। मुझे यह जानकर खुशी हुई कि एएपीआई पूरे अमरीका में 160 से अधिक शाखाओं के नेटवर्क वाले एक व्यापक संगठन के रूप में कार्य करता है।

हमें वास्तव में अपने चिकित्सकों और स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों पर गर्व है जो दुनिया भर के देशों में अमूल स्वास्थ्य देखभाल सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। यह अनुमान लगाया गया है कि पूरे विश्व में भारतीय मूल के 1.4 मिलियन चिकित्सक हैं। मुझे बताया गया है कि संयुक्त राज्य अमरीका में किसी भी समय हर सात में से एक मरीज़ का भारतीय मूल के चिकित्सक द्वारा इलाज किया जाता है।

मैं एक ऊर्जावान निकाय होने, विधायी कार्य सूची हेतु अग्रणी भूमिका निभाने और न केवल अमरीका में बल्कि दुनिया भर में चिकित्सा देखभाल की प्रगति को प्रभावित करने के लिए एएपीआई की सराहना करता हूँ।

प्यारे भाइयों एवं बहनों,

आज, भारत विश्व में तीव्रतम गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है। हम सतत गति से वर्ष 2025 तक पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में बढ़ रहे हैं।

पूरे विश्व में युवाओं की सबसे बड़ी संख्या भारत में ही है, इसकी आधी आबादी 25 वर्ष से कम आयु के लोगों की है।

अगर देश को समृद्ध करना है और इसकी वास्तविक संभावनाओं को साकार करना है तो यह सबसे महत्वपूर्ण है कि हम सभी लोगों के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित करें।

महात्मा गाँधी ने एक बार कहा था, "सोने और चाँदी के टुकड़े नहीं, बल्कि स्वास्थ्य ही वास्तविक धन है।" ऐसे ही विचार का समर्थन करते हुए भगवान बुद्ध ने कहा कि "शरीर को अच्छे स्वास्थ्य में रखना हमारा कर्तव्य है। अन्यथा हम अपने विचारों में दृढ़ता और स्पष्टता नहीं रख सकते हैं।"

केवल एक स्वस्थ राष्ट्र ही प्रगतिशील और समृद्ध राष्ट्र हो सकता है।

ऐतिहासिक तौर पर भारत ज्ञान का प्रकाश-स्तम्भ रहा है। चिकित्सा की हमारी आयुर्वेद प्रणाली 5000 ईसा पूर्व पुरानी है। आइए हम अपने पूर्वजों के कुछ अमूल्य योगदान पर गौर करते हैं। आर्यभट्ट के "आर्यभट्टियम" को एक अत्यंत प्रभावशाली रचना माना जाता है: वराहमिहिर की पंचसिद्धांतिका भी इसी तरह की पथप्रदर्शक रचना है।

नि:संदेह, सुश्रुत को शल्य चिकित्सा के जनक के रूप में जाना जाता है। कणाद ऋषि ने कणाद सूत्र में पहली बार "अणु" का पदार्थ के एक अविनाशी कण के रूप में जिक्र किया और पतंजलि को योग का जनक माना जाता है।

चरक (ई.पू. तीसरी शताब्दी) आयुर्वेद के प्रमुख योगदानकर्ताओं में से एक थे। उन्हें चिकित्सा ग्रंथ, चरक संहिता के लेखक के रूप में जाना जाता है।

प्राचीन भारत में असंख्य प्रख्यात वैज्ञानिक थे जिन्होंने विश्व के वैज्ञानिक कोष को समृद्ध किया है।

अन्य प्रसिद्ध प्राचीन वैज्ञानिकों में जीवक और माधव शामिल हैं। जीवक को एक आदर्श आरोग्य साधक के रूप में जाना जाता है और माधव ने रोग-विनिश्चय लिखा जिसमें विभिन्न रोगों के साथ उनके कारणों, लक्षणों और जटिलताओं के बारे में बताया गया है।

हमें उनकी उपलब्धियों पर गर्व करने की और उन से विरासत में मिले ज्ञान को पूरी दुनिया के साथ साझा करने की आवश्यकता है।

आपको यह ढूँढने का प्रयास करना चाहिए कि क्या आयुर्वेद जैसी प्राचीन भारतीय चिकित्सा प्रणालियां कुछ वैकल्पिक समाधान प्रदान कर सकती हैं। मैं देश भर के चिकित्सा अनुसंधानकाओं से अनुसंधान पर ध्यान केन्द्रित करने का और चिक्तिसा क्षेत्र में पथप्रवर्तक प्रगति करने का आग्रह करता हूँ।

मैं आपसे आपके ज्ञान के आधार को व्यापक बनाने और अधिक क्षमता, विश्वास और संवेदना के साथ चिकित्सा कार्य करने का आग्रह करता हूँ।

जैसा कि आप सभी जानते हैं कि किसी समय भारत एक विश्वगुरू के रूप में जाना जाता था तथा पूरे विश्व में एक अग्रणी अर्थव्यवस्था थी। भारत सर्वश्रेष्ठ शिक्षण केन्द्रों का गढ़ था और पूरे विश्व से विद्धान नालन्दा, तक्षशिला और पुष्पगिरि में अध्ययन करने यहाँ आते थे।

नालन्दा विश्वविद्यालय, जो लगभग पाँचवी सदी में शुरू हुआ था, दुनिया का सबसे प्राचीनतम शिक्षण केन्द्र माना जाता है जबकि दुनिया भर में अन्य प्राचीन विश्वविद्यालयों की स्थापना इसके बहुत बाद हुई थी।

उदाहरणस्वरूप अल-करवियिन महाविद्यालय की स्थापना मोरक्को में 9वीं शताब्दी में बताई जाती है। इसी प्रकार, विश्व के अन्य हिस्सों में कुछ प्राचीन शिक्षण केन्द्रों जैसे मिस्र में अल-अजर विश्वविद्यालय, बगदाद में अल-निज़ामिया और इटली में बोलोग्ना विश्वविद्यालय की स्थापना बाद में हुई। साथ ही, जाने-माने विवविद्यालय जैसे पेरिस विश्वविद्यालय, इंग्लैंड में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, इटली में मॉन्टपीलियर विश्वविद्यालय, इंग्लैंड में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय और स्पेन में सलामांका विश्वविद्यालय की स्थापना भी बहुत बाद में हुई। मैं ये सब सिर्फ यह बताने के लिए कह रहा हूँ कि प्राचीन भारत ज्ञान और शिक्षा का मूल स्रोत था।

प्यारे भाइयों और बहनों, भारत ने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही विभिन्न स्वास्थ्य सूचकों पर महत्वपूर्ण प्रगति हासिल की है। उत्तरोत्तर सरकारों द्वारा लोगों के स्वास्थ्य और कुशल-क्षेम की उच्च प्राथमिकता प्रदान किए जाने के साथ औसत जीवन प्रत्याशा 69 वर्षों तक बढ़ गई है और संक्रामक मातृत्व नवजात शिशुओं और पोषण संबंधी बीमारियों के कारण भारत में रोग का बोझ वर्ष 1990 से 2016 के बीच 61 प्रतिशत से घटकर 33 प्रतिशत रह गया है।

देश भर में स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं की बढ़ती पहुँच, व्यापक स्वास्थ्य अभियानों, स्वच्छता अभियानों, भारत में सरकारी और निजी अस्पतालों की संख्या में और वृद्धि, बेहतर रोग प्रतिरक्षण और बढ़ती साक्षरता के कारण शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) और मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) से संबंधित स्वास्थ्य सूचकों में उल्लेखनीय सुधार हुए हैं।

भारत ने "आयुष्मान भारत" की भी शुरूआत की है जिसे विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना माना जाता है। इसके तत्वाधान में 10 लाख लोगों का इस योजना के अंतर्गत मुफ्त में इलाज किया जा चुका है।

भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र को कई प्रतिस्पर्धात्मक फायदे हैं जिसमें सुप्रशिक्षित चिकित्सा पेशेवरों के बड़े समूह से लेकर जेनेरिक दवा निर्माण में विशिष्टता प्राप्त समृद्ध फार्मा उद्योग, किफायती और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा प्रक्रियाएं शामिल हैं। भारत में शल्य चिकित्सा की लागत मूलत: संयुक्त राज्य अमरीका का और पश्चिमी यूरोप की तुलना में कम है जो भारत को स्वास्थ्य सेवा में पसंदीदा स्थान बनाता है। इतनी उन्नति के बावजूद हमें आगे एक लंबा और कठिन रास्ता तय करना है।

हमारा स्वास्थ्य क्षेत्र अभी भी अपर्याप्त सार्वजनिक व्यय, डॉक्टर और मरीज का कम अनुपात, अस्पतालों में फुटकर व्ययों का अधिक होना गामीण क्षेत्रों में अपर्याप्त बुनियादी अवसंरचना, स्वास्थ्य बीमा की पहुंच की कमी और अपर्याप्त निवारक तंत्रों की कमी से जूझ रहा है।

भारत में हम अर्हता प्राप्त चिकित्सकों विशेषकर विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या में भारी कमी का सामना कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल 2018 के अनुसार देश में लगभग 11,082 लोगों के लिए केवल एक ऐलोपैथिक सरकारी डॉक्टर उपलब्ध है, यह आँकड़े विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा अनुशंसित अनुपात 1:10 से 10 गुणा अधिक है।

500 चिकित्सा महाविद्यालयों में एमबीबीएस की लगभग 71000 सीटें है जबकि स्नातकोत्तर सीटे केवल 32000 ही हैं।

यह आवश्यक है कि हम इस भारी अंतर को पाटने के लिए और अधिक चिकित्सा महाविद्यालय खोलें और स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तरों पर सीटों की संख्या में वृद्धि कर प्रशिक्षित स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों की कमी को पूरा करें। हमें और 40,000 स्नातकोत्तर सीटों की आवश्यकता है ताकि कोई भी एमएमबीएस स्नातक विशेषज्ञता प्राप्त किए बिना नहीं रहे।

मैं दुनिया भर में काम कर रहे भारतीय मूल के सभी चिकित्सा पेशेवरों से आग्रह करता हूँ कि वे हमारी सरकार और शैक्षणिक संस्थाओं के साथ मिलकर भारतीय चिकित्सा शिक्षा को विश्व स्तर का बनाएं।

अगर हम स्वास्थ्य सेवा के लिए बुनियादी संरचना की बात करें तो इसमें भी शहरों और गांवों के बीच बड़ी असमानताएं हैं।

भारत में चिकित्सा हेतु लगभग 86 प्रतिशत भ्रमण ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के द्वारा किए जाते हैं जिसमें से अधिकांश लोगों को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल सुविधा प्राप्त करने के लिए लंबी दूरी की यात्रा करनी पड़ती है। इसके अलावा अस्पतालों में फुटकर व्यय कई लोगों को गहरे ऋण संकट में झोंक देते हैं।

इस संकट को कम करने के लिए हमें प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि यह किसी मरीज के लिए चिकित्सा प्रणाली के साथ प्रथम संपर्क बिंदु होता है। प्राथमिक स्वास्य सेवा केंद्र एक मजबूत एवं किफायती स्वास्थ्य सेवा प्रणाली का निर्माण करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मैं प्रवासी भारतीय डॉक्टरों से आग्रह करता हूँ कि वे अपने-अपने गांवों को गोद लें और वहाँ प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने में मदद करें।

आपके अपने गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा केंद्रों के कार्यों में सक्रिय रूप से रूचि लें। अपने प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा केंद्रों का दौरा करें, स्थिति को समझें, उनका मार्गदर्शन करें, यथासंभव उन्हें बेहतर बनाने में मदद करें।

हमारे प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा केंद्रों को मजबूत करने के साथ-साथ हमें न्वोनमेषकारी, परंपरागत प्रौद्योगिकी से इतर प्रौद्योगिकी समाधान जैसे टेलीमेडिसीन की संभावनाएं अवश्य तलाशनी चाहिए। मैकिन्से ग्लोबल संस्थान ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें उसने यह अनुमान लगाया है कि टेलीमेडिसीन प्रौद्योगिकी के कार्यान्वयन से प्रत्येक वर्ष 4-5 बिलियन डॉलर की बचत हो सकती है और भारत में परामर्श के लिए आने वाले बहिरंग रोगियों की संख्या आधी हो सकती है।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) पहले ही जम्मू-कश्मीर, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के सुदूर गांवों के साथ ही पूर्वोत्तर के सातों राज्यों के जनजातीय क्षेत्रों में टेलीमेडिसीन देने में सक्षम रहा है। हमें इस दायरे को देश में अन्य ग्रामीण क्षेत्रों एवं दुर्गम क्षेत्रों को शामिल करने की आवश्यकता है। एएपीआई जैसे संगठनों को भारत के दूर-दराज के इलाकों में स्थित अस्पतालों को टेलीमेडिसीन के नवीनतम उपकरण हासिल करने में मदद करनी चाहिए।

सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी की शक्ति का लाभ उठाकर स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं की व्यापक पहुंच को सुनिश्चित करने के लिए हाल ही में राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य खाके की शुरूआत की है।

टेलीमेडिसीन का उपयोग चिकित्सा के जटिल मामलों को सुलझाने के लिए भारत में प्रमुख सरकारी अस्पतालों और विदेशों के विशेषज्ञ डॉक्टरों एवं अस्पतालों के बीच परामर्श के लिए भी किया जा सकता है।

मेरे प्रिय भाईयों और बहनों

भारत जैसे देश में रोगों से बचाव पर ध्यान केंद्रित करने से स्वास्थ्य प्रणाली के बोझ को कम करने में सहायता मिलेगी।

हमें लागों को बीमारियों की रोकथाम के लिए उन्हें ऐसे अभ्यासों को अपनाने के प्रति संवेदनशील बनाने हेतु बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियानेां को आयोजित करना होगा। हमें उपचार दृष्टिकोण से हटकर स्वास्थ्य आधारित दृष्टिकोण अपनाना होगा, जो कि राष्ट्रीय स्वस्थ्य नीति, 2017 में स्पष्ट रूप से निर्धारित एक लक्ष्य है।

भारत अब चिंताजनक महामारी विज्ञान में परिर्वतन संचारी रोगों से गैर-संचारी रोगों, जीवन शैली संबंधी रोगों (एनसीडी) का सामना कर रहा है। आईसीएमआर भारत की राज्य स्तरीय रोग भार अध्ययन रिपोर्ट "भारत: राष्ट्र के राज्यों का स्वास्थ्य", के अनुसार गैर-संचारी रोगों (एनसीडीज़) के कारण हुई सभी मौतों का अनुमानित अनुपात वर्ष 1990 में 37.09 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2016 में 61.8 प्रतिशत हो गया है।

इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि इन रोगों से पीड़ित लोगों में से बड़ा अनुपात युवाओं का है।

मैं एएपीआई जैसे संगठनों से अनुरोध करता हूँ कि वे सरकार और भारत के निजी क्षेत्र के साथ गैर-संचारी रोगों से निपटने में उनके अभियान में सहयेाग करें व्यापक स्तर पर स्क्रिीनिंग कार्यक्रमों और जागरूकता अभियानों के आयोजन में सहयेाग करें। आपका ज्ञान और विशेषज्ञता गैर-संचारी रोगों से निपटने में भारत को इस संकट का समाधान करने के लिए उसके प्रयासों में मार्गदर्शन करने में सहायक होगा।

मेरा विचार है कि शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में एनसीडी निदानशालाएं स्थापित करने की आवश्यकता है और ऐसी निदानशालाओं की स्थापना में निजी क्षेत्र को एक अहम भूमिका निभानी होगी। मैं सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों के डॉक्टरों से यह आह्वान करना चाहूँगा कि वे अपने-अपने क्षेत्र के निकटतम विद्यालयों में जाकर स्वस्थ जीवन शैली अपनाने की आवश्यकता पर जागरूकता अभियानों का आयोजन करें। यह केवल डॉक्टरों की ही जिम्मेदारी नहीं है अपितु सामाजिक दृष्टि से स्वस्थ जीवन शैली के बारे में जागरूकता फैलाने में सहभागी बनना हम सभी की जिम्मेदारी है।

वास्तव में, गैर-संचारी रोगों के बढ़ते मामलों के संबंध में एक राष्ट्र व्यापी आंदोलन की शुरूआत करने की आवश्यकता है। इंडियन मेडिकल एसोशिएशन को लोगों के बीच विशेष रूप से विद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्रों के बीच शारीरिक गतिविधि विहीन जीवन शैली और अस्वास्थ्यकारी खान-पान की आदतों के कारण स्वास्थ्य को होने वाले नुकसान के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए आगे आना चाहिए।

एक अन्य क्षेत्र जहाँ ध्यान देने की आवश्यकता है वह है आपातकालीन चिकित्सा सुविधा। वर्ष 2025 तक, भारत में सड़क यातायात से होने वाली मौतों की संख्या वार्षिक रूप से 2,50,000 को पार करने की संभावना है। हमें देश में समय पर और उच्च गुणवत्ता वाली आपात स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराने के लिए निवेश करना होगा।

हमें प्रत्येक नागरिक को भी आपात प्राथमिक चिकित्सा सहायता और हृदय पुनरुत्थान चिकित्सा (सीपीआर) में प्रशिक्षित करना होगा। ऐसे प्रशिक्षण से बिना आपातकालीन सेवाओं की प्रतीक्षा के जीवन बचाने में मदद मिलेगी।

आपातकालीन चिकित्सा सुविधा में आपकी विशेषज्ञता के साथ-साथ आपको भारत में अंत: विषयी दृष्टिकोण के साथ मजबूत देशव्यापी आपातकालीन चिकित्सीय सेवा तैयार करने में योगदान देना चाहिए। आपको भारत में आपातकालीन चिकित्सा सेवा शिक्षा को सुदृढ़ बनाने में भी सहायता करनी चाहिए।

भारत अब बढ़ती एंटीबॉयोटिक प्रतिरोधी के रूप में एक बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है। विदेशों में कार्य कर रहे हमारे डॉक्टरों द्वारा प्राप्त किए गए बहुमूल्य अनुभव को अपने भारतीय सहयोगियों और इंडियन मेडिकल एसोसिशएशन के साथ साझा किया जा सकता है ताकि एंटीबॉयोटिक्स प्रतिरोधी से लड़ने के लिए एक प्रभावी कार्यनीति बनाई जा सके।

मैं विदेशों में कार्य कर रहे भारतीय डॉक्टरों से यह अनुरोध भी करना चाहूँगा कि क्षय रोग और मलेरिया जैसे उष्णकटीबंधीय रोगों से लड़ने सहित विभिन्न स्वास्थ्य मुद्दों के समाधान के लिए अनुसंधान और विकास में सहयोग करें। ऐसे सहयोग से इन रोगों के प्रभावी और शीघ्र उन्मूलन की भारत की इच्छा को बढ़ावा मिलेगा।

आप जिन देशों में रहते हैं वहाँ स्वच्छता, साफ-सफाई और पोषण जैसे क्षेत्रों में अनुसरण किए जाने वाले बेहतरीन कार्यों को भी साझा कर सकते हैं। अंत में, मैं आपसे जिस देश में आप रहते हैं वहाँ न केवल भारत की प्रेरक पहल को मजबूत बनाने बल्कि सभी के लिए स्वास्थ्य और तंदुरुस्ती को बढ़ावा देने के लिए भी योग को बढ़ावा देने का आग्रह करता हूँ।

मेरे प्यारे बहनों और भाईयों,

लेकिन मैं वास्तव में भारत के पोषित आदर्श, 'वसुधैव कुटुंबकम' यानि विश्व एक बड़ा परिवार है, में विश्वास करता हूँ। हम न केवल भारत के लिए बल्कि पूरे विश्व के कल्याण, खुशहाली और शांति की प्रार्थना करते हैं।

आपकी 'कर्मभूमि' भले ही आपकी 'जन्मभूमि' से काफी अलग हो लेकिन अपनी 'जन्मभूमि' से जुड़े रहें और इसके कल्याण के लिए अनवरत कार्य करते रहें।

मैं एक बार फिर से आपको इस वैश्विक सम्मेलन का आयोजन करने के लिए बधाईयाँ देता हूँ और आप सभी को आपके भविष्य के लिए शुभकामनाएँ देता हूँ।

धन्यवाद!

जय हिन्द!"