18 अप्रैल, 2022 को स्वर्ण भारत ट्रस्ट, विजयवाड़ा में "डॉ वाई. नायुदम्मा: निबंध, भाषण, नोट्स और अन्य" नामक पुस्तक के विमोचन के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

विजयवाड़ा | अप्रैल 18, 2022

“विशिष्ट अतिथिगण, भाइयों और बहनों!
विश्व भर में मानव जाति को मिस्र, मेसोपोटामिया, बेबीलोन, यूनान, चीनी और सिंधु घाटी जैसी विभिन्न प्राचीन सभ्यताएं विरासत में मिली हैं। इन सभ्यताओं का विकास उस समय से हुआ है जब मानव ने अपनी खानाबदोश, शिकार जीवी जीवन शैली का त्याग कर एक स्थान पर बसने का पहली बार निर्णय लिया था। यह हजारों वर्षों का लंबा सफर रहा है जब तक हम आधुनिक कही जाने वाली सभ्यता के सदस्य नहीं बन गए जिसकी दुनिया भर में समान विशेषताएं और आकांक्षाएं हैं। अधिक से अधिक ज्ञान का संचय और उच्च जीवन स्तर की तलाश इस यात्रा की विशेषता रही है। विशेष रूप से पिछली दो शताब्दियों के दौरान इस आधुनिक यात्रा की प्रेरक शक्ति विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हुई तेजी से प्रगति है।
यहां तक कि, मानव को अब 'प्रौद्योगिकी प्राणी' के रूप में जाना जाता है, जो हमेशा नए उपायों की तलाश में रहता है जिनसे उसकी आकांक्षाएं बढ़ती हैं। बेहतर जीवन जीने की इस अनवरत खोज ने कुछ गंभीर समस्याओं को जन्म दिया है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के तेजी से विकास और हमारे जीवन के हर पहलू में इसके बढ़ते इस्तेमाल ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी की अंधाधुंध खोज और इस्तेमाल के प्रयोजन, प्रासंगिकता, मूल्यों और परिणामों के बारे में कुछ गंभीर चिंताओं की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया है।
जैसा कि आज हम यहां जमीन से जुड़े, प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा. यलवर्थी नायुदम्मा गरु की जन्म शताब्दी मनाने के लिए एकत्र हुए हैं तो इस अवसर पर इन सरोकारों पर विचार करना उचित होगा।
मुझे इस अवसर पर 'डा. वाई. नायुदम्मा : एस्सेज, स्पीचेज, नोट्स एंड अदर्स' शीर्षक वाली इस पुस्तक का विमोचन करते हुए खुशी हो रही है। इस अवसर की तैयारी के लिए, मैंने इस पुस्तक में निहित कुछ निबंधों का अध्ययन किया है।
मैं विज्ञान और प्रौद्योगिकी के भविष्य और इसके अनुप्रयोग से जुड़े विविध सरोकारों के संबंध में डा. नायुदम्मा गरु की परिकल्पना से आश्चर्यचकित हूं। उन्होंने एक ऐसा दर्शन प्रस्तुत किया था जिसे सामाजिक मूल्यों से प्रेरित होकर सर्वहित के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग को संचालित करना चाहिए। उन्होंने लक्ष्यों और उद्देश्यों तथा मूल्यों के एक स्पष्ट खाका प्रस्तुत किया था जिन्हें लोगों के जीवन की बेहतरी के साधन के रूप में और सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए परिवर्तन के उत्प्रेरक के रूप में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोगों का मार्गदर्शन करना चाहिए। उन्होंने अपने सरोकारों और विभिन्न मुद्दों को बहुत ही सरल और आसानी से बोधगम्य तरीके से विस्तार पूर्वक स्पष्ट किया।
उनके दर्शन के आधारभूत सिद्धांत इतने रोचक और आश्वस्त करने वाले हैं कि वे आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक हैं। उनके तर्कों की दृढ़ता और विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के लिए उनके दर्शन के प्रकाश को देखते हुए, मेरा प्रस्ताव है कि इसे उच्चतर कक्षाओं के छात्रों के लिए पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। इससे विज्ञान और प्रौद्योगिकी के तेजी से बढ़ते हुए क्षेत्र के उद्देश्यों के बारे में उचित समझ को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी ताकि नवोदित और उत्साही वैज्ञानिकों को उनके अधिगम के प्रारंभिक चरण में सही समझ और अभिविन्यास मिल सके।
'मैनेजमेंट ऑफ साइंसः चैलेंजेज एंड पर्सपेक्टिव्स', 'सोशल वैल्यूज एंड टेक्नोलॉजी चॉइस’ एंड 'ट्रिनिटी: इन द सर्विस ऑफ द सोसाइटी' विषय पर निबंध विशेष रूप से ज्ञानवर्धक हैं। मैं सभी संबंधितों को सलाह देता हूँ कि वे विज्ञान और प्रौद्योगिकी के साधनों की खोज और अनुप्रयोग के बारे में विभिन्न मुद्दों और सरोकारों की उचित समझ के लिए उन्हें पढ़ें।
मैं इस पुस्तक के संपादकों डा. के चंद्रहास और डा. के. शेषगिरि राव द्वारा नायुदम्मा गरू के ऐसे प्रबुद्ध विचारों जो भावी पीढ़ी के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में काम करेंगे, को संकलित करने और इसे प्रस्तुत करने में उनके श्रमसाध्य प्रयास के लिए उनकी सराहना करता हूं ।
प्रिय भाइयों और बहनों !
मुख्य मुद्दे ये हैं कि क्या विज्ञान और प्रौद्योगिकी को लोगों के अनुकूल होना चाहिए या लोगों को उनके अनुकूल होना चाहिए? क्या उन्हें लोगों द्वारा महसूस की गई जरूरतों और सरोकारों से उभरना चाहिए या उन्हें शीर्ष स्तर से संचालित होना चाहिए? वे कौन से मूल्य हैं जिन्हें विज्ञान और प्रौद्योगिकी की खोज और उनके अनुप्रयोगों का मार्गदर्शन और संचालन करना चाहिए? इन शक्तिशाली उपकरणों के अंधाधुंध अनुप्रयोग के अवांछनीय परिणामों को कैसे नियंत्रित किया जाए और संभाला जाए? इन उपकरणों से किसका हित होना चाहिए? डा. नायुदम्मा गरु ने अपने जीवन और कार्यों के माध्यम से इन प्रश्नों के उत्तर दिए। इसलिए उन उत्तरों को जानना जरूरी है।
डा. नायुदम्मा गरु के कार्यों और योगदानों ने अपने आप में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के उद्देश्यों को प्रतिबिंबित किया। वह स्पष्ट रूप से सामाजिक परिवर्तन के अभिकर्ता थे और उन्होंने प्रदर्शित किया कि वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीविद् इस तरह के बदलाव के प्रभावी अभिकर्ता कैसे हो सकते हैं। एकांत में विज्ञान के अनुशीलन से अपने आप मानवता की सेवा नहीं हो सकती है। इसे प्रभावी तकनीकी साधनों के रूप में लोगों तक पहुंचाया जाना चाहिए जिनका उपयोग लोग अपनी समस्याओं का समाधान करने के लिए कर सकते हैं। विज्ञान समाज और लोगों के लिए होना चाहिए। लोगों की आकांक्षाओं और लक्ष्यों को विज्ञान और प्रौद्योगिकी विकास का एजेंडा निर्धारित करना चाहिए।
डा. नायुदम्मा गरु के कार्यों से इस बिंदु को और स्पष्ट करने के लिए उन्होंने देश में चर्मशोधन उद्योग के स्वरूप को बदलने के लिए अग्रणी योगदान दिया। परंपरागत तरीके से कुछ समुदायों द्वारा अपनाए गए मृत पशुओं की खाल इकट्ठा करने के पेशे को दूसरों द्वारा हेय दृष्टि देखा जाता था। इसकी वजह इस प्रकार के कार्य में आने वाली दुर्गंध और कार्य की गंदी प्रकृति थी। डा. नायुदम्मा ने इन मुद्दों का गहन विश्लेषण किया और इस बात पर विचार किया कि इस पेशे को व्यापक रूप से स्वीकार्य बनाने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी के उपयोग के माध्यम से कैसे इसमें बदलाव लाया जा सकता है। वह बदबू को दूर करने और इस पेशे में शामिल लोगों के कौशल में सुधार करने में सफल रहे। उन्होंने चर्मशोधन श्रमिकों की आय बढ़ाने के लिए चमड़े के उत्पादों को बढ़ावा दिया। इस प्रक्रिया में उन्होंने साबित कर दिखाया कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग से उस गतिविधि की आर्थिक व्यवहार्यता को बढ़ाने में मदद मिलनी चाहिए जिसमें इन उपकरणों का उपयोग किया जाता है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी को अधिक लाभकारी रोजगार पैदा करना चाहिए।
नतीजतन, चमड़े के उत्पाद अधिकाधिक स्वीकार्य हो गए हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय चर्म उत्पादों की काफी मांग है। वास्तव में, आज स्थिति यह है कि अच्छी गुणवत्ता वाले चमड़े के उत्पाद जैसे जूते, हैंडबैग आदि रखना हैसियत से जुड़ा विषय बन गया है। विभिन्न समुदायों के लोग अब पारंपरिक बाधाओं और पूर्वाग्रहों को छोड़कर चमड़ा उद्योग में शामिल हो गए हैं।
डा.नायुदम्मा गरु की तीव्र इच्छा थी कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग से इस प्रकार के सामाजिक-आर्थिक बदलाव आएं और उन्होंने यह प्रदर्शित किया कि इसे किस प्रकार किया जा सकता है। एक वैज्ञानिक के रूप में वह सामाजिक परिवर्तन के अभिकर्ता थे।
मूल्य प्रौद्योगिकी के चयन को निर्देशित करते हैं। दुनियाभर में लोगों को संचालित करने वाला मुख्य मूल्य 'भौतिकवाद और उपभोक्तावाद' है। प्रौद्योगिकी विकास को संचालित करने वाले ऐसे मूल्यों की एक सीमा होनी चाहिए। गुणवत्तापूर्ण जीवन के नाम पर सुख-सुविधाओं के लिए इस तरह की भौतिकवादी पिपासा शांति से रहने वाले लोगों की मदद नहीं करती है। इसलिए भारतीय दर्शन और विचार, समाज और प्रकृति के साथ सद्भाव में रहने के लिए आंतरिक शांति हेतु आध्यात्मिक खोज पर जोर देते हैं। भौतिकवाद की प्रतिस्पर्धात्मक खोज लक्ष्य नहीं होना चाहिए और ऐसे उद्देश्यों की पूर्ति करना विज्ञान और प्रौद्योगिकी का एजेंडा नहीं होना चाहिए।
मैं डा.नायुदम्मा गरु की दूरदृष्टि से आश्चर्यचकित हूं क्योंकि उनके कुछ विचार अब प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार की कुछ प्रमुख पहलों में परिलक्षित होते हैं। मैं इस संबंध में प्रधानमंत्री जन धन योजना, सब का साथ-सब का विकास-सब का प्रयास और आत्मानिर्भर भारत जैसी योजनाओं का संक्षेप में उल्लेख करना चाहूंगा।
समाज के सभी वर्गों के सशक्तीकरण की आवश्यकता के बारे में चर्चा करते हुए डा. नायुदम्मा गरु ने एक संदर्भ में कहा था कि यदि किसी महिला का बैंक खाता होगा, तो उसके साथ परिवार में अलग व्यवहार और सम्मान किया जाएगा। इससे उसके उद्धार में मदद मिलती है। यह स्पष्ट रूप से प्रधानमंत्री जन धन योजना के शुभारंभ के मूल में है जिसके तहत वित्तीय समावेशन और सशक्तीकरण करने के लिए करीब 50 करोड़ बैंक खाते खोले गए हैं। नि:संदेह, वह समय से दो कदम आगे थे और इसलिए दूरदर्शी थे।
आत्मनिर्भरता डा. नायुदम्मा गरु के दर्शन के मूल में थी। उनका विचार था कि औपनिवेशिक अतीत और पश्चिमी प्रशिक्षण, अभिविन्यास और शिक्षा के कारण हम प्रौद्योगिकी के आयात और समाधानों के लिए पश्चिम की ओर देखते हैं और पश्चिमी समाधान भारत की समस्याओं को हल नहीं कर सकते, क्योंकि इनकी परिस्थिति और संदर्भ अलग हैं। उन्होंने विज्ञान और प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता की पुरजोर वकालत की। यही प्रधानमंत्री श्री मोदी की आत्मानिर्भर भारत पहल का सार है।
संयुक्त राष्ट्र चार्टर के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए, डा. नायुदम्मा गरु ने राष्ट्रीय प्रयासों में सभी की भागीदारी के साथ सभी को गरिमामयी, श्रेयकर, अधिकारों की समानतायुक्त, बेहतर जीवन स्तर वाला, सुरक्षित जीवन जीने आदि में सक्षम बनाने पर जोर दिया था। यह 'सब का साथ-सब का विकास-सब का प्रयास' के दर्शन का अंतर्निहित सिद्धांत है।
डा. वाई. नायुदम्मा गरू जैसे दूरदर्शी वैज्ञानिक दुर्लभ हैं। ऐसे महानायक को हम नमन करते हैं। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण था कि 1985 में एक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई। उस समय वह सिर्फ 63 वर्ष के थे। वह 1971 में 49 वर्ष की कम उम्र में हमारे देश में विज्ञान और प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के लिए सर्वोच्च निकाय, वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद के महानिदेशक बने और उसी वर्ष उनको पद्मश्री से सम्मानित किया गया। यदि वह अधिक समय तक जीवित रहते तो हमारे देश के लिए बहुत हितकारी होता।
प्रिय भाइयो और बहनो!
डा.नायुदम्मा गरु हमारे देश की महान वैज्ञानिक विरासत की श्रृंखला की एक कड़ी थे। हजारों वर्ष पूर्व, हमारे यहां बौधायन, आर्यभट, ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य, महावीराचार्य, वराहमिहिर, कणाद, सुश्रुत, चरक, पतंजलि आदि जैसे महान वैज्ञानिक थे जिन्होंने ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में अग्रणी योगदान दिया। विदेशी आक्रमणों के कारण मध्ययुगीन काल के दौरान यह परंपरा मंद पड़ गई थी।
अतीत में भारत के 'विश्वगुरु' होने के गौरव को फिर से स्थापित करने के लिए अब संयुक्त प्रयास किए जा रहे हैं। हम सभी को अपनी शिक्षा पद्धतियों, विज्ञान और अनुसंधान के तरीकों को सुव्यवस्थित करके इस प्रयास में भागीदारी करने की आवश्यकता है।
हम ऐसे समय में रह रहे हैं जब ज्ञान ही वास्तविक शक्ति है। हमें सभी को ज्ञान से सशक्त बनाने की आवश्यकता है जो प्रत्येक व्यक्ति का सर्वोत्तम संसाधन है। हमें ऐसा ज्ञान प्रदान करने की आवश्यकता है जो हमारे राष्ट्र की समस्याओं का सामूहिक रूप से समाधान करने में सक्षम हो।
डा. नायुदम्मा गरु ने इस बात पर जोर दिया कि शिक्षा का उद्देश्य राहत प्रदान करना नहीं है बल्कि इसे सभी को आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनाने के लिए सभी की आंतरिक क्षमता को प्रदर्शित करना चाहिए। हमें सभी क्षेत्रों में ज्ञान प्रदाताओं की ऐसी व्यवस्थाओं की जरूरत है।
किसी व्यक्ति का उसकी सर्वोत्तम क्षमता तक विकास सामुदायिक भागीदारी की भावना और सामूहिक प्रयास के वातावरण में ही होता है। जब हम राष्ट्रवाद की भावना से निर्देशित होते हैं तो इस प्रकार का सर्वोत्तम पारिस्थितिकी तंत्र मिलता है। इस प्रकार, राष्ट्रवाद प्रत्येक व्यक्ति का उसकी पूर्ण क्षमता तक विकास करके हमारे राष्ट्र की तीव्र प्रगति के लिए एक सकारात्मक शक्ति है। यह एक नकारात्मक कारक नहीं है जैसा कि कुछ लोगों द्वारा प्रचारित करने की कोशिश की जा रही है।
आधुनिक वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति के आधार पर विश्व स्तर पर अपनाई जाने वाली विकासात्मक कार्य नीतियों के परिणामस्वरूप तेजी से संसाधनों की कमी, पारिस्थितिक असंतुलन और असमानताएं पैदा हो रही हैं। सतत और सामंजस्यपूर्ण विकास के लिए वैकल्पिक विकास मॉडल की आवश्यकता है। पर्यावरण कोई अचल संपत्ति नहीं है। यह भावी पीढ़ी के लिए संजो कर रखी जाने वाली विरासत है और यह सभी की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी लोगों की सेवा के लिए उपयोग में लायी जानी चाहिए और लोगों को इसका दास नहीं बनना चाहिए।
डा. नायुदम्मा गरु ने इन सभी मुद्दों पर अत्यंत स्पष्टता और दूरदृष्टि के साथ विचार किया था। हमें उसी के अनुसार निर्देशित होने की आवश्यकता है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी को न केवल अभिजात्य वर्ग अपितु सभी वर्गों के लोगों के हितों की पूर्ति करनी चाहिए। इसका उपयोग समहित को ध्यान में रखकर करने की जरूरत है।
मैं नदिमापल्ली गांव से संचालित नायुदम्मा फाउंडेशन फॉर एजुकेशन एंड रूरल डेवलपमेंट को डा. वाई. नायुदम्मा गरु की दूरदर्शिता और दर्शन को बनाए रखने के लिए बधाई देता हूं।
आप सबको धन्यवाद!”