13 मार्च, 2021 को नई दिल्ली में राज्यसभा के नवनिर्वाचित/मनोनीत सदस्यों के लिए आयोजित अभिविन्यास कार्यक्रम के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति, श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया अभिभाषण

नई दिल्ली | मार्च 13, 2021

“मैं आज से प्रारंभ होने वाले इस दो दिवसीय विषय-बोध कार्यक्रम में राज्यसभा के नव-निर्वाचित सदस्यों का स्वागत करता हूं। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य नए सदस्यों को राज्य सभा के लिए चुने जाने के उपरांत संसद सदस्य के तौर पर स्वयं को प्रभावी रूप से अभिव्यक्त करने और अपने उत्तरदायित्वों के निर्वहन हेतु संसद सदस्यों के लिए उपलब्ध विभिन्न अवसरों के अतिरिक्त राज्य सभा के नियमों और प्रक्रियाओं की व्यापक जानकारी प्रदान करना है।
हमारे देश में, विधायक बनना सार्वजनिक जीवन में सबसे आकांक्षित कार्य है। इस आकांक्षा को पूरा करने के लिए प्रतिस्पर्धा अत्यंत तीव्र है। इसमें सिविल सेवाओं से भी कहीं अधिक तीव्र प्रतिस्पर्धा होती है। यदि निर्धारित पाठ्यक्रम में महारत हासिल कर ली जाए तो आईएएस अधिकारी बनने की संभावना विधायक बनने से कहीं अधिक है क्योंकि विधायक बनने लिए कोई निश्चित पाठ्यक्रम नहीं है । एक और अंतर यह है कि एक अधिकारी के लिए यह जीवन भर के लिए एक सुरक्षित नौकरी होती है जबकि एक विधायक के लिए ऐसा नहीं होता। इसके विपरीत, विधायक बनने के बाद असली चुनौती प्रारंभ होती है। हर पांच या छह वर्ष में अपनी योग्यता साबित करके और खुद पर लोगों का विश्वास बनाए रखते हुए पुनः निर्वाचित होना एक बड़ा काम है, जिसमें कई विधायक असफल रहते हैं।
इस पृष्ठभूमि में, मैं आप सभी को राज्य सभा, जो हमारे देश की सर्वोच्च विधायिका का एक अभिन्न अंग है, का सदस्य बनने पर बधाई देता हूं । यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। आप अपने क्षेत्र के लोगों के साथ जुड़कर और उनके साथ कार्य करके, अपनी सदिच्छा, प्रतिष्ठा और अन्य योग्यताओं के आधार पर राज्य सभा के लिए निर्वाचित हो पाए हैं। अब आपके पास उस राज्य या संघ राज्य क्षेत्र के हितों का प्रतिनिधित्व करने का संवैधानिक जनादेश है, जिसके लिए आप निर्वाचित हुए हैं।
इस महान कार्य में सफल होने के लिए, आपको सदन में समय-समय पर लोक महत्व के मामलों को उठाने और यथोचित समाधान ढूँढने, सभा की बहस में गुणवत्तापूर्ण योगदान देने और संसद के प्रति कार्यपालिका के उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने में विधि निर्माता के रूप में बेहतर प्रदर्शन करना होगा। ये विधायिका के विधायी,प्रतिनिधि, विमर्शी और निगरानी कार्यों के अनुरूप हैं।
किसी भी जन सेवक या अन्य पदाधिकारियों द्वारा अपने कार्यों का प्रभावी ढंग से निर्वहन किए जाने हेतु कार्यक्षेत्र, कार्य के परिवेश को शासित करने वाले नियमों और विनियमों की समुचित समझ और इससे भी महत्वपूर्ण बात सही रवैय्या और विषय-बोध महत्वपूर्ण हैं। इस कार्यक्रम का उद्देश्य ऐसा विषय-बोध प्रदान करना है। मुझे आशा है कि आप सभी इस दो दिवसीय संवाद का बेहतर उपयोग करेंगे।
आजादी के बाद से, संसद और राज्य विधान सभाएं हमारे राष्ट्र के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन की पटकथा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं। नतीजतन, आज़ादी के समय गरीब, निरक्षर और तकनीकी रूप से पिछड़े हुए हमारे इस देश ने कम समय में काफी प्रगति की है और अब पूरी दुनिया एक राष्ट्र के रूप में हमारा लोहा मानती है। देश भर के विधायक, जिन्होंने विगत वर्षों में इस बदलाव में अपना योगदान दिया है, इसके लिए गर्व महसूस कर सकते हैं। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र, हमारे लोकतंत्र, की जीवंतता प्रत्येक चुनाव के साथ खुद को अधिकाधिक मुखर करती रही है परंतु हमारे विधान मंडलों के कामकाज के संबंध में चिंता के कुछ क्षेत्र उभरकर सामने आए हैं। ये विधायकों, जिनमें संसद सदस्य भी शामिल हैं, के विधायी कक्षों के भीतर और बाहर के कार्यकलापों से संबंधित हैं, जिसके परिणामस्वरूप संसदीय लोकतंत्र की संरक्षक - आम जनता के बीच कानून बनाने वाले निकायों और कानून निर्माताओं, के बारे में 'नकारात्मक धारणा' बढ़ती ही जा रही है। यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। इस विषय-बोध कार्यक्रम का उद्देश्य इस बढ़ती चिंता के प्रति आप सभी को सचेत करना और इस स्थिति को बदलने में आप सभी का सहयोग करना है।
मैंने इस दो दिवसीय कार्यक्रम के लिए सचिवालय द्वारा तैयार किए गए विषय-बोध मॉड्यूल का अध्ययन किया है। मुझे यह उल्लेख करते हुए प्रसन्नता हो रही है कि इन दो दिनों के दौरान राज्य सभा के कुछ अनुभवी सदस्य सभा के कामकाज के विभिन्न पहलुओं पर आपसे संवाद करेंगे, जिसमें बारीकियों, नियमों, प्रक्रियाओं और परिपाटियों और अपने विचारों और चिंताओं को व्यक्त करने के लिए आपके पास उपलब्ध अवसरों पर प्रकाश डाला जाएगा।
प्रिय सदस्यों !
लगभग 30 साल के विधायी अनुभव और राज्य सभा के सभापति के रूप में साढ़े तीन साल के कार्यकाल के अनुभव के आधार पर मैं आपके साथ स्वयं को प्रभावी सांसद साबित करने के लिए एक दर्जन युक्तियां साझा करना चाहता हूं।
1.संविधान के उपबंधों और दर्शन का गहन ज्ञान
जैसा कि मैंने पहले कहा, आपके पास संविधान के तहत कार्य करने का अधिदेश और उत्तरदायित्व है। हमारा संविधान न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों के आधार पर राष्ट्र के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करता है। आपको इन संवैधानिक सिद्धांतों और अंतर्निहित दर्शन की समुचित जानकारी होनी चाहिए क्योंकि वे आपको कार्यसंचालन संबंधी आधार प्रदान करते हैं। भारत का संविधान देश की ऐसी विधि है जो विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका की कार्यात्मक सीमाओं को परिभाषित करती है।
राज्य सभा के सदस्य के रूप में आपको विशेष तौर पर केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के वितरण की योजना की जानकारी होनी चाहिए ताकि आप संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों के हितों की रक्षा कर सकें। राज्य सभा को संविधान के अधीन समवर्ती सूची में उल्लिखित विषयों पर विधान बनाने, अखिल भारतीय सेवाओं का सृजन करने और लोक सभा के अस्तित्व में न होने की स्थिति में राष्ट्रपति शासन के अनुसमर्थन से संबंधित कुछ विशेष शक्तियां प्रदान की गई हैं । इसलिए, आपकों संविधान के उपबंधों की पूरी जानकारी होनी चाहिए।
2. राज्य सभा की भूमिका और विकास का बोध/strong>
राज्य सभा को 'दूसरे चैम्बर' के रूप में जाना जाता है, लेकिन निश्चित रूप से वह 'द्वितीयक चैम्बर' नहीं है। संविधान सभा में राज्य सभा के निर्माण पर बहस के दौरान इस बिंदु पर बल दिया गया था। धन विधेयक के मामले को छोड़कर, संसद के दोनों सदनों को देश के लिए कानून बनाने के संबंध में समान अधिकार प्राप्त हैं। यह अंतर इसलिए रखा गया है क्योंकि संविधान में कार्यपालिका लोक सभा के प्रति जवाबदेह है। जैसा कि मैंने कुछ समय पहले कहा था, वास्तव में, राज्यसभा के पास संघीय ढाँचे की रक्षा करने के लिए कुछ विशेष शक्तियां हैं।
संसद की दोनों सदनों के सदस्यों के चुनाव के लिए अलग-अलग प्रावधानों और देश के राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव को देखते हुए, वर्ष 1952 में राज्य सभा के अस्तित्व में आने के बाद से लेकर गत 69 वर्षों में से 39 वर्षो के दौरान तत्कालीन सरकार के पास राज्य सभा में बहुमत नहीं रहा है। हालांकि, आपको ज्ञात होना चाहिए कि 3 अवसरों के अतिरिक्त जब विधि निर्माण संबंधी मतभेदों को सुलझाने के लिए दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाई गई थी, दोनों सदनों ने इन सभी वर्षों के दौरान साझा समझ और सद्भाव की भावना से कार्य किया है। इस रिकॉर्ड ने संविधान सभा की बहस में व्यक्त की गई उन आशंकाओं को निराधार साबित कर दिया है कि दूसरा चैम्बर अवरोधक साबित हो सकता है। साझा विजन की यह भावना संसद के काम-काज का मार्गदर्शन करती रहेगी। इसलिए, आपको सदन में अवरोधक तरीके से आचरण नहीं करना चाहिए।
3. सदन के नियमों और परिपाटियों का बोध
सामाजिक आचरण के नियमों के बिना, कोई भी समाज अराजक होगा। यह विधानमंडलों पर भी लागू होता है। तदनुसार, राज्य सभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन विषयक नियमों की विस्तृत योजना समय के साथ-साथ अस्तित्व में आई है। आपको इन नियमों और विशेष रूप से उन नियमों का ध्यान रखना चाहिए जिनका उल्लेख अक्सर किया जाता है।
इन नियमों में हरसंभव आकस्मिक स्थिति के लिए प्रावधान किया गया है। राज्य सभा में सदस्य के तौर पर 20 वर्ष और सभापति के रूप में साढ़े तीन साल के अपने कार्यकाल के दौरान, मैंने कभी ऐसी स्थिति नहीं देखी जब सदन में प्रक्रियात्मक मामलों का समाधान करने में नियमों की अपर्याप्तता महसूस की गई हो।
4. सदन के नियमों और परिपाटियों के लिए समुचित सम्मान
सदन के नियमों और परिपाटियों को जानना एक बात है और उनका पालन करना दूसरी बात है। सदन में समस्याएं तब उत्पन्न होती हैं जब सदन के सुस्थापित नियमों और परिपाटियों का या तो उल्लंघन किया जाता है अथवा उनकी व्याख्या अपने अनुसार तोड़ मरोड़ कर की जाती है। इसलिए, सभा के नियमों और परिपातिओं का अनुपालन करना उचित है।
कुछ दलों और सदस्यों द्वारा अपनी बात रखने के लिए बार-बार कतिपय नियमों का सहारा लिए जाने से सभा में प्राय समस्याएं उत्पन्न होती हैं। दिन की कार्यावलि में शामिल कार्य को छोड़कर किसी विशेष विषय को उठाने के लिए नियम 267 के तहत नियमों को निलंबित करने की मांग करना ऐसा ही एक साधन है जिससे सभा में सबसे ज़्यादा व्यवधान होता है और मजबूरी में सभा को स्थगित करना पड़ता है। ऐसे नियमों का उपयोग दैनिक दिनचर्या के बजाय केवल असाधारण स्थितियों में ही किया जाना चाहिए।
'औचित्य का प्रश्न' उठाना भी ऐसा ही एक मामला है। मैंने देखा है कि इस प्रावधान का अधिकाधिक उपयोग तब भी किया जाता है जब ऐसी कोई बात ही नहीं होती। बेहतर होगा कि इस तरह के निरर्थक औचित्य के प्रश्न उठाने से बचें क्योंकि यह केवल सभा के नियमों की अपर्याप्त समझ को उजागर करता है।
वास्तव में, नियमों को जानना और उनका अनुपालन करना ही बेहतर है।
5. विधि निर्माण प्रक्रिया
संसद सदस्यों का प्राथमिक कर्तव्य देश के लिए विधि बनाना है। इस संबंध में अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं के बारे में संविधान में स्पष्ट प्रावधान हैं। किसी विधि को पारित करने का प्रत्येक चरण विचाराधीन विधेयक का विरोध करने अथवा उसका समर्थन करने का अनोखा अवसर प्रदान करता है और इसका समुचित उपयोग किया जाना चाहिए। इससे समय के बेहतर प्रबंधन में सहायता मिलती है। इन बारीकियों की उचित समझ नए सदस्यों के लिए उपयोगी होगी। 
6. राष्ट्र की स्थिति
संसद सदस्य के तौर पर प्रभावी योगदान देने के लिए राष्ट्र की स्थिति की गहन समझ एक आवश्यक पूर्वापेक्षा है ताकि निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के उद्देश्य से इस स्थिति में तेजी से बदलाव लाया जा सके। हमारे जैसे विकासशील देश को सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक और बाह्य मोर्चों पर जटिल चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। प्रभावी हस्तक्षेप करने के लिए आपको इस तरह के मुद्दों और चुनौतियों की सुविज्ञ और समीक्षात्मक समझ होनी चाहिए।
जैसे-जैसे हमारा राष्ट्र और मजबूत हो रहा है, वैसे-वैसे हमारे सामूहिक प्रयासों में बाधा डालने के और हमारी प्रगति पर रोक लगाने के लिए संगठित प्रयास किए जा रहे हैं। इनमें सीमाओं पर गड़बड़ी पैदा करना, कुछ छिट-पुट घटनाओं के आधार पर हमारे देश की अनुचित आलोचना करना, हमारे लोकतंत्र को अपमानित करना, आर्थिक प्रतिबंध लगाना, सीमा पार से आतंक का प्रायोजन आदि शामिल हैं।
संसद सदस्यों के रूप में, प्रत्येक मंच से प्रगतिशील भारत के पक्ष में बोलने के अतिरिक्त हमारे देश की अखंडता और संप्रभुता की रक्षा करना आपका महान कर्तव्य है। इसके लिए, आपको हर समय सतर्क रहना होगा और ऐसे कपटपूर्ण प्रयासों को विफल बनाना होगा।
जाति, रंग, क्षेत्र और धर्म के आधार पर फूट पैदा करने के प्रयासों पर रोक लगाते हुए हमारे बहु-सांस्कृतिक समाज की एकता और समावेशिता सुनिश्चित करना और उसे और मज़बूत बनाना भी आपका कर्तव्य है। आप में से प्रत्येक को आकांक्षी, उद्गामी, सक्षम, लचीले और एकजुट भारत के प्रवक्ता के तौर पर आगे आना होगा।
7. मुद्दों की गहन जानकारी
राजनीतिक वर्ग को व्यापक रूप से 'सामान्यवादियों 'के रूप में जाना जाता है जो किसी भी मुद्दे पर बोलने में सक्षम होते हैं लेकिन अक्सर उनमें गहराई और आवश्यक परिपेक्ष्य नहीं होता। तेजी से एकीकृत हो रही विश्व व्यवस्था में विकास की बढ़ती ललक के इस दौर में, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, व्यापार आदि सभी क्षेत्रों में जटिल मुद्दे सामने आ रहे हैं। ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ के दौर में इस तरह के मुद्दों पर अस्पष्टता के साथ चर्चा करना फायदेमंद नहीं होगा। एक प्रभावी सांसद बनने के लिए आपको ऐसे मुद्दों की गहन और विश्लेषणात्मक समझ होनी चाहिए। इसके लिए आपको व्यापक पठन और तैयारी के माध्यम से पर्याप्त 'होमवर्क' करने की आवश्यकता है।
संसदीय ग्रंथालय, जो दिल्ली में सबसे बड़ा और राष्ट्रीय पुस्तकालय के बाद देश का दूसरी सबसे बड़ा ग्रंथागार है, में सभी भाषाओं की सैकड़ों पत्रिकाओं सहित विभिन्न विषयों पर लगभग 14 लाख पुस्तकों का विशाल संग्रह है। मुझे बताया गया है कि सूचना और ज्ञान के इस स्रोत में सदस्यों का आगमन उत्साहजनक नहीं है। मैं संसद के सभी सदस्यों से बहस के स्तर में स्पष्ट अंतर लाने के लिए संसदीय ग्रंथालय के सभी संसाधनों का प्रभावी उपयोग करने का आग्रह करता हूं।  
8. संकेंद्रित हस्तक्षेप
सभा और पीठासीन अधिकारियों के समक्ष मुख्य चुनौती समय प्रबंधन है। किसी भी बहस या चर्चा के लिए तय किए गए समय और प्रत्येक दल के सदस्यों की संख्या के आधार पर विभिन्न दलों को समय आवंटित किया जाता है। तदनुसार, कुछ दलों और सदस्यों को सभा के समक्ष किसी मुद्दे पर बोलने के लिए अक्सर तीन या चार मिनट मिलते हैं।
लेकिन वास्तव में यही मायने रखता है कि सभा में क्या बोला गया है न कि कितने समय तक बोला गया है। मैंने अक्सर सदस्यों को बोलते समय अपनी बातों को दोहराते हुए देखा है। सबसे अच्छा तरीका यह है कि पूर्ववर्ती वक्ताओं द्वारा कही गई मुख्य बातों के साथ स्वयं को मोटे तौर पर संबद्ध करते हुए ऐसी नई जानकारी अथवा परिप्रेक्ष्य को सामने लाया जाए जो पूर्ववर्ती वक्ता ने अपने वक्तव्य में उजागर न किए हों। यह एक कला है और आप सभी को स्वयं को आबंटित समय का सदुपयोग करने के लिए यह कला सीखनी चाहिए। मैंने देखा है कि कुछ अवसरों पर एक या दो मिनट बोलने वाले वक्ताओं ने काफी लंबे समय तक बोलने वाले वक्ताओं की अपेक्षा चर्चा में अधिक प्रभावी योगदान दिया है।
बातों को दोहराने से मीडिया की रूचि भी समाप्त हो जाती है और आपके अंतक्षेप को मीडिया द्वारा अनदेखा कर दिया जाता है। इसलिए, आपको स्वयं को मिलने वाले समय का बुद्धिमानी पूर्वक उपयोग करना चाहिए।
9. सुविज्ञ समालोचना न कि साशय अवरोध
विपक्ष को सत्ताधारी सरकार की आलोचना करने का अधिकार है। वास्तव में, यह उनका कर्तव्य है। लेकिन आलोचना सुविज्ञ होनी चाहिए ताकि वह विश्वसनीय लगे। केवल रिकॉर्ड के लिए सरकार के प्रत्येक कदम का विरोध करना इसकी विश्वसनीयता को कम करता है। आलोचना की गुणवत्ता ऐसी होनी चाहिए कि वह वास्तव में सत्ताधारी सरकार को चुभे और मीडिया और जनता का ध्यान आकर्षित करे ।
10. विशेषाधिकार और दायित्व
संसद सदस्य कुछ विशेषाधिकारों के हकदार हैं और उनमें से कई विशेषाधिकार प्रत्येक सभा के विशेषाधिकारों से प्राप्त होते हैं। इन विशेषाधिकारों की अभिकल्पना संसद सदस्यों के लिए निर्बाध कामकाज सुनिश्चित करने के लिए की गई है। जबकि राज्य सभा के सदस्यों के रूप में अपने विशेषाधिकारों के बारे में आपको जानकारी होनी चाहिए लेकिन सभा के प्रभावी कामकाज और वे मतदाता जिनका आप सभा में प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, के प्रति अपने दायित्वों से अवगत होना और भी महत्वपूर्ण है।
11. प्रौद्योगिकी में निपुणता प्राप्त करना
सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) में क्रांतिकारी परिवर्तन ने दुनिया को आपकी मुठ्ठी में कर दिया है। आप लैपटॉप या स्मार्ट फोन के की-बोर्ड के एक बटन पर क्लिक करके सूचना और ज्ञान के विशाल भंडार का उपयोग कर सकते हैं। इससे आपको सभा की कार्यवाही में भाग लेने के लिए अपनी तैयारी करने में सहायता मिलती है । यदि आपको तकनीक का उपयोग करने में झिझक महसूस होती है, तो बेहतर है कि इसे दूर करें और तकनीक प्रेमी बनें। राज्य सभा सचिवालय ने सदस्यों की सुविधा के लिए ई-नोटिस जैसी प्रौद्योगिकी को व्यापक रूप से अपनाया है। आपको तकनीक का अधिक से अधिक उपयोग करना होगा ताकि आप तकनीक का ज्ञान रखने वाले अपने साथियों से पिछड़ न जाएं।
12. अंत में, सभापति की बात मानें
पीठासीन अधिकारी समय के साथ-साथ विकसित किए सभा के नियमों, परिपाटियों और मूल्यों का संरक्षक होता है। जबकि आपको सभा के नियमों और परिपाटियों के अनुसार सभा में अपना हक प्राप्त करने का अधिकार है, परंतु यह आपके और सभा के हित में है कि आप सभापीठ के निर्णय का पालन करें, चाहे वह सभापति हो, उप-सभापति हो या पैनल में शामिल उपसभाध्यक्ष हों । आपको यह समझना चाहिए कि सभापति का अनादर करने से सभा का भी अनादर होता है। मुझे विश्वास है कि आप ऐसा नहीं करेंगे।
माननीय सदस्यगण !
आपको आकांक्षी भारत, जो अंतरराष्ट्रीय सौजन्य में अपना उचित स्थान बनाने के लिए प्रयासरत है, की उन्नति में अपना योगदान देने के लिए राज्य सभा के सदस्यों के रूप में एक अमूल्य अवसर मिला है। विभिन्न कारणों से हमने कुछ समय और अवसरों को खो दिया है, जिसके कारण हम कुछ ऐसे देशों से पिछड़ गए हैं जिन्हें कुछ वर्ष पहले भारत के साथ बराबरी पर या हमसे पीछे ही रखा गया था । यह त्रुटियों में सुधार कर तेजी से आगे निकलने का समय है। मैं आप सभी से अपेक्षा करता हूं कि आप इस अवसर का लाभ उठाएंगे। सदैव याद रखिए कि आप अपने कार्यकाल के अंत में क्या विरासत छोड़ जाएंगे। यह सभा के भीतर और बाहर दोनों ही स्थानों पर आपका उचित मार्गदर्शन करेगा और आपको सही राह दिखाएगा।
“हमारे देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिया गया आदर्श वाक्य है "प्रदर्शन, सुधार और परिवर्तन"। इसे विधानमंडलों में व्यवधानों की बजाय “बहस, चर्चा और निर्णय” के साथ जोड़कर प्राप्त किया जा सकता है।
मैं कामना करता हूँ कि आप अपने प्रयासों में सफल रहें।
मैं आप सभी के लाभार्थ इस सुविचारित विषय-बोध कार्यक्रम का आयोजन करने हेतु सचिवालय की सराहना करता हूं।
आप सभी का धन्यवाद!”