18 नवंबर, 2019 को नई दिल्ली में राज्यसभा के ऐतिहासिक 250वें सत्र के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति और सभापति, राज्य सभा श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | नवम्बर 18, 2019

माननीय सदस्यों!

किसी व्यक्ति के जीवन में अनूठी और ऐतिहासिक घटनाओं का एक हिस्सा बनने के अवसर कदाचित ही आते हैं। मैंने बहुत से लोगों को स्वतंत्रता संग्राम का भाग न बन पाने और 15 अगस्त 1947 का परवर्ती सूर्योदय न देख पाने के कारण एक वंचित रह जाने की भावना को प्रकट करते हुए सुना है। ईमानदारी से कहूं तो मैं उन लोगों में से एक था।

आज हम सभी को इस महती सदन के ऐतिहासिक 250वें सत्र के साथ जुड़े होने और उसका एक भाग होने का गौरव प्राप्त हुआ है। मैं आप सभी को इस विरल और अनूठे अवसर के लिए बधाई देता हूं जो एक लंबे समय के लिए संजोए जाने योग्य है।

संसद में एक दूसरे सदन की आवश्यकता पर संविधान सभा द्वारा व्यापक विमर्श किए जाने के पश्चात राज्यसभा अस्तित्व में आयी। कुछ लोगों ने इसका विरोध तथा अन्यों ने इसका समर्थन किया और उसी वाद-विवाद की प्रक्रिया में इस महती सभा की भूमिका और अधिदेश को पूर्णतः स्पष्ट किया गया।

राज्य सभा की पहली बैठक 13 मई 1952 को हुई। पिछले 67 वर्षों में राज्यसभा ने देश के सामाजिक आर्थिक रूपांतरण में अपनी व्यापक भूमिका निभायी है। यह एक ऐसा समय था जब हमारे देश में लोकतंत्र बर्बादी की सभी भविष्यवाणियों को नकारते हुए प्रत्येक चुनाव के साथ धीरे-धीरे स्वयं को सुदृढ़ कर रहा था। हमने संसदीय लोकतंत्र का विधि और समानता के नियम पर आधारित शासन के मूलभूत सिद्धांत के रूप में अंगीकरण और निष्पादन किया है।

यह महत्वपूर्ण अवसर अभी तक की यात्रा पर सामूहिक रूप से चिंतन और विफलताओं पर निष्ठापूर्वक आत्मनिरीक्षण करने के लिए एक उपयुक्त समय है। यह इसलिए भी आवश्यक है ताकि हम अतीत की किसी भूल, यदि कोई हो तो, को न दोहराएं। हमें अपने पिछले 67 वर्षों के अनुभवों से सीखने की आवश्यकता है और यदि हम ऐसा नहीं करते तो स्वयं को अप्रासंगिक बनाने की एक अंतर्निहित आशंका बनी रहती है। आज "भारतीय राजतंत्र में राज्यसभा की भूमिका और उसके भविष्य की दिशा" पर चर्चा करने का यही कारण है।

राज्यसभा की 1952 से अभी तक की यात्रा का संक्षिप्त ब्योरा यह है की पिछले 249 सत्रों के दौरान इस महती सभा की 5,466 बैठकें हुई और 3,817 विधेयक पारित किए गए। इसमें हमारे देश के सामाजिक आर्थिक परिदृश्य की पुनरव्याख्या करने वाले बहुत से पथप्रदर्शक और दूरगामी प्रभाव वाले विधान भी शामिल है। राज्यसभा सचिवालय द्वारा प्रकाशित 'राज्यसभा : 1952 से अभी तक की यात्रा' नामक एक प्रकाशन जिसे कल ही जारी किया गया है, में इस महती सभा के योगदान की उत्कृष्ट और प्रमुख विशेषताओं को शामिल किया गया है।

हमारे देश ने स्वतंत्रता प्राप्ति के समय की कठिन परिस्थिति से लेकर आज एक ऐसे देश, जिसके विचारों को जटिल वैश्विक व्यवस्था में महत्व दिया जाता है, के रूप में एक लंबी दूरी तय की है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय गरीबी, निरक्षरता, खराब स्वास्थ्य देखभाल, निम्नस्तरीय औद्योगिकीकरण और आर्थिक विकास, सामाजिक रूढ़िवादिता, निम्नस्तरीय अवसंरचना, बेरोजगारी, अप्रभावी कृषि, कमजोर शासन और वित्तीय संस्थान, अपर्याप्त सांस्थानिक ढांचा आदि जैसी बहुत सी चुनौतियां भारत के सामने खड़ी थी। इस प्रकार के हालातों ने संप्रभु भारतीय गणतंत्र की विधान सभाओं और विशेष रूप से भारतीय संसद के लिए कार्यसूची को निर्धारित किया। हमारे देश की शीर्षस्थ विधायिका ने समय-समय पर विभिन्न चुनौतियों का सामना करते हुए और राष्ट्र को जटिल उलझनों में से आगे बढ़ने का रास्ता दिखाते हुए एक सुव्यवस्थित और श्रेणीबद्ध तरीके से राष्ट्र निर्माण का कार्य किया। परिणामस्वरूप, आर्थिक और मानवीय विकास के संकेतकों में काफी सुधार होने से जीवन की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। हम विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र और वैश्विक आर्थिक विकास के अग्रणी चालक हैं।

राज्य सभा ने हमारी संसदीय व्यवस्था में अपनी अनूठी भूमिका और स्थिति से आज के भारत के निर्माण में अपना योगदान दिया है। यदि हम इस का सार प्रस्तुत करें तो "1952 में हिंदू विवाह और विवाह विच्छेद विधेयक पारित करने से लेकर 2019 में मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक तक, धोतियों पर अतिरिक्त उत्पाद शुल्क लगाए जाने से लेकर 2017 में रूपांतरकारी माल और सेवा कर के पुरःस्थापन तक, 1954 में औद्योगिक विवाद (संशोधन) विधेयक पारित करने से लेकर 2019 में नई दिल्ली अंतरराष्ट्रीय माध्यस्थम केंद्र विधेयक तक, 1953 में आंध्र राज्य विधेयक पारित करने से लेकर 2019 में जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन विधेयक तक, 1955 में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान विधेयक के पारण से लेकर 2019 में राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान परिषद विधेयक तक, 1954 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की स्थापना से लेकर 2009 में बालकों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार से सशक्त बनाने तक और 1952 में निवारक निरोध (द्वितीय संशोधन) के पारण से लेकर 2019 में विधि विरुद्ध कार्यकलाप निरोध (संशोधन) अधिनियम तक इस महती सभा ने समय-समय पर राष्ट्र की अपेक्षाओं को पूरा करने के अलावा सामने आई चुनौतियों का सामना करने में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। किंतु अभी भी हमें विशेष रूप से इस महती सभा के कार्यकारण के संबंध में गंवाए हुए समय और अवसरों की भरपाई करने हेतु लंबा सफर तय करना है।

माननीय सदस्यों!

यह अवसर अपने अच्छे कृत्यों को याद करके अपनी पीठ थपथपाने का है। किंतु सब ठीक नहीं है। जिस प्रकार का आचारण हम सभा में करते आ रहे हैं उसे लेकर लोगों में व्याप्त व्यापक चिंताओं को देखते हुए अभी बहुत कुछ किया जाना अपेक्षित है। ये चिंताएं सभी को भली-भांति ज्ञात हैं और मुझे इन्हें विस्तार से बताने की आवश्यकता नहीं है। हम में से प्रत्येक को स्वयं से यह प्रश्न पूछने की आवश्यकता है कि 'क्या हम सभा के भीतर और बाहर अपनी कथनी और करनी के द्वारा इस महती संस्थान की प्रतिष्ठा को बढ़ाने में अपना योगदान दे रहे हैं'? उत्तरों की तलाश हमें अपने आचरण में सुधार लाने में सहायता करनी है।

राज्य सभा अविश्वास प्रस्तावों और धन विधेयको के मामलों को छोड़कर वस्तुतः लोकसभा के समान ही है।

हमारे पूर्व राष्ट्रपति और इस महती सभा के अनुभवी सदस्य श्री प्रणब मुखर्जी ने आज हिंदुस्तान टाइम्स में अपने लेख में कहा है कि 1952 में इसकी शुरुआत से लेकर अब तक राज्य सभा ने न केवल विधि निर्माण प्रक्रिया का मार्गनिर्देशन किया है बल्कि भारतीय राजतंत्र के संघीय सिद्धांतों पर कार्य करते हुए जल्दबाजी में विधि निर्माण किए जाने पर भी रोक लगाई है। उन्होंने आगे कहा और मैं उद्धृत करता हूं "राज्य सभा के सदस्यों के लिए यह वांछनीय होगा कि वे यह याद रखें कि उन्हें अवरोधक और निरर्थक बनने के मध्य एक उत्कृष्ट संतुलन बनाना होगा। राज्य सभा दुर्भावना से ग्रस्त होकर लोक सभा द्वारा पारित किए गए प्रत्येक प्रस्ताव के लिए निषेधाधिकार का प्रयोग करके अवरोधक नहीं बन सकती और उसी प्रकार, इसे लोकसभा द्वारा पारित किए गए किसी भी प्रस्ताव को बिना सोचे समझे स्वीकृति भी प्रदान नहीं करनी चाहिए अन्यथा इसका अस्तित्व ही व्यर्थ हो जाएगा।"

मुझे विश्वास है कि श्री मुखर्जी की दूरंदेशी बातें इस महती सभा में हमें अपने आचरण के लिए आवश्यक दिशा निर्देश उपलब्ध करवाएंगी। फ्रांसीसी संविधान विशेषज्ञ एबे सीएस ने एक बार कहा था और मैं उद्धृत करता हूं "यदि दूसरा सदन पहले से असहमति रखता है तो वह दुर्भावना से ग्रस्त है यदि वह सहमति रखता है तो वह अनावश्यक है।

अतः यह बात निकलकर सामने आती है कि इस महती संस्थान के माननीय सदस्यों को सभा के विचाराधीन प्रत्येक मुद्दे पर अपनी बुद्धिमत्ता, जानकारी और विशेषज्ञता का प्रयोग करते हुए एवं विविध परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करते हुए सभा की कार्यवाही को प्रबुद्ध चर्चाओं और वाद विवादों से समृद्ध बनाना चाहिए। प्रणबदा कहते हैं और मैं उद्धृत करता हूं "चूंकि सदस्य अपने -अपने दलों द्वारा चुने जाते हैं, यह आशा की जाती है कि राजनीतिक दृष्टि से चतुर लोग राज्यसभा में आएंगे। राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्देशित 12 सदस्य इसी आशा का प्रतिनिधित्व करते हैं। इससे वास्तव में यह अपेक्षा की जाती है कि यह संसद की विमर्शी प्रकृति को समृद्ध बनाएगा।

माननीय सदस्यों!

पिछले 2 वर्षों में इस महती कार्यालय में कार्यभार ग्रहण करने से लेकर अब तक मैं नियमित रूप से सामान्यतः हमारी विधायिका और विशेष रूप से इस सभा के कार्यकरण को लेकर अपनी चिंताओं को प्रकट करता आया हूँ। जैसा कि आप सब इस महती सभा के कार्यकरण में सुधार लाने की आवश्यकता पर चर्चा करते हैं, मैं आपकी सुविचारित राय के लिए कुछ मुद्दों का सुझाव देता हूं:

1. विधानों की प्रकृति और संख्या तथा लोक महत्व के मुद्दों पर चर्चा करने के लिए उपलब्ध समय को ध्यान में रखते हुए अब सभा की एक वर्ष में लगभग 60 से 70 दिनों के लिए बैठक के संदर्भ में बैठकों की संख्या की पर्याप्तता;

2. सभा के वर्तमान कार्य विषयक नियमों की पर्याप्तता और अपेक्षित परिवर्तन, यदि कोई हो;

3. विधायी प्रस्तावों पर अपने विचार प्रस्तुत करने और लोक महत्व के मुद्दे उठाने हेतु सदस्यों के लिए वर्तमान में उपलब्ध विभिन्न तंत्रों की पर्याप्तता और प्रभावोत्पादकता;

4. सभा में वर्तमान में अनुसरण की जा रही विद्यमान प्रक्रियाओं की पर्याप्तता और प्रभावोत्पादकता;

5. वाद विवादों में सदस्यों की उचित और व्यापक प्रतिभागिता को संभव बनाने के लिए अनुसरण किए जाने वाले मानक;

6. यह सुनिश्चित करना कि सभा में वाद विवाद को समृद्ध बनाने के लिए सही पृष्ठभूमि और योग्यताओं वाले सदस्य भेजे जाएं;

7. सभा के व्यवस्थित कार्यकरण के लिए कार्य विषयक नियमों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए सदस्यों द्वारा स्वयं को अनुशासित रखा जाना सुनिश्चित करना;

8. सभा के वाद विवादों में जागरूक योगदान को संभव बनाने के लिए सदस्यों को अवसंरचनात्मक सहायता की आवश्यकता;

9. संपूर्ण कार्यवाही के दौरान सभा में और सभा की विभाग संबंधित स्थायी समितियों तथा अन्य समितियों की बैठकों में सदस्यों की पर्याप्त उपस्थिति सुनिश्चित करना; और

10. सदस्यों के कार्यकरण को बेहतर बनाने और सभा की कार्यवाही के अधिक रोचक संचालन के लिए प्रौद्योगिकी को अपनाना।

मुझे विश्वास है कि आप सभी पिछले 67 वर्षों के दौरान इस महती संस्थान की यात्रा की निष्ठापूर्वक समीक्षा और अपेक्षित सुधारों से संबंधित उपयोगी सुझाव लेकर आएंगे ताकि यह महान संस्थान उन ऊंचाइयों को छू सके जिनकी इस से आशा की जाती है। आपके सुझावों पर गंभीरता से विचार किया जाएगा।

इस महत्वपूर्ण अवसर पर मैं सभी 2,282 सदस्यों, पीठासीन अधिकारियों, पैनल में शामिल अध्यक्षों, सभा के नेता और विपक्ष के नेता, मंत्रियों, सभा में विभिन्न दलों के नेताओं , सचिवालय के कर्मचारियों, मीडिया और इस यात्रा में योगदान देने वाले लोगों, जिन्हें इस यात्रा का एक हिस्सा बनने का गौरव प्राप्त हुआ है, को बधाई और धन्यवाद देता हूं।

सभा के गत सत्र में पिछले कई वर्षों की तुलना में सर्वाधिक कार्य हुआ है और आइए उसी भावना के साथ हम आगे बढ़े।

आप सभी का धन्यवाद !