17 अप्रैल, 2022 को हैदराबाद में राष्ट्रीय बौद्धिक दिव्यांगजन सशक्तिकरण संस्थान (एनआईईपीआईडी) में एक सभा में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

हैदराबाद | अप्रैल 17, 2022

“बहनों और भाइयों,
मुझे राष्ट्रीय बौद्धिक दिव्यांगजन सशक्तिकरण संस्थान (एनआईईपीआईडी) का दौरा करने और यहां की गतिविधियों के बारे में जानकारी हासिल करते हुए प्रसन्नता हो रही है। मुझे यह जानकर खुशी हुई कि एनआईईपीआईडी बौद्धिक दिव्यांरग व्यक्तियों, इससे संबंधित स्थितियों और उनके परिवारों को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण प्रगति कर रहा है।
 मुझे बताया गया है कि यह संस्थान, जो सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अंतर्गत एक शीर्ष निकाय है, बौद्धिक दिव्यांथगता के क्षेत्र में प्रशिक्षण, अनुसंधान और सेवाओं के तीनों मोर्चे पर एक साथ कार्य करता है।
 वास्तव में आपके जैसे संस्थान दिव्यांगजनों के जीवन में गुणात्मक परिवर्तन ला सकते हैं। मुझे कुछ महीने पहले नेल्लोवर के वेंकटचलम में कंपोजिट रीजनल सेंटर (सीआरसी) की अपनी यात्रा याद आ रही है जो दिव्यांगजनों को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाने के लिए कौशल प्रशिक्षण प्रदान कर रहा है।
 बहनों और भाइयों,
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, दिव्यांनगजन भारत की कुल आबादी में 2.21 प्रतिशत की महत्वीपूर्ण हिस्सेिदारी रखते हैं। जाहिर तौर पर उन्हें आर्थिक एवं सामाजिक रूप से सशक्त बनाने और विभिन्न प्रकार के दैनिक कार्य करने में उनकी कठिनाई को कम करने की आवश्यकता है।
दिव्यांगजनों को अपनी पूरी क्षमता के विकास के लिए हर अवसर हासिल करने का हक है। उन्हें हमारी सहानुभूति की जरूरत नहीं है। उन्हें अपने अनोखे कौशल को निखारने के लिए समानुभूति, न्याय और प्रशिक्षण की आवश्यकता है।
इस संदर्भ में यह सरकार और समाज की जिम्मेदारी है कि वे उनके खिलाफ किसी भी तरह के भेदभाव को रोकें और उनकी कामयाबी एवं उत्कृष्टता के लिए एक वातावरण तैयार करें। मैं इस संस्थाेन की भूमिका को एक समावेशी समाज के निर्माण के महत्वपूर्ण मिशन के हिस्से के रूप में देखता हूं।
बहनों और भाइयों,
कई दिव्यांयगजनों ने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी योग्यता एवं उत्कृष्टता को बार-बार साबित किया है। उन्होंने दुनिया को दिखा दिया है कि उनकी दिव्यां गता उनके सपनों को साकार करने की सीमा नहीं है। इससे साबित होता है कि यदि उन्हेंा उचित प्रोत्साहन दिया जाए और एक उपयुक्तक वातावरण तैयार किया जाए तो वे किसी से पीछे नहीं रहेंगे।
यह चिंता का विषय है कि बौद्धिक दिव्यांिगजनों को कई बार भेदभाव और सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ता है जिससे समाज में उनका एकीकरण बाधित होता है। कई मामलों में परिवार के करीबी सदस्यों और स्थानीय समुदाय की मानसिकता को बदलने की आवश्यनकता होती है।
दिव्यांगजन समुदाय के सामने आने वाली कठिनाइयों के बारे में लोगों के बीच जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है। जागरूकता किसी भी गलतफहमी को दूर करेगी और उन्हेंि समानुभूति की ओर ले जाएगी।
बहनों और भाइयों,
एक्सेसिबिलिटी यानी पहुंच एक ऐसा महत्वपूर्ण क्षेत्र है जिस पर हाल के वर्षों में 'एक्सेसिबल इंडिया' अभियान के कारण काफी ध्या न केंदित किया गया है। इस प्रभावशाली अभियान द्वारा पर्यावरण, परिवहन, सूचना एवं संचार प्रणाली जैसे क्षेत्रों में पहुंच को सुलभ बनाया गया है। निश्चित तौर पर इस ओर अभी भी काफी कुछ करने की आवश्यकता है।
सार्वजनिक स्थानों के साथ-साथ सरकारी और निजी भवनों को भी दिव्यांमगजनों के लिए सुलभ होना चाहिए। अन्य निर्मित वातावरण और सार्वजनिक परिवहन तक भौतिक पहुंच में भी सुधार किया जाना चाहिए। स्कूलों में शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को दिव्यांसग बच्चों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील बनाने की भी आवश्ययकता है।
यह सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है कि प्रौद्योगिकी दिव्यांआगजनों को बाहर नहीं रखना चाहिए। मुझे यह देखकर खुशी हो रही है कि प्रौद्योगिकी कंपनियां अपने उत्पादों को समावेशी बनाने के लिए प्रयास रही हैं। मैं भारत के राष्ट्रीय संस्थानों और विश्वविद्यालयों से सुलभ स्मार्ट प्रौद्योगिकी से संबंधित अपने काम में तेजी लाने का आग्रह करता हूं।
पुनर्वास क्षेत्र में प्रशिक्षित लोगों की कमी एक अन्य ऐसी समस्याो है जिसे सभी हितधारकों को मिलकर दूर करने की आवश्यसकता है। मुझे यह जानकर खुशी हुई कि एनआईईपीआईडी अपने अनोखे पाठ्यक्रमों के जरिये ऐसे कई लोगों को प्रशिक्षण दे रहा है।
बच्चों में दिव्यांगता संबंधी जोखिम की जल्द पहचान करना और उनका पता लगाना काफी महत्वेपूर्ण है। मुझे खुशी है कि नव स्थापित क्रॉस-डिसएबिलिटी अर्ली इंटरवेंशन सर्विस सेंटर (सीडीईआईएससी) इस दिशा में काम कर रहा है। चूंकि एनआईईपीआईडी हैदराबाद में है, इसलिए मैं चाहूंगा कि आप बच्चोंस में दिव्यांएगता के जोखिम की शीघ्र पहचान करने और उसका पता लगाने के लिए सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (सीसीएमबी) के साथ गठजोड़ करें।
विभिन्न राज्यों में ऐसे कई केंद्र स्थापित करने की भी आवश्यकता है। साथ ही, बच्चों में दिव्यां गता संबंधी जोखिम का जल्द पता लगने पर माता-पिता को उपयुक्त् परामर्श दिए जाने की आवश्यकता है।
बहनों और भाइयों,
निस्संदेह दिव्यांएग बच्चों के माता-पिता को प्रेरक की भूमिका निभानी होगी और उन्हें भावनात्मक समर्थन प्रदान करना होगा। मैं इस अवसर पर उन माता-पिता की सराहना करता हूं जो अपने बच्चों को यहां प्रशिक्षण के लिए लाते हैं। इन विशेष बच्चों की क्षमता को अधिकतम सीमा तक विकसित करने के लिए उनका उपयुक्त पालन-पोषण करने के लिए मैं आपको सलाम करता हूं। आप सभी उम्मी द और बिना शर्त प्यार के सच्चे अवतार हैं।
बहनों और भाइयों,
मैं फिर कहना चाहूंगा कि एनआईईपीआईडी का दौरा करके और यहां किए जा रहे उत्कृष्ट कार्यों को देखकर मुझे बहुत खुशी हो रही है। एनआईईपीआईडी को बौद्धिक दिव्यांागजनों के जीवन को सुगम और निर्बाध बनाने के लिए कहीं अधिक नवीन तकनीकों, विधियों और प्रक्रियाओं को लाने के लिए अपनी कड़ी मेहनत जारी रखना चाहिए।
बौद्धिक दिव्यांलगजनों और उनके परिवारों के पुनर्वास में मदद के लिए एनआईईपीआईडी के सभी कर्मचारियों को मेरी बधाई!
बहनों और भाइयों,
यदि हम दिव्यांंगजनों के साथ-साथ सभी नागरिकों में मौजूद क्षमता का दोहन करने में विफल रहे तो भारत की विकास गाथा अधूरी रहेगी।
दिव्यांथगजनों की विशेष आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रत्येक स्तर पर हमारी शासन प्रणाली को सुदृढ़ किया जाना चाहिए। इसके लिए हमें साथ मिलकर और तत्काेल काम करना होगा।
धन्यवाद, नमस्कार।
जय हिन्द!”