14 नवंबर, 2017 को नई दिल्ली में भारत राज्य-स्तरीय रोग व्याप्ति प्रतिवेदन और तकनीकी पत्र का विमोचन करने के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | नवम्बर 14, 2017

"भारत में विश्व की आबादी का लगभग पाँचवां हिस्सा रहता है। देश के भिन्न-भिन्न हिस्सों और राज्यों में बसे लोग अपनी-अपनी जातीय उत्पत्ति, संस्कृति और कई अन्य तरीकों से एक-दूसरे से अलग हैं जो उनकी स्वास्थ्य स्थिति को प्रभावित करते हैं।

बेहतर सामाजिक और आर्थिक विकास की बुनियाद के रूप में भारत की संपूर्ण आबादी को आरोग्य बनाना भारत सरकार का महत्वपूर्ण लक्ष्य है।

स्वास्थ्य ही धन है। अगर हमारा स्वास्थ्य अच्छा है तो हम धन-दौलत अर्जित कर सकते हैं किन्तु इस बात की कोई गारन्टी नहीं है कि आप धन से अच्छा स्वास्थ्य भी प्राप्त कर सकें। हम वैश्विक ग्राम में रह रहे हैं और दुनिया छोटी हो गई है। हमें अपने बच्चों को स्वस्थ भविष्य और रहने के लिए बेहतर स्थान प्रदान करने की अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि करनी होगी। चिकित्सा वृत्तिकों को रोगियों के उपचार में मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। जनता के प्रति केन्द्रित सुधारों के साथ जवाबदेह निष्पादनकारी स्वास्थ्य सेवा प्रतिपादन प्रणाली देश में स्वास्थ्य संबंधी ढाँचें का रूपांतरण कर सकती है। जीवन शैली में बदलावों और निवारक सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् से भारतीय जनता की स्वास्थ्य स्थिति सुधरती जा रही है। उदाहरण के लिए, वर्ष 1960 में भारत में पैदा हुए व्यक्ति की जीवन प्रत्याशा 40 वर्ष थी जो अब बढ़कर लगभग 70 वर्ष हो गई है। 1960 में भारत में पैदा होने वाले प्रत्येक 1000 बच्चों में से लगभग 160 बच्चें पहले वर्ष में ही मर जाते थे किन्तु अब यह शिशु मृत्यु दर उस समय की तुलना में लगभग एक-चौथाई रह गई है।

तथापि सुधार के ये बड़े-बड़े रूझान राज्यों के बीच और सामाजिक-आर्थिक स्तरों में विद्यमान बड़ी-बड़ी असमानताओं को छुपा लेते हैं।

इस पर प्रकाश डालते हुए भारतीय राज्यों में उच्चतम जीवन प्रत्याशा और न्यूनतम जीवन प्रत्याशा में वर्तमान में 11 वर्षों का अंतर है तथा उच्चतम शिशु मृत्यु दर वाले राज्य और न्यूनतम मृत्यु दर वाले राज्य के बीच यह अंतर चार गुना है।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तुलना करने पर, भारत के अनेक स्वास्थ्य संबंधी संकेतक विकास के समान स्तरीय अन्य देशों की तुलना में अभी भी अत्यंत असंतोषजनक बने हुए हैं। इसका तात्पर्य यह है कि यद्यपि भारत में स्वास्थ्य के क्षेत्र में बहुत सुधार हुए हैं किन्तु हम और बेहतर कर सकते हैं।

बेहतर करने के लिए अनेक चीजों को समानांतर रूप से किए जाने की आवश्यकता है। इसमें देश के नीति-निर्माण में स्वास्थ्य को उच्च प्राथमिकता प्रदान करना और निवारक एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों के लिए संसाधनों में वृद्धि करना शामिल है। भारतीय जनता को स्वस्थ रखने और जब वह बीमार हो जाए तो उनकी समुचित स्वास्थ्य सेवा हेतु जमीनी स्तर पर पर्याप्त तंत्र होना चाहिए। हमारे पास ज्ञान की ठोस प्रणाली भी होनी चाहिए जिससे देश के प्रत्येक हिस्से में स्वास्थ्य और रोग व्याप्ति की प्रवृतियों का व्यापक स्तर पर पता लगाया जा सके।

यह अंतिम पहलू है जिसके लिए भारत में स्वास्थ्य संबंधी प्रगति हेतु भारत राज्य-स्तरीय रोग व्याप्ति पहल का कार्य महत्वपूर्ण है।

भारत में महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सर्वेक्षण और अन्य स्रोतों से प्राप्त हुए आँकड़े हैं जो दश के भिन्न-भिन्न हिस्सों में कुछ रोगों की व्याप्ति में महत्वपूर्ण अंतरों को दर्शाते हैं।

किन्तु हमारा देश विशाल और विविधतापूर्ण है। हमें समुचित कार्यवाही करने के लिए राज्य-वार और ज्यादा व्यापक तस्वीर की जरूरत है। अभी तक, हमारे पास सभी रोगों की व्याप्ति का तथा एक ही ढाँचे में देश के प्रत्येक राज्य के संबंध में उनके पीछे जोखिम कारकों का एक सुव्यवस्थित और संपूर्ण संकलन उपलब्ध नहीं था। इस अंतर को अब मौजूदा पहल के माध्यम से भरा जा रहा है।

आज जारी किया गया भारत राज्य-स्तरीय रोग व्याप्ति पहल का प्रतिवेदन भारत में पहली बार वर्ष 1990 से 2016 तक प्रत्येक राज्य के संबंध में इन व्यापक प्राक्कलनों को प्रस्तुत करता है। इस प्रतिवेदन के साथ आज ही जारी हुए तकनीकी वैज्ञानिक पत्र और ओपन-एक्सेस विज्यूलाइजेशन टूल एक साथ मिलकर प्रत्येक राज्य में स्वास्थ्य संबंधी स्थिति तथा भारत के राज्यों में स्वास्थ्य संबंधी असमानताओं के बारे में सुव्यवस्थित अंतर्दृष्टि प्रस्तुत करते हैं।

परिणाम यह दर्शाते हैं कि भारत के कुछ राज्यों में प्रति व्यक्ति समग्र रूप से रोग व्याप्ति कुछ अन्य राज्यों की तुलना में लगभग दुगुनी है, तथा राज्यों के बीच बहुधा होने वाले रोगों के कारण रोग व्याप्ति दर पाँच से दस गुना के बीच है। इन असमानताओं पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।

इस प्रतिवेदन में प्रत्येक राज्य के संबंध में विशिष्ट रोग व्याप्ति की प्रवृतियां आयोजना संबंधी पहल के लिए संदर्भ पेश करती हैं जो प्रत्येक राज्य में रोग संबंधी बड़ी समस्याओं के समाधान के लिए आवश्यक है। प्रत्येक राज्य में साक्ष्य आधारित इस प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी आयोजना प्रत्येक राज्य में स्वास्थ्य संबंधी सुधारों, राज्यों के बीच स्वास्थ्य संबंधी असमानताओं को कम करने, और भारत के लिए स्वास्थ्य संबंधी सभी लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में तेजी से प्रगति करने में सहायता करेगी।

आज जारी किए गए परिणामों में एक विशेष बिंदु जिसे उच्चतम प्राथमिकता दिए जाने की आवश्यकता है वह भारत में कुपोषण से होने वाली अत्यधिक रोग व्याप्ति की निरंतरता है। इसका शीघ्र समाधान किए जाने की आवश्यकता है जिससे भारत की भावी पीढ़ी अपने वैयक्तिक विकास के साथ-साथ राष्ट्र के विकास हेतु अपनी पूर्ण क्षमता को प्राप्त कर सके। हम मानवीय विकास के इस महत्वपूर्ण पहलु के बारे में आत्मसंतुष्ट नहीं हो सकते हैं क्योंकि हम एक नवीन पुनरुत्थानशील भारत का निर्माण करने का प्रयास कर रहे हैं।

यह उत्साहजनक है कि इस प्रतिवेदन को तैयार करने के कार्य में भारत की एक सौ से अधिक संस्थाओं के प्रतिनिधित्व के साथ अनेक अग्रणी स्वास्थ्य संबंधी वैज्ञानिकों और पणधारकों सहित सहयोगकर्ताओं के नेटवर्क ने काम किया है।

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद की महानिदेशक, डा. सौम्या स्वामीनाथन के मार्ग-निर्देशन तथा विगत दो वर्षों के दौरान उनका अपने कार्य के साथ गहन रूप से जुड़ाव इस कार्य की सफलता के लिए महत्वपूर्ण रहा।

मैं आईसीएमआर की महानिदेशक और इस उत्कृष्ट कार्य को पूर्ण करने में सहयोग देने वाले सभी व्यक्तियों और संस्थाओं को बधाई देता हूँ। आप सभी ने ज्ञान के भंडार को बढ़ाने में योगदान दिया है। यह हमारे देश में स्वास्थ्य सेवा में सुधार के लिए विशिष्ट लक्ष्यित पद्धतियों को तैयार करने में सहायक होगा। मैं आशा करता हूँ कि इस प्रकार की राष्ट्रीय पहल जारी रहेगी और आगामी वर्षों में और अधिक संवर्धित होगी। मैं आप सभी को आपके प्रयासों के लिए शुभकामनाएं देता हूँ।

जय हिंद!"