16 नवंबर, 2017 को नई दिल्ली में राष्ट्रीय प्रेस दिवस के अवसर पर भारतीय प्रेस परिषद के स्वर्ण जयंती के विदाई समारोह में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया अभिभाषण

नई दिल्ली | नवम्बर 16, 2017

"सर्वप्रथम मैं उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार के सभी विजेताओं को हार्दिक बधाई देता हूँ।

1780 में जेम्स अगस्तस हिकी द्वारा प्रथम समाचार पत्र 'बंगाल गजट' के प्रकाशन से ही भारत में प्रेस का लम्बा और शानदान इतिहास रहा है।

जब ब्रिटिश सत्ता से स्वतंत्रता प्राप्ति के संघर्ष में तेजी आनी शुरू हुई तो प्रेस लोगों को प्रेरित करने और उनकी आकांक्षाओं को आवाज देने का महत्वपूर्ण साधन बन गई। अनेक समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं, विशेषकर स्वदेशी भाषाओं की पत्र-पत्रिकाओं ने स्वतंत्रता आन्दोलन में धर्मयुद्ध जैसी भूमिका निभाई। यद्यपि ब्रिटिश शासकों ने हर संभव तरीके से इसका दमन करने का प्रयास किया किन्तु प्रेस स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रचार-प्रसार का प्रमुख साधन थी।

इस अवसर के महत्व को समझते हुए 1821 में बंगाली में राजा राम मोहन राय का संवाद कौमुदी, 1822 में फारसी में मिरात-उल-खबर सहित अनेक पत्रिकाएं और समाचार-पत्र जैसे केसरी, मराठा, द हिन्दू, अमृत बाज़ार पत्रिका, वन्देमातरम, अल-बलाघ और अल-हिलाल, यंग इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशित होने लगे।

ब्रिटिश सत्ता द्वारा थोपे गए कड़े प्रतिबंधों से विचलित हुए बिना, प्रेस निर्भीक रही और तब से यही अदम्य भावना निंदनीय आपातकाल जब प्रेस ने सरकार के नौकर की तरह व्यवहार किया था, के दौरान अस्थाई भटकाव को छोड़कर भारतीय मीडिया की यह प्रमुख विशेषता यथावत रही है। निस्संदेह, 'इंडियन एक्सप्रेस', द स्टे्समैन और 'द मेनस्ट्रीम' जैसे कुछेक अपवाद रहें।

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लोकमत को प्रभावित करने और उसे दिशा देने में समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं ने कोई छोटी भूमिका नहीं निभाई। वास्तव में, उस काल के दौरान प्रेस स्वतंत्रता प्राप्ति के नेक काम के लिए भिन्न-भिन्न पृष्ठभूमि के लोगों को एक साथ लाने का प्रमुख साधन थी। वास्तव में यह पत्रकारों के लिए सबसे बड़ा मिशन था जिन्होंने ब्रिटेन के शिकंजे से भारत को मुक्त कराने के ध्येय का प्रसार करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी।

स्वतंत्रता के पश्चात्, भारत में प्रेस ने प्रहरी की भूमिका निभाई और जनता की समस्याओं और उनकी आकांक्षाओं का प्रतिबिंब बनकर रही। पहले जिस अवधि के दौरान का उल्लेख मैने किया उसको छोड़कर यह देश में लोकतंत्र की रक्षा करने और उसे सुदृढ़ बनाने के प्रमुख स्तंभों में से एक रही है। आज, मीडिया का परिदृश्य हजारों पत्रिकाओं एवं समाचार-पत्रों, सैंकड़ों टी.वी. चैनलों और अनेकों रेडियो स्टेशनों से भरा हुआ है। निस्संदेह, हमारे पास सोशल मीडिया भी है जो इस डिजिटल युग में सूचना-सम्प्रेषण के प्रमुख साधनों में से एक बन गया है।

मित्रों, मुझे विश्वास है कि आप सब इस बात से सहमत होंगे कि पिछले कुछ वर्षों में पत्रकारिता का स्वरूप बदला है, यद्यपि लोकमत को दिशा देने और सरकारों द्वारा नीति-निर्माण करने, विशेषकर लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में, बहुत बड़े स्तर पर प्रभावित करता रहा है। अमरिका का वाटरगेट कांड एक स्मरणीय उदाहरण है कि किस प्रकार निष्पक्ष और निर्भीक प्रेस एक शक्तिशाली राष्ट्रपति के पतन का भी कारण बन सकती है।

भारत में भी, हमारे पास एक ऐसा दृष्टांत है जिसमें सीमेंट उद्योग से जुड़े एक कांड का पर्दाफाश होने के बाद एक मुख्यमंत्री को त्याग-पत्र देना पड़ा।

मैंने ये उदाहरण केवल मात्र लोकतंत्र में निष्पक्ष प्रेस की धर्मयुद्ध जैसी भूमिका पर प्रकाश डालने के लिए दिए हैं।

तथापि, पिछले कुछ वर्षों में, ऐसा प्रतीत होता है कि विगत में पत्रकारिता का मार्ग-निर्देशन करने वाले बुनियादी मूल्यों का अब पालन नहीं किया जा रहा है और समाचारों को ज्यादा-से-ज्यादा उन दृष्टिकोणों से ढाला जाता है जो समाचार समूह के प्रबंधन के द्वारा मानी जाने वाली विचारधारा के अनुरूप होते हैं। क्या यह लोकतंत्र के लिए स्वस्थ प्रवृत्ति है? मुझे तो ऐसा नहीं लगता और आज यहाँ राष्ट्रीय प्रेस दिवस के अवसर पर उपस्थित हुए आप सभी लोगों को इस पर गंभीरतापूर्वक आत्मविश्लेषण करना चाहिए।

समाचारों को जानबूझकर तोड़-मरोड़कर पेश करना, मुद्दों, संगठनों अथवा हस्तियों को अनुचित कवरेज देना, जबकि गंभीर समाचरों को एक ही कॉलम में समेट देना या केवल उनसे खाली जगह भर देना अथवा किसी गैर-मुद्दे को प्रमुखता देकर लोगों में तनाव को बढ़ाने जैसी खतरनाक प्रवृतियां प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया दोनों के समाचार-कक्षों में अपना स्थान बना चुकी हैं। इस पर अंकुश लगाए जाने की आवश्यकता है जिससे कि प्रेस द्वारा पहले निभाई जा रही भूमिका को पुन:स्थापित किया जा सके। किसी समाचार-पत्र अथवा समाचार चैनल को चलाने का उद्देश्य केवल वाणिज्यिक हित नहीं होना चाहिए। मैं समाचार-पत्रों और टी.वी. चैनलों से रातों-रात दानशील संगठन बनने के लिए नहीं कह रहा हूँ अपितु सामाजिक दायित्वों और व्यापारिक उद्यमों के बीच थोड़ा संतुलन साधने की आवश्यकता है।

मैं यह महसूस करता हूँ कि आजकल के पत्रकारों को सटीकता, निष्पक्षता, वस्तुनिष्ठता, समाचारों की उपयुक्तता और स्वतंत्रता के बुनियादी मूल्यों का पालन करना चाहिए। अपने प्रतिद्वंद्वियों अथवा प्रतिस्पर्धियों को हराने की होड़ में गलत खबरें रहीं दी जानी चाहिए।

मेरे विचार में, स्टिंग आपरेशन, गुप्त पत्रकारिता और सोशल मीडिया के मंचों में तेजी से वृद्धि के समय में, एक नए नाम के साथ एक ही निगरानी निकाय के तहत मीडिया के सभी संगठनों को लाए जाने की आवश्यकता है।

भारतीय प्रेस परिषद यकीनन देश में जवाबदेह पत्रकारिता को बढ़ावा देने में प्रमुख भूमिका निभा रही है। पत्रकारिता के बदलते परिदृश्य में, मैं यह महसूस करता हूँ कि पत्रकार बनने के इच्छुक लोगों के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता निर्धारित करने का समय आ गया है। यह सुनिश्चित करने के लिए पूर्णत: अनिवार्य है कि पत्रकारिता के मानकों और सदाचारों को बनाए रखा जाए और उनके साथ समझौता न किया जाए।

मित्रों, पत्रकारिता एक उच्च कोटि का व्यवसाय है और इस पेशे के ध्वज वाहकों के रूप में आप सबको यह सुनिश्चित करना होगा कि लोगों को सही जानकारी प्राप्त हो सके और वे पक्षपातपूर्ण और पक्षपाती सूचनाओं के विवश प्राप्तकर्ता न बनें।

धन्यवाद और जय हिंद!"