21 जनवरी, 2021 को हैदराबाद से वस्त्र निर्यात संवर्धन परिषद (एईपीसी) के वर्चुअल प्लेटफार्म का उद्घाटन करने के उपरांत भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

हैदराबाद | जनवरी 21, 2021

“आज वस्त्र निर्यात संवर्धन परिषद (एईपीसी) के वस्त्र उत्पादों के लिए वर्चुअल प्लैटफॉर्म का उद्घाटन करते हुए मुझे निस्संदेह प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। महामारी के इस दौर ने, केवल वर्चुअल प्लैटफॉर्म के माध्यम से ही निर्यात संवर्धन कार्यक्रमों को बढ़ावा देना अनिवार्य बना दिया है। इस संदर्भ में, एईपीसी द्वारा एक वर्चुअल प्लैटफॉर्म की पहल करना अत्यंत सराहनीय कार्य है। मुझे विश्वास है कि यह विश्व भर में भारतीय वस्त्र निर्यात को बढ़ावा देने में अत्यंत सफल सिद्ध होगा।
प्रिय बहनों और भाइयों,
लगभग पैंतालीस मिलियन लोगों को प्रत्यक्ष रोज़गार प्रदान करते हुए, वस्त्र उद्योग भारत का दूसरा सबसे बड़ा नियोक्ता है। यह केवल कृषि क्षेत्र के बाद आता है। वस्त्र उद्योग के अंतर्गत, परिधान क्षेत्र, अपने आप में ही लगभग 12.9 मिलियन लोगों को रोज़गार प्रदान करता है तथा इस उद्योग में कार्यरत लोगों में अधिकतर महिला श्रमिक सम्मिलित हैं।
परिधान उद्योग भारत के लिए विदेशी मुद्रा अर्जित करने वाला एक बहुत ही महत्वपूर्ण उद्योग है। स्वदेशी वस्त्र एवं परिधान उद्योग भारत की जीडीपी में 2.3 प्रतिशत का योगदान देता है, देश के औद्योगिक उत्पादन में 7 प्रतिशत का योगदान देता है और देश की नियति आय में 12 प्रतिशत का योगदान करता है। ये आंकड़े हमारी वृहद अर्थव्यवस्था के लिए इस क्षेत्र के विशेष महत्व को दर्शाते हैं।
भारत के लिए वस्त्र उद्योग केवल विदेशी मुद्रा के स्रोत के रूप में अथवा श्रम अवशोषण के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है। वास्तव में, यह भारत की समृद्ध और गौरवशाली विरासत का एक अंग है।
प्राचीन काल में, भारतीय कपड़े अपनी बेहतर गुणवत्ता और उत्तम शिल्प कौशल के लिए विश्व प्रसिद्ध थे। उस समय भारतीय कपड़ों की सबसे अधिक मांग थी। इसे प्राप्त करना समृद्धि और गौरव का प्रतीक माना जाता था।
हालांकि, औपनिवेशिक युग की शुरूआत होने पर इस जीवंत क्षेत्र में गिरावट देखी गई। किसानों द्वारा कड़े भूमि करों का भुगतान किए जाने के कारण, बुनकरों को संरक्षण का अभाव होने के कारण तथा निर्यातकों पर भारी निर्यात शुल्क लगाए जाने के कारण भारतीय वस्त्र एवं परिधान क्षेत्र में गिरावट आई और अंत में, भारतीय बाज़ार में ब्रिटेन से आने वाले मशीन-निर्मित कपड़ों की बाढ़ ने स्वदेशी क्षेत्र को बहुत बड़ा झटका दिया।
भारतीय अर्थव्यवस्था और जीवन-शैली में वस्त्रों की महत्ता का आकलन हमारे स्वाधीनता संग्राम के दौरान, इसके द्वारा निभाई गई भूमिका, जिसकी शुरुआत "स्वदेशी आंदोलन" से हुई, से भी किया जा सकता है। राष्ट्रवादियों द्वारा "स्वदेशी" कपड़ों के उपयोग का आह्वान, संभवत: भारत के "आत्मनिर्भरता" की ओर बढ़ते कदम के रूप में देखा जा सकता है। चरखे पर की जाने वाली खादी की कताई, स्वराज़ प्राप्ति के लिए एक महान प्रतीक बन गई और राष्ट्रीय चेतना के अभ्युदय का कारण बनी। इसने गरीबों और अमीरों, किसानों और कारीगरों, तथा सभी क्षेत्र के लोगों को जोड़कर उन्हें एकजुट कर दिया।
प्रिय बहनों और भाइयो,
यद्यपि, इस क्षेत्र की प्रकृति और मांगें समय के साथ बदल गई हैं, परंतु यह अभी भी हमारी अर्थव्यवस्था पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है। यह व्यापक रूप से माना जाता है कि, परिधान क्षेत्र सबसे अधिक श्रम-प्रधान क्षेत्र है और कुशल श्रमशक्ति को रोज़गार प्रदान करता है। यह क्षेत्र हमारे जनसांख्यिकीय लाभांश की क्षमता का दोहन करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है क्योंकि प्रत्येक वर्ष लाखों युवाओं को इससे संबंधित बाजार में रोज़गार प्राप्त होगा।
परिधान क्षेत्र महिलाओं को रोज़गार प्रदान करने में भी सबसे अग्रणी है और इस क्षेत्र में महिलाओं का वर्चस्व है। कुछ अनुमानों के अनुसार, महिलायें कुल श्रम शक्ति का 70 प्रशित है। मित्रों, महिलाओं के लिए इन अवसरों के माध्यम से, यह क्षेत्र, दूरदराज के इलाकों में सामाजिक परिवर्तन का सच्चा कारक सिद्ध हो सकता है और यह ग्रामीण क्षेत्रों में महिला श्रम शक्ति की कम भागीदारी को बढ़ा सकता है तथा महिलाओं और बच्चों को आर्थिक रूप से सशक्त बना सकता है। अध्ययनों से पता चला है कि, इस क्षेत्र के विस्तार से महिलाओं की शिक्षा और कुल प्रजनन दर में सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं।
परिधान क्षेत्र की पूर्ण क्षमता का दोहन करने के लिए हमें इस क्षेत्र के समक्ष उपस्थित चुनौतियों को पहचानने और उन्हें दूर करने की आवश्यकता है। वास्तव में, इन चुनौतियों को हमें उन अवसरों के रूप में देखना चाहिए जिनका दोहन किया जा सकता है।
प्रचुर मात्रा में कच्चे माल की उपलब्धता, कुशल श्रम शक्ति और वस्त्र मूल्य श्रृंखला के हर खंड में विनिर्माण की मौजूदगी के रूप में भारत को निश्चित रूप से वस्त्र क्षेत्र में एक प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त हासिल है। उदाहरण के लिए, भारत कपास और जूट का सबसे बड़ा उत्पादक है और विश्व में मानव निर्मित फाइबर और रेशम का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। सूती धागों के उत्पादन में भी हमारी एक सशक्त वैश्विक पहचान है। परंतु, कपड़े और परिधान के क्षेत्र में हम प्रतिस्पर्धात्मक दृष्टि से कमजोर हैं।
चीन और बांग्लादेश जैसे देश भारतीय धागों के सबसे बड़े खरीदार हैं। वे संवर्धित मूल्य के साथ इन परिधानों और कपड़ों को भारत की तुलना में कम कीमत पर बेचते हैं। भारत के 5 प्रतिशत से 6 प्रतिशत की तुलना में, सूती कपड़ों में चीन की हिस्सेदारी 51 प्रतिशत है। भारत में बुनाई-क्षेत्र के असंगठित होने और बिखरे हुए होने के कारण ही ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई है।
लघु उद्योगों को ठोस सहायता की आवश्यकता है और हमारे वैश्विक प्रतिस्पर्धियों के बराबर आने के लिए इनकी गुणवत्ता में सुधार और बेहतरी के लिए सहायता की जानी चाहिए। एक और मुद्दा जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है वह है, कम उत्पादकता एवं गुणवत्ता स्तर वाली पुरानी एवं अप्रचलित तकनीक का उपयोग जारी रखना। मैं, लघु उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए, संशोधित प्रौद्योगिकी उन्नयन कोष योजना (एटीयूएफएस) के माध्यम से इस क्षेत्र की सहायता करने के लिए सरकार की सराहना करता हूँ। यह एक उत्कृष्ट योजना है और दूसरी और तीसरी श्रेणी के शहरों की फर्मों को इस योजना का लाभ पहुँचाने के लिए सम्मिलित प्रयास किए जाने चाहिए।
इसी प्रकार, वस्त्र श्रमिकों के कौशल को बढ़ाए जाने वाले कार्यक्रमों को भी बड़े पैमाने पर आयोजित किया जाना चाहिए। इस तरह, हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि हमारी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता केवल तकनीक और सस्ते श्रम तक सीमित नहीं होगी। बांग्लादेश और वियतनाम हमारे उत्पादों को कड़ी प्रतिस्पर्धा दे रहे हैं क्योंकि उन देशों में सस्ता श्रम उपलब्ध है, तो हमारी प्रमुख शक्ति, हमारी कुशल श्रम शक्ति होनी चाहिए।
राज्य सरकारों को भी प्रोत्साहन देकर और निर्बाध, गुणवत्तापूर्ण बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करते हुए इस प्रयास में भागीदारी निभानी चाहिए जो इस क्षेत्र के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय रही है। वस्त्र उद्यमियों को अपनी ओर से, बदलती वैश्विक मांगों के अनुरूप अपने विनिर्माण में विविधता लानी चाहिए और नए बजारों का दोहन करना चाहिए।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि जब तक परिधान फर्मों का औसत आकार नहीं बढ़ता, ये फर्में नवीनतम तकनीकों को नहीं अपनाती और कुशल श्रमशक्ति नहीं प्राप्त करती, तब तक हम प्रतिस्पर्धी मूल्य पर गुणवत्तापूर्ण वस्तुओं का विनिर्माण नहीं कर सकते। केवल इसी प्रकार, हम इस उद्योग का रोज़गार प्रदान करने और आर्थिक दृष्टि से निहित क्षमता का संपूर्ण दोहन कर सकेंगे। इस वर्ष, नीति आयोग की प्रस्तावित परियोजनाओं में से एक वस्त्र मंत्रालय के साथ मिलकर कपड़ा और परिधान दोनों क्षेत्रों में हमारे निर्यात को बढ़ावा देने के लिए मेगा वस्त्र फर्मों की स्थापना करना है। यह एक स्वागत योग्य पहल है। मैं निजी क्षेत्र को सरकार के साथ भागीदारी करने और निर्यात में सुधार के लिए वस्त्र क्षेत्र में नव परिवर्तन लाने का आह्वान करता हूँ।
भाइयों और बहनों,
अपनी निर्यात प्रतिस्पर्धाओं में सुधार करते हुए हम उन क्षेत्रों में पिछड़ नहीं सकते जो हमारे वस्त्र उद्योग के लिए पारंपरिक नहीं हैं। शुरूआत में, मानव निर्मित फाइबर्स (एमएमएफ) और तकनीकी वस्त्रों को लेकर एक झिझक थी। हमें इस झिझक को दूर करना चाहिए और अपने श्रमिकों और उद्यमियों को इस क्षेत्र के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
भौतिक विज्ञान में प्रगति के साथ तकनीकी वस्त्र भविष्य के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होंगे, ऐसी अपेक्षा की जा रही है। तकनीकी वस्त्रों का वैश्विक बाज़ार 2022 तक 220 बिलियन अमरीकी डॉलर तक पहुंचने की संभावना है। भारत अभी भी इस क्षेत्र में लगभग 4 प्रतिशत का हिस्सेदार है। हमें नये उद्यमियों को प्रोत्साहित करते हुए इस हिस्सेदारी को बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि हम अंतर्राष्ट्रीय बाजारों की तलाश कर सकें और सक्रिय कदम उठा सकें। हाल ही में घोषित एमएमएफ और तकनीकी वस्त्र क्षेत्र के लिए उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना इसके लिए सकारात्मक सिद्ध होगी।
बहनों और भाइयों,
मुझे, महामारी के इस दौर में चिकित्सीय वस्त्रों (पीपीई किट, फेस शील्ड, मास्क एवं दस्ताने) के उत्पादन और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए आप सभी को और वस्त्र मंत्रालय को बधाई देनी चाहिए। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप, भारत आज पीपीई किट के विनिर्माण में विश्व में दूसरे स्थान पर है।
इसी उद्यमशीलता की भावना के साथ एईपीसी ने निर्यात संवर्धन कार्यक्रमों के आयोजन के लिए अपना वर्चुअल प्लैटफॉर्म बनाया है। मुझे यह जानकर प्रसन्नता हो रही है कि यह प्लैटफॉर्म 24 घंटे और हरेक दिन सक्रिय रहेगा और खरीददार वर्ष भर भारतीय निर्यातकों के साथ बातचीत कर सकेंगे।
मैं महामारी के दौरान, चुनौतियों को कम करने और छोटे व्यापारियों एवं निर्यातकों को दी गई सहायता के लिए वस्त्र मंत्रालय की भूमिका की भी सराहना करता हूँ।
मुझे विश्वास है कि इन सभी प्रयासों से भारतीय वस्त्र के निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। हमें जल्दी ही कपड़ा निर्यात में अपनी हिस्सेदारी मौजूदा 5-6 प्रतिशत से बढ़ाकर दहाई अंक में करने की आकांक्षा रखनी चाहिए।
मैं एक बार पुन:, इस प्लैटफार्म के शुभारंभ पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करता हूँ। मुझे इस पहल के लिए एईपीसी के अध्यक्ष डॉ. ए. शक्तिवेल और उनकी टीम को अवश्य बधाई देनी चाहिए, क्योंकि "आत्मनिर्भरता" की ओर यह एक और मील का पत्थर साबित होगा। आशा है कि इससे कई और इस तरह की पहल आरंभ करने हेतु प्रेरणा मिलेगी और दूसरों के लिए अनुकरण करने योग्य उत्तम परिपाटी भी विकसित होगी।

जय हिन्द!”