17 दिसंबर, 2019 को नई दिल्ली में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडी (शिमला) द्वारा आयोजित 6वें रवींद्रनाथ टैगोर स्मारक व्याख्यान में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु का संबोधन

नई दिल्ली | दिसम्बर 17, 2019

“इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी के अध्यक्ष प्रोफेसर कपिल कपूर जी; इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष श्री राम बहादुर राय जी; आईआईएएस के निदेशक प्रोफेसर मकरंद आर परांजपे जी, आईआईएएस के सचिव कर्नल वी के तिवारी जी, प्रतिष्ठित शिक्षाविदों, वरिष्ठ अधिकारियों, बहनों और भाइयों।

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी, शिमला को, जो न केवल देश अपितु दुनिया भर में उच्च शिक्षण और अनुसंधान का एक प्रमुख संस्थान है, द्वारा आयोजित प्रतिष्ठित छठा रवींद्रनाथ टैगोर स्मृति व्याख्यान देने के लिए मुझे आमंत्रित करने हेतु बहुत-बहुत धन्यवाद।

मैं ऐसे समय में यह व्याख्यान देने के लिए अपने आपको सौभाग्यशाली मानता हूं जब गुरुदेव श्री रवींद्रनाथ टैगोर की कालातीत दृष्टि भारत और दुनिया के लिए बहुत प्रासंगिक है।

प्रिय बहनों और भाइयों,

आज के व्याख्यान का विषय 'विजन फॉर न्यू इंडिया ’है।

हम सभी का एक स्वप्न है कि हमारा देश कैसा होना चाहिए। हमारे देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले पुरुषों और महिलाओं का एक विजन था। वे चाहते थे कि हमारा देश औपनिवेशिक शासन से मुक्त हो। संविधान निर्माताओं का दृष्टिकोण था कि स्वतंत्र होने के बाद हमें किस तरह शासन करना चाहिए। अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था के ढांचे के रूप में हमारे संविधान को अपनाने के सत्तर साल बाद, अब हम अपने पिछले अनुभव की समीक्षा कर रहे हैं और भविष्य के उस भारत का सपना देख रहे हैं जैसा भारत हम सभी देखना चाहते हैं।

हमारे लिए सपने देखना स्वाभाविक है। लेकिन इस सपने को हकीकत में तब्दील करने के लिए, एक दृढ़ निश्चय, प्रतिबद्ध सक्षम कार्यान्वयन, ईमानदार अन्तरावलोकन और कुशल पाठ्यक्रम सुधार होना चाहिए।

प्रिय बहनों और भाइयों,

हमारे सपने बड़े हैं क्योंकि वे हमारे पुरखों या पूर्वजों द्वारा देखे गए सपनों से निकले हैं, वो सपने पिछली बीस शताब्दियों में दुनिया को प्रेरित किया है। ये वे सपने हैं जो वैदिक स्तोत्रों में, महाभारत और रामायण जैसे महाकाव्यों में, उपनिषदों की सार्वभौमिक दृष्टि में, भगवद-गीता, काव्य, संगीत, नृत्य, कला और स्थापत्य के खज़ानों में और समाज सुधारकों की बुद्धिमत्ता तथा संतों की रचनाओं में मौलिक रूप से अभिव्यक्ति होते हैं। गांधी जी की तरह गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर भी दूरदर्शी नेताओं की इस महान वंशावली से संबद्ध हैं।

महात्मा गांधी ने उन्हें "महान प्रहरी" कहा था, जो भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में एक महान नैतिक बल था।

जैसा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 'डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' में कहा है “ टैगोर ने भारत की सांस्कृतिक परंपरा, जीवन को उसकी पूर्णता में स्वीकार करने और इसे हंसते - गाते हुए बिताने की परंपरा का अनिवार्य रूप से प्रतिनिधित्व किया । ”

रबींद्रनाथ टैगोर ने सर्जनात्मक लेख लिखे। शिक्षा, प्रकृति, राष्ट्रवाद, अंतर्राष्ट्रीयवाद, नारीवाद, धर्म, भाषा, जाति व्यवस्था जैसे विभिन्न विषयों पर उनके विचार उनकी बहुआयामी प्रतिभा के विस्तृतत कार्य-क्षेत्र को दर्शाते हैं। वे सच्चे अर्थों में एक विश्व कवि थे, जो प्राचीन वैदिक ऋषियों के सांचे में ढले थे, जिन्होंने हमें "वसुधैव कुटुम्बकम" की सार्वभौमिक दृष्टि दी।

अगर मुझे उनके लेखन में व्यक्त विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों में से तीन प्रमुख तत्व बताने पड़ें, तो मैं उनके द्वारा स्थापित तीन संस्थानों का नाम लूँगा और वे उनकी सोच के प्रतीक थे। मैं शांतिनिकेतन, श्रीनिकेतन और विश्वभारती की बात कर रहा हूं। जब हम एक नए भारत का सपना देख रहे हैं तो शिक्षा, ग्रामीण पुनर्निर्माण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर उनके विचार आज भी हमारे लिए उतने ही प्रासंगिक हैं जितने कि वे लगभग सौ साल पहले थे।

शांति निकेतन शिक्षा को जीवन से जोड़ने, छात्रों को प्रकृति से जोड़ने और सामंजस्यपूर्ण तथा समग्र व्यक्तित्व का विकास करने का एक प्रयोग था। गुरुदेव इसका वर्णन इस प्रकार करते हैं, “मैंने ऐसी जगह को चुना है जहां क्षितिज के किनारे पर अनंत आकाश है। जंहा मन अपने सपने बुनने के लिए बिलकुल निडर रह सके। मैं उन सपनों का साथी था। मैं उनके लिए गुनगुनाया। मैंने संगीतमय मुखड़ों, ओपेरा और नाटकों की रचना की, और वे इन सब में शामिल हुए। मैंने उन्हें हमारे महाकाव्य सुनाए और इस प्रकार इस स्कूल की शुरुआत हुई। ”

यह स्कूल प्राचीन गुरुकुलों की तरह था और शिक्षा को "जीवन का हिस्सा" बनाने और "इससे अलग न होने और कुछ अमूर्त बनाने" की कोशिश की गई थी। जैसा कि टैगोर बताते हैं, "मैंने सभी चीजों, प्रकृति की सुंदरता और आसपास के गाँवों तथा साहित्य में भी उनकी रुचि जगाने की कोशिश की।" मैंने उन्हें न केवल कक्षा शिक्षण द्वारा बल्कि नाटक-अभिनय के माध्यम से, स्वाभाविक तरीके से संगीत सुनने के माध्यम से शिक्षित करने की कोशिश की। ”

हमें अपनी शिक्षा प्रणाली में सहजता, रचनात्मकता और सौंदर्यपरक संवेदना के इन तत्वों को शामिल करने की आवश्यकता है।

हमें ज्ञान के साथ आनंद का मेल करना होगा। गुरुदेव कहते हैं, "मैंने आनंद के मार्ग पर ज्ञान के लिए तपस्या करने की कामना की थी।"

हमें गुरूदेव के बुद्धिमत्तापूर्ण उपदेशों पर भी ध्यान देना चाहिए कि हम किस प्रकार महान परंपराओं से जुड़कर, श्रेष्ठ विचारों को आकर्षित करके और अपनी शक्तियों को पुनः खोजकर भारतीय शिक्षा को पुनर्जीवित कर सकते हैं: “भारतीय संस्कृति फिर से समृद्धि होगी जब हमारी शिक्षा में वेद, पुराण, बौद्ध, जैन और इस्लामी विचारों का मिश्रण होगा। इस प्रकार भारत अपनी विविधता में एकता के दृष्टिकोण से जुड़ पाएगा। हमें इस जुड़े हुए रूप में खुद को फिर से तलाशना होगा अन्यथा हमारी शिक्षा हमारी अपनी नहीं होगी। कोई भी राष्ट्र नकल करके नहीं पनप सकता। ”

यह हमें समय रहते याद दिलाता है कि हमें नकल नहीं अपितु नवाचार करना चाहिए। हमें अपनी क्षमता के आधार पर राष्ट्र निर्माण करना चाहिए और श्रेष्ठ विचारों से सीखना चाहिए।

रवींद्रनाथ टैगोर ने गांधीजी की तरह ग्रामीण क्षेत्रों पर बहुत ध्यान केंद्रित किया और दिखाया कि उनके श्रीनिकेतन में ग्रामीण पुनर्निर्माण कैसा दिखता है। 'द सेंटर ऑफ इंडियन कल्चर' निबंध में उनके लंबे समय तक पोषित सपने पर श्रीनिकेतन बारे में चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, '' अगर हम एक गाँव को भी असहायता और अज्ञानता की बेड़ियों से मुक्त कराते हैं, तो पूरे भारत के लिए आदर्श की स्थापना होगी । इस तरह से कुछ गांवों को फिर से बनाया जाए और मैं कहूंगा कि वो मेरा भारत हैं। वास्तविक भारत की खोज का यह तरीका है। ”

इसके अलावा उन्होंने अपने विचारों को विस्तृत किया और श्रीनिकेतन के उद्देश्य को परिभाषित किया। 1928 में विश्वभारती बुलेटिन में लिखते हुए, उन्होंने कहा, "श्रीनिकेतन का उद्देश्य गांवों को आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी बनाते हुए पूरी तरह पटरी पर वापस लौटाना है, अपने देश की सांस्कृतिक परंपरा से परिचित कराना है और उनकी भौतिक, बौद्धिक और आर्थिक स्थितियों में सुधार के लिए आधुनिक संसाधनों का कुशल उपयोग करना है। ”

उनके लिए ग्रामीण विकास वास्तविक स्वतंत्रता की दिशा में एक बड़ा कदम था। इसमें "रचनात्मक कार्यक्रम" और ग्रामीण उत्थावन या ग्रामीण स्वराज के लिए गांधीवाद की गूंज सुनाई देती है।

उन्होंने कहा था, "जब हमारे देश में सहकारी स्वाधीनता के साथ परिचय होगा और उसके अभ्यास और अभिमान का प्रसार होगा तो अकेले ऐसे व्यापक आधार पर ही स्वराज का सपना सच हो सकता है।"

यह, वास्तव में, 73 वें और 74 वें संवैधानिक संशोधनों में परिकल्पित गांवों और नगर निकायों को शक्तियों के हस्तांतरण की भावना है। मुझे खुशी है कि वर्तमान सरकार भी ग्रामीण विकास के सभी पहलुओं पर काम कर रही है। हम ग्रामीण-शहरी अंतर को नजरअंदाज नहीं कर सकते।

टैगोर का मानना था कि ज्ञान देश के बदलाव का मुख्य कारक है और इसलिए उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान की वकालत की जिससे ग्रामीणों के जीवन की गुणवत्ताम में सुधार लाने में मदद मिले । उनके अनुसार, "चीजों में बदलाव लाने का एकमात्र तरीका यह है कि उपेक्षित गांवों में अर्थव्यावस्थाज, कृषि, स्वाकस्य्ों और अन्या सभी रोजमर्रा के विज्ञान का नव अर्जित ज्ञान लागू किया जाए।

टैगोर को विश्वास था कि ज्ञान की कोई प्रादेशिक सीमा नहीं है और हम सभी मानवता के रूप में एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। वे "विश्वभारती" संस्थान के माध्यम से इन सभ्यतागत और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करना चाहते थे। यह सांस्कृतिक और बौद्धिक क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए एक बड़ा कदम था।

जैसा कि स्वयं टैगोर ने कहा था, “विश्वभारती भारत का प्रतिनिधित्व करती है जहां उसके पास बौद्धिक धन है, जो सभी के लिए है। इतिहास में कभी भी पूरी तरह से मानव जाति मानव सहयोग की आवश्यकता के लिए इतनी अधिक क्रियाशील, अनिवार्य और अपरिहार्य नैतिक संबंधों के बारे में अधिक जागरूक नहीं रही है जो मानव सभ्यता के ताने-बाने को बुनती है ”।

टैगोर की दृष्टि व्यापक और सार्वभौमिक थी। उन्होंने पश्चिम और पूर्व दोनों के सर्वोत्तम पहलुओं को देखा था। वह दोनों में समन्वय करना चाहते थे और अंतर -सांस्कृतिक शिक्षा को बढ़ावा देना चाहते थे। पंडित नेहरू ने कहा था कि, “टैगोर ने पूर्व और पश्चिम के आदर्शों के बीच सामंजस्य स्थापित करने में मदद की है और भारतीय राष्ट्रवाद के आधारों को व्यापक बनाया है। वह भारत के सर्वोत्कृष्ट अंतर्राष्ट्रीयवादी रहे हैं जिनका अंतरराष्ट्रीय सहयोग में विश्वास है और उसके लिए कार्य कर रहे हैं, भारत के संदेश को अन्य देशों में ले जा रहे हैं और उनके संदेशों को लोगों तक पहुंचा रहे हैं। ” भारतीय मिट्टी से जुड़े एक सच्चे भारतीय और साथ ही वैश्विक दृष्टिकोण भी रखने के उदाहरण के रूप में टैगोर ने राजा राम मोहन राय जो "अपने देश की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति को बेहतरीन ढंग से जानते थे, की "सम्मानजनक ग्रहणशीलता" की सराहना करते हुए कहा कि वह वृहद विश्व में भारतीय संस्कृति की जड़ें खोजने में सक्षम थे ।"

ये विचारों के सागर से सिर्फ तीन मोती थे जिन्हें गुरुदेव एक स्थायी विरासत के रूप में हमारे पास छोड़ कर गए हैं। उन्होंने तीन सपने दिखाए जिन्हें हम संभवतः एक नए भारत के स्वप्न के साथ जोड़ सकते हैं, जिसे हम बनाने की कोशिश कर रहे हैं । बेशक कई और भी चीजें हैं जो हमारे नए निर्माण के लिए उपयोगी हो सकती हैं। नए भारत के निर्माण के लिए एक समावेशी प्रक्रिया होनी चाहिए। प्रधान मंत्री नरेंद्र भाई मोदी जी ने "सबका साथ, सबका विकास, सब का विश्वास" के रूप में अतिव्यापी रूपरेखा बनाई है। इसी तरह का स्वप्न देखने वाले गुरुदेव टैगोर ने कहा था, "भारत में वास्तपविक चुनौती यह है कि हमें खुद पूरे देश का निर्माण करना है। ऐसा निर्माण जिसमें सभी समुदाय और व्यक्ति भागीदारी करेंगे।"

यह हमारे लिए बहुत गर्व की बात है कि हमारे देश की छवि और कद विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ रहा है-चाहे वह क्षेत्र आर्थिक, शैक्षणिक, भू-राजनीतिक प्रभाव, रक्षा, खेल, विज्ञान, आईटी और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का हो।

प्रिय बहनों और भाइयों,

वह दिन वास्तव में बहुत ही प्रतिष्ठा और गौरव का दिन होगा जब भारत 2022 में अपनी आजादी के 75 साल मनाएगा। हालांकि, हमें आत्मसंतुष्ट नहीं रहना चाहिए और न ही यथास्थिति से संतुष्ट रहना चाहिए। गुरुदेव टैगोर ने कहा कि हमें एक ऐसे नए भारत का निर्माण करने और इसे साकार करने के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए और अपनी ऊर्जा को दिशा देनी चाहिए जहां सभी का सिर गर्व से ऊंचा हो, जैसा कि गुरुदेव टैगोर ने कहा था, "दुनिया को संकीर्ण घरेलू दीवारें खंडित कर रही हैं।"

माननीय प्रधान मंत्री ने नए भारत के स्वप्न की रूपरेखा बनाई है जो कि 2022 तक एक नया जीवंत और गतिशील भारत के निर्माण का प्रयास है। यह केवल तभी संभव है जब 1.25 बिलियन भारतीय 'संकल्पित भारत,' सशक्त भारत ',' स्वच्छ भारत '’और 'श्रेष्ठ भारत’बनाने के इस प्रयास में शामिल हों।

मुझे पूरा विश्वास है कि नया भारत नवाचार और ज्ञान का केंद्र होगा, जिसमें प्रतिभाशाली युवा डिजिटली रूप से सशक्त उद्यमी, टेक्नोक्रेट, वैज्ञानिक और शिक्षाविद शामिल होंगे और जलवायु परिवर्तन से लेकर कृषि उत्पादकता बढ़ाने जैसी विभिन्न समस्याओं के स्वदेशी समाधान खोजने के लिए सब मिलकर काम करेंगे।

मैं अध्यक्ष, निदेशक, संकाय सदस्यों और इस संस्थान के अन्य सभी कर्मचारियों को ज्ञान के माध्यम से विकास को बढ़ावा देने के उनके प्रयासों और राष्ट्रीय प्रयासों में योगदान देने के लिए शुभकामनाएं देता हूं।

जय हिन्द!"