16 दिसंबर, 2019 को नई दिल्ली में वर्ष 2015 और 2016 के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा पुरस्कार (खान) प्रदान करने के बाद सभा में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु का संबोधन

नई दिल्ली | दिसम्बर 16, 2019

वर्ष 2015 और 2016 के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा पुरस्कार (खनन) के विजेताओं को सम्मानित करने के लिए आज आपके बीच उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है।

मैं खदान सुरक्षा के क्षेत्र में अनुकरणीय योगदान देने के लिए प्रत्येक पुरस्कार विजेता को हार्दिक बधाई देता हूं।

मुझे पता है कि आपकी नौकरी आसान नहीं है क्योंकि खनन को सबसे खतरनाक व्यवसायों में से एक माना जाता है। लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि खनन उद्योग के योगदान के बिना कोई भी देश विकसित नहीं हो सकता है।

हमारे देश में प्रचुर मात्रा में खनिज भंडार हैं। भारत में 95 खनिजों का उत्पादन होता है, जिसमें 4 ईंधन, 10 धातु, 23 अधातु, 3 परमाणविक और 55 गौण खनिज (भवन संबंधी पत्थर और अन्य सामग्री सहित) शामिल हैं।

देश का खनन क्षेत्र हमारी अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण खंड है जो राष्ट्रीय जीडीपी में लगभग 2.6 प्रतिशत योगदान देता है। वर्ष 2018-19 में, खनन और उत्खनन क्षेत्र द्वारा सकल मूल्य वर्धन 4 लाख और 10 हजार करोड़ रूपये था। यह 10 मिलियन से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार भी प्रदान करता है।

स्वतंत्रता के बाद से, मात्रा और मूल्य दोनों के संदर्भ में खनिज उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। आज बॉक्साइट, क्रोमाइट, लौह अयस्क और मैंगनीज अयस्क जैसे खनिजों के वैश्विक उत्पादन में हमारा स्थान 4 से लेकर 6 के बीच है।

हमें तीव्र आर्थिक विकास के लिए इन संसाधनों का लाभ उठाने हेतु अपने प्रमुख खनिजों के मूल्य श्रृंखलाओं का और विस्तार करने का प्रयास करना चाहिए।

प्रिय बहनों और भाइयों,

हाल के दिनों में खनन क्षेत्र में अन्वेषण को बढ़ावा देने और निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ाने के लिए कई प्रमुख नीतिगत हस्तक्षेप देखे गए हैं जिससे इस क्षेत्र के विकास में सहायता मिली है।

खनन कार्यों के पैमाने और विस्तार में इस वृद्धि के साथ, खनन सुरक्षा सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। यह जानकर खुशी हो रही है कि पिछले कुछ वर्षों में दुर्घटना से होने वाली मृत्यु की दर में लगातार गिरावट आई है। डीजीएमएस इसके लिए सराहना का पात्र है।

लेकिन तकनीकी प्रगति के बावजूद, खनन कार्यों में श्रमिकों की सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए खतरे बने हुए हैं जैसे कि साँस के साथ धूल का अंदर जाना; साँस के साथ विषाक्त धुएं और गैसों का अंदर जाना; विकिरण का खतरा; शोर से श्रवण क्षमता समाप्त हो जाना; तापाघात; थकान आदि। इसके साथ खनन स्थलों पर दुर्घटनाएं होती हैं जैसे कि छत ढहना, सैलाब आना, विस्फोट और आग लगना।

हमें आज भी वह दुर्भाग्यपूर्ण घटना याद है जिसमें मेघालय की एक अवैध रैट-होल खदान में 15 खनिकों की मौत हो गई थी।

तथ्य यह है कि खनन कार्यों के पैमाने में वृद्धि, मशीनीकरण में वृद्धि और दुर्गम भौगोलिक क्षेत्रों में खनन कार्य के विस्तार के साथ सुरक्षा संबंधी मुद्दे और जटिलताएं बढ़ रही हैं।

प्रिय बहनों और भाइयों,

भारतीय खनन उद्योग वर्तमान में परिवर्तन की दहलीज पर खड़ा है।

कोयले और तेल जैसे खनिजों की मांग को पूरा करने के लिए, मूल खनन कार्य तेजी से ठेकेदारों को आउटसोर्स किए जा रहे हैं।

कई बार ये ठेकेदार जोखिम लेने की मनोवृत्ति अपनाते हैं क्योंकि वे मुख्य रूप से उत्पादन को अधिकतम करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। इसके परिणामस्वरूप केवल अल्पकालिक लाभ के लिए सुरक्षा में निवेश की अधिकांशते: उपेक्षा कर दी जाती है।

यह स्वीकार्य नहीं है। प्रत्येक श्रमिक को सुरक्षित और उचित कार्य परिवेश का अधिकार है।

हमारा उद्देश्य "शून्य क्षति" के लक्ष्य के लिए निरंतर प्रयास करना होना चाहिए।

अध्ययनों से पता चलता है कि खनन उद्योग में बड़ी संख्या में घटनाएं मानव त्रुटि के कारण होती हैं। यह भी देखा गया है कि कौशल-आधारित त्रुटियां सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक हैं और सुरक्षा के दृष्टिकोण से इसपर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।

शोधकर्ताओं ने श्रमिक की उम्र, अनुभव और काम की शिफ्ट तथा निष्पादित किए गए असुरक्षित कार्य, जो दुर्घटनाओं का कारण बनता है, के बीच महत्वपूर्ण संबंध पाया है ।

इसलिए इस पहलू पर प्राथमिकता के आधार पर ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है।

दोषपूर्ण प्रबंधन और कार्य प्रथाओं की पहचान की जानी चाहिए और सुधारात्मक कदम उठाए जाने चाहिए।

किसी संगठन में सौंपे गए कार्य को कुशलतापूर्वक और सुरक्षित रूप से करने के लिए टीम के सदस्यों को पर्याप्त प्रशिक्षण और मार्गदर्शन प्रदान करने में नेतृत्व की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

इससे दुर्घटनाओं में काफी कमी आ सकती है और एक सुरक्षित कार्य वातावरण बनाने में मदद मिलेगी।

दूसरा मुद्दा प्रभावी विनियमन और निगरानी से संबंधित है।

तेजी से बदलती दुनिया में, हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि विधायी उपबंध और नियम लगातार अद्यतन होते रहें और उभरती नई तकनीकों के साथ इनका तालमेल बना रहे।

नई प्रौद्योगिकियों के लिए बिना बिलंब किए सुरक्षित संचालन प्रक्रियाओं का विकास किया जाना चाहिए ताकि इसका असुरक्षित संचालन न हो।

प्रिय बहनों और भाइयों,

सुरक्षा विनियमों के प्रति विधायी दृष्टिकोण इस मुद्दे से निपटने का एकमात्र तरीका नहीं हो सकता है।

अनुभव हमें यह दर्शाता है कि "शून्य क्षति" की ओर खनन उद्योग की प्रगति के लिए किसी संगठन के सभी कर्मचारियों में "रोकथाम की संस्कृति" का निर्माण महत्वपूर्ण है।

ऐसा उन सुरक्षा कार्यक्रमों से नहीं होगा जो उद्योग द्वारा उनपर थोपे जाते हैं, बल्कि केवल तभी होगा जब सुरक्षा को उद्योग और उसके मिशन के अभिन्न अंग के रूप में पूरी तरह से स्वीकार किया जाए।

प्रभावी सुरक्षा कार्यक्रम केवल तभी एक वास्तविकता बनेंगे, जब सभी स्तरों का प्रबंधन खनन उद्योग की मुख्यधारा में सुरक्षा संबंधी उत्तरदायित्व को पूरी तरह से एकीकृत करेगा।

खनन उद्योग के लिए बाह्य पर्यवेक्षण की वर्तमान प्रणाली के स्थान पर 'स्व-पर्यवेक्षण' और 'देखभाल के कर्तव्य' प्रमुख अवधारणाएं बननी चाहिए।

इसी तरह, सुरक्षा प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, और जोखिमों के आकलन के आधार पर "सुरक्षा प्रबंधन प्रणाली" बनाई जानी चाहिए।

कार्य स्थल के खतरों की निरंतर निगरानी के लिए नवीनतम तकनीकी उपकरणों और ई-गवर्नेंस का उपयोग किया जाना चाहिए।

प्रिय बहनों और भाइयों,

इस संस्कृति को अपनाने के लिए ऑपरेटरों, कर्मचारियों, सरकार और सभी हितधारकों को इसके प्रति 'मूल्य' के रूप में प्रतिबद्ध होना चाहिए। यह प्रक्रिया संगठनों को "प्रतिक्रिया की संस्कृति" से "रोकथाम की संस्कृति" की ओर ले जाएगी। किसी दुर्घटना होने या चोट लगने पर कारवाई करने के स्थान पर, संगठनों को समस्या उत्पन्न होने से पहले समस्या के संभावित कारणों को दूर करने के लिए सक्रिय होना होगा। इस प्रकार, खानों में सभी दुर्घटनाओं, चोटों और व्यावसायिक रोगों की रोकथाम पर ध्यान केंद्रित करने के लिए रोकथाम की संस्कृति पर आधारित एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाए जाने की आवश्यकता है।

खनन रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण योगदान देता है, इसलिए हमें खनन क्षेत्र में सभी स्तरों पर लैंगिक समानता पर ध्यान देना चाहिए।

मुझे यह जानकर खुशी हुई कि केंद्र सरकार ने खानों में महिलाओं के रोजगार पर प्रतिबंध में ढील दी है और जमीन के ऊपर और ओपेन कास्ट कार्यों में दिन के सभी घंटों में और जमीन से नीचे के कामकाज में तकनीकी, पर्यवेक्षी और प्रबंधकीय श्रेणी में दिन के घंटों में उनके रोजगार की अनुमति दी है।

इसके अलावा, मुझे खुशी है कि संसद में व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य परिस्थिति संबंधी संहिता पुरःस्थापित की गई है।

मुझे यह जानकर खुशी हुई कि खनन में निहित जोखिमों के मद्देनजर श्रम सुविधा पोर्टल के माध्यम से एक जोखिम आधारित निरीक्षण प्रणाली शुरू की गई है।

प्रिय बहनों और भाइयों,

सर्वोत्तम प्रयासों के बावजूद, खानों में आपदाएँ आ सकती हैं क्योंकि यह प्रतिकूल परिस्थितियों के खिलाफ एक सतत संघर्ष है। ऐसी आपदा से होने वाली क्षति को कम करने और फंसे हुए व्यक्तियों को बचाने के लिए आपातकालीन तैयारी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारत सरकार की संकट प्रबंधन योजना इस मुद्दे का समाधान करती है।

मैं इस बात की सराहना करता हूं कि खान सुरक्षा महानिदेशालय खानों में कृत्रिम पूर्वाभ्यास करके और खदान प्रबंधन तथा जिला प्रशासन, बचाव सेवाओं, राज्य आपदा मोचन बल को संवेदनशील बनाकर सक्रिय कदम उठा रहा है।

मैं आग्रह करूंगा कि आसपास की जनसंख्या के स्वास्थ्य पर खनन के प्रतिकूल प्रभाव को कम करने के लिए भी कदम उठाए जाएं। खनन क्षेत्रों में काम करने वालों और स्थानीय निवासियों को एक बेहतर वातावरण प्रदान करने की आवश्यकता है।

मुझे यह देखकर खुशी होगी कि उद्योग, सरकार, व्यवसाय और शिक्षाविदों सहित हमारे देश में खनन बिरादरी के सहयोगात्मक प्रयासों से हम अपनी खानों को अधिक सुरक्षित कार्य स्थलों में बदल सकें और साथ ही खनन को भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास के सुरक्षित और शक्तिशाली संचालक में बदल सकें।

मुझे विश्वास है कि खनन में राष्ट्रीय सुरक्षा पुरस्कार हमारे देश की खानों में सुरक्षा और कल्याण मानकों को बनाए रखने के लिए एक उत्कृष्ट प्रेरक साबित हुआ है और होता रहेगा।

धन्यवाद।

जय हिन्द।