19 मई, 2019 को आंध्र प्रदेश के गुंटूर में एमयूएलएलएआरपी तथा एआईआरडी लेग्यूम्स 2019 की वार्षिक समूह बैठक का उद्घाटन करने के बाद सभा में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु का संबोधन

गुन्टूर, आन्ध्र प्रदेश | मई 19, 2019

"मैं एमयूएलएलएआरपी एवं एरिड लेग्यूम्स कार्यशाला के संबंध में अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान समूह की वार्षिक समूह बैठक के उद्घाटन सत्र में भाग लेकर प्रसन्नता का अनुभव कर रहा हूँ।

जैसा कि आप सभी जानते हैं, सूखे अनाज के लिए उगाई जाने वाली फलियों को दलहन के रूप में वर्गीकृत किया जाता है जो सामान्य रूप से विश्व भर में और विशेष रूप से भारत में, जहां अधिकांश लोग शाकाहारी हैं, पादप आधारित प्रोटीनों, विटामिनों तथा खनिज लवणों का महत्वपूर्ण और सस्ता स्रोत है।

ऐतिहासिक रूप से दालें भारतीय फसल और उपभोग प्रतिमान का सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटक रही हैं। दलहन फसलें हमारी कृषि प्रणाली, विशेषकर शुष्क भूमि कृषि की एक अद्वितीय विशेषता है। वे मानव उपभोग के लिए खाद्य प्रदार्थ, पशुओं के लिए हरित पोषक चारा उपलब्ध कराते हैं तथा जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण के द्वारा मृदा को समृद्ध बनाते हैं।

फलियां न केवल प्रोटीन का एक बढ़िया स्रोत है बल्कि पशु प्रोटीन की तुलना में सस्ती भी है। इसके अतिरिक्त दालें कुछ एमिनो एसिड का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं और ऐसा कहा जाता है कि ये कोलेस्ट्रल तथा रक्त शर्करा के स्तर को कम करती हैं।

कुछ फलियों में औषधीय तथा उपचारात्मक गुण भी होते हैं। इसलिए उन्हें ठीक ही भारतीय कृषि उत्पाद के 'अनूठे रत्न' कहा जाता है। वैश्विक रूप से 171 देशों में 83.3 मिलियन हेक्टेयर में 81.8 मिलियन टन के उत्पादन के साथ भिन्न-भिन्न प्रकार के दलहनों का उत्पादन होता है। भारत 34% क्षेत्र और 24% उत्पादन के साथ विश्व का सबसे बड़ा दलहन उत्पादक देश है। म्यांमार दूसरा सबसे बड़ा दलहन उत्पादक देश है। म्यांमार दलहन का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है और इसके पश्चात कनाडा, चीन, नाइजीरिया, ब्राजील तथा आस्ट्रेलिया का स्थान है।

भारत दालों का सबसे बड़ा उत्पादक, प्रसंस्करणकर्ता तथा आयातक देश भी है। विश्व का लगभग 90% अरहर, 75% काबुली चना एवं 37% मसूर क्षेत्र भारत में है। दलहन का उत्पादन करने वाले प्रमुख राज्य मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान तथा आंध्र प्रदेश हैं।

दानों का वैश्विक उत्पादन 1961 के 40.8 मिलियन टन उत्पादन की तुलना में दुगुना होकर 2016 में 81.8 मिलियन टन हो गया। इसी अवधि के दौरान अनाज का उत्पादन बढ़कर तीन गुना हो गया और अनाज की तुलना में दलहन की उपज में लगभग 55.8% की वृद्धि हुई। अनाज की तुलना में दलहन की उपज में कम वृद्धि दर्शाता है कि दलहनों के उत्पादन में वृद्धि की पर्याप्त क्षमता है।

भारत में विभिन्न दलहनों तथा दलहन उत्पादों की कुल खपत लगभग 21-22 मिलियन टन है। भारत का वार्षिक दलहन उत्पादन लगभग 18.45 मिलियन टन है जो 23.47 मिलियन हेक्टेयर में होता है - जिसका अधिकांश भाग वर्षा आधारित, अनुपजाऊ तथा विषम वातावरण में आता है जहां बार-बार सूखा तथा अन्य अजैविक दबाव वाली स्थिति की संभावना रहती है।

दलहनों की मांग को पूरा करने के लिए वर्तमान में भारत संयुक्त राज्य अमरीका तथा रूस सहित भिन्न-भिन्न देशों से लगभग 4.02 मिलियन टन का आयात कर रहा है। आत्म निर्भरता सुनिश्चित करने के लिए देश में 2030 तक 32 मिलियन टन दलहन की आवश्यकता का अनुमान लगाया गया है। तथापि दालों का आयात 2016-17 में 100 लाख टन से घटकर 2017-18 में 56.5 लाख टन हो गया जिसके परिणामस्वरूप 9,775 करोड़ रूपए की राशि की विदेशी मुद्रा की बचत हुई।

प्यारे बहनों एवं भाइयों, भारत तथा वियतनाम के बीच द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने के लिए और वेसक समारोह के 16वें संयुक्त राष्ट्र दिवस में भाग लेने के लिए मैंने हाल ही में वियतनाम की यात्रा की थी। यद्यपि यहां भारत और वियतनाम में फसल उत्पादकता में अंतर का उल्लेख करना प्रासंगिक है।

भारत में चावल की खेती की औसत उत्पादकता प्रति हेक्टेयर लगभग 3 टन है जो वियतनाम के 5 टन प्रति हेक्टेयर की औसत उत्पादकता से कम है और वियतनाम के चयनित कृषि क्षेत्र के लगभग 7-8 टन प्रति हेक्टेयर के सर्वाधिक कृषि उत्पादकता से काफी कम है। मिस्र जैसे देशों में उत्पादकता 7.7 टन प्रति हेक्टेयर है।

इसी तरह भारत में सोयाबीन की खेती की उत्पादकता वियतनाम के लगभग 1.5 टन प्रति हेक्टेयर की तुलना में लगभग एक टन प्रति हेक्टेयर है।

मैंने इन आंकड़ों का उल्लेख कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा विभिन्न फसलों की उत्पादकता में सुधार करने तथा नई, जलवायु अनुकूल व उच्च उत्पादकता वाली किस्मों के विकास के लिए भी अनुसंधान को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल देने के लिए किया है।

दलहनों का उत्पादन क्यों महत्वपूर्ण है?

खाद्य तथा कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार कई कारणों से दलहन अनिवार्य फसलें हैं। वे पोषक तत्वों से भरे होते हैं और इनमें प्रोटीन की मात्रा अत्यधिक होती है जिससे वे प्रोटीन के आदर्श स्रोत बन जाते हैं, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां मांस तथा दुग्ध उत्पाद या तो नहीं मिलते या आर्थिक रूप से पहुँच के बाहर हैं।

कुपोषण तथा सूक्षम-पोषक तत्वों की कमी की समस्या, जिससे हमारी जनसंख्या के अनेक भाग प्रभावित हैं, को देखते हुए दालें स्वस्थ आहार को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती हैं। इनमें वसा की मात्रा कम होती है और वे कॉम्प्लेक्स कोर्बोहाइड्रेट, सूक्ष्म-पोषक तत्वों, प्रोटीन तथा बिटामिन बी से भरपूर होती हैं।

वस्तुत: दालों की सिफारिश इसलिए की जाती है क्योंकि वे हृदय रोगों तथा मधुमेह के खतरे को कम करती हैं। दालें मोटापे से निपटने में भी सहायता करती है।

इनके नाइट्रोजन-स्थिरीकरण के गुण के कारण मृदा की उर्वरता में वृद्धि करने के अलावा वे सिंथेटिक उर्वरकों पर निर्भरता को कम कर जलवायु परिवर्तन के अपघटन को कम करने में भी योगदान देते हैं। इन उर्वरकों के उत्पादन और प्रयोग के दौरान ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है।

यद्यपि पिछले कुछ वर्षों में दलहन के उत्पादन में वृद्धि हुई है, तथापि आने वाले वर्षों में आत्म-निर्भरता प्राप्त करने के लिए रकबे के साथ-साथ उत्पादकता में वृद्धि करने की आवश्यकता है। यद्यपि औसत उत्पादकता बढ़कर 841 कि.ग्रा./हेक्टेयर हो गई है पर यह वैश्विक औसत से काफी कम है। कुछ राज्यों में उपज अन्य राज्यों की तुलना में काफी अधिक है। विश्व भर की और देश में प्रचलित सर्वश्रेष्ठ प्रक्रियाओं से सीखने और उत्पादकता में सुधार हेतु उन्हें अपनाने की आवश्यकता है।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा देने में दलहन केंद्रीय भमिका निभा रहे हैं, अत: हमें बीज की बेहतर किस्मों का विकास करने की आवश्यकता है जो उच्च उपज वाली, रोग एवं कीट-रोधी हों और साथ ही अतिरिक्त बंजर भूमि को दलहन उत्पादन के अंतर्गत लाने की आवश्यकता है। किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने की भी पर्याप्त आवश्यकता है।

किसानों की स्थिति में सुधार लाने और उन्हें सशक्त बनाने में कृषि विश्वविद्यालय शोध संस्थान तथा कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) कृषक समूहों को बेहतर व सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। कृषि विश्वविद्यालयों को दलहनों की उपज में सुधार पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है जबकि कृषि विज्ञान केंद्रों को वैज्ञानिकों, सरकारों तथा किसानों के बीच सेतु की भूमिका निभानी चाहिए।

राष्ट्रीय श्रम अर्थशास्त्र अनुसंधान एवं विकास संस्थान द्वारा 2015 में प्रकाशित एक अध्ययन में कहा गया है कि "कृषि विकास केंद्रों के हस्तक्षेप से 80 प्रतिशत कृषकों ने अपने कृषि के तरीकों में परिवर्तन कर लिया है जो फसलों के विविधीकरण तथा फसल के पैटर्न में परिवर्तन, बीज रोपण तकनीक, उर्वरकों तथा कीटनाशकों के उपयोग, प्रयुक्त यंत्रों में परिवर्तन तथा जल के उपयोग के पैटर्न में परिवर्तन से संबंधित है। 50 प्रतिशत से अधिक किसानों ने अपने कृषि कार्यों को मशीनीकृत कर लिया है, तथापि कृषि यंत्रों का स्वामित्व तथा तकनीक का अपनाया जाना जोत के आकार एवं किसानों के शिक्षा के स्तर के साथ बढ़ गया।"

कृषि विज्ञान केंद्र कृषक समुदाय को सशक्त बनाने तथा ग्रामीणों के जीवन को बदलने के लिए भी जमीनी स्तर के महत्वपूर्ण संस्थान हैं।

जैसा कि आप सभी जानते हैं, भारत की प्रमुख फसलों - चावल तथा गेहूँ को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के द्वारा काफी प्रोत्साहन दिया गया है और भारत के गरीब लोगों को लाभ पहुँचाने हेतु सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में इन्हें प्राथमिकता दी गयी है। अत: भारतीय किसान या तो इन फसलों या नकदी फसलों जैसे कॉटन तथा गन्ने की खेती के लिए प्रोरित हैं। किसानों के लिए दलहन की खेती करना दूसरी पसंद है।

मुझे बताया गया है कि नई मृदा प्रबंधन तकनीकों जैसे फसल रोटेशन तथा इंटर क्रॉपिंग के बारे में जागरूकता के कारण दलहन की खेती के प्रति भी भारतीय किसान आकर्षित हो रहे हैं।

दलहनों की खेती को अधिक लाभप्रद और उपभोक्ताओं की पहुँच में लाने के प्रयास के तहत सभी प्रमुख दलहनों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) आरंभ किया गया जो जीरो ड्यूटी पर आयात की अनुमति देता है और निर्यात पर प्रतिबंध लगाता है। फिर भी प्रति व्यक्ति उपलब्धता निम्न और उपभोक्ता मूल्य उच्च रहा।

प्रिय बहनों एवं भाइयों, भारत के गंगा के तटीय मैदानेां में और परती चावल भूमि में गीष्मकालीन दलहन की विशाल क्षमता के दोहन पर अधिक ध्यान देना पड़ेगा। आंध्र प्रदेश, पंजाब एवं हरियाणा जैसे राज्यों में ग्रीष्मकालीन दलहनों को बोनस फसल के रूप में उपजाया जा रहा है।

मुझे बताया गया है कि विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों में दालों की निम्न अवधि वाली किस्मों का विकास करने की दिशा में पिछले कुछ वर्षों में प्रगति हुई है। ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल तथा असम जैसे पूर्वी राज्यों में दलहन उत्पादन के आधार को विस्तार देने के लिए उपयुक्त दलहन तकनीक का विकास करने के लिए अधिक तीव्र प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।

जैसा कि आप सभी जानते हैं, दिन-प्रतिदिन जल की कमी की समस्या बढ़ती जा रही है और जनसंख्या वृद्धि, जलवायु परिवर्तन तथा अस्थिरता के कारण समस्या विकराल होती जा रही है। ऐसी फसलों जिनमें पानी का कम उपयोग होता है, को खाद्य उत्पादन में वृद्धि की नीति का भाग बनाया जाना चाहिए। ऐसी शुष्क फलियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है जिनमें जलवायु परिवर्तन को सहन करने व उनका सामना करने की अंतर्निहित क्षमता हो। छोटे अनाज की फलियों को शामिल कर फलियों की किस्मों को बढ़ाने की भी आवश्यकता है। यह एक सुरक्षित भंडार के रूप में भी कार्य करेगा जब सूखे के कारण प्रमुख अनाज की फलियां सफल नहीं होती है।

शुष्क फलियों की स्वीकार्यता को बढ़ाने के लिए उन्नत किस्मों, जो सूखा तथा उष्णता रोधी होते हैं पोषक तत्वों से भरपूर तथा उच्च उपज वाली हो, को उपलब्ध कराया जाना चाहिए। लगभग 80-90 प्रतिशत फली बीज प्रणाली कृषक चालित है जो या तो अन्य किसानों से या अनौपचारिक स्थानीय बाजार से आती है।

अत: हमारे देश के शुष्क और अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में फसल तथा पोषण सुरक्षा के लिए उनकी ब्रीडिंग के पहलुओं, बीज प्रणालियों, उत्पादन, विपणन तथा उपयोग के पक्षों पर तत्काल ध्यान दिया जाना चाहिए।

कृषि फसलों की उत्पादकता में सुधार के लिए नए ज्ञान, वैकल्पिक नीतियों तथा संस्थागत परिवर्तनों की आवश्यकता है। शुष्क क्षेत्रों के वंचित लोगों के, जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप आर्द्रता तथा तापमान में हुए बदलाव से गंभीर रूप से प्रभावित होने की अधिक संभावना है। इसलिए जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने और खाद्य एवं पोषण सुरक्षा पाप्त करने के लए कृषि अनुसंधान में एक नए प्रतिमान की आवश्यकता है जो परंपरागत ज्ञान के संयोजन से विज्ञान और प्रौद्योगिकी का इष्टतम उपयोग करे।

जय हिंद!