18 फरवरी, 2021 को हैदराबाद में "मैवरिक मसाइअ - ए पॉलिटिकल बायोग्राफी ऑफ़ एन.टी. रामाराव" नामक पुस्तक का विमोचन करने के उपरांत भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

हैदराबाद | फ़रवरी 18, 2021

“"मुझे आज यहां वरिष्ठ पत्रकार रमेश कंडुला द्वारा लिखित एनटीआर की राजनीतिक जीवनी 'मैवरिक मसाइअ' का विमोचन करते हुए अपार हर्ष की अनुभूति हो रही है।

नंदमुरी तारक रामाराव (1923-96) न केवल एक फिल्म स्टार थे जिन्होंने आंध्र प्रदेश में शक्तिशाली सत्ताधारी दल को चुनौती दी और एक दलीय शासन व्यवस्था को समाप्त किया अपितु इस क्षेत्र में राजनीतिक संस्कृति को फिर से परिभाषित करते हुए एक नई राजनीतिक व्यवस्था की पटकथा लिखी।

दक्षिण भारत की राजनीति में, एनटीआर ने ईएमएस नंबूदरीपाद, अन्नादुराई, पुच्छलपल्ली सुंदरैया करुणानिधि, एमजीआर और श्रीमती जयललिता जैसे नेताओं की तरह उच्च पद हासिल करने में सफलता प्राप्त की।

कुछ अन्य लोग एनटीआर की तुलना में लंबे समय तक सत्ता में रहे होंगे, लेकिन उनके द्वारा छोड़ी गई छाप के कारण, एनटीआर ने निश्चित रूप से क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीति दोनों में स्वयं के लिए स्थान बनाया है।

एनटीआर हमारे देश में 'वैकल्पिक राजनीति' के शीर्ष अग्रदूतों में शामिल हैं। वे उस समय उभर कर सामने आए जब संयुक्त आंध्र प्रदेश के लोग बदलाव और एक नई राजनीतिक व्यवस्था के लिए अत्यधिक उत्सुक थे।

राजनीति में उनके प्रवेश और क्षेत्रीय पार्टी के गठन के लगभग 9 महीनों के भीतर उनकी 'प्रभावशाली' सफलता ने राष्ट्रीय राजनीति को एक नई दिशा दी। एक प्रकार से, उन्होंने क्षेत्रीय दलों के उदय और एकीकरण की दूसरी लहर का नेतृत्व किया।

उनका उप-राष्ट्रवाद रचनात्मक था और उनकी पहचान की राजनीति संकीर्णता से रहित थी। उनकी क्षेत्रवाद की अवधारणा में भारत का बहुलवादी विचार अंतर्निहित था। एक पक्के देशभक्त, एनटीआर ने अन्य पहचानों पर विशेषाधिकार के बिना अपनी केसरिया भावना के साथ गर्व के साथ अपनी तेलुगु पहचान कायम रखी।

राजनीति में एक बाहरी व्यक्ति, पर एनटीआर ने राजनीतिक गोलबंदी के लिए एक प्रवृत्ति दर्शाई। एनटीआर के राजनीति में आगमन के बाद इसमें अत्यधिक बदलाव हुआ। एनटीआर के मामले में सत्ता वास्तविक अर्थों में लोगों से प्राप्त की गई थी।

हालांकि, राजनीति में उनकी प्रभावशाली प्रविष्टि, आन्ध्र प्रदेश के लोगों पर उनके गहरे प्रभाव और राष्ट्रीय राजनीति में उनके अपेक्षाकृत संक्षिप्त राजनीतिक जीवन के दौरान उनके द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका को यथोचित मान्यता प्रदान नहीं की गई है।

हमारे संविधान के संघीय चरित्र को मजबूत करने के लिए और उनका संघर्ष सरकार की कल्याणकारी भूमिका पर उन्होंने जिस तरह बल दिया वह आज के भारत में जब क्षेत्रीय आकांक्षाएं बढ़ रही हैं, प्रासंगिक है।

एनटीआर आकर्षक अंतर्विरोधों वाले व्यक्ति थे। वह एक प्रभावशाली व्यक्तित्व थे, लेकिन उन्होंने आश्चर्यजनक 'थिएट्रिक्स' और विस्मयकारी पोशाक पूर्वानुराग का सहारा लिया। कई लोगों द्वारा उन्हें रूढ़िवादी माना जाता था, लेकिन उन्होंने कट्टरपंथी प्रवृत्तियों को दर्शाया जिससे व्यवस्था में हंगामा हुआ। बाह्य तौर पर धार्मिक प्रवृत्ति के होने के बावजूद वे कट्टर धर्मनिरपेक्ष थे। क्षेत्रीय आकांक्षाओं के सहारे अपनी लड़ाई लड़ने वाले नेता होने के बावजूद वे पूर्ण तौर पर राष्ट्रवाद के प्रति प्रतिबद्ध रहे।

किसी ज्ञात विचारधारा रहित व्यक्ति होने के बावजूद, वे अपने स्वयं की लोकप्रियता और केंद्र-राज्य संबंधों पर एक स्पष्ट तौर पर सिद्धांत के साथ आगे बढ़े।

मूलत: संघर्षशील स्वभाव वाले एनटीआर को अपने से बड़े स्थापित नेताओं को टक्कर देना पसंद था। राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता के लिए उनका योगदान एक अग्रगामी प्रयास था और एनटीआर 1990 के दशक में राष्ट्रीय मोर्चा के अध्यक्ष के रूप में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते थे परंतु भाग्य को कुछ और मंजूर था।

वह राजनीति की नीरस दुनिया में सबसे लुभावने व्यक्तियों में से एक थे। नाटक का पहलू उनके प्रभावशाली जीवन में गहराई से अंतर्निहित था। अंतिम दिनों में उनके व्यक्तिगत और राजनीतिक जीवन का एक अनोखा मिश्रण देखने को मिला, जिसके परिणामस्वरूप उनके जीवन में एक ऐसा झंझावात आया जिसकी आधुनिक भारतीय राजनीति में बहुत कम मिशाल देखने को मिलती हैं।

अपनी घटनापूर्ण राजनीतिक यात्रा के दौरान मैंने कई ऐसे विशिष्ट व्यक्तियों से मुलाकात की है जिन्होंने अपने जीवन में असाधारण उपलब्धियां प्राप्त की हैं। उनमें से एक थे अननुकरणीय नंदमूरी ताराकरामा राव।

राजनीति में कदम रखने से पूर्व एक अभिनेता के रूप में वे अपने जीवनकाल में एक किंवदंती थे। यह सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया जाता है कि कोई अन्य फिल्म अभिनेता हमारे पुराणों के महापुरूषों जैसे भगवान राम, भगवान कृष्ण, अर्जुन, कर्ण, दुर्योधन अथवा रावण की भूमिका को उतने अनुग्रह, सहजता, आनंद और गंभीरता के साथ नहीं निभा सकता था जितना एनटीआर ने अपने प्रदर्शन से दर्शाया है। लाखों लोगों द्वारा उन्हे दिव्य अवतार के रूप में देखा जाता था…ऐसा कोई घर नहीं था जिसमें भगवान राम या कृष्ण के रूप में एनटीआर की तस्वीर वाला कैलेंडर न हो … वे लंबे समय तक लोगों के जीवन का एक अभिन्न अंग बने रहे।

एक अभिनेता के रूप में, एनटीआर लोगों मे बेहद लोकप्रिय थे। लोगों के प्यार और प्रशंसा का एनटीआर को उस समय अत्यधिक लाभ मिला जब उन्होंने एक नई व्यवस्था का वादा करते हुए राजनीतिज्ञ के तौर पर अपना सार्वजनिक जीवन प्रारंभ किया।

फिल्मों में उत्कृष्ट अभिनेता के रूप में, उन्होंने जो भी कार्य किया और जो भी बोला उसमें उन्हें महारथ हासिल थी। परंतु राजनीति में उनके लिए सब कुछ इतना आसान नहीं था। सार्वजनिक जीवन के अलग-अलग कथानक होते हैं और यह खतरों और चुनौतियों का क्षेत्र है। मुख्यमंत्री बनने के तत्काल बाद एनटीआर को इसका आभास हुआ।

एनटीआर का जीवन फिल्मों में उनके लंबे कार्यकाल को समझे बिना ठीक से नहीं समझा जा सकता। उनको समझने के लिए इस लंबी समयावधि के दौरान उनके विचार और व्यक्तित्व के निर्माण, इन वर्षों के दौरान उनके द्वारा ग्रहण किए गए मूल्यों, परिप्रेक्ष्य और दुनिया के प्रति उनके दृष्टिकोण को समझना आवश्यक है।

राजनीति में प्रवेश करने से पूर्व एनटीआर एक सुदृढ़ व्यक्तित्व, सख्त अनुशासनप्रिय, स्पष्टवादी, ईमानदार और परंपरागत विचारों वाले व्यक्ति थे। सार्वजनिक जीवन में व्यक्तिगत हित की अपेक्षा वृहत हितों को ध्यान में रखते हुए अपनी स्थिति मे बदलाव करते हुए समायोजन और समझौते करने पड़ते हैं। एनटीआर ने मुख्यमंत्री के रूप में इस सांस्कृतिक आघात का सामना किया। इन वर्षों के दौरान निर्मित उनके व्यक्तित्व के दृष्टिगत, एनटीआर उस नई दुनिया के अनुरूप स्वयं को नहीं ढ़ाल पाए जिसमें प्रवेश का विकल्प उन्होंने चुना था। उनकी संपूर्ण राजनीतिक यात्रा के दौरान वे इसी असमंजस से जूझते रहे।

राजनेता के तौर पर एनटीआर को जिन असफलताओं का सामना करना पड़ा उससे उनका कद कम नहीं हुआ। 1984 में मुख्यमंत्री पद से उनको असंवैधानिक तौर पर हटाए जाने और उनकी जबरन बहाली ने उनके कद को बढ़ाया।

एनटीआर ने राज्य में चार चुनावों में अपनी पार्टी का नेतृत्व किया और तीन बार जीत हासिल की। तीनों जीत में, एनटीआर ने पिछले चुनावों की तुलना में अधिक सीटें जीतीं और प्रत्येक बार सीटों की संख्या 295 सीटों में से 200 से अधिक थी। यह एक अद्भुत राजनीतिक कारनामा है जिसकी बराबरी करना मुश्किल है।

एनटीआर और मेरा एक बहुत ही विशेष संबंध था जो आपसी विश्वास पर आधारित था। आंध्र प्रदेश की राजनीति में 1983 एक उथल-पुथल वाला वर्ष था। इसी वर्ष एनटीआर राजनीतिक तौर पर चर्चा में आए और तेलुगु देशम पार्टी की स्थापना के बाद शानदार जीत दर्ज करते हुए सत्ता में आए। उदयगिरी निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार के रूप में पुन: चुनाव लड़ते हुए, मैं उन कतिपय उम्मीदवारों में शामिल था जिन्होंने एनटीआर के नेतृत्व में टीडीपी सुनामी का सामना करते हुए जीत दर्ज की। यह अवधि इतिहास का एक समृद्ध दौर था और उस समय घटित कतिपय महत्वपूर्ण घटनाओं में एक सक्रिय भागीदार के तौर पर मैं एनटीआर की राजनीतिक जीवनी 'मैवरिक मसाइअ' में उल्लिखित सत्ता के खेल के विभिन्न आयामों का गवाह रहा हूं।

रमेश कंडुला ने एनटीआर के लिए 'विद्रोही' उपसर्ग का उपयोग किया है, इस शब्द का उपयोग कई लोग राजनीति में विद्रोही और परंपरा विरोधी स्वभाव का वर्णन करने के लिए करते हैं - वास्तव में एनटीआर ने स्वयं को एक मसीहा के रूप में प्रस्तुत किया जो आंध्र प्रदेश और उसके बाहर सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव ला सकते थे। स्वभाव से मनमौजी और थोड़े बहुत सनकी होने के बावजूद एक बार सार्वजनिक जीवन के लिए स्वयं की प्रतिबद्धता व्यक्त करने के बाद एनटीआर ने़ पीछे मुड़कर नहीं देखा।

1983 में, मैंने उन्हें उनकी नवीकृत गाड़ी 'चैतन्य रथ' पर अथक चुनाव प्रचार करते हुए देखा, जहां उनकी विशुद्व तेलुगु में भाषण शैली अपने पूरे शबाब पर थी क्योंकि वे जहाँ भी जाते थे भारी भीड़ पर अपना जादू बिखेरते थे। जब उनका 'चैतन्य रथ' संपूर्ण आंध्र प्रदेश में घूम रहा था तो गर्मी और धूल की परवाह किए बिना एनटीआर का अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण संपूर्ण और अटूट था जिसके परिणामस्वरूप वे अकेले ही अपनी पार्टी को आश्चर्यजनक जीत दिलवाने में सफल रहे।

जब 1984 में एनटीआर को सत्ता से हटाया गया, जो हमारी लोकतांत्रिक परंपरा में सबसे दु:खद घटनाओं में से एक था, तब मैंने उनके समर्थन में चलाए गए 'लोकतंत्र बचाओ' आंदोलन, जिसे व्यापक स्तर पर जन समर्थन मिला, में शामिल लोगों में अग्रणी भूमिका निभाई। मैं इस घिनौनी घटना पर इससे अधिक कुछ नहीं कहना चाहता कि अविभाजित आंध्र प्रदेश राज्य में सत्रह विपक्षी दल एनटीआर सरकार की अनुचित बर्खास्तगी के बाद 'लोकतंत्र बचाओ' आंदोलन के तहत एक साथ आए। मेरे अच्छे मित्र दिवंगत एस. जयपाल रेड्डी, जो उस समय जनता पार्टी में थे, और एक युवा विपक्षी विधायक के रूप में स्वयं मैंने लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को बहाल करने के अभियान में अग्रणी भूमिका निभाई। एनटीआर को इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने हमारे प्रति आभार व्यक्त करते हुए हमें मंत्रिमंडल में स्थान देने तक का प्रस्ताव दिया जिसे हमने यह आग्रह करते हुए विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया कि यह एक अटूट दृढ़ विश्वास का विषय था जिसने हमें गंभीर संवैधानिक संकट के दौरान मजबूती से उनके पक्ष में खड़ा किया।

रमेश कंडुला ने इस मनोरंजक वृतांत में एनआरटीआर के संक्षिप्त लेकिन घटनापूर्ण राजनीतिक जीवन का उल्लेख किया है और जैसे-जैसे मैंने इसके प्रत्येक पृष्ठ को पलटा तो उस समय के कई दृश्य तरोताजा हो गए। जीवनी लेखक ने सुस्पष्ट तरीके से उस समयावधि की भावना को चित्रित किया है जिसकी छाप मेरे मन-मस्तिष्क में सहज और सजीव तरीके से अंकित हो गई है। इस पुस्तक में हाल की आंध्र प्रदेश की राजनीति में सबसे बड़ी उथल-पुथल की कुछ घटनाओं का निष्पक्ष भाव और एक अनुभवी पर्यवेक्षक की अंतर्दृष्टि के साथ उल्लेख किया गया है। एनटीआर के राजनीतिक कार्यकाल के कतिपय सर्वाधिक उथल-पुथल वाले दिनों में उनके साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ होने के कारण मैं कह सकता हूं कि एक राजनीतिक जीवनी लेखक के रूप में लेखक ने घटनाओं के चित्रण में सटीक और तटस्थ भाव अपनाया है। लेखक द्वारा वृतांत पर अत्यधिक ध्यान दिए जाने के साथ ही कुशल कथा वर्णन यहाँ चित्रित कतिपय अशांत घटनाओं के नाटकीय असमंजस को पुनर्जीवित करता है।

सिनेमा के क्षेत्र की तरह ही राजनीति में भी एनटीआर का आगमन एक अद्भुत घटना थी । उन्होंने किसी महापुरूष की तरह पूरी तरह से अपनी शर्तों के साथ राजनीतिक मंच पर सफलता पाई। जैसा कि मैंने उन्हे पाया, एनटीआर नेक इरादे वाले और दिल के अच्छे व्यक्ति थे। राजनीति में उनका प्रवेश सत्ता लोलुपता पर आधारित नहीं था और यह ईर्ष्या या अति-महत्वाकांक्षा से परे था। उन्हें कुछ लोगों द्वारा दंभी करार दिया गया जबकि वह सच में अपने इरादों में ईमानदार व्यक्ति थे। उनके साथ मेरी कई मुलाकातों से मैंने यह भांप लिया था कि वे लाभ वंचितों की सेवा करने और भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने के अपने जुनून में पक्के थे। अपने इरादों के अनुरूप, उन्होंने अपने शासनकाल में कई गरीब हितकारी कल्याणकारी योजनाएं प्रारंभ कीं। हालांकि उन्हें राजनीति और सार्वजनिक जीवन में एक नौसिखिए के रूप में देखा जाता था, लेकिन उन्होंने एक स्थापित दल के विरुद्ध पहली बार उसके ही गढ़ में मोर्चाबंदी करके गठबंधन सरकार बनाकर राष्ट्रीय परिदृश्य में सनसनी पैदा कर दी।

मुख्यमंत्री के रूप में, एनटीआर ने मौलिक और दूरगामी विधायी और प्रशासनिक पहलों को प्रारंभ‍ किया, जिन्होंने एनटीआर को एक परंपरावादी अभिनेता से एक अपरंपरागत राजनीतिज्ञ बना दिया। उनकी पहली विधायी पहल उप-लोक पाल अधिनियम थी जो उनकी भ्रष्टाचार, जो समाज और राज्य के लिए घटक था, को समाप्त करने की उत्सुकता को दर्शाती है। उन्होंने महिलाओं को संपत्ति के अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के साथ सशक्त बनाया और जिला परिषदों में पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण प्रारंभ किया.. 2 रुपए किलो चावल देने की उनकी योजना कल्याणकारी योजनाओं में सर्वाधिक लोकप्रिय रही।

एनटीआर संघवाद और क्षेत्रीय आकांक्षाओं के एक प्रभावी रक्षक के रूप में उभरकर सामने आए जिन पर देश में लंबे समय तक एकल पार्टी के प्रभुत्व के कारण कुप्रभाव पड़ा। उन्होंने राज्यों और केंद्र की शक्तियों के बीच उचित संतुलन के लिए एक स्थिति और परिवेश तैयार किया।

एनटीआर के व्यक्तित्व का एक कम ज्ञात और पर्याप्त रूप से न समझा गया पहलू उनकी 'भारतीयता' था। वे हमारे देश के मूल्यों, रीति-रिवाजों और दर्शन के महान प्रशंसक थे- यही हमारे देश में मौजूदा संवाद में चर्चित 'राष्ट्रवाद' है। एनटीआर ने हमारे पौराणिक महापुरूषों की भूमिकाएं निभाते समय उनके संबंध में किए गए गहन अध्ययन के दौरान इन भारतीय मूल्यों, संस्कृति और दर्शन की व्यापकता और शक्ति को आत्मसात किया।

एनटीआर के व्यक्तित्व के कई पहलू थे - एक प्रतिष्ठित फिल्म स्टार और बाद में एक सफल राजनीतिज्ञ होने के अलावा, वे एक समर्पित पति और अपने बच्चों का ध्यान रखने वाले पिता भी थे। व्यक्तिगत स्तर पर मेरा और एनटीआर का तेलुगु भाषा और साहित्य के प्रति समान लगाव और प्रेम होने के साथ ही हमारे शास्त्रों और समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं में भी गहरी रुचि थी। एनटीआर की विरासत केवल राजनीतिक इतिहासकारों के लिए ही सामग्री नहीं है - उनके द्वारा दर्शाई गई मानवता, स्पष्टवादिता, ईमानदारी, अनुकरणीय अनुशासन और उददेश्यों के प्रति निडर अनुराग कतिपय अनुकरणीय विशेषताएं हैं।

जब उन्होंने स्वामी विवेकानंद की पोशाक जैसे वस्त्र धारण किए तो कुछ लोगों ने एनटीआर के बारे में प्रतिकूल टिप्पणियां की । परंतु मेरे विचार में, यह विवेकानंद के विचारों और सिद्धांतों की गहराई और उनकी शक्ति की अभिव्यक्ति तथा लोगों का उस दिशा में मार्गदर्शन करने का उनका तरीका था।

एनटीआर ने तेलुगु भाषा के विकास में अत्यधिक योगदान दिया। जिस तरह से लोगों ने फिल्म 'दाना वीरा सुरों कर्ण' में सुयोधन के रूप में एनटीआर के संवादों को सीखा और याद किया उससे यह स्पष्ट है। उनकी कई भूमिकाओं और संबंधित संवादों के संबंध में भी ऐसा ही था। बेहतरीन शब्द-चयन, संवाद के बीच में विराम और विराम चिह्न के सामर्थ्य के कारण उन्होंने हमारी मातृभाषा तेलुगु को जन-जन तक पंहुचाया। उनके संवादों से लोग मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।

"वाछीनदाना ... .वच्छादाना माना तेलुगु भाषा ओकाटेनन्ना "एनटीआर का एक प्रसिद्ध गीत था जो तेलुगु लोगों की एकता के लिए गाया गया था। कितने आकर्षक शब्द हैं?

आधुनिक भारतीय इतिहास में तेलुगु लोगों के 'आत्म-सम्मान' को बहाल करने में एनटीआर के योगदान को सदैव याद रखा जाएगा। उन्होंने तेलुगु लोगों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और स्थान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मैं इस विचार से सहमत नहीं हूं कि एनटीआर एक जटिल व्यक्ति थे। वे एक स्पष्ट विचारों वाले और ईमानदार व्यक्ति थे। यदि एनटीआर में कोई एक कमी थी, तो वह यह थी कि वे किसी कीमत पर भी समझौता नहीं करते थे। हो सकता है कि सत्ता की राजनीति के क्षेत्र में उनके लिए बदलाव लाने के लिए बहुत देर हो चुकी थी यह उनके लिए बहुत मुश्किल कार्य था।

एनटीआर ने अभिनेता और राजनेता दोनों के रूप में तेलुगु लोगों के दिलों पर राज किया और वे लंबे समय तक तेलुगु लोगों के दिलों में बसे रहेंगे।

एनटीआर का जीवन मनोवैज्ञानिक और सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण से दिमाग और तत्व के पारस्परिक प्रभाव के गंभीर अध्ययन के लिए एक अच्छा विषय साबित होगा।

मेरा विश्वास है कि "मैवरिक मसाइअ" पुस्तक, जिसका आज विमोचन किया जा रहा है, एनटीआर के बहुआयामी व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालेगी क्योंकि इसमें अभिनेता-राजनेता के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर समग्र रूप से प्रकाश डाला गया है।

उनके लाखों प्रशंसकों को उनसे उम्मीद थी और एनटीआर ने उन्हें निराश नहीं किया। उन्होंने लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए लंबी दूरी तय की। यदि पूरी दूरी को तय नहीं किया गया था, तो ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वे एनटीआर थे और यही उनके जीवन जीने का ढ़ंग था। जो दूरी तय नहीं की गई वह उनके द्वारा तय की गई दूरी को रेखांकित करती है क्योंकि केवल एनटीआर ही अपने लिए नियत समय में ऐसा कर सकते थे। उनके द्वारा तय नहीं की गई दूरी को दूसरे लोगों को तय करना होगा।

मैं कंडुला रमेश को लंबे समय से जानता हूं और मैं ऐसे कई लोगों, जिन्होंने लंबे समय तक एनटीआर को कार्य करते हुए देखने का अवसर मिला है, सहित ऐसे लोगों से परिचित कराने संबंधी उनके प्रयासों की सराहना करता हूँ जिनको यह सौभाग्य नहीं मिला है।

रमेश कंडुला की राजनीतिक जीवनी में एनटीआर के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं की कई परतों को दर्शाया गया है और लगातार बदलते भारतीय राजनीति के चित्रपट में अभिनेता-राजनेता के महत्वपूर्ण योगदान को समुचित परिप्रेक्ष्य में दर्शाया गया है। इसमें एनटीआर के उत्कृष्ट व्यक्तित्व के इन असाधारण पहलुओं के बारे में शिक्षाप्रद अंतर्दृष्टि प्रदान की गई है।

जय हिन्द!"