15 दिसंबर, 2020 को हैदराबाद से गृह (जीआरआईएचए) परिषद द्वारा आयोजित 12वें (जीआरआईएचए) शिखर सम्मेलन का वर्चुअली उद्घाटन करने के उपरांत भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

हैदराबाद | दिसम्बर 15, 2020

यह मेरे लिए बहुत खुशी की बात है कि मैं 12वें जीआरआईएचए (ग्रीन रेटिंग फॉर इंटीग्रेटेड हैबिटेट असेसमेंट) शिखर सम्मेलन में शामिल हो रहा हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर साझेदारियां करने के लिए जीआरआईएचए की प्रतिबद्धता आज इस मंच पर मौजूद अनेक भागीदारों, हितधारकों और प्रतिनिधियों में दिखाई दे रही है।

जैसा कि हम सभी जानते हैं, भारत सरकार सभी हितधारकों की भागीदारी के साथ भारत को एक समग्र रूप से संधारणीय राष्ट्र में रुपांतरित करने का दृढ़ प्रयास कर रही है। “आत्मनिर्भर भारत अभियान” एक नए भारत का विजन है जिसका उद्देश्य देश और उसके नागरिकों को सभी क्षेत्रों में स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बनाना है। इस प्रयोजनार्थ, हमें सतत विकास की अवधारणा पर फिर से ज़ोर देने की ज़रूरत है। लोगों में दीर्घकालिक पारिस्थितिक संधारणीयता के विचार को बढ़ावा देने की अत्यावश्यकता पर जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है।

वर्ल्ड ग्रीन बिल्डिंग काउंसिल के अनुसार, दुनिया में ऊर्जा से संबंधित 39%कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन भवनों और निर्माण कार्य से होता है और समय की आवश्यकता है कि मानव निर्मित पर्यावरण को समग्र रुप से कार्बन रहित करने की प्रक्रिया में तेजी लाई जाए।

चूंकि भवन ग्रीनहाउस गैस के प्रमुख उत्सर्जनकर्ताओं में से एक हैं और भारत में 2030 तक अस्तित्व में आने वाले अधिकांश भवनों का निर्माण होना अभी बाकी है, इसलिए सभी हितधारकों को ठोस और समन्वित प्रयास करने की आवश्यकता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि पर्यावरण के अनुकूल निर्माण सामग्री का उपयोग हो और साथ ही भवन ऊर्जा और संसाधन कुशल बन सकें। आज हम जिस निर्माण सामग्री का उपयोग करते हैं, वह टिकाऊ होनी चाहिए - इससे भावी पीढ़ियों की अपनी जरूरतों को पूरा करने की क्षमता किसी भी प्रकार खतरे में नहीं पड़नी चाहिए।

यह ध्यान देने योग्य बात है कि केंद्रीय लोक निर्माण विभाग ने यह प्रतिबद्धता व्यक्त की है कि सभी नए भवन पहले से अधिक हरित होंगे। इसी तरह की प्रतिबद्धता अन्य सरकारी निर्माण एजेंसियों द्वारा व्यक्त की गई है। मुझे बताया गया है कि अनेक निजी क्षेत्र के डेवलपर्स ने भी यह प्रतिबद्धता व्यक्त की है कि उनके भावी निर्माण कार्यों के लिए जीआरआईएचए का अनुपालन किया जाएगा। मुझे यह पुरज़ोर रूप से महसूस होता है कि हमें भविष्य में बनने वाले सभी भवनों को अनिवार्य रूप से हरित बनाने पर विचार करना चाहिए और यह सभी प्रकार के भवनों पर लागू होना चाहिए। केवल नए भवनों को ही नहीं अपितु मौजूदा भवनों को भी पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए रेट्रोफिट करना चाहिए।

कुशलता के अलावा, हरित भवन अक्षय ऊर्जा के उपयोग को सुनिश्चित करते हैं, कचरे को कम करने और पर्यावरण के अनुकूल स्थानीय सामग्रियों के उपयोग को प्रोत्साहित करते हैं। कम कार्बन वाली प्रौद्योगिकियों को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जाना चाहिए और साथ ही इनका उपयोग किया जाना चाहिए - हरित भवन को कम से कम संसाधनों का उपयोग करना चाहिए और ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन में भारी कमी लानी चाहिए।

परंपरागत रूप से हमारे पूर्वज आवासीय इकाइयों के निर्माण में प्रकृति के अनुकूल सामग्रियों और डिजाइनों का उपयोग करते रहे हैं। हालांकि, लगता है कि हम उन जलवायु-अनुकूल वास्तुशिल्प संबंधी संरचनाओं को भूल गए जो सदियों से परिष्कृत हुईं हैं। दुर्भाग्य से, हमारी आधुनिक संरचनाएं ऐसी हैं कि कोई भी गौरैया आकर हमारे घर में घोंसला नहीं बना सकती है। यह हमारी संस्कृति नहीं है। हमारे प्राचीन सभ्यतागत मूल्य हमें प्रकृति के साथ तालमेल बना कर रहना सिखाते हैं। मैंने हमेशा कहा है कि हमें प्रकृति से प्रेम करना चाहिए और उसके साथ जीना चाहिए और अपनी सदियों पुरानी संस्कृति का पालन करना चाहिए ... यही बेहतर भविष्य का मार्ग है।

टिकाऊ भवन मज़बूत समुदायों के निर्माण का एक महत्वपूर्ण घटक हैं और टिकाऊ वास्तुकला भारतीय परंपरा है। प्राचीन भारतीय सभ्यता ने हमेशा पर्यावरण का सम्मान किया है।

अब समय आ गया है कि हम अपना दृष्टिकोण बदलें और उन डिजाइन तथा निर्माण परिपाटियों को अपनाना सुनिश्चित करें जो अधिक टिकाऊ और मज़बूत हों। निर्माण की पारंपरिक परिपाटियों को बहाल करके और हरित प्रौद्योगिकी को अपनाने के माध्यम से भवन क्षेत्र को फिर से सुदृढ़ बनाना और प्राकृतिक परिवेश के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने को बढ़ावा देना संभव है।

जलवायु परिवर्तन एक वास्तविकता है और यह हमें प्रभावित कर रहा है। राष्ट्रों के लिए आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना अत्यावश्यक है। यदि हम प्रकृति का सम्मान करते हैं तो अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी का सह-अस्तित्व हो सकता है।

कोविड-19 विश्वव्यापी महामारी के कारण यह वर्ष पूरे विश्व के लिए कष्टमय रहा है विश्व बाढ़, सूखे और अन्य चरम मौसमी घटनाओं के रूप में कई प्राकृतिक आपदाओं का बारम्बार गवाह रही है। इस प्रकार, विकास के प्रति हमारे दृष्टिकोण को नई दिशा देना बेहद आवश्यक है क्योंकि आज हम जो निर्णय लेते हैं, उसके प्रभाव हमारे जीवनकाल के काफी बाद भी दिखेंगे। जब हम टिकाऊ वास्तुकला और डिजाइन के बारे में बात करते हैं, तो हमें स्थानीय, प्राकृतिक रूप से उपलब्ध संसाधनों और पर्यावरण के अनुकूल निर्माण सामग्री का उपयोग करना होगा।

मुझे यह जान कर बहुत खुशी हुई कि पिछले कुछ वर्षों से, विश्वव्यापी महामारी के बावजूद, जीआरआईएचए काउंसिल संधारणीयता के एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए निर्बाध गति से प्रयास कर रहा है।

मैं जीआरआईएचए काउंसिल को नि:शुल्क-उपयोग वाले स्व-मूल्यांकन उपकरण बिल्डिंग फिटनेस इंडीकेटर (बीएफआई) उपकरण, जिसके द्वारा विभिन्न संगठन कोविड-19 के संपर्क में आने से बचने के लिए कार्यस्थलों की तैयारियों को आंक पाएंगे, का विकास करने पर भी बधाई देना चाहता हूं।

2030 सतत विकास एजेंडा, संधारणीयता, पर्यावरण, मानव कल्याण और जीवन, सुरक्षा, भोजन, पानी और स्वच्छता के अधिकार सहित विभिन्न मानव अधिकारों की एक विस्तृत श्रृंखला के बीच महत्वपूर्ण संबंधों को प्रदर्शित करता है ।

इस वर्ष के शिखर सम्मेलन का विषय " सुदृढ़ पर्यावासों का पुनरुद्धार" है और यह कार्यक्रम तत्परता और आपदा की स्थिति को झेल सकने वाले सुदृढ़ बुनियादी ढांचे के निर्माण की आवश्यकता पर केंद्रित है। अब सामाजिक विकास और आर्थिक विकास के बीच एक संतुलन बनाना पहले से कहीं अधिक आवश्यक है ताकि जलवायु परिवर्तन तथा वैश्विक महामारी के चलते एक नई सामान्य स्थिति को परिभाषित किया जा सके और वहनीय प्रणालियों को फिर से समनुरुप बनाया जा सके।

आज, शहरी भारत का भारत के सकल घरेलू उत्पादन में लगभग 65% योगदान है, जिसके 2030 तक बढ़ कर 70% तक हो जाने का अनुमान है। यह एक अभूतपूर्व विस्तार है जिससे भारत का आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरण संबंधी परिदृश्य बदल जाएगा।

2050 तक देश की कम से कम आधी आबादी कस्बों और शहरों में निवास करने लगेगी और इससे आवासीय क्षेत्र और बुनियादी ढांचे पर बहुत दबाव पड़ेगा और उभरती हुई जरूरतों को पूरा करने के लिए हरित समाधान विकसित करने होगें।

भारत सरकार का मुख्य उद्देश्य शहरों को रहने योग्य विकास केंद्र बनाना है। स्मार्ट सिटी मिशन का उद्देश्य उन शहरों को बढ़ावा देना है जो मूलभूत शहरी अवसंरचना प्रदान करते हैं और अपने नागरिकों को समुचित गुणवत्तायुक्त जीवन और स्वच्छ तथा टिकाऊ वातावरण प्रदान करते हैं।

भारत में ग्लोबल ग्रीन बिल्डिंग अभियान का नेतृत्व करने की क्षमता है।

निजी क्षेत्र और सरकार दोनों के द्वारा हरित भवन की अवधारणा को बढ़ावा दिए जाने की आवश्यकता है। वित्त आयोगों और स्थानीय निकायों को कर प्रोत्साहन सहित विभिन्न उपायों के माध्यम से हरित भवनों को प्रोत्साहन प्रदान करना चाहिए।

मुझे लगता है कि छत को ठंडा रखना (रूफ कूलिंग) सभी के लिए प्राथमिकता का क्षेत्र होना चाहिए। भारत में, 60 प्रतिशत से अधिक छतें धातु, एस्बेस्टस और कंक्रीट से बनती हैं - इससे ऐस्बेस्टस भवनों के अंदर गर्मी बनी रहती है और इस प्रकार शहरी क्षेत्रों के वातावरण को आस-पास के क्षेत्रों से अधिक गर्म करने में इनका योगदान रहता है। वर्तमान में, भारत के 10% से कम घरों में एयर कंडीशनिंग यूनिट्स हैं लेकिन जीवन स्तर में सुधार और ग्लोबल वार्मिंग के कारण तापमान में वृद्धि के कारण इस प्रतिशत में काफी वृद्धि होने की उम्मीद है।

हमारा देश एक विशाल देश है और हमारे सामने कई चुनौतियां हैं। इन चुनौतियों का सामना अकेले सरकार नहीं कर सकती है इसलिए निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों के सभी हितधारकों को इस प्रयास में साथ देना चाहिए।

रिपोर्टें यह दर्शाती हैं कि ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी एनर्जी कंजर्वेशन बिल्डिंग कोड (ईसीबीसी) का कार्यान्वयन पूरे देश में एक समान नहीं है और अभी तक केवल 15 राज्यों और दो संघ राज्य क्षेत्रों ने इस कोड को अधिसूचित किया है। मुझे यह जानकर खुशी हो रही है कि तेलंगाना राज्य और आंध्र प्रदेश राज्य ने इस संबंध में बढ़त हासिल कर ली है।

हरित भवनों का निर्माण करने के फायदों के बारे में एक व्यापक मीडिया अभियान शुरू करने की आवश्यकता है क्योंकि हरित भवन की अवधारणा के बारे में लोगों में जागरूकता की कमी है।

स्थानीय स्तर पर क्षमता निर्माण के लिए, वास्तुविदों, अभियंताओं, सरकारी अधिकारियों और ऊर्जा कुशल भवनों के भवन निर्माताओं के लिए विशिष्ट प्रशिक्षण कार्यक्रम आवश्यक हैं। सभी राज्यों को ऑनलाइन पोर्टल बनाने पर विचार करना चाहिए और हरित भवनों को एकल खिड़की मंजूरी प्रदान करनी चाहिए।

जीआरआईएचए अपनी स्थापना के बाद से, भारत में हरित विकास के व्यापक अंगीकरण के लिए एक उत्प्रेरक रहा है।

इस वर्ष के जीआरआईएचए शिखर सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में मुझे आमंत्रित करने के लिए मैं एक बार फिर आप सभी को धन्यवाद देता हूं। मैं इस आयोजन के लिए और भविष्य के सभी प्रयासों के लिए जीआरआईएचए काउंसिल को शुभकामनाएं देता हूं।