15 नवंबर, 2017 को विजाग, आन्ध्र प्रदेश में आन्ध्र प्रदेश कृषि प्रौद्योगिकी सम्मेलन, 2017 के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया अभिभाषण

विशाखापत्तनम, आन्ध्र प्रदेश | नवम्बर 15, 2017

"आन्ध्र प्रदेश कृषि प्रौद्योगिकी सम्मेलन, 2017 के उद्घाटन सत्र पर आप सभी के साथ यहां होने पर मुझे प्रसन्नता हो रही है।

हमारा देश ऐसा है जहां कृषि-पारिस्थितिकीय विविधताएं बहुत अधिक हैं तथा ग्रामीण क्षेत्रों में संपूर्ण श्रम-शक्ति का 64 प्रतिशत भाग कृषि कार्यों में लगा हुआ है तथा संपूर्ण ग्रामीण निवल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान 39 प्रतिशत है।

भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका है। मत्स्य-पालन और वानिकी क्षेत्र सहित कृषि क्षेत्र ने वर्ष 2011-12 के मूल्यों के अनुरूप वर्ष 2016-17 के दौरान सकल मूल्य संवर्धन (जी.वी.ए.) में 17 प्रतिशत का योगदान दिया है।

स्वाधीनता के पश्चात विगत सत्तर वर्षों के दौरान महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। देश के खाद्यान्न उत्पादन में 8.7 प्रतिश्त वृद्धि हुई है और वर्ष 2016-17 में यह 273.83 मिलियन टन के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया है।

जैसा कि खाद्य एवं कृषि संगठन ने स्वीकार किया है:

"भारत विश्व में दूध, दालों और पटसन का सबसे बड़ा उत्पादक है तथा चावल, गेंहू, गन्ना, मूंगफली, सब्जियों, फलों और कपास का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। भारत का खाद्यान्न उत्पादन का स्तर 1950 में 50 मिलियन टन से पांच गुना बढ़कर 2014-15 में 257 मिलियन टन हो गया है। भारत प्रतिवर्ष 130 मिलियन टन से भी अधिक मात्रा में दूध का उत्पादन करता है और विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक है। दुग्ध उत्पादन क्षेत्र भी ग्रामीण लोगों, विशेषकर महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराने वाले सबसे बड़े क्षेत्रों में से एक है। मत्स्य उत्पादन में भारत का स्थान विश्व में दूसरा है, यहां प्रतिवर्ष 10 मिलियन टन का उत्पादन करता है और मत्स्य उत्पादन के मामले में यह केवल चीन से पीछे है।"

तथापि, हमारे सामने कठिन चुनौतियां हैं।

हमने अपने लिए वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने संबंधी अत्यंत महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। एक आकलन के अनुसार, यदि हमें यह लक्ष्य प्राप्त करना है तो हमें 33 प्रतिशत की दर से प्रगति करते हुए विकास के विभिन्न स्रोतों में आगे बढ़ना होगा।"

स्पष्ट है कि सामान्य कार्य पद्धति से कार्य फलीभूत नहीं होगा। हमें नवोन्मेष करना होगा। हमें ज्ञान और प्रौद्योगिकी को संव्यवहार में लाने के लिए किसानों के साथ मिलकर कार्य करना होगा। हमें उत्पादकता बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकी का प्रयोग करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बढ़े हुए उत्पाद के आर्थिक लाभ सभी किसानों तक पहुंच सकें। कृषि क्षेत्र में सुधार लाने के लिए कृषि प्रौद्योगिकी को सूचना प्रौद्योगिकी के साथ मिलाकार कार्य करना होगा। कृषि क्षेत्र में प्रतिवर्ष औसतन 2 प्रतिशत की दर से श्रम-शक्ति का ह्रास हो रहा है। यह एक सामान्य धारणा है कि कृषि लाभकारी व्यवसाय नहीं है। इस अवधारणा तथा रुझान बढ़ाये जाने की आवश्यकता है।

यह स्पष्ट है कि हमें ऐसे अनेक मुद्दों पर सुनियोजित, समन्वित तथा सकेन्द्रित कार्रवाई करने की आवश्यकता है जिनसे कृषि क्षेत्र के विकास और उन लोगों के जीवन की गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ता है जो प्रमुख रूप से इसी क्षेत्र पर निर्भर करते हैं।

खाद्य सुरक्षा की जो वर्तमान स्थिति बनी हुई है हम उसके बारे में संतुष्ट नहीं रह सकते। हमारे देश की बढ़ती जनसंख्या की बढ़ती हुई आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए यह आवश्यक है कि हम स्वदेशी आधार पर अपनी खाद्य सुरक्षा कार्य योजना तैयार करें। खाद्यान्नों के बढ़े हुए उत्पादन एवं समुचित संवितरण के माध्यम से हम अपने देश को शून्य भुखमरी-स्तर तथा सभी के लिए समुचित सुपोषण का लक्ष्य प्राप्त करने की दिशा में ले जा सकते हैं।

आन्ध्र प्रदेश कृषि प्रौद्योगिकी सम्मेलन, 2017 वैश्विक नेताओं, स्टार्ट-अप उद्यमियों और प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों के लिए आन्ध्र प्रदेश सहित शेष भारत में कृषि में कायाकल्प करने संबंधी न्वोन्मेषी विचारों पर चर्चा करने का एक उत्कृष्ट अवसर है। मुझे प्रसन्नता है कि छोटे किसानों की समस्याओं तथा अन्य मुद्दों का समाधान करने की दिशा में नवोन्मेषकों के बीच प्रतिस्पर्द्धा हो रही है और राज्य सरकार राज्य भर में वास्तव में संवहनीय समाधान उपलब्ध कराने का इरादा रखती हैं। मुझे प्रसन्नता है कि मुख्य ध्यान केवल नए विचारों के सृजन पर ही नहीं दिया जा रहा है बल्कि अच्छे विचारों को कार्यक्रमों में परिणत करने पर भी दिया जा रहा है। वस्तुत:, यह समय की मांग है। हमें दुनिया भर के सर्वाधिक मेधावी लोगों से सीखना चाहिए और हमारे किसानों के जीवन को बदलने के लिए ज्ञान और कौशल को अपनाना चाहिए।

प्रौद्योगिकी से किसानों के जीवन में अनेक प्रकार से सुधार करने में सहायता मिल सकती है। मैं यहां पांच महत्वपूर्ण क्षेत्रों का उल्लेख करना चाहूंगा जो मेरे विचार से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

प्रौद्योगिकी किसानों को मृदा का स्वास्थ्य जानने में समर्थ बनाती है और उसे विभिन्न फसलों की उन किस्मों में से चयन करने में सहायता प्रदान करती है जिनका उस जमीन में उत्पादन करना संभव हो। यह पहले ही मृदा स्वास्थ्य कार्ड के माध्यम से हो रहा है। हमें प्रभावी रूप से सूचना तथा ज्ञान का अंतरण करते हुए वर्तमान सीमाओं से आगे जाना होगा।

पहली बात, हमें भारतीय कृषि में मुख्य परिवर्तन लाते हुए इसे निम्न-उत्पादकता स्तर से उच्च उत्पादकता स्तर पर ले जाना होगा तथा साथ ही यह सुनिश्चित करना होगा कि यह सतत और न्यायसंगत हो। देश में अधिकांश फसलों की उत्पादकता का स्तर के मुख्य रूप से सिंचाई तथा उन्नत प्रौद्योगिकी तक पहुंच न होने के कारण वैश्विक औसत से कम है।

मौसमी परिस्थितियों का पूर्वानुमान, मृदा परीक्षण और जल उपलब्धता सहित वैज्ञानिकों को सरकार की विस्तार मशनरी जैसे कृषि विज्ञान केन्द्रों के माध्यम से किसानों को फसल बोने की पद्धतियों, फसलों के पकने के पश्चात् की प्रक्रियाओं तथा खाद्य प्रसंस्करण प्रौद्योगिकी के बारे में परामर्श देने का कार्य किया जाना चाहिए।

हमें उत्पादकता और किसानों की आय को बढ़ाने के लिए कृषि के सघनीकरण और विविधीकरण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उच्चतर उत्पादकता वाले बीजों की किस्मों के प्रयोग तथा भूमि एवं जल के सक्षम प्रयोग के माध्यम से उत्पादकता में वृद्धि होगी। वर्तमान में, उच्च उपज देने वाली किस्मों का प्रयोग मोटे अनाज वाली फसलों हेतु प्रयुक्त किए जाने वाले क्षेत्र के केवल 69 प्रतिशत भाग में ही किया जाता है। इस क्षेत्र को बढ़ाया जाना चाहिए। साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि उतनी ही भूमि पर और अधिक फसलें उगाई जाएं।

किसानों की आय बढ़ सकती है यदि प्रौद्योगिकी के माध्यम से हम उन्हें न केवल सर्वोत्तम फसल पद्धतियों के बारे में जानकारी प्रदान करें बल्कि विविधीकरण के लिए भी परामर्श प्रदान करें। किसानों को फसल वैविध्यकरण तथा फल, सब्जियां, रेशे वाली फसल, मसाले, दलहन तथा गन्ने जैसे उच्चतर मूल्य वाली फसलों का उत्पादन करने की दिशा में प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

अन्य अनुषंगी व्यवसायों जैसे दुग्ध-उत्पादन तथा वानिकी के क्षेत्र में भी विविधीकरण की प्रबल संभावनाएं हैं। इसी प्रकार, हमें किसानों को कृषि-वानिकी तथा वानिकी अपनाने हेतु भी प्रोत्साहित करना चाहिए। निस्संदेह सिंचाई ऐसा महत्वपूर्ण घटक है जहां प्रौद्योगिकी सहायक सिद्ध हो सकती है। हमें प्रौद्योगिकी का प्रयोग न केवल जल की उपलब्धता बढ़ाने के लिए करना चाहिए बल्कि हमें किसानों को उपलब्ध जल का इष्टतम उपयोग करने के बारे में भी परामर्श प्रदान करना चाहिए। जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, कच्चे बांधों का निर्माण, बूंद आधारित एवं छिड़काव आधारित सिंचाई ऐसे क्षेत्र हैं जहां प्रौद्योगिकीय ज्ञान मूल्यवान सिद्ध होगा। "यह देखने में आया है कि एक ही स्तर की सिंचाई सुविधाओं से युक्त जिलों में भी औसत पैदावार में अंतर पाया जाता है।" इस दुर्लभ संसाधन की प्रत्येक बूंद का इष्टतम उपयोग होना चाहिए। जैसा कि पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने कहा था कि कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए हर हाथ को काम दो और हर खेत को पानी दो।

दूसरी बात यह है कि सिंचाई के अतिरिक्त हमें ग्रामीण सड़कों, निर्भर योग्य एवं गुणवत्तापरक विद्युत आपूर्ति, गोदामों, शीत भंडार गृह सुविधाओं, रेफ्रिजेरेटेड वाहनों तथा मार्किट यार्डों जैसी अवसंरचना पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।

खाद्य प्रसंस्करण पर प्रमुख बल दिया जाना चाहिए। किसानों द्वारा उद्यमी कार्यों तथा कृषि आधारित उद्योग लगाने की दिशा में उन्हें प्रोत्साहित करने में प्रौद्यागिकी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसानों को नवीनतम जानकारी तथा उन्हें कार्य करने संबंधी प्रशिक्षण प्रदान किए जाने की आवश्यकता है।

विपणन तीसरा ऐसा क्षेत्र है जहां हमारी अभिकल्पना के अनुरूप प्रौद्योगिकी सहायक सिद्ध हो सकती है।

अधिकांश किसानों के लिए कृषि उत्पादों को बेचने तथा उचित मूल्य प्राप्त करना एक बड़ी चुनौती है। किसान अभी भी स्थानीय बाजारों पर निर्भर हैं और आमतौर पर उन्हें मजबूरन बिक्री करनी पड़ती है। विश्वसनीय तथा तत्काल सूचना प्रदान करना मुख्य पहलू है। मुझे प्रसन्नता है कि ई-एन.ए.एम. नामक एक नई पहल के तहत कृषि वस्तुओं को ई-ट्रेडिंग पलेटफार्म पर स्वीकार करते हुए इस स्थिति को सुधारने का प्रयास किया जा रहा है।

यदि हम किसानों की पहुंच निर्यात बाजारों तक भी सुलभ करवा दें तो उन्हें लाभ प्राप्त होगा। प्रौद्योगिकी के माध्यम से यह परिवर्तन संभव है कि वे केवल घरेलू बाजार के विक्रेता न रहकर अतिरिक्त उत्पादों के निर्यातक भी बन सकें।

एक सशक्त पारिस्थिति तंत्र का चौथा और पांचवा महत्वपूर्ण घटक समुचित ब्याज दल सहित समय पर ऋण सुविधाएं तथा किसान हितैषी बीमा नीतियां हैं। यदि डिजिटल प्रौद्योगिकी का दोहन किया जाए तो इन दोनों को और अधिक पारदर्शी तथा किसान-हितैषी बनाया जा सकता है। इससे किसानों को बेहतर निवेश करने, आय बढ़ाने वाली फसलें तथा कृषि पद्धतियां अपनाने तथा अपनी आय को बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी। बीमा सुरक्षा किसानों को अप्रत्याशित जलवायु जनित एवं प्राकृतिक आपदाओं से बचाव प्रदान करता है। किसान क्रेडिट कार्ड तथा प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना (पी.एम.एफ.बी.वाई.) सही दिशा में उठाए गए कदम हैं तथा इनका सार्वभौमिकीकरण करना आवश्यक है।

मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि यह सम्मेलन सूर्योदय वाले राज्य तथा स्मार्ट सिटी बनने की ओर अग्रसर विशाखापत्तनम शहर में आयोजित हो रहा है। सरकार की ओर से कृषि को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। देश में कृषि क्षेत्र को सुधारने के लिए नदियों को परस्पर जोड़ा जाना सर्वोत्तम समाधान है।

भारत में अनेक फसलों का सर्वाधिक उत्पादन करने में आन्ध्र प्रदेश मुख्य उत्पादक राज्यों में से एक है। खाद्यान्नों और तिलहनों के उत्पादन में अग्रणी राज्य होने के साथ-साथ यह राज्य आम, मिर्च व हल्दी के उत्पादन में भी अग्रणी है। बागवानी में 16.8% तथा मत्स्य पालन व जलकृषि के क्षेत्र में 30.1% की वृद्धि-दर को दृष्टिगत रखते हुए 2016-17 की स्थिति के अनुसार माननीय मुख्य मंत्री के नेतृत्व में कृषि आय को बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए गए हैं। आन्ध्र प्रदेश में जल कृषि एवं मत्स्य पालन के क्षेत्र में अभी तक दोहन से वंचित अपार संभावनाएं हैं क्योंकि इसकी समुद्रतटीय सीमा का विस्तार 974 किलोमीटर है।

इस सम्मेलन हेतु आपके द्वारा चयनित उप-वाक्य भी अत्यंत सटीक है।

हम जिस नए भारत की अपेक्षा करते हैं उसमें निश्चित रूप से हमें ऐसे प्रगतिवादी किसानों की आवश्यकता है जो आधुनिक कृषि पद्धतियों का अपनाएं।

हमें अपने किसानों के जीवन में अंतर लाने के लिए तथा प्रकृति की संपदा का दोहन करने के लिए मिलजुल कर तथा नीतिगत कार्य योजना से काम करने की आवश्यकता है।

मुझे आशा है कि वैज्ञानिकों, प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों तथा नीति-निर्माताओं सहित कार्यक्रम का क्रियान्वयन करने वाली एक ऐसी नीतिगत कार्य योजना तैयार करेंगे जिससे आन्ध्र प्रदेश और भारत के कृषि परिदृश्य में महत्वपूर्ण एवं सतत परिवर्तन आएगा।

जय हिन्द!"