19 फरवरी, 2022 को चेन्नई से पांचवें वैश्विक भगवद्गीता सम्मेलन में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा वर्चुअली दिया गया भाषण

चेन्नई | फ़रवरी 19, 2022

“बहनो और भाइयो,
मुझे वैश्विक भगवद गीता सम्मेलन (जीबीजीसी 2022) के पांचवें संस्करण में भाग लेकर वास्तव में अपार हर्ष की अनुभूति हो रही है। मुझे यह जानकर प्रसन्नता है कि सेंटर फॉर इनर रिसोर्स डिवलपमेंट (सीआईआरडी), उत्तर अमरीका - एक यूएसए-आधारित संस्थान इस सम्मेलन का आयोजन कर रहा है, जो हमारे लोकाचार और संस्कृति की वैश्विक उपस्थिति और मान्यता को दर्शाता है।
पूज्य स्वामी भूमानंद तीर्थ जी, जो इस वार्षिक आयोजन की प्रेरणा और प्रेरक शक्ति हैं, को मेरा विनम्र अभिवादन!
बहनो और भाइयो,
कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन और उनके श्रद्धेय मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक, भगवान श्री कृष्ण के बीच संवाद, एक शाश्वत प्रासंगिक संवाद है। प्रतिभाशाली और विवेकशील अर्जुन जिन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय युद्ध के मैदान की रणनीतियों और कौशल में दक्षता हासिल करने में बिताया, को विख्यात महाभारत युद्ध के पहले दिन अति आत्म-संदेह का सामना करना पड़ता है।
अर्जुन की निराशा की भावना इस तथ्य से उत्पन्न होती है कि वह अपने परिजनों, अपने प्रिय गुरूजनों और आदरणीय बडे-बुजुर्गों को विपक्षी सेना में देखता है। जब वह विपक्षी सेना को देखते हैं, तो उनके मन में उस युद्ध की निरर्थकता का भाव होता है, जो उसके सगे-संबंधियों और लोगों का संहार करने जा रहा है। उन्हें इतनी निराशा होती है कि वह आसन्न युद्ध से मुंह मोड़कर वापस लौटने की इच्छा व्यक्त करते हैं।
तभी उनके सारथी और उनके साथ मार्गदर्शक श्रीकृष्ण उन्हें परामर्श देते हैं और अर्जुन के मन में उठने वाले प्रत्येक प्रश्न और चिंता का बड़ी गहराई से उत्तर देते हैं।
श्रीकृष्ण की सबोध अंतर्दृष्टि और दृष्टिकोण से अर्जुन अपने अनिर्णय की स्थिति से बाहर निकलते हैं। प्रभावी प्रदर्शन करने की स्थिति में वापस आने के बाद, अपने मन में उत्पन्न संदेहों को दूर करते हुए अर्जुन अपने धार्मिक कर्तव्यों के निर्वहन में साहसपूर्वक आगे बढ़ते हैं।
बहनो और भाइयो,
यद्यपि भगवद्गीता का संदेश हजारों साल पुराना है, परंतु इसकी प्रांसगिकता और महत्व कभी कम नहीं हो सकता है। यह लोगों के लिए चिरस्थायी मार्गदर्शन और प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। आज, पहले से कहीं अधिक, एक जटिल और परस्पर जुड़ी दुनिया में, भगवद्गीता का कालातीत संदेश प्रासंगिक बना हुआ है क्योंकि लोग अपने जीवन में कई चुनौतियों और बाधाओं का सामना करते हैं।
संकट के दौरान, भगवद् गीता जैसे पवित्र ग्रंथ मानसिक शांति प्रदान करने में मार्गदर्शन और सहायता प्रदान करते हैं। वे शक्ति और विश्वास के स्रोत के रूप में कार्य करते हुए कठिन समय में हमारा मार्ग प्रशस्त करते हैं।
बहनो और भाइयो,
दुनिया भर में लोगों के जीवन में कोविड -19 महामारी के कारण उत्पन्न हुए अभूतपूर्व व्यवधान के दृष्टिगत, मुझे इस सम्मेलन के लिए 'मानसिक सद्भाव' का विषय अत्यधिक उपयुक्त और सामयिक प्रतीत होता है। महामारी के कारण होने वाले तनाव और निराशा को दूर करने के लिए मानसिक सद्भाव एक पूर्वापेक्षा है।
दुर्भाग्यवश, आधुनिक दौर में मानसिक तनाव तेजी से सर्वव्यापी बनता जा रहा है। इसलिए, इस महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे पर सभी हितधारकों को अधिकाधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। एक प्रतिष्ठित स्वास्थ्य पत्रिका ने कुछ वर्ष पूर्व बताया था कि 'सात भारतीयों में से एक अलग-अलग स्तर की गंभीरता के मानसिक विकारों से पीड़ित है। रिर्पोट से यह भी पता चलता है कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में इलाज में बहुत अधिक अंतर है।
अवसाद जैसे स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों की व्यापकता के बावजूद, मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता बहुत कम है। दुर्भाग्यवश इससे जुड़ा कलंक स्थिति को और अधिक बदतर बना देता है।
यह आश्चर्य की बात नहीं है कि महामारी ने लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित किया है। मुझे प्रसन्नता है कि हाल ही में केंद्र सरकार ने लोगों को चौबीस घंटे मुफ्त परामर्श और देखभाल प्रदान करने के लिए एक राष्ट्रीय टेली-मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम प्रारंभ करने की घोषणा की है। यह लोगों की पहचान सार्वजनिक किए बिना उनकी, विशेष रूप से दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का मानसिक स्वास्थ्य सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
 बहनो और भाइयो,
हमें मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित सभी मुद्दों का समग्र रूप से समाधान करने को उच्च प्राथमिकता प्रदान करनी चाहिए। साथ ही इससे जुड़े कलंक को मिटाने के लिए जागरूकता पैदा करना भी उतना ही जरूरी है। किसी भी चीज़ से अधिक, हमें मानसिक स्वास्थ्य के महत्व के बारे में खुलकर बातचीत करने के लिए तैयार रहना चाहिए। विशेष रूप से सभी क्षेत्रों की लोकप्रिय हस्तियों को, इस महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे पर लोगों से बात करनी चाहिए और जागरूकता बढ़ानी चाहिए।
अंत में, हमें अपनी जीवन-शैली में सुधार का तत्व भी शामिल करना चाहिए। हमें आधुनिक जीवन के दबावों से बाहर निकलने और लोककल्याण के लिए कार्य-जीवन संतुलन सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। यह सर्वविदित है कि ध्यान, नियमित व्यायाम, योग का अभ्यास या संगीत सुनने जैसे उपाय तनाव निवारक हैं और तनाव को दूर करने में सहायक हैं। वास्तव में, वे हमारी मनोदशा को तेज और सक्रिय बनाते हैं।
मित्रो,
ऐसी घटनाओं के बारे में जानकर दु:ख होता है जब युवा, विशेष रूप से, विद्यार्थी पढ़ाई के दबाव के कारण होने वाले तनाव से निपटने में असमर्थ होकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर लेते हैं। यहाँ पर माता-पिता और शिक्षकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्हें उन छात्रों को परामर्श देने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए जो शैक्षणिक दबावों का सामना करने में असमर्थ हैं। वास्तव में, प्रत्येक शैक्षणिक संस्थान में छात्रों को तनावपूर्ण स्थितियों से उबरने में मदद करने के लिए इन-हाउस परामर्शदाता होना चाहिए। सरकारों को हर जगह इस आवश्यकता का अनुपालन सुनिश्चित करना चाहिए। छात्रों को किसी भी विपरीत परिस्थिति का निडर होकर सामना करने और परिणाम की चिंता किए बिना लगनपूर्वक अपना कर्तव्य निभाने के लिए प्रेरित करना चाहिए। यह भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को युद्ध के मैदान में दिए गए उपदेश का सार है। हमें भगवान कृष्ण के संदेश के सार को आत्मसात करना चाहिए और इसे अपने जीवन में अनिवार्य तौर पर शामिल करना चाहिए।
मुझे दृढ़ मत है कि आंतरिक शक्ति और मानसिक शांति प्राप्त करने के लिए आध्यात्मिकता आवश्यक है। इस संबंध में, मैं धर्मगुरुओं से आग्रह करता हूं कि वे आध्यात्मिकता के संदेश को युवाओं और आम लोगों तक पंहुचाएं।
मैं इस सम्मेलन के माध्यम से भगवद्गीता के संदेश का प्रसार करने और 'मानसिक सद्भाव' के महत्व पर बल देने के लिए स्वामी भूमानंद तीर्थ जी और अन्य व्यक्तियों की सराहना करता हूं।
बहनों और भाइयों,
अंत में, मैं यह कहना चाहता हूं कि भगवद्गीता का ज्ञान संपूर्ण मानवता की भलाई के लिए है और इस संदेश को अधिक से अधिक भाषाओं में अनुवाद करने का प्रयास किया जाना चाहिए ताकि इस मौलिक ज्ञान को सभी तक पहुंचाया जा सके।
हमने सदैव अपने सभ्यतागत ज्ञान को विश्व के साथ साझा किया है और हमें ऐसा करते रहना चाहिए। जैसा कि मैं प्राय कहता हूं, 'शेयर एंड केयर' भारतीय दर्शन का मूल है। मुझे यह देखकर हर्ष हो रहा है कि सीआईआरडी-एनए जैसे संगठन और वैश्विक भगवद्गीता सम्मेलन इस दर्शन को साकार कर रहे हैं और वैश्विक दर्शकों का इन निधि से परिचय कराने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं।
पुन:, मुझे इस सम्मेलन में आकर हर्ष की अनुभूति हो रही है। मैं वैश्विक भगवद्गीता सम्मेलन के पांचवें संस्करण की सफलता की कामना करता हूं। मुझे विश्वास है कि आगामी तीन दिनों के दौरान होने वाला विचार-विमर्श सभी को आंतरिक शांति प्राप्त करने के लिए प्रबुद्ध, शिक्षित और प्रेरित करेगा।
धन्यवाद। नमस्कार।

जय हिन्द!";