14 दिसंबर, 2019 को आनंद, गुजरात के वल्लभ विद्यासागर में चारुतर विद्या मंडल के प्लैटिनम जयंती समारोह के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु का संबोधन

आनन्द, गुजरात | दिसम्बर 14, 2019

"नमस्कार!

मैं इस सुंदर शहर वल्लभ विद्यानगर, जो गुजरात में शिक्षा का केंद्र है, में आकर बहुत प्रसन्न हूँ।

चारुतर विद्या मंडल (सी वी एम) की सेवा के गौरवपूर्ण 75 वर्षों के समारोह में भाग लेकर और इस क्षेत्र के ग्रामीणों के शैक्षणिक उत्थान के लिए न्यास द्वारा की जा रही गतिविधियों को देखकर मुझे बहुत प्रसन्नता हो रही है।

मुझे हर्ष है कि चारुतर विद्या मंडल की स्थापना वर्ष 1945 में एक धर्मार्थ न्यास के रूप में हुई थी और इसका एक विशेष उद्देश्य था । इसका लक्ष्य शिक्षा के माध्यम से ग्रामीण विकास और ग्रामीण जनता में सामाजिक जागरूकता लाना, उनका उत्थान और उनकी समृद्धि है।

इस संस्थान की स्थापना के पीछे भारत के महान सपूत, एकता स्थापित करने वाले और भारतीय राज्यों के एकीकरण के मुख्य वास्तुकार, श्री सरदार वल्लभभाई पटेल का असाधारण दृष्टिकोण है। उन्होंने श्री भाईकाका और श्री भीकाभाई साहब को स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद के भारत में शिक्षा के माध्यम से ग्रामीण पुनरुत्थान के लिए एक संस्थान स्थापित करने के लिए प्रेरित किया।

सरदार पटेल ने शिक्षा, रोजगार और चिकित्सा सुविधाओं की खोज में गाँवों से शहरों की ओर लोगों के पलायन को नियंत्रित करने के लिए ग्रामीण क्षेत्र की सेवा कर चारुतर को भारत का केंद्र बिन्दु बनाने में सहायक होने का कार्य भाईकाका को सौंपा।

यहाँ पर, लोगों को श्री पटेल के प्रशंसनीय दृष्टिकोण को समझना होगा और उसकी सराहना करनी होगी जिन्होंने 75 वर्ष पहले ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन के बारे में सोचा था। वे शहरी और ग्रामीण के बीच की खाई को पाटना चाहते थे।

सरदार पटेल ने एक ऐसे भारत की परिकल्पना की थी जो एक अखंड निकाय हो जिसमें विविधताओं, भाषाओं और संस्कृतियों का संगम हो।

भारतीय संघ में 562 रियासतों के एकीकरण में उनके प्रयासों से उनके ऐसे सशक्त राष्ट्र के विचार परिलक्षित होते हैं जिसमें राष्ट्रों के समुदाय में खड़ा होने की महानता है।

सरदार पटेल की महानता न केवल रियासतों को भारतीय संघ के एकीकरण करने में है बल्कि यह सुनिश्चित करने में है कि स्वतंत्र राष्ट्र की विकास प्रक्रिया में प्रत्येक राज्य और प्रत्येक नागरिक की हिस्सेदारी है।

देश सरदार पटेल जी का सदैव आभारी रहेगा। भावी पीढ़ी, विशेष रूप से युवाओं को, उन्हें प्रशंसा, सम्मान और कृतज्ञता के साथ याद रखना और भारत के लिए उनके दृष्टिकोण को समझना सिखाया जाना चाहिए।

मुझे प्रसन्नता है कि यह संस्थान सरदार पटेल के सपने को साकार करने के लिए कार्य कर रहा है और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन के एक सशक्त माध्यम के रूप में प्रयोग कर रहा है ।

वास्तव में, शिक्षा एक महान एकीकरणकर्ता होती है। उत्तम शिक्षा जातिगत बाधाओं को दूर करती है और एक अधिक समावेशी समाज का निर्माण करती है। यह एक ऐसे दृष्टिकोण को बढ़ावा देती है जो व्यक्ति को संकीर्ण, लोगों को विभिन्न वर्गों में विभाजित करने वाले विखंडन करने वाले दृष्टिकोण से आगे ले जाने में सक्षम बनाती है । यह समाज में विभिन्न सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक समूहों का महान एकीकरणकर्ता होती है।

मुझे जानकारी दी गई थी कि ऐसे दूरदर्शी राजनेता को श्रद्धांजलि स्वरूप डॉ. सी.एल. पटेल के नेतृत्व में चारुतर विद्या मंडल (सीवीएम) ने वर्ष 2008 में सरदार जी के जीवन और कार्यों पर अध्ययन को समर्पित अपने तरीके का पहला और एकमात्र अनुसंधान केंद्र स्थापित किया है।

सेंटर फॉर स्टडीज़ एंड रिसर्च ऑन लाइफ एंड वर्क्स ऑफ सरदार वल्लभभाई पटेल (सीईआरएलआईपी) कला और मानविकी के क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए पाठ्यक्रम संचालित करता है और इसका लक्ष्य सामाजिक रूप से प्रासंगिक और किफ़ायती शिक्षा के माध्यम से राष्ट्र निर्माण करने के लिए विद्यार्थियों का विकास करना है।

प्रिय बहनों और भाइयों

केवल शिक्षा में ही वह शक्ति है जो लोगों की मानसिकता में बदलाव ला सकती है । इसमें सामाजिक मानदंडों को बदलने की शक्ति है। यह निर्बल को सबल बनाती है। यह व्यक्तियों और समाज में बदलाव लाती है।

शिक्षा को मानव के व्यक्तित्व के सभी आयामों - बौद्धिक, शारीरिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक को विकसित करना चाहिए। इसलिए, इसे कक्षा में होने वाले अनुभव तक सीमित या प्रतिबंधित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे सीखने का समग्र अनुभव बनना चाहिए।

हमें एक समग्र शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता है जो विद्यार्थियों को जीवन मूल्यसिखाए और एक वैज्ञानिक, नवोन्मेषी भावना का संचार करे। चारुतर विद्या मंडल की स्थापना इस प्रकार कि शिक्षा प्रदान करने के लिए की गई थी।

मंडल का मुख्य उद्देश्य सामाजिक परिवर्तन और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को मूल्य-आधारित शिक्षा प्रदान करके उन्हें सशक्त बनाना है।

गांधी जी की ग्राम स्वराज की विचारधारा को समझने वाले सरदार पटेल ने पड़ोसी जिलों करमसाद, बकरोल और आनंद के त्रि-जंक्शन पर विद्या मंडल को आकार देकर ग्रामीणों के सशक्तिकरण के लिए जमीन तैयार की। उनका मानना था कि गाँव या ग्रामीण भारत का विकास "अमीर और गरीब" के बीच के अंतर को समाप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है।" वे ग्राम-गणराज्यों की गाँधीवादी दृष्टि को वास्तविकता में बदलना चाहते थे।

तकनीकी में तेजी से विकास के साथ ही, स्वदेशी उद्योगों और बुनकरों, कुम्हारों, चमड़ा कारीगरों, ताड़ी बनाने वालों और इस प्रकार के अन्य पारंपरिक उद्योगों के पुनरुत्थान से अब ग्रामीण लोगों के लिए रोजगार सृजन करने की अनेक संभावनाएं हैं।

आपके संस्थान जैसे संस्थानों को कारीगरों के कौशल को उन्नत करके, उनके उत्पादों के विपणन के लिए रास्ते बनाकर और उन्हें आवश्यक सहायता प्रदान करके उनके शिल्प कौशल के संवर्धन के लिए विशेष कदम उठाने चाहिए।

रचनात्मकता, नवीनता, गुणवत्ता जागरूकता और उत्पादों की तुरंत बिक्री को बढ़ावा देने की नितांत आवश्यकता है।

प्रिय भाइयों और बहनों

भारत बड़े परिवर्तन के मोड़ पर है। केंद्र सरकार द्वारा किए गए सुधार और अनेक राज्यों द्वारा दर्ज की गई प्रगति भारत को विश्व की सबसे तेज गति से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था बना रही है । तथापि, हमारी युवा आबादी की बढ़ती आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए विकास की गति को तेज करने और उसे कायम रखने की आवश्यकता है ।

विश्वविद्यालयों और उच्च शैक्षणिक संस्थानों पर ऐसे विद्यार्थियों को तैयार करने की बड़ी ज़िम्मेदारी है जो सभी क्षेत्रों में प्रगति करने में देश का नेतृत्व करें । मुझे अभी थोड़ी देर पहले इस महत्वपूर्ण अवसर पर सीवीएम को विश्वविद्यालय घोषित करके बहुत प्रसन्नता हो रही है।

मुझे हर्ष है कि सेंट्रल गुजरात का सबसे पुराना और सबसे प्रभावशाली शैक्षणिक न्यास अब स्व-वित्तपोषित राज्य स्तरीय निजी विश्वविद्यालय हो जाएगा। मेरा मानना है कि इस विद्या मंडल को विश्वविद्यालय का दर्जा देकर, सरकार ने इसकी 74 वर्षों की लंबी शिक्षा सेवा को मान्यता प्रदान की है।

आनंद जिले के लोगों के लिए यह अच्छी ख़बर है कि जिले का शिक्षा नगर- वल्लभ विद्यानगर में अब दो विश्वविद्यालय होंगे- सरदार पटेल विश्वविद्यालय और सीवीएम विश्वविद्यालय।

सीवीएम के विश्वविद्यालय बनने से, वल्लभ विद्यानगर और न्यू वल्लभ विद्यानगर में स्थित उसके मौजूदा उन्नीस स्व-वित्तपोषित कॉलेज सीवीएम विश्वविद्यालय के संघटक कॉलेज बन जाएंगे। मुझे जानकारी दी गई थी कि अनेक सहयोगी संस्थान जैसे एसआईसीएआरटी (विज्ञान अनुसंधान संस्थान), अकादमियां, आयुर्वेदिक अस्पताल और अन्य भी सीवीएम विश्वविद्यालय का हिस्सा होंगे और नौ से अधिक अकादमिक विषयों में पाठ्यक्रम संचालित करती है ।

मुझे यह जानकर प्रसन्नता हो रही है कि सीएवीएम विश्वविद्यालय का आरंभिक आकार गुजरात में सभी निजी विश्वविद्यालयों में सबसे बड़ा होगा । लगभग 10,000 विद्यार्थी और 560 सुयोग्य संकाय सदस्य और लगभग इतनी संख्या में गैर-शैक्षणिक कर्मचारीगण सीएवीएम विश्वविद्यालय का हिस्सा होंगे ।

मेरा सुझाव है कि सीएवीएम विश्वविद्यालय के प्रशासन और संकाय सदस्यों को कमजोर वर्गों के लिए उच्च शिक्षा को किफ़ायती बनाने के लिए कदम उठाने चाहिए । विश्वविद्यालय की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए, विश्वविद्यालय को ग्रामीण आजीविका पर विशेष ध्यान देना चाहिए और ग्रामीण युवाओं, विशेषकर महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में पाठ्यक्रम शुरू करने चाहिए।

विश्वविद्यालय को गाँवों को आत्मनिर्भर बनाने के तरीकों और साधनों की खोज करने के लिए एक विशेष पाठ्यक्रम शुरू करना चाहिए ।

साथ ही, इस विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा पूरी करने वाले विद्यार्थियों के रोजगार की संभावनाओं को बेहतर बनाने के लिए पाठ्यक्रम शुरू करने के प्रयास भी करने चाहिए ।

यदि आप अभी ऐसा कोई पाठ्यक्रम संचालित नहीं कर रहे हैं तो आपको ग्रामीण उद्यमिता और खाद्य प्रसंस्करण पर पाठ्यक्रम शुरू करने की योजना बनानी चाहिए।

शैक्षणिक सत्र के दौरान औद्योगिक इकाई या प्रासंगिक कार्यशाला का एक दौरा विद्यार्थियों को प्रचालन का एक विहंगावलोकन देगा और उन्हें कार्य प्रत्यक्ष अनुभव देगा।

विश्वविद्यालय या शिक्षण संस्थानों के लिए एक सक्षम पारिस्थितिकी तंत्र बनाने की आवश्यकता है ताकि शोध और नवाचार की भावना को बढ़ाया जा सके।

21 वीं सदी के भारत को विश्व-स्तरीय उच्च शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता है जो छात्र को दायरे से बाहर सोचने में सक्षम बनाती हो, और उद्यमशीलता की भावना को प्राप्त करने में उसकी मदद करे । हमें युवाओं को रोजगार सृजक बनने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए और ग्रामीण उद्यमों की स्थापना करने के लिए आवश्यक ज्ञान और कौशल प्रदान करना चाहिए।

900 विश्वविद्यालयों और लगभग 51,649 उच्च शिक्षा संस्थानों में लगभग 14 लाख संकाय सदस्यों के साथ भारत में विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों में देश का भविष्य बदलने की बहुत संभावनाएं हैं। गुणवत्ता पर अधिक ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता है।

उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा वास्तव में भारत को विश्व गुरु बना सकती है। भारत, जिसे विश्वगुरु के नाम से जाना जाता था वह युवा आबादी के माध्यम से अपने जनसांख्यिकीय लाभ का उपयोग करके अब वापस अपना स्थान प्राप्त कर सकता है।

भारत की 35 प्रतिशत से अधिक आबादी युवा है और विश्व भर से सर्वश्रेष्ठ विचारों को ग्रहण करने की प्रतीक्षा में हैं।

सरकार, निजी क्षेत्र और आपके जैसे शैक्षणिक संस्थान 21 वीं सदी के नागरिकों के लिए आवश्यक सीखने के अवसर उपलब्ध करा सकते हैं।

तकनीकी और हमारे देश के समृद्ध मानव संसाधन इसे किफ़ायती लागत पर करने में सक्षम बनाएँगे।

सरकार अकेले यह कार्य नहीं कर सकती है। एक व्यापक सामाजिक प्रयास, सामूहिक बल, विभिन्न हिस्सेदारों के बीच सहयोगी भागीदारी की आवश्यकता है ।

इस महत्वपूर्ण अवसर पर इस प्रतिष्ठित शैक्षणिक केंद्र में आप सभी के साथ और इस विश्वविद्यालय की गतिविधियां तथा राष्ट्र के प्रति योगदान के बारे में जानकर मुझे वास्तव में बहुत प्रसन्नता हो रही है ।

मुझे विश्वास है कि विश्वविद्यालय अपनी स्थापना के प्रेरणा स्त्रोत-सरदार वल्लभभाई पटेल और गत अनेक वर्षों में इस संस्थान को आकार देने वाले सभी संस्थापकों के डीआरएस=इष्टिकोन के प्रति पुन:समर्पित होकर व्यक्तियों, समाज और देश की वर्तमान और भविष्य की आवश्यकताओं के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर ध्यान केन्द्रित करेगा।

स्वयं 'चारुतर विद्या' शब्द का तात्पर्य बेहतर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की खोज है । यह एक ऐसी खोज है जिसका कोई अंत नहीं है । गुणवत्ता एक निरंतर खोज है ।

पूर्णता के लिए इस निरंतर प्रयास के लिए आप सभी को शुभकामनाएँ ।

जय हिन्द।