20 अगस्त, 2020 को नई दिल्ली में इंडियन एसोसिएशन ऑफ पार्लमेन्टेरीअन फॉर पॉपुलेशन एंड डेवलपमेंट (आईएपीपीडी) द्वारा लाई गई दो रिपोर्टों का विमोचन करने के बाद सभा में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | अगस्त 20, 2020

मुझे इंडियन एसोसिएशन ऑफ पार्लियामेंटर्स फॉर पॉपुलेशन एंड डेवलपमेंट (आईएपीपीडी) की दो रिपोर्टों, "भारत में जन्म के समय लिंग अनुपात की स्थिति," जिसमें जनसंख्या में महिलाओं और पुरुषों की संख्या में असंतुलन का उल्लेख किया गया है और "भारत में बुजुर्गों की संख्या": स्थिति और सहायता प्रणाली ", जिसमें देश में बुजुर्ग आबादी के मुद्दों पर प्रकाश डाला गया है और उनकी दुर्दशा में सुधार के लिए कुछ उपयोगी सिफारिशें की गई हैं, का विमोचन करते हुए प्रसन्नता हो रही है।

इस रिपोर्ट में आज देश के समक्ष उत्प/न्न दो अत्यधिक महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों को शामिल किया गया है। इन मुद्दों को उठाने और अपने समर्थन में निर्वाचित प्रतिनिधियों को शामिल करने के लिए मैं आईएपीपीडी और इसके अध्यक्ष प्रो. पी. जे. कुरियन, पूर्व उप सभापति राज्यसभा को बधाई देता हूं।

मैं विशेषज्ञों डॉ. पी.पी. तलवार, डॉ. सुदेश नांगिया और डॉ. जे.एस. यादव को भी बधाई देता हूं, जिन्होंने तत्संबंधी विस्तृत अध्ययन को कम अवधि के भीतर पूरा करने के लिए जबरदस्त प्रयास किया है।

मेरे प्यारे भाइयों और बहनों,

वैश्विक स्तर पर 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या बढ़ रही है।

जापान, रूस, जर्मनी, ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों में आबादी तेजी से उम्रदराज हो रही है, जिससे यह पता चलता है कि दुनिया में उम्रदराज आबादी से संबंधित कई चुनौतियां हैं।

यह वास्तव में अत्यधिक संतोष की बात है कि गत कुछ दशकों के दौरान भारत में जीवन प्रत्याशा काफी बढ़ गई है। इससे बुजुर्ग आबादी के अनुपात में वृद्धि हुई है। हमारी बुजुर्ग आबादी 2050 में 300 मिलियन से अधिक होने की संभावना है और यह कुल आबादी का लगभग 20 प्रतिशत होगा।

हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारे बुजुर्ग स्वस्थ, सामाजिक रूप से व्यस्त, आर्थिक रूप से सुरक्षित और उत्पादक बने रहें।

जब मैं बुजुर्गों की उपेक्षा, परित्याग या दुर्व्यवहार की खबरें सुनता हूं तो अत्यधिक व्यथित महसूस करता हूं। कुछ मामलों में, बुजुर्ग महिलाओं की स्थिति और भी खराब है। इस बात पर गौर करके मुझे अत्यधिक पीड़ा होती है कि इस तरह की घटनाएं माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 जैसे कानूनों के विद्यमान होने के बावजूद हो रही हैं। यह पूरी तरह से अस्वीकार्य प्रवृत्ति है।

समाज के रूप में, हम बुजुर्गों के अत्यधिक आभारी हैं। हम उनके संकल्प और परिश्रम का फल आज भोग रहे हैं। उनकी देखभाल और कल्याण सुनिश्चित करने का उत्तरदायित्व मुख्यत: परिवार का होता है।

हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि हमारी ऐसी सभ्यता है जिसमें बुजुर्गों का सदैव सम्मान किया गया है। हमने सदैव अपने बुजुर्गों को समाज में सबसे सम्मानित और सम्मानजनक स्थान दिया है। जिस तरह से एक समाज अपने वरिष्ठ नागरिकों के साथ व्यवहार करता है वह उसकी संस्कृति और लोकाचार का प्रतिबिंब होता है।

हमारे प्राचीन ग्रंथों में से एक मनु स्मृति में यह कहा गया है:

"यदि कोई निष्ठापूर्वक बुजुर्गों की सेवा करता है, तो उसे दीर्घायु, अच्छी शिक्षा, प्रसिद्धि और शक्ति प्राप्त होती है।"

हमें अतीत के इन गूढ़ विचारों से प्रेरणा लेनी चाहिए और बुजुर्गों का सामाजिक तौर पर सम्मान करना चाहिए।

हमारी पारंपरिक संयुक्त परिवार प्रणाली के अन्तर्गत, हमारे बुजुर्गों को श्रद्धा एवं सम्मान का स्थान प्रदान किया गया है। वे धार्मिकता, परंपराओं, पारिवारिक सम्मान और संस्कार के संरक्षक होते हैं।

हालांकि, शहरीकरण के साथ-साथ एकल परिवारों के तेजी से प्रसार के कारण अंतर-पीढ़ीगत संबंध कमजोर हो गए हैं। संयुक्त परिवारों में बच्चों को पुरानी पीढ़ियों की स्नेही देखभाल, प्यार, ममता, संरक्षण, विवेक और मार्गदर्शन मिलता है।

यही कारण है कि हमें सदियों पुरानी संयुक्त परिवार प्रणाली को बढ़ावा देते हुए उसे संरक्षित करना चाहिए। भारत को अपनी पारंपरिक पारिवारिक प्रणाली को पुनर्जीवित करना चाहिए और अन्य देशों के लिए एक आदर्श स्थापित करना चाहिए। विचारों को साझा करना और देखभाल करने जैसे मूल्य सदैव हमारी संस्कृति के मूल में रहे हैं।

बुजुर्गों की देखभाल करना एक सामाजिक जिम्मेदारी भी है। इसे पुन: सामाजिक मानक बनाया जाना चाहिए।

मुझे खुशी है कि सरकार ने बुजुर्गों के कल्याण के लिए वरिष्ठ पेंशन बीमा योजना, वरिष्ठ नागरिकों के लिए एकीकृत कार्यक्रम और बुजुर्गों के स्वास्थ्य के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम, रेलवे और विमान सेवाओं की यात्रा में रियायतें देने के अलावा कई योजनाएं शुरू की हैं।

लेकिन अभी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। जीवन प्रत्याशा में सुधार के कारण, बुजुर्ग अब 60 की उम्र से परे 17 - 20 साल तक जीवित रहते हैं।

कई 60 साल की उम्र के बाद भी पेशेवर रूप से सक्रिय रहते हैं और वे पूर्णकालिक या अंशकालिक तौर पर काम करते रहते हैं। इसलिए हमें अपनी बुजुर्ग आबादी को नए युग के कौशलों से सज्जित करने पर विचार करना चाहिए ताकि वे पूर्ण तौर पर व्यावसायिक जीवन व्यतीत करते हुए राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान कर सकें।

हमें यह याद रखना चाहिए कि यदि युवा राष्ट्र के 'जनसांख्यिकी लाभांश' हैं, तो वरिष्ठ नागरिक 'जनसांख्यिकीय पारितोषिक' हैं। बुजुर्गों को चिकित्सा लाभ प्रदान करके और उनके लिए बीमा कवरेज सुनिश्चित करके उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हमारी स्वास्थ्य प्रणाली का तत्काल पुनर्निर्धारण करने की आवश्यकता है।

सामाजिक मोर्चे पर, रिश्तेदारों के अलावा पड़ोसियों, स्थानीय गैर-सरकारी संगठनों और पुलिस कर्मियों को बुजुर्गों विशेष तौर पर एकल महिलाओं, दिव्यांगजनों तथा रुग्ण परिस्थितियों से ग्रसित लोगों की सामाजिक और भावनात्मक आवश्यकताओं की देखभाल करने के लिए संवेदनशील और प्रशिक्षित किए जाने की आवश्यकता है।

सार्वजनिक और सामुदायिक स्थलों को भी बुजुर्गों के अनुकूल विकसित किए जाने की आवश्यकता है। बुजुर्गों को लंबे समय तक कतार में खड़ा नहीं किया जाना चाहिए और बैंकों जैसी जगहों पर उनके लिए अलग काउंटर स्थापित किए जाने चाहिए।

मैं आईएपीपीडी से आग्रह करता हूं कि वरिष्ठ नागरिकों के जीवन को खुशहाल और उत्पादक बनाने के लिए संबंधित हितधारकों के साथ इन मुद्दों का समर्थन करने के लिए निर्वाचित प्रतिनिधियों को संवेदनशील बनाएं। मुझे यकीन है कि यह अत्यधिक गहन जानकारी प्रदान करने वाली रिपोर्ट हमारे बुजुर्गों के सामने आने वाली चुनौतियों को उजागर करने और इनका उपयुक्त और स्थायी समाधान खोजने में दूरगामी प्रभाव वाली साबित होगी।

आईएपीपीडी की दूसरी रिपोर्ट एक अन्य बहुत महत्वपूर्ण सामाजिक संकेतक, जन्म के समय लिंग अनुपात (एसआरबी) से संबंधित है।

लंबे समय से, भारत कम होते लिंग अनुपात की समस्या से जूझ रहा है। हम जानते हैं कि जन्म लेने वाली बालिकाओं की संख्या सामान्य या प्राकृतिक मानदंड से काफी कम है। हमारे देश में प्रत्येक 100 बालिकाओं की तुलना में 110 से अधिक बालक पैदा हुए हैं। 2011 की जनगणना में उल्लेख किया गया है कि भारत में प्रत्येक 1000 पुरुषों की तुलना में 940 महिलाएँ थी। यह कम होता लिंग अनुपात एक मूक आपातकाल है और इसके गंभीर परिणाम होंगे, जिससे हमारे समाज की स्थिरता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

पीसी-पीएनडीटी अधिनियम को कड़ाई से लागू किए जाने के बावजूद, हमें लिंग चयनात्मक गर्भपात की रिपोर्ट प्राप्त होती रहती हैं। इस बुराई को समाप्त करने का एकमात्र तरीका एक ऐसे समाज का निर्माण करना है, जो सभी प्रकार के लैंगिक भेदभाव से मुक्त हो। लोगों की मनोदशा को बदलने की जरूरत है और यह कार्य घर से शुरू होना चाहिए। लड़कों को लड़कियों के साथ सम्मान और शिष्टाचार के साथ पेश आने का सलीका सिखाना चाहिए।

सरकार की दूरदर्शी योजनाओं जैसे बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और सुकन्या समृद्धि योजना में बालिकाओं की सुरक्षा और उनको बढ़ावा देने की आवश्यकता पर अत्यधिक बल दिया गया है। लेकिन अभी इस दिशा में काफी कार्य किए जाने की आवश्यकता है।

स्कूलों में बच्चों को नैतिक शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए ताकि वे बड़े होकर ऐसे जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक बनें, जो लैंगिक भेदभाव को अनैतिक मानते हों।

सभी बालिकाओं के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करते हुए कन्या भ्रूण हत्या और दहेज पर प्रतिबंध लगाने वाले कानूनों को कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए। महिलाओं को संपत्ति में एक समान हिस्सा दिया जाना चाहिए ताकि वे आर्थिक रूप से सशक्त हों। हमें संसद और सभी राज्य विधानमंडलों में महिलाओं के लिए पर्याप्त आरक्षण सुनिश्चित करना चाहिए और मैं सभी राजनीतिक दलों से इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर जल्द से जल्द आम सहमति बनाने का आग्रह करता हूं। यदि महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त नहीं किया गया, तो देश की प्रगति बाधित होगी।

लिंग अनुपात में अत्यधिक असंतुलन वाले जिलों पर निर्वाचित प्रतिनिधियों को अधिक ध्यान देना चाहिए। आईएपीपीडी को लिंग अनुपात और अन्य सामाजिक संकेतकों में संतुलन बनाने के लिए ऐसे जिलों के निर्वाचित प्रतिनिधियों को शामिल करने हेतु महिला और बाल विकास मंत्रालय तथा नीति आयोग के साथ मिलकर कार्य करना चाहिए।

मैं देश की विकास गतिविधियों में भूमिका निभाने के लिए आईएपीपीडी की सराहना करता हूं। ऐसे अध्ययन और उनकी सिफारिशें महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों का समाधान करने की दिशा में दूरगामी प्रभाव वाली होंगी।

मुझे इस बात पर गौर करके खुशी हुई है कि आईएपीपीडी का मुख्य जोर जनसंख्या और विकास इस बात पर गौर करके है। हमें जनसंख्या और विकास के बीच के संबंध को पहचानना चाहिए।

विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया है कि 2036 तक भारत की जनसंख्या बढ़कर 1.52 बिलियन तक हो जाएगी (2011 के संदर्भ के अनुसार इसमें 25 प्रतिशत वृद्धि)। शहरी आबादी वर्ष 2011 में 31.8 प्रतिशत की तुलना में वर्ष 2036 तक बढ़कर 38.2 प्रतिशत होने का अनुमान लगाया गया है।

जैसे-जैसे जनसंख्या का आकार बढ़ता है, विकास की चुनौतियाँ अधिक जटिल होती जाती हैं और उनका समाधान करना कठिन होता जाता है। जीवन की समुचित गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए हमें और अधिक वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है। यदि हम परिवारों को छोटे परिवार के आदर्श को अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर सकें तो बुनियादी सेवाओं के परिदान को बेहतर बनाने के साथ ही गरीबी के स्तर में कमी करना संभव हो पाएगा। जैसा कि प्रधान मंत्री नरेंद्रभाई मोदी ने पिछले वर्ष अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में कहा था कि जो लोग छोटे परिवार की नीति का पालन करते हैं, वे राष्ट्र के विकास में योगदान करते हैं और यह "राष्ट्र के प्रति उनके प्रेम की अभिव्यक्ति" है।

राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों को इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और लोगों को शिक्षित करना चाहिए।

हमारे देश में विकास संबंधी असंख्य चुनौतियां हैं। आईएपीपीडी जैसे संगठनों को इन मुद्दों के बारे में अधिक जागरूकता पैदा करते हुए उनका समाधान करने के लिए संभावित रणनीतियों को बनाना चाहिए।

इसके लिए निर्वाचित जन-प्रतिनिधियों सहित सभी हितधारकों द्वारा प्रतिबद्ध, ठोस कार्रवाई किया जाना अपेक्षित है। सांसदों को इन कार्यों के लिए प्रबुद्ध, सुविज्ञ नेतृत्व प्रदान करना होगा।

गरीबी, अशिक्षा और लैंगिक भेदभाव जैसी सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए मैं जन-प्रतिनिधियों, नीति नियंताओं, राजनीतिक दलों और अन्य महत्वपूर्ण हितधारकों से इन पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता पर बल देता हूं। देश की तेजी से प्रगति करने के लिए इन मुद्दों का युद्ध स्तर पर समाधान किए जाने की आवश्यकता है।

प्राथमिकता के तौर पर, मेरा सुझाव है कि उन्हें भारत सरकार द्वारा अभिनिर्धारित 110 महत्वाकांक्षी जिलों के कार्यक्रमों और योजनाओं पर कार्य करना चाहिए।

मैं पुन: आईएपीपीडी, इसके अध्यक्ष प्रो. पी. जे. कुरियन और उनकी टीम के सदस्यों को उनके कार्यों के लिए बधाई देता हूं।

धन्यवाद!

जय हिन्द!