14 दिसंबर, 2019 को आनंद, गुजरात में इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल मैनेजमेंट, आनंद (आईआरएमए) के 40वें स्थापना दिवस समारोह के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

गुजरात | दिसम्बर 14, 2019

"प्रिय बहनों और भाइयों,

आईआरएमए के 40वें स्थापना दिवस पर आप सभी के बीच आकर मैं बहुत खुश हूं।

मैं इस महान भूमि पर आकर प्रसन्न हूं जो भारत की नियति निर्धारित करने वाले कई महान पुरुषों और महिलाओं की 'जन्मभूमि' और 'कर्मभूमि' रही है।

यहाँ से कुछ ही दूर सरदार वल्लभभाई पटेल - भारत के लौह पुरुष का जन्मस्थान है जिन्होंने रियासतों का सफलतापूर्वक और शांतिपूर्वक भारतीय संघ में विलय किया। हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जिनकी 150 वीं जयंती इस वर्ष मनाई जा रही है, का जन्म 1869 में यहां हुआ था।

मैं इन दूरदर्शी नेताओं का सम्मान करता हूं जो एक ऐसी विरासत छोड़ कर गए जिस पर हम सभी को गर्व है ।

बहनों और भाइयों,

हमारे गाँवों का विकास एक ऐसा विषय था जो महात्मा गांधी को बहुत प्रिय था और वे कहा करते थे कि - "भारत की आत्मा गाँवों में बसती है।"

उन्होंने यह भी कहा था - "अगर गांव समाप्त हो जाता है, तो भारत भी समाप्त हो जाएगा।"

सरदार वल्लभभाई पटेल, जो खुद एक किसान के बेटे थे, ने खेड़ा और बारदोली में किसानों के आंदोलनों का नेतृत्व किया। किसानों का कल्याण उनके दिल के भी करीब था।

मैं सराहना करता हूं कि आईआरएमए, 1979 में अपनी स्थापना के बाद से ही सरदार पटेल और महात्मा गांधी के सपनों का भारत बनाने के लिए अथक प्रयास कर रहा है।

प्रिय बहनों और भाइयों,

यह संस्था डॉ. वर्गीज कुरियन के नेतृत्व और दूरदर्शिता का प्रमाण है जो एक महान संस्थान निर्माता थे।

यहां आने से ठीक पहले, मैंने एनडीडीबी परिसर का दौरा किया है। यह निश्चित ही एक प्रेरणादायक और खूबसूरत जगह है।

यहीं पर 'श्वेत क्रांति' की अवधारणा ने जन्म लिया और इसका कार्यान्वयन किया गया था। डा. कुरियन और उनकी टीम के साथ साथ डेयरी किसानों के अथक प्रयासों का ही परिणाम है कि भारत वर्तमान में दूध का विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। भारत में प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता जो कि 1960 में 120 ग्राम प्रति दिन थी, वह बढ़कर 2018 में 375 ग्राम प्रति दिन हो गई है। यह वृद्धि इस अवधि के दौरान हमारी जनसंख्या के तीन गुना बढ़ने के बावजूद हुई है।

प्रिय बहनों और भाइयों,

जब हम ग्रामीण विकास की बात करते हैं, तो हमारे दिमाग में कई बातें आती हैं जैसे ग्रामीण सड़कें, पर्याप्त बिजली की आपूर्ति, स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता, स्वच्छता आदि।

मुझे यह जानकर खुशी हुई कि श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार 'सबका साथ, सबका विकास' की सच्ची भावना के साथ इन मुद्दों को हल करने के लिए सक्रिय कदम उठा रही है।

पिछले पांच वर्षों के दौरान प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत लगभग दो लाख किलोमीटर नई सड़कें ग्रामीण भारत में बनाई गई हैं।

अब सरकार ने इस योजना के तीसरे चरण को शुरू करने का निर्णय लिया है। इसमें आने वाले पांच वर्षों में एक लाख पच्चीस हजार किलोमीटर ग्रामीण सड़कों का उन्नयन शामिल है। इस चरण में उन सड़कों पर ध्यान केन्द्रित किया जाएगा जो बस्तियों को कृषि बाजारों, स्कूलों और अस्पतालों के साथ जोड़ती हैं।

सौभाग्य योजना के अंतर्गत प्रत्येक इच्छुक ग्रामीण परिवार को बिजली कनेक्शन प्रदान किया गया है जिसके परिणामस्वरूप बिजली की पहुंच में भारत ने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। अब चार नक्सल प्रभावित जिलों में कुछ ही घर बचे हैं, जिन तक यह सुविधा नहीं पहुंच पाई है।

उज्जवला योजना के तहत 8 करोड़ से अधिक एलपीजी के कनेक्शन प्रदान किए गए हैं। इससे ग्रामीण महिलाओं को काफी राहत मिली है, जिन्हें हर दिन ईंधन की लकड़ी इकट्ठा करने में घंटों मेहनत करनी पड़ती थी।

इसी प्रकार सरकार जल जीवन मिशन के तहत 2024 तक सभी ग्रामीण परिवारों को हर घर जल (पाइप के माध्यम से जलापूर्ति) प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है। एकीकृत और समग्र जल प्रबंधन के लिए जल शक्ति मंत्रालय के नाम से एक नए मंत्रालय का गठन किया गया है।

बहनों और भाइयों,

गाँधीजी ग्राम स्तर पर पारंपरिक शिल्प और कृषि प्रसंस्करण उद्योगों के पक्के समर्थक थे।

इन गांधीवादी सिद्धांतों के अनुरूप सरकार 'स्फूर्ति' योजना को लागू कर रही है जिसमें बांस, शहद और खादी पर ध्यान केन्द्रित करने के साथ पारंपरिक उद्योगों के समूहों को बढ़ावा दिया जा रहा है। 2019-20 के दौरान इस तरह के 100 नए समूह स्थापित किए जाएंगे जिससे 50,000 कारीगर आर्थिक मूल्य श्रृंखला में शामिल होने के लिए सक्षम हो पाएंगे।

इस वर्ष के बजट में भी, 2019-20 में 'एस्पायर' योजना के तहत 80 लाइवलीहुड बिजनेस इनक्यूबेटर्स और 20 टेक्नोलॉजी बिजनेस इनक्यूबेटरों की स्थापना का प्रावधान है ताकि कृषि ग्रामीण उद्योग क्षेत्रों में 75,000 कुशल उद्यमियों को आगे लाया जा सके।

ऐसी स्थिति में आईआरएमए जैसे संस्थानों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। ग्रामीण किसानों को सफल उद्यमियों और नवप्रवर्तकों में बदलने के लिए उचित प्रशिक्षण और मार्गदर्शन आवश्यक पूर्व शर्त है।

हम अमूल की सफलता को देख चुके हैं। श्वेत क्रांति’ को ’बड़े पैमाने पर उत्पादन’ से नहीं बल्कि 'जनसाधारण द्वारा उत्पादन’ से हासिल किया गया था। इससे छोटे और सीमांत किसानों को विपणन में बड़े पैमाने की किफायत का लाभ प्राप्त करने में मदद मिली।

यदि गांधी जी के ग्रामोद्योगों के विकेन्द्रीकरण के सपने को साकार करना है, तो हमें ऐसे उद्योगों और संस्थानों के प्रबंधन के लिए पर्याप्त संख्या में पूरी तरह से तैयार पेशेवरों की आवश्यकता होगी।

मुझे खुशी है कि पिछले चालीस वर्षों में आईआरएमए विश्व स्तरीय पेशेवरों को तैयार कर रहा है जिन्होंने डेयरी सहकारी मॉडल के माध्यम से अनेक ग्रामीण संस्थानों को आरंभ करने और उन्हें चलाने में मदद की है।

प्रिय बहनों और भाइयों,

देश के भीतर और बाहर 'न्यू इंडिया' को लेकर बहुत सी आशाएं हैं।

भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है और इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए ग्रामीण भारत का योगदान महत्वपूर्ण होगा।

किसानों की संख्या अभी भी भारतीय कामकाजी आबादी के 50% से अधिक है, लेकिन उनकी कड़ी मेहनत के बावजूद, राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में कृषि की हिस्सेदारी केवल 15% है।

हमारे प्रधान मंत्री ने वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने का आह्वान किया है। यदि इस लक्ष्य को प्राप्त करना है तो हमें बहु-आयामी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। आय सृजन के लिए कृषि-उद्योगों, शीतागार, भंडारण, खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, मुर्गी पालन, मत्स्य पालन और गैर-कृषि से संबंधित अन्य कार्यकलापों पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करना होगा।

आईआरएमए, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आवश्यक इस बड़े परिवर्तन में, एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। आपूर्ति श्रृंखला दक्षता में सुधार के माध्यम से इस दिशा में कई संभावनाएं मौजूद हैं।

कई अन्य मूल्य श्रृंखलाओं में भी डेयरी क्षेत्र में प्राप्त हुई सफलता के मार्ग पर चलकर देश को अन्य क्षेत्रों में भी सफलता पाने के कई शानदार अवसर मिलेंगे।

प्रौद्योगिकी और अभिनव व्यवसाय मॉडलों की भूमिका भी विचार करने योग्य है।

ग्रामीण क्षेत्रों में स्मार्ट फोनों की संख्या में वृद्धि और 'डिजिटल इंडिया' की दिशा में लगातार जोर दिए जाने के कारण किसानों की बाजारों, कीमतों आदि से संबंधित जानकारी तक और अधिक पहुंच बनेगी।

इन तकनीकों ने डिजिटल पेमेंट, ई-कॉमर्स आदि के माध्यम से ग्रामीण भारत में पहले से ही व्यवसाय के नए रास्ते खोल दिए हैं।

जिस प्रकार से डा. कुरियन और उनकी टीम ने भैंस के दूध से दूध पाउडर निकालने की अनोखी प्रक्रिया ईजाद की थी, उसे ही देख लीजिए। यह एक सफल क्रांति की शुरुआत थी।

यदि प्रौद्योगिकी, आपूर्ति श्रृंखला, वाणिज्य और वित्तपोषण का सम्मिश्रण हो जाए तो इसी प्रकार की क्रांति लाई जा सकती है । इससे किसानों को अपनी आजीविका कमाने और बाजारों और विभिन्न हितधारकों के साथ व्यवहार करने के तरीके में क्रांति आने वाली है।

प्रिय बहनों और भाइयों,

ग्रामीण उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला की इस अनूठी और नई वास्तविकता का कुशलतापूर्वक प्रबंधन करने के लिए हमें पेशेवरों की गुणवत्ता की आवश्यकता होगी- जो कि आईआरएमए जैसी संस्थाएं प्रदान कर सकती हैं।

इस संदर्भ में उद्यमिता की भूमिका भी ध्यान देने योग्य है। स्टार्ट-अप्स के लिए समग्र समर्थनकारी माहौल और सामाजिक वातावरण आज पहले से कहीं अधिक अनुकूल है।

आज भारत में खाद्य, कृषि और ग्रामीण क्षेत्र में 1,000 से अधिक स्टार्ट अप्स हैं। मैं आपसे इस क्षमता को पूर्ण रूप से उपयोग में लाने की योजना बनाने का आग्रह करता हूं। अगले कुछ वर्षों में आईआरएमए ग्रामीण क्षेत्रों में कम से कम 1,000 स्टार्ट-अप स्थापित कर सकता है। केवल आप ही ग्रामीण भारत की वास्तविकताओं को समझने में और ग्रामीण संदर्भ के लिए पेशेवर व्यावसायिक प्रबंधन संबंधी कौशल प्रदान करने में विशेष रूप से सक्षम हैं।

ग्रामीण भारत से आने वाले खाद्य पदार्थों, शिल्प, फर्नीचर, खिलौनों आदि के लिए उपभोक्ता बाजार में बहुत अवसर हैं। पारंपरिक ज्ञान के लाभों और बारीकियों की पुन: खोज करते हुए हम न केवल परंपरा को संरक्षित कर सकते हैं, बल्कि इसे एक व्यापक ग्राहक वर्ग के लिए स्थानांतरित भी कर सकते हैं। उपभोक्ता, उत्पाद के पीछे की कहानी को समझने और राष्ट्र निर्माण में अपना कुछ योगदान देने के लिए लगातार उत्पादकों के साथ जुड़ना चाहते हैं।

उदाहरण के लिए एक ऐसे परिदृश्य की कल्पना कीजिए कि जहां पारंपरिक तरीकों के माध्यम से लाखों सूक्ष्म ग्रामीण उद्यम और एफपीसी (किसान, उत्पादक कंपनियां) विभिन्न प्रकार के खाद्य उत्पादों का उत्पादन करते हैं और दूसरी ओर लाखों उपभोक्ता इन उत्पादों के लिए अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए एक मंच की तलाश में हों, जो उनकी आवश्यकताओं को पूरा करे।

अर्थव्यवस्था के तीन अंगों-कृषि क्षेत्र (कृषि उत्पादन), विनिर्माण (प्राथमिक खाद्य प्रसंस्करण) और सेवाएं (वितरण, सुपुर्दगी)-का विशिष्ट रूप से एक साथ होना निश्चित ही एक ओर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास के लिए एक बड़ा अवसर हो सकता है और साथ ही साथ ग्रामीण भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास के संर्वधन का एक बड़ा कारक बन सकता है।

बहनों और भाइयों,

भारत के विकास को समावेशी बनाने के लिए हमें विकास में क्षेत्रीय विषमताओं को दूर करना होगा।

हमें कुछ ऐसे क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है जो अभी भी विकास के कई मापदंडों में काफी पिछड़े हुए हैं लेकिन जिनमें पारंपरिक भोजन, कला और शिल्प, पारिस्थितिकी-पर्यटन (इको-टूरिज्म) पर आधारित कई संभावनाएं मौजूद हैं। इन गुणों को पहचानने और डिजिटल प्रौद्योगिकियों, ई-कॉमर्स और अभिनव बिजनेस मॉडलों के मिश्रण से इनका लाभ उठाने की आवश्यकता है।

इसके अलावा, दूसरी तरफ हमें इस तथ्य की सराहना करने की आवश्यकता है कि ग्रामीण डेयरी अर्थव्यवस्था में 90% से अधिक योगदान महिलाओं का है। लेकिन राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में महिलाओं का कुल योगदान बहुत कम, लगभग 25% है।

हमें ग्रामीण संगठनों और आपूर्ति श्रृंखलाओं द्वारा पेश महिला सशक्तीकरण की अपार संभावनाओं को पहचानने की आवश्यकता है। डेयरी सहकारी आंदोलन ने इस बात को पर्याप्त रूप से प्रदर्शित किया है।

भारत में शहरी और ग्रामीण युवाओं दोनों के लिए ग्रामीण उद्यमों को एक आकर्षक करियर का विकल्प बनाना भी महत्वपूर्ण है। इन अवसरों के बारे में युवाओं को सूचित करने के लिए एक जागरूकता कार्यक्रम चलाना समय की मांग है।

देश के युवाओं में इस उत्साह और रचनात्मकता को पैदा करने के लिए आईआरएमए को अपने वर्तमान कार्यक्षेत्र का विस्तार करना चाहिए।

इस महान संस्थान के छात्रों और शिक्षकों के रूप में, मैं आप में से हर एक से अपील भी करता हूं कि इसे अपने लिए एक लक्ष्य के रूप में लें- जैसे कि किसी प्रकार का पीएसआर (व्यक्तिगत सामाजिक उत्तरदायित्व) - सीएसआर (कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व) के विरुद्ध - अपने नेटवर्क में स्कूल के कम से कम 10 युवाओं का जागरूक करना- युवा पीढ़ी को ग्रामीण भारत की वास्तविकताओं को समझने और संभावनाओं का पता लगाने के लिए प्रोत्साहित करना।

निष्कर्ष के रूप में, मैं आईआरएमए को हमारे देश की ग्रामीण आबादी के लिए उद्देश्यपूर्ण सेवा के 40 वर्ष पूरे करने पर बधाई देता हूं। मैं अध्यक्ष और उनकी पेशेवरों की टीम द्वारा किए जा रहे प्रयासों की सराहना करता हूं, जो इस प्रमुख संस्थान को अग्रणी, दूरदर्शी संस्थान के रूप में बदल रहे हैं।

आपका पिछला प्रदर्शन शानदार रहा है। आपके सामने एक बड़ी चुनौती है।

आपके पास महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के सपने को वास्तविकता में बदलने और भारत के 6.4 लाख गांवों और इसकी 68.8 प्रतिशत ग्रामीण आबादी पर सकारात्मक प्रभाव डालने का एक अनूठा अवसर है।

एक बार फिर मैं आप सभी को आपके इस शानदार प्रयास के लिए शुभकामनाएं देता हूं।

जय हिन्द!"