16 अगस्त, 2019 को कोलकाता में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा पुनर्निर्मित गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के पैतृक घर श्यामोली को राष्ट्र को समर्पित करने के लिए आयोजित एक कार्यक्रम के अवसर पर सभा में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु का संब

कोलकाता | अगस्त 16, 2019

'मैं आज श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर के विरासत गृह श्योमाली का उद्घाटन करने और इसे राष्ट्र को समर्पित करने के अवसर पर आप सबके साथ हूँ जिसकी मुझे बहुत खुशी है।

श्यामोली 1935 में शांतिनिकेतन में बनाया गया एक प्रायोगिक मिट्टी का घर है। मुझे यह जानकर खुशी हो रही है कि हाल ही में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा इस घर का नवीकरण निक्षेप कार्य के रूप में किया गया है। मुझे बताया गया है कि यह ऐतिहासिक गृह वर्तमान में विश्व भारती की संपत्ति है।

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने बारह वर्ष की आयु में पहली बार शांतिनिकेतन का दौरा किया और अपने पिता महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर द्वारा बनाए गए घर में शांतिनिकेतन गृह के नाम से जाने जाने वाले घर में रुके। शांतिनिकेतन नाम इस घर से मिला है जो आज भी औपनिवेशिक वास्तुकला की महिमा का एक उदाहरण है।

रवींद्रनाथ ने चार दीवारों की सीमाओं के भीतर विद्यालय में अपनी शिक्षा के एक दर्दनाक और घुटन भरे बचपन के अनुभव से बाहर जाकर 1901 में शांतिनिकेतन में बच्चों के लिए एक विद्यालय की स्थापना की। इसके बाद उन्होंने शांतिनिकेतन आश्रम के उत्तरी कोने में 5 नए घर बनाए जो अब उत्तरायण के नाम से जाने जाते हैं और उनका नाम कोणार्क, उदयन, श्यामली, पुनश्च और उडिची रखा।

इतिहास कहता है कि श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर समय समय पर इन घरों में रहे और उन्होंने अपनी आवश्यकताओं के अनुसार इन घरों की योजना में विशेष रुचि ली।

मुझे बताया गया है कि श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर, ठोस संरचनाओं से असंतुष्ट थे और अपने अंतिम निवास के रूप में मिट्टी से बने एक नए घर की इच्छा रखते थे जिसके परिणामस्वरूप, श्यामली का निर्माण किया गया था और श्यामली की छत भी मिट्टी से बनी है।

उन्होंने आशा व्यक्त की कि श्यामली ग्रामीण बंगाल के गरीबी से पीड़ित परिवारों को आग में नष्ट होने वाली छप्पर की छतों के स्थान पर मिट्टी की छतों के लिए प्रोत्साहित करेगी। प्राकृतिक शीतलन प्रणाली शुरू करने के उद्देश्य से श्यामली के एक कमरे की मोटी मिट्टी की दीवारों और छत के अंदर जानबूझकर बड़े और खाली मिट्टी के बर्तन रखे गए थे।

रवीन्द्रनाथ ने 1936 में 'श्यामली' नामक कविता संकलन प्रकाशित करके इस घर को अमर कर दिया।

मुझे यह जानकर खुशी हो रही है कि यह घर सुरेन्द्रनाथ कार द्वारा डिजाइन किया गया, गौड मंडल की देखरेख में संथाल कारीगरों द्वारा बनाया गया और बाद में विश्व-भारती के कला-भवन के छात्रों के सहयोग से नंदलाल बोस और रामकिंकर बैज द्वारा सजाया गया था।

यह बहुत गर्व की बात है कि महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी 1940 में शांतिनिकेतन की अपनी यात्रा के दौरान इस घर में रुके थे और कवि की मृत्यु के बाद भी इस घर में रहना पसंद करते थे।

मेरे प्रिय बहनों और भाइयों,

श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर पहले एशियाई थे जिन्हें 1913 में साहित्य का नोबल पुरस्कार मिला था। वे कलकत्ता के मूल निवासी थे, जिन्होंने बंगाली भाषा में लिखा था और वे प्राय: अपने काम का अंग्रेजी में अनुवाद किया करते थे।

उन्होंने कविता, कथा, नाटक, निबंध और गीत लिखे; शिक्षा, सौंदर्यशास्त्र और धर्म में सुधारों को बढ़ावा दिया; और 60 के दशक के अंत में उन्होंने अपनी मृत्यु से पहले लगभग 2500 कला चित्रों और रेखा चित्रों का निर्माण करते हुए दृश्य कला की ओर रुख किया।

बंगाल के संर्दर्भ में, टैगोर का, अन्य सभी लोगों की तुलना में एक सर्वथा असाधारण साहित्यिक व्यक्तित्व रहा है और रहेगा।

रवीन्द्रनाथ की कविता, जो प्राय: मधुर गीतों का रूप लेती है, जिसे रवींद्रसंगीत कहा जाता है, ने लोकप्रिय बंगाली संगीत को अपनी विशेष चिंतनशील भाषा और संगत धुनों के संयोजन के साथ बदल दिया है।

अपनी कुछ कविताओं के अनुवाद के माध्यम से वे पश्चिम में तेजी से विख्यात हो गए। उनकी प्रसिद्धि ने एक प्रकाशमान ऊँचाई को प्राप्त किया, जो उन्हें व्याख्यान दौरों और मैत्री दौरों पर महाद्वीपों में ले गई।

भारत के लिए, विशेष रूप से बंगाल के लिए, वे एक महान जीवित संस्थान हैं और दुनिया के लिए, वे भारत की आध्यात्मिक विरासत की आवाज और उसके प्रतिनिधि बन गए।

वे वास्तव में भारत की शान और गौरव हैं।

शांतिनिकेतन रवींद्रनाथ टैगोर के सीखने के स्थान की दृष्टि को दर्शाता है जो धार्मिक और क्षेत्रीय बाधाओं से अप्रभावित है। शांतिनिकेतन की स्थापना 1863 में शिक्षा को कक्षा के दायरे से बाहर ले जाने में मदद करने के उद्देश्य से की गई थी।

1921 तक, शांतिनिकेतन धीरे-धीरे भारत के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक, विश्व भारती विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हो गया। यह देश की कुछ सबसे रचनात्मक प्रतिभाओं का निवास स्थान है।

शांतिनिकेतन को टैगोर द्वारा मानवतावाद, अंतर्राष्ट्रीयतावाद और एक संपोषणीय वातावरण के सिद्धांतों के आधार पर प्रेमपूर्वक से ढाला गया था।

उन्होंने एक अनूठा पाठ्यक्रम विकसित किया जो कला, मानवीय मूल्यों और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का इष्टतम मिश्रण था। आज भी, कोई व्यक्ति शांतिनिकेतन के प्रवेशमार्ग में संस्था में उनकी उपस्थिति, उनके जुनून, उनके समर्पण और उनके गर्व को महसूस कर सकता है।

वे ऐसे कवि थे जो ईमानदारी से मानते थे कि "उच्चतम शिक्षा वह है जो हमें केवल जानकारी नहीं देती बल्कि हमारे जीवन का सभी अस्तित्व के साथ सामंजस्य बिठाती है" और उन्होंने शिक्षा के एक संपन्न केंद्र के निर्माण की परिकल्पना की जहां प्रकृति का भ्रमण और उन्होंने सैर पाठ्यक्रम का एक हिस्सा थे और प्राकृतिक घटनाओं पर विशेष ध्यान दिया जाता था।

टैगोर ने ग्रामीण पुनर्निर्माण के साथ मदद करने और ग्रामीण जीवन की चुनौतियों के बारे में छात्रों को जागरूक करने के प्रयास के रूप में संथाल आदिवासी समुदाय के पड़ोसी गांवों के साथ विद्यालय के संबंधों का विस्तार करने की मांग की। मुझे यह जानकर खुशी हुई कि उनके प्रयासों के कारण शांतिनिकेतन आज पश्चिम बंगाल में शिक्षित संथालों का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है।

जैसा कि हमारे राष्ट्र पिता, महात्मा गांधी ने कहा था, "मैं नहीं चाहता कि मेरे घर को हर तरफ दीवारों से घेर लिया जाए और मेरी खिड़कियां ठसाठस भरी हों। मैं चाहता हूँ कि सभी जगहों की संस्कृति का यथासंभव स्वतंत्र रूप से मेरे घर में आवागमन हो। लेकिन मैं किसी भी एक संस्कृति की आंधी में उड़ना नहीं चाहता हूँ।" पिछले कुछ वर्षों में, शांतिनिकेतन ने अपने मूल तत्व को संरक्षित रखते हुए बदलते समय के अनुसार स्वयं को अनुकूलित किया है।

मेरे प्रिय बहनों और भाइयों,

टैगोर हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की रक्षा, उसके पोषण और प्रचार-प्रसार के मूल्य में प्रबल विश्वास रखते थे। उन्होंने एक बार कहा था, "संगीत और ललित कलाओं के बिना, एक राष्ट्र में राष्ट्रीय आत्म-अभिव्यक्ति के अपने उच्चतम साधनों का अभाव रहता है और लोग मूक व अनभिव्यक्त रहते हैं।

भारत मूर्त और अमूर्त दोनों तरह की सांस्कृतिक विरासत का खजाना है। हमारी विरासत हमारी पहचान है; यह हमें अद्वितीय और असाधारण बनाती है। भारत हमेशा अपनी समृद्ध और बेहद विविध सांस्कृतिक विरासत के कारण दुनिया में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

यह हमारा कर्तव्य और जिम्मेदारी है कि हम हर स्मारक और कला रूप की रक्षा करें और इसे भावी पीढ़ी तक पहुंचाएँ ताकि वे भारत के गौरवशाली इतिहास को पूर्ण रूप से समझ सकें। हमारी सांस्कृतिक विरासत हमारी सामूहिक विरासत है। हमें इसे संरक्षित करना होगा ताकि आने वाली पीढि़यों को हमारी महान सांस्कृतिक विरासत के शैक्षिक, सांस्कृतिक और सौंदर्य परक लाभ प्राप्त हो सकें।

प्राचीन काल से, भारत अपनी वास्तुकला संबंधी अद्भुत प्रतिभा, विशेष रूप से स्थानीय वास्तुकला के लिए, जाना जाता है। भारतीय देशी वास्तुकला में अनौपचारिक, कार्यात्मक संरचनाएं शामिल हैं, जो प्राय: भारत के ग्रामीण इलाकों में पाई जाती है और स्थानीय सामग्रियों से निर्मित होती हैं और स्थानीय लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए डिज़ाइन की गयी हैं।

इन संरचनाओं के निर्माणकर्ता प्राय: औपचारिक वास्तुशिल्प डिजाइन में अशिक्षित थे और उनका काम भारत की जलवायु की समृद्ध विविधता को दर्शाता है। वे स्थानीय रूप से उपलब्ध निर्माण सामग्री का उपयोग करके बनाए गए थे और स्थानीय सामाजिक रीति-रिवाजों और शिल्प कौशल में जटिल बदलाव का प्रतीक थे।

भारतीय देशी वास्तुकला स्थिरता का प्रतीक है। ये संरचनाएं भविष्य के वास्तुकारों और बिल्डरों के लिए, स्थायी आवास के मॉडल के रूप में काम करती हैं और इसलिए जहां आवश्यक हो इन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए।

मैं बहुत अच्छी तरह से नवीनीकरण के काम की कठिन प्रकृति को समझता हूँ।

यह कोई आसान कार्य नहीं है।

लेकिन हम अपने वास्तुशिल्प रत्नों को उपेक्षा और जड़ता के वजन के नीचे दबने नहीं दे सकते। जैसा कि प्रसिद्ध संस्कृत नाटककार भास ने कहा था, "खजाने को संरक्षित करना उसे पाने से अधिक कठिन है।"

मैं श्यामली के एएसआई द्वारा किए गए महान नवीनीकरण कार्य के लिए उसकी सराहना करता हूं।

सरकार और नागरिक समाज संगठनों को एक साथ मिलना चाहिए और हमारी मूर्त और अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का कार्य करना चाहिए।

सरकार और नागरिक समाज समूहों दोनों को भी इन इमारतों के मूल्य के बारे में व्यापक स्तर पर लोगों के बीच जागरूकता पैदा करने के लिए काम करना चाहिए और इन वास्तु चमत्कारों को संरक्षित करने का दायित्व इस देश के प्रत्येक नागरिक का भी बनता है।

आम जनता को इन कीमती इमारतों को बचाने और इनका दुरुपयोग करने से बचना चाहिए और इन रत्नों के आगे अध: क्षरण को रोकने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए।

मुझे यह देखकर खुशी हुई कि हाल के वर्षों में स्मारकों के संरक्षण और सुरक्षा के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी बनाने और सांस्कृतिक परंपराओं और कला रूपों का प्रचार करने के लिए शुरुआत की गई है। ऐसे कई और प्रयासों की परिकल्पना की जानी चाहिए।

इस विरासत गृह को राष्ट्र को समर्पित करने से सभी को उसका समृद्ध इतिहास उपलब्ध होगा। यह उनके प्रति सबसे अच्छी श्रद्धांजलि है जो देश के इस अमर कवि को अर्पित की जा सकती है जिनका ज्ञान और बुद्धि के लोकतंत्रीकरण में हमेशा विश्वास रहा है।

मुझे आशा है कि यह संरचना छात्रों और ज्ञान पिपासुओं के लिए समान रूप से एक निवास साबित होगी। मैं टैगोर को उनकी काव्य पंक्तियों द्वारा अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं जो शायद उनके द्वारा लिखी गई सबसे शक्तिशाली पंक्तियाँ हैं।

“जहाँ मन निर्भय हो व सिर सम्मान से उठा हो

जहां ज्ञान मुक्त हो

जहां दुनिया टुकड़े-टुकड़े न हो

संकीर्ण घरेलू दीवारों में

जहां सत्य की गहराई से शब्द निकलते हों

जहां अथक प्रयास अपनी बाहों को पूर्णता की ओर बढ़ाते हों

जहां विवेक की स्पष्ट धारा ने अपना रास्ता नहीं खोया हो

मृत आदत के सुनसान रेगिस्तान की रेत में

जहां मन आपसे प्रेरित होकर निरंतर प्रगतिशील विचारों और कर्म की ओर अग्रसर हो

कभी भी विचार और कार्रवाई में व्यापक

स्वतंत्रता के उस स्वर्ग में, मेरे परम पिता, मेरे देश को जागृत कर दो ”।

मैं आशा करता हूँ कि ये छंद हमेशा आपकी आगे की यात्रा में आपके लिए दिशासूचक के रूप में कार्य करेंगे।

धन्यवाद!

जय हिन्द!"