16 अक्तूबर, 2017 को चेन्नई में तीसरे भारत अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव-2017 में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

चेन्नई | अक्टूबर 16, 2017

मैं भारत अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव-2017 में आकर मुदित हूं। यह विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय एवं विज्ञान भारती द्वारा आयोजित किए जाने वाले ऐसे कार्यक्रमों की श्रृंखला में तीसरा कार्यक्रम है।

मानवजाति के विकास के लिए विज्ञान मूलभूत तत्व है। वैज्ञानिक आविष्कारों से दुनिया में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं और इनसे आधुनिक जीवन के प्रत्येक पहलू को नया रूप मिला है। भारतीयों ने प्राचीनकाल से विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है और अब भारतीय विश्व को पछाड़ते हुए अत्याधुनिक अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी तथा सूचना प्रौद्योगिकी में सबसे अग्रणी बने हुए है।

मित्रो, विज्ञान और प्रौद्योगिकी भारत की संस्कृति और परंपरा का हिस्सा बने रहे हैं। प्राचीन भारत में व्याप्त वैज्ञानिक रुझान अन्य के साथ-साथ शून्य के प्रयोग, स्थान मूल्यों, बीज-गणित, परमाणु की अवधारणा, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण की गणना से परिलक्षित होता है। 'सुश्रुत संहिता' में शल्य क्रिया की बात की गई है जबकि चरक ने सैकड़ों प्रकार की बीमारियों, उनके कारणों तथा उनके उपचार की विधियों का वर्णन किया है।

मोहेंजोदड़ो तथा हड़प्पा की शहरी बस्तियाँ, सर्वोत्तम किस्म के इस्पात का उत्पादन तथा चीनी का निष्कर्षण अन्य ऐसे उदाहरण हैं जो यह दर्शाते हैं कि भारत शेष विश्व की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक विकसित था।

महान वैज्ञानिक एल्बर्ट आइस्टाइन ने प्रामाणिक स्वर में कहा था, "हम भारतीयों के बहुत ऋणी हैं जिन्होंने हमें गणना करनी सिखाई, जिसके बगैर कोई भी लाभप्रद वैज्ञानिक खोज संभव नहीं हो पाती।"

सुविख्यात लेखक और दार्शनिक विल डूरंट को यह कहना पड़ा : भारत हमारी संतति की जननी और संस्कृत यूरोप की भाषाओं की जननी है। भारत हमारे दर्शन, और काफी हद तक गणित ईसाइयत में वर्णित आदर्शों, स्वशासन और लोकतंत्र की जननी है। कई मायनों में भारत माता हम सबकी मां है।

खगोल शास्त्र, गणित, योग और आयुर्वेद के क्षेत्र में प्राचीन काल के अपने ज्ञान को विश्व में प्रदर्शित करने के पश्चात् मुगलों के आक्रमणों और औपनिवेशिक दासता के दौरान भारत अपने मार्ग से भटक गया था। अब समय आ गया है कि प्रत्येक भारतीय अपने अतीत के गौरव को पुन: प्राप्त करने की दिशा में काम करे और भारत को आगामी दशकों में वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीय नवोन्मेशों के क्षेत्र में अग्रणी स्थान दिलाए।

इसे साकार बनाने के लिए, सरकारों के साथ-साथ, शिक्षकों-जो युवा मस्तिष्क को आकार देते हैं से लेकर विश्वविद्यालयों एवं उद्योगों, जो बड़ी मात्रा में अनुसंधान एवं विकासोन्मुखी कार्यकलापों को गति प्रदान करते हैं, तक समाज के विभिन्न वर्गों को संगठित प्रयास करना होगा।

दूरबीन के आविष्कार से लेकर हिग्स बोज़ोन की खोज तक, उल्लेखनीय वैज्ञानिक आविष्कारों के बावजूद विश्व में यह देखा गया है कि मानव सभ्यता को असंख्य चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जैसे कि जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वॉर्मिंग, टिकाऊ विकास, स्वच्छ ऊर्जा और जल और बीमारियां। केवल विज्ञान ही मौजूदा एवं आने वाले वर्षों में उत्पन्न होने वाली समस्याओं के लिए समाधान प्रदान कर सकता है। कृत्रिम प्रज्ञा (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस), रोबॉटिक्स, इंटरनेट सूचना प्रेषण, बड़े पैमाने पर डेटा विश्लेषण (बिग डेटा ऐनलिटिक्स) तथा डिजिटल निर्माण से हमारे जीने के ढंग बदलने वाले हैं। इन क्षेत्रों का नवीन और प्रतिस्थापित प्रौद्योगिकी से दोहन किए जाने की आवश्यकता है।

हमारा देश गरीबी, बेरोजगारी, प्रदूषण, बीमारियों, शहरी-ग्रामीण अंतर, स्वच्छ पेयजल की कमी जैसी समस्याओं के साथ-साथ अपराध एवं सुरक्षा जैसे मुद्दों का सामना कर रहा है, जिन पर काबू पाने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी में निवेश की मात्रा बढ़ाए जाने की आवश्यकता है।

इस मौके पर, मैं विभिन्न कॉरपोरेट निकायों और उद्योगों से अपील करना चाहूंगा कि वे हाथ मिलाएं और नवोन्मेषी, लीक से हटकर अनुसंधान और विकास परियोजनाओं तथा वर्तमान प्रौद्योगिकी को प्रतिस्थापित करने वाली क्रांतिकारी प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के लिए एक विशेष निधि की स्थापना करें, जिससे जनता को पेश आने वाली समस्याओं का स्थायी समाधान उपलब्ध कराया जा सके।

मुझे इस बात की खुशी है कि केन्द्र में उत्तरवर्ती सरकारों ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को महत्व प्रदान किया है तथा वैज्ञानिकों एवं अध्येताओं को अपने शोध कार्य को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक अवसंरचना उपलब्ध कराई है। सीएसआईआर एवं आईसीएमआर उन अग्रणी शोध संस्थाओं में से हैं, जिन्होंने अपने अत्याधुनिक कार्य से वैश्विक ख्याति अर्जित की है।

इन दोनों प्रमुख संस्थानों को मेरा सुझाव है कि वे प्रतिभाशाली अनुसंधानकर्ताओं के आगे बढ़ने के लिए अनुकूल परिवेश का निर्माण करें और यह सुनिश्चित करें कि युवा वैज्ञानिकों की प्रगति में नियम कानून, नौकरीशाही और पक्षपात आड़े न आए। वे विचार-विमर्श करने के लिए और नवेन्मेशी अनुसंधान के लिए स्वतंत्र महसूस करें।

मैं चाहूंगा कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग स्कूल के समय से ही विज्ञान की पढ़ाई को रुचिकर और संवादमूलक बनाने के लिए मानव संसाधन मंत्रालय के साथ कदम से कदम मिलाकर कार्य करे। ऐसा करना स्कूली छात्रों में विज्ञान में अपेक्षाकृत और अधिक रुचि उत्पन्न करने के लिए आवश्यक है जिससे अधिकाधिक युवा आधारभूत अनुसंधान की ओर उन्मुख हो सकें।

मुझे यह जानकर खुशी है कि मंत्रालयों ने अपने कार्यकलापों को मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्वस्थ भारत और स्वच्छ भारत की ओर सरकार के राष्ट्रीय एजेंडे के साथ सुमेलित किया है। यह भी गर्व की बात है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग 30 मीटर की दूरबीन परियोजना और लेज़र इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल वेव ऑब्ज़रवेटरी प्रोजेक्ट जैसी कई वैश्विक परियोजनाओं में शामिल हैं, उसे यह जानकर भी खुशी हुई है कि जैव प्रौद्योगिकी विकास की दृष्टि से भारत का 12वां स्थान है और एशिया प्रशांत क्षेत्र में इसका तीसरा स्थान है। अमेरिका के बाद भारत ऐसा दूसरा देश है जिसके पास सबसे अधिक यूएस फूड एण्ड ड्रग ऐडमिनिस्ट्रेशन (यूएसएफडीए) द्वारा अनुमोदित संयंत्र हैं। साथ ही भारत रिकॉम्ब्निैन्ट हैपटाइटिस बी के टीके का सबसे बड़ा उत्पादक देश है।

मुझे पूरा विश्वास है भारत-अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान महोत्सवों की उस श्रृंखला से नए विचार विकसित होंगे और यह लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने में एक उत्प्रेरक की भूमिका अदा करेगी। अंत में, विज्ञान को मानव सभ्यता के सम्मुख उत्पन्न समस्याओं के समाधान खोजना चाहिए तथा इस ग्रह को मौजूदा एवं भावी पीढ़ियों के रहने योग्य एक बेहतर जगह बनाना चाहिए। जय हिन्द।