15 सितंबर 2020 को नई दिल्ली से ऑनलाइन ग्लोबल आयुर्वेद शिखर सम्मेलन के उद्घाटन के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | सितम्बर 15, 2020

मुझे आज महामारी के दौरान आयुर्वेद के लिए उभरते अवसरों पर 'आयुर्वेद फॉर इम्युनिटी' विषय पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन और प्रदर्शनी का उद्घाटन करने के दौरान आप सभी के बीच आकर अपार हर्ष की अनुभूति हो रही है।

मुझे यह जानकर खुशी है कि इस तरह का वैश्विक आयोजन वेब के माध्यम से केरल में हो रहा है।

मैं महामारी संकट काल के बावजूद, इस अत्यावश्यक कार्यक्रम की अवधारणा और आयोजन के लिए भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) को बधाई देता हूं। यह केवल एक कार्यक्रम नहीं है, अपितु एक ऐसे महत्वपूर्ण स्वास्थ्य मिशन का प्रदर्शन है जो हमें इस महामारी के गंभीर प्रभावों से निपटने के लिए अत्यधिक सशक्त बनाएगा।

मेरी प्यारी बहनों और भाइयों,

प्राचीन काल से, भारत में रोगों के उपचार के लिए एक बहुत ही व्यवस्थित, वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण रहा है।

अथर्ववेद चिकित्सा के क्षेत्र में ज्ञान और विद्या का खजाना है। भारत में चिकित्सा जानकारी के शुरुआती स्रोत के रूप में इसकी सराहना की जाती है।

आयुर्वेद को अथर्ववेद का एक उपवेद या उप-विषय माना गया है। इसका इतिहास छठी शताब्दी ईसा पूर्व का है। इसे मानव को ज्ञात"सबसे पुरानी चिकित्सा प्रणाली" होने के साथ ही यह विश्व की सबसे व्यापक आध्यात्मिक शिक्षा की पुस्तक होने का गौरव प्राप्त है।

आयुर्वेद की नींव हिंदू दार्शनिक शिक्षाओं के प्राचीन विद्यालयों, वैशेषिका और तर्कशास्त्र की पाठशाला जिसका नाम न्याय था, द्वारा रखी गई थी।

चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टनाग हृदय कुछ अन्य ग्रंथ हैं जिनमें आयुर्वेद के बारे में ज्ञान का विपुल भंडार है।

अथर्ववेद के मंत्र जड़ी बूटियों, धातुओं, दवाओं, रोगों और उपचार के बारे में ज्ञान का भंडार है। उनमें पौधों द्वारा रोगों के उपचार वाले आश्चर्यजनक गुणों और शक्तियों का उल्लेख किया गया है।

आयुर्वेद के चिकित्सीय सिद्धांत प्रकृति और त्रिदोष पर केंद्रित हैं। ये सिद्धांत प्रतिपादित करते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी एक विशिष्ट संरचना होती है और यह उपचार और दवा के लिए अलग-अलग प्रतिक्रिया करती है।

आयुर्वेद में यह माना जाता है कि स्वस्थ जीवन के लिए प्रकृति के तत्वों और मानव शरीर के त्रिदोषों के बीच एक उचित संतुलन बनाए रखा जाना चाहिए।

आयुर्वेद के प्रचलन को संस्कृत और साथ ही कई अन्य भारतीय भाषाओं में लिखे गए सैकड़ों प्राचीन ग्रंथों में प्रलेखित किया गया है।

आयुर्वेद का पिछली कई शताब्दियों के दौरान भारत की विशाल आबादी को प्राथमिक और यहां तक कि तृतीयक स्वास्थ्य देखभाल सेवाएं प्रदान करने का एक निर्बाध इतिहास है।

प्राचीन भारत के कई शासकों ने इसे संरक्षित किया। कहा जाता है कि मौर्य साम्राज्य ने आयुर्वेद को एक संस्थागत आधार दिया है जो व्यापार, वाणिज्य और कृषि क्षेत्रों से प्रारंभ हुआ।

वर्तमान में, आयुर्वेद को चिकित्सा और स्वास्थ्य क्षमताओं सहित एक अनुकूल स्वास्थ्य देखभाल विज्ञान के रूप में विश्व स्तर पर मान्यता प्रदान की गई है। यह केवल चिकित्सा प्रणाली ही नहीं अपितु एक जीवन दर्शन भी है।

इसमें मनुष्यों को प्रकृति का एक अभिन्न अंग माना गया है। इसमें जीवन के एक समग्र तरीके पर बल दिया गया है जहां व्यक्ति स्वयं और अपने आस-पास की दुनिया के साथ सद्भाव से रहता है।

स्वास्थ्य और कल्याण के लिए इसका दृष्टिकोण जीवन के अद्वितीय भारतीय दर्शन में दृढ़ता से निहित है।

मेरी प्यारी बहनों और भाइयों,

आज पूरा विश्व एक अभूतपूर्व महामारी की चपेट में है। आज हम जिस पैमाने और अनुपात में वैश्विक 'शट डाउन' देख रहे हैं, वैसा संभवत हमारे इतिहास में पहली बार हुआ है। इसके सामाजिक-आर्थिक प्रभाव अकल्पनीय हैं। इसने हमारे खाने, काम करने, यात्रा करने और लोगों के साथ बातचीत करने के तरीके सहित जीवन के प्रत्येक पहलू को बदल दिया है। इसने अर्थव्यवस्थाओं और विभिन्न व्यवसायों को बुरी तरह प्रभावित किया है।

इस महत्वपूर्ण मोड़ पर, हमें इस बात का आत्मनिरीक्षण करना चाहिए कि इस दुर्जेय संकट के बाद भारत कैसे एक विजेता के रूप में उभर सकता है। इस संक्रमण के प्रसार को सफलतापूर्वक रोकने पर बहुत कुछ निर्भर होगा। आयुर्वेद में बताए गए प्राकृतिक उपचारों के माध्यम से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने और रोग प्रतिरक्षा का निर्माण करना इस 'वायरस' का मुकाबला करने का एक दीर्घकालिक उपाय होगा।

आयुर्वेद का निवारक देखभाल संबंधी व्यापक ज्ञान आधार, "दिनचर्या"- दैनिक रहन-सहन और "ऋतुचर्या" - स्वस्थ जीवन के लिए मौसमी रहन-सहन की अवधारणाओं पर आधारित है।

तुलसी, दालचीनी, काली मिर्च, सूखी अदरक, किशमिश और गुड़ से बनी हर्बल चाय पीने और खाना पकाने में हल्दी, जीरा जैसे मसालों तथा धनिया और लहसुन के उपयोग जैसे सरल उपायों के माध्यम से प्रतिरक्षण प्रणाली को मजबूत किया जा सकता है।

जैसा कि आयुष मंत्रालय द्वारा परामर्श दिया गया है, योग का दैनिक अभ्यास, विशेष रूप से प्राणायाम और कम से कम 30 मिनट के लिए ध्यान भी सामान्य स्वास्थ्य और तंदरूस्ती को बेहतर बनाने में सहायक होगा।

मुझे यह जानकर प्रसन्नता है कि आयुर्वेद की रोग निवारण क्षमताओं को मान्यता प्रदान करते हुए, केरल सरकार द्वारा सीआईआई के सहयोग से आयुर रक्षा क्लीनिकों के विस्तार के रूप में 'आयुशील्ड'जैसी पहलें प्रारंभ की जा रही हैं।

आयुर्वेद भारत और दुनिया पर मंडरा रही महामारियों से बचाव कर सकता है।

सुप्रलेखित वैज्ञानिक साक्ष्यों के माध्यम से आयुर्वेदिक दवाओं के गुणों का और पता लगाने तथा भारत और दुनिया भर के लोगों को आयुर्वेद के कई प्रकार के लाभ प्रदान करने की आवश्यकता है।

भारत पहले ही दुनिया के लिए सस्ती और गुणवत्तापूर्ण दवाओं का स्रोत है। यह दुनिया के लिए बेहतरीन उपचार और चिकित्सा पर्यटन का सबसे पसंदीदा स्थान भी बन कर उभर सकता है।

ऐसी स्थिति निर्मित करने के लिए, हमें अनुभवजन्य साक्ष्य के माध्यम से चिकित्सा की हमारी पारंपरिक प्रणालियों को और सुदृढ़ तथा श्रेष्ठ बनाना होगा। इसके साथ ही, अवलोकन और अनुभव के आधार पर आयुर्वेद को एक प्रभावी स्वास्थ्य देखरेख प्रणाली के रूप में प्रासंगिक बनाए रखने के लिए इसका सतत्‍ विकास करना होगा।

मैं निजी कंपनियों और सरकार से आग्रह करता हूं कि वे नई दवाओं को विकसित करने और उनका परीक्षण करने के लिए अत्याधुनिक आरएंडडी सुविधाओं की स्थापना करें। इन संस्थानों को भारत और दुनिया भर में किए जा रहे स्वदेशी दवाओं के विभिन्न प्रारूपों के विकास के समेकन और निरंतर प्रलेखन केंद्र के रूप में भी कार्य करना चाहिए।

राष्ट्रों को स्वेच्छा से अपनी पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के बारे में जानकारी और ज्ञान साझा करना चाहिए ताकि संपूर्ण मानवता को, विशेष रूप से कोरोना वायरस जैसे वैश्विक संकटों के समय, इसका लाभ मिल सके। हालांकि, कोई भी प्रोटोकॉल या प्रचलन साक्ष्य-आधारित होना चाहिए।

चिकित्सा की पारंपरिक और आधुनिक प्रणालियों के बीच अंतर्विषयी संबंध भी होना चाहिए ताकि एक-दूसरे से सीखते हुए समग्र स्वास्थ्य के लिए एक-दूसरे का सहयोग किया जा सके।

आयुर्वेद को गैर-संचारी रोगों, पेशीय-कंकाल संबंधी विकारों, अपक्षयी और जीवन-शैली संबंधी बीमारियों और प्रसव पूर्व तथा प्रसव उपरांत देखभाल से संबंधित क्षमताओं के लिए भी तेजी से मान्यता प्रदान की जा रही है। भारत में गैर-संचारी और जीवन शैली संबंधी बीमारियों की बढ़ती घटनाओं के मद्देनजर आयुर्वेद की यह क्षमता विशेष रूप से प्रासंगिक हो गई है।

भारत सरकार की 'आयुष्मान भारत' दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना है। ऐसी योजनाओं की अपार पहुंच का उपयोग आयुर्वेद के लाभों को सभी तक पंहुचाने के लिए किया जा सकता है।

आयुर्वेद उद्योग बड़े पैमाने पर एक रोजगार प्रदाता भी है। इसलिए हमें आयुर्वेद और संबद्ध क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करते हुए कार्यक्रमों की अभिकल्पना करनी चाहिए। इससे सेवाओं के निर्यात को बढ़ावा देने में भी सहायता मिलेगी।

हमें अपनी पारंपरिक चिकित्सा पद्धति, विशेष रूप से अधिक संख्या में स्वास्थ्य स्टार्ट-अप को प्रोत्साहित और संवर्धित करते हुए, में अधिक संसाधनों का निवेश करना चाहिए।

आयुर्वेद में आधुनिक तकनीक की अपार संभावनाओं का उपयोग करना चाहिए। आयुर्वेद उद्यमियों को 'नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन' जैसे निकायों के साथ सहयोग करना चाहिए। इससे आयुर्वेद को अब तक अनछुए प्रौद्योगिकी क्षेत्रों से जोड़ कर विश्व स्तर पर आयुर्वेद को लोकप्रिय बनाने के उपाय खोजे जा सकते हैं।

हमें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारा बीमा क्षेत्र आयुर्वेद का समर्थन करे। हमें यह सुनिश्चित करने के लिए भी निरंतर निगरानी करनी चाहिए कि हमारी दवाओं की गुणवत्ता, उपचार 'प्रोटोकॉल' और समग्र प्रबंधन प्रक्रिया दोषरहित गुणवत्ता वाली हो।

भारतीय सभ्यता ने सदैव पूरी दुनिया की भलाई के लिए प्रार्थना की है। बृहदारण्यकोपनिषद उपदेशों के शांतिमन्त्र:

"सर्वे भवन्तु सुखिन:

सर्व संतु निरामया:"

का अर्थ है "सभी खुश रहें! सभी निरोगी रहें!"

मुझे उम्मीद है कि यह वैश्विक आयुर्वेद शिखर सम्मेलन संपूर्ण मानवता के कल्याण के लक्ष्य को पूरा करने की दिशा में एक समुचित कदम होगा।

इसी के साथ, मुझे वैश्विक आयुर्वेद शिखर सम्मेलन के चौथे संस्करण की घोषणा करते हुए खुशी हो रही है। मुझे उम्मीद है कि इस शिखर सम्मेलन में सुविज्ञ चर्चा, उत्साहपरक बहस और सार्थक विचार-विमर्श होगा और इससे भारत और विश्व में आयुर्वेद का विज्ञान और प्रचलन सुदृढ़ होगा।

धन्यवाद!

जय हिन्द!