15 दिसंबर, 2020 को हैदराबाद में `योरस ट्रूली मारगज़ी` उत्सव के वर्चुअल उद्घाटन के अवसर पर सभा में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

हैदराबाद | दिसम्बर 15, 2020

“"मुझे द फेडरेशन ऑफ सिटी सभाज और कलाकेंद्र द्वारा आयोजित 'योर्स ट्रूली मार्गज्ही' महोत्सव का उद्घाटन करते हुए अपार हर्ष की अनुभूति हो रही है। कोविड-19 महामारी ने हमारे जीवन में विभिन्न बदलाव किए हैं और विभिन्न अवसरों पर आयोजित की जाने वाली सभाओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। ऐसे दौर में, आभासी माध्यम से की गई यह पहल वास्तव में सराहनीय है। मेरा मानना है कि यह अनुभवी चिकित्सकों का सहयोग करने और नवोदित कलाकारों को प्रोत्साहित करने की दिशा में काफी मददगार साबित होगा।
चेन्नई, भारत की कर्णाटक संगीत राजधानी, के साथ मेरा लंबे समय से गहरा लगाव रहा है। चेन्नई एक अद्वितीय महानगर है - यह एक ऐसा जीवंत और आधुनिक शहर है जिसने अपने सांस्कृतिक और पारंपरिक चरित्र को बनाए रखा है। यही विशेषता चेन्नई को विशिष्ट पहचान प्रदान करती है। हमें यह जानकर हैरानी नहीं होनी चाहिए कि यूनेस्को द्वारा 2017 में चेन्नई को विश्व के "रचनात्मक शहरों" की सूची में स्थान प्रदान किया गया है। 
चेन्नई के सांस्कृतिक परिदृश्य के केंद्र में मार्गज्ही के संगीत और नृत्य उत्सव हैं। मार्गज्ही या धनुर-मास के पवित्र महीने के दौरान यह शहर उस समय जीवंत हो जाता है, जब दुनिया भर के शास्त्रीय संगीत कलाकारों को यहां अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलता है। दिसंबर का त्योहार चेन्नई का पर्याय बन गया है और इसने इस शहर को दुनिया भर के कला प्रेमियों के लिए एक आकर्षक पर्यटन स्थल बना दिया।
प्रिय बहनों और भाइयों,
हम एक वर्ष से अधिक समय से महामारी से जूझ रहे हैं। इस महामारी ने हमारे जीवन, हमारी आजीविका और हमारे रहन-सहन के तौर-तरीकों को प्रभावित किया है। इस संदर्भ में, देश भर के कलाकारों को भी सभागारों के बंद होने से समस्या का सामना करना पड़ा है। इस तरह की अभिनव पहलों से चीजें अब बेहतर प्रतीत होने लगी हैं। 
यद्यपि, प्रत्यके व्यक्ति शारीरिक रूप से सभाओं में शामिल होने की चर्चा और आनंद की कमी महसूस कर रहा है परंतु इस वर्ष यह नया प्रारूप हमें अपने घरों से ही त्योहार का आनंद लेने का अवसर प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त, विदेशी कला संरक्षकों को भी सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देखने का अवसर मिलेगा।
दोस्तों, हालांकि यह महामारी अंतत: समाप्त हो जाएगी परंतु यह हमारी जीवनशैली को स्थायी तौर पर बदल देगी। कलाकार बिरादरी को इस अवसर का लाभ उठाते हुए इस बात पर विचार करना चाहिए कि वे हमारे जीवन को इन नये सामान्य तौर-तरीकों को अंगीकार करने के लिए क्या कर सकते हैं। कलाकारों को प्रौद्योगिकी का लाभ उठाते हुए रचनात्मक तरीके से अपने संरक्षकों तक पहुंच बनानी चाहिए। भविष्य में, वास्तविक और आभासी माध्यमों का सह-अस्तित्व कायम रहने की संभावना है और कलाकारों को आभासी माध्यम की क्षमता का पूर्ण दोहन करना चाहिए।
भाइयों और बहनों, 
ऐसे दौर में जब लोग चिंता और तनाव से गुजर रहें हैं, संगीत और नृत्य जैसी कलाएं मन को अत्यावश्यक सुकून और राहत प्रदान करते हैं। वास्तव में, ये आनंददायी प्रभाव पैदा करते हैं और मन और शरीर को पुन: सक्रिय करने में सहायक हैं। जीवन में हम जिस संतुलन की तलाश कर रहे हैं, भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य उसका प्रतीक है। वे स्वयं के भीतर और प्रकृति के साथ पवित्रता, एकता और सद्भाव के सिद्धांतों का प्रतीक हैं।
इन कला विधाओं का जादुई प्रभाव उनके प्राचीन स्वरूप में निहित है। भारत में वैदिक काल से ही संगीत और नृत्य की शानदार परंपराएं हैं। सामवेद जो वैदिक अनुष्ठानों के लिए धुनों और मंत्रों का एक संग्रह है, संभवतः संगीत पर सबसे पहला मानव साहित्य है।
नटराज का चित्रण- शिव के ब्रह्मांडीय नर्तक अवतार के रूप में- एक हजार से अधिक वर्षों से है और अभी भी इसका मूल स्वरूप बरकरार है। तांडव मुद्रा, एक ही छवि में ब्रह्मांड के निर्माता, संरक्षक, और विध्वंसक के रूप में शिव की भूमिकाओं को सम्मिलित करती है और काल के शाश्वत चक्र के भारतीय दर्शन का प्रतीक है।
प्राचीन वैदिक काल से लेकर वर्तमान दौर तक, शास्त्रीय रूपों से लेकर हमारी फिल्मों में लोकप्रिय संस्करणों तक संगीत और नृत्य हमारे जीवन का अभिन्न भाग रहें हैं। संगीत और नृत्य खुशी के अवसरों के अभिन्न अंग हैं और हमारे सांस्कृतिक मूल्यों के प्रचार और प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सभाओं की भी 2000 वर्ष से अधिक पुरानी संगम युग की समृद्ध विरासत रही है। हमने दुनिया के कतिपय महानतम साहित्यिक सम्मेलनों का आयोजन किया था जिनमें उस दौर के सुप्रसिद्ध कवियों ने भाग लिया था। उनके द्वारा रचित साहित्यिक रचनाओं को अब हम 'संगम साहित्य' के रूप में जानते हैं। ये विशिष्ट संकलन अपनी प्राचीनता, समृद्धि और साहित्यिक श्रेष्ठता में अनुपम हैं। 
हमारे पास विभिन्न कला विधाओं की एक समृद्ध विरासत है जिन्हे संरक्षित और प्रचारित करने के लिए हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए। संगीत, नृत्य और नाटक का हमारा स्थायी सांस्कृतिक कोष दुनिया के लिए भारत का सबसे बड़ा उपहार है।
यह महान उपहार भारत के लिए 'साफ्ट पावर' का एक प्रभावकारी स्रोत बना हुआ है। जैसा कि आप जानते हैं दुनिया की भारतीय शास्त्रीय कला विधाओं में गहन रुचि है। भारतीय संगीत कार्यक्रम और नृत्य प्रदर्शन के लिए कई देशों में नियमित वार्षिक कार्यक्रम बने हुए हैं और भरतनाट्यम और कुचिपुड़ी जैसी नृत्य विधाओं के लिए असंख्य अनुयायी हैं। भारतीय नृत्य और संगीत की यह लोकप्रियता काफी हद तक रुक्मिणी देवी अरुंडेल और मैंडोलिन श्रीनिवास जैसे दिग्गजों की बदौलत है। वे भारतीय कला को वैश्विक मंच पर ले गए। हम अपनी वैश्विक पहुंच के विस्तार के लिए 'सॉफ्ट पावर' की इस अपार क्षमता का उपयोग कर सकते हैं।
अपनी शास्त्रीय कला विधाओं को 'सॉफ्ट पावर' के उपकरण के रूप में प्रचारित करके हम लोगों को भारतीय कला और संस्कृति की समृद्धि और विरासत के प्रति जागरूक कर सकते हैं।
इस तरह की 'सॉफ्ट पावर' के साथ, हम भारत के 'वसुधैव कुटुम्बकम' के युग-दर्शन के अनुरूप अहिंसा, शांति और सह-अस्तित्व के आदर्शों को दुनिया भर में फैला सकते हैं। नए आत्मविश्वास के साथ हमें पुन: विश्व गुरु बनने की आकांक्षा रखनी चाहिए।
बहनों और भाइयों,
प्राचीन काल में शास्त्रीय कला विधाएं हमारी शिक्षा का एक अभिन्न अंग थी। हमें इस परंपरा को बड़े पैमाने पर पुनर्जीवित करना चाहिए और संगीत और नृत्य को स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना चाहिए। नई शिक्षा नीति में भी इस संबंध में समर्थकारी प्रावधान किए गए हैं। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि शास्त्रीय कला विधाओं का अभ्यास ध्यान अवधि को बेहतर बनाता है, अनुशासन को विकसित करता है, आत्मविश्वास पैदा करता है, धैर्य बढ़ाता है और कई अन्य गुणों के साथ बच्चों को दृढ़ता के महत्व को सिखाता है। यह उनके शैक्षणिक और सामाजिक जीवन के लिए भी अत्यधिक लाभकारी होगा।
वर्तमान में युवाओं को विभिन्न संस्कृतियों की व्यापक जानकारी है। परंतु अन्य संस्कृतियों के बारे में सीखते हुए भारतीय संस्कृति, विरासत और परंपराओं को केन्द्र में रखना महत्वपूर्ण है। हमें गांधीजी द्वारा कही गई बात का भी स्मरण रखना चाहिए: “उन्होंने कहा था, 'मैं नहीं चाहता कि मेरा घर चारों ओर दीवारों से घेरा जाए और मेरी खिड़कियां बंद कर दी जाएं। मैं चाहता हूं कि सारे भू-भागों की सांस्कृतिक बयार मुक्त रूप से मेरे घर में बहे। लेकिन मैं नहीं चाहता कि कोई मेरी आत्म-अनुभूति को फूंक मारकर उड़ा दे।' ”
प्रिय बहनों और भाइयों,
मैं द फेडरेशन ऑफ सिटी सभाज और कलाकेंद्र की दूरदर्शिता और इस महान पहल की योजना के लिए सराहना करता हूं। इस आयोजन में 100 से अधिक कार्यक्रमों और 500 कलाकारों के भाग लेने से यह एक आनंदमयी मार्गज्ही कार्यक्रम होगा। मेरा विश्वास है कि यह अन्य उत्सवों के लिए प्रेरणादायी होगा।
पुन:, मैं आज आप सभी के बीच आभासी तौर पर उपस्थित होकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करता हूं। मैं इस बात पर बल देते हुए अपनी वाणी को विराम देना चाहता हूं: हम सभी को एक साथ मिलकर अपनी संस्कृति का पोषण करना होगा, हमारे देश की प्रतिष्ठा को बढाना होगा और अपने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करना होगा। 

जय हिन्द!”