13 मई, 2019 को नई दिल्ली में भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के स्वर्ण जयंती समारोह में माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु का संबोधन

नई दिल्ली | मई 13, 2019

“मुझे भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) के स्वर्ण जयंती कार्यक्रम में भाग लेने पर प्रसन्नता हो रही है। किसी भी संगठन के लिए 50 वर्ष पूरे कर लेना एक महत्वपूर्ण सफलता है, विशेष रूप से आईसीएसएसआर के लिए, जो सामाजिक, आर्थिक और मानव विकास जैसे जटिल मुद्दों से संबंध रखता है।

12 मई, 1969 को स्थापित आईसीएसएसआर देश में सामाजिक विज्ञान अनुसंधान को प्रोत्साहित करने, बढ़ावा देने और वित्त पोषण करने के लिए एक प्रमुख संगठन के रूप में उभरा है और सामाजिक विज्ञान अनुसंधान के माध्यम से देश और समाज के विकास में सक्रिय योगदान दे रहा है। इस संगठन, सामाजिक वैज्ञानिकों और इससे जुड़े अन्य प्रमुख पदाधिकारियों को मेरी बधाई।

मुझे पता है कि व्यापक आधार वाले सामाजिक विज्ञान अनुसंधान के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए आईसीएसएसआर ने छह क्षेत्रीय केंद्रों की स्थापना की है और इसने देश के विभिन्न हिस्सों में स्थित 24 अनुसंधान संस्थानों और पांच मान्यता प्राप्त अनुसंधान संस्थानों को वित्तपोषित किया है।

प्रिय बहनों और भाइयों, जैसा कि आप सभी जानते हैं, तकनीकी और अन्य मोर्चों पर पूरी दुनिया में तथा भारत में तेजी से बदलाव हो रहे हैं। अर्थव्यवस्थाओं के आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण की प्रक्रिया, जिसकी शुरूआत 1990 के दशक के शुरूआती वर्षों में हुई थी, ने देशों के बीच द्विपक्षीय और बहुपक्षीय संबंधों के अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य को पूरी तरह से बदल दिया है। समाज के महत्वपूर्ण मुद्दों और देश की अर्थव्यवस्था के प्रमुख महत्व के मुद्दों के लिए स्वीकार्य समाधान खोजने के लिए उन्हें सामाजिक विज्ञान के परिप्रेक्ष्य के माध्यम से देखने की आवश्यकता है।

मुझे बताया गया है कि छठी पंचवर्षीय योजना (1980 के दशक का मध्य का समय) के अंत तक, परिषद द्वारा स्वीकृत बड़ी संख्या में परियोजनाएं प्रयोग पर आधारित थीं जो उन सरकारी कार्यक्रमों और नीतियों का मूल्यांकन करती थीं जो स्थानीय और क्षेत्रीय स्तरों पर लागू किए जा रहे थे। प्रासंगिकता का नीतिगत अनुसंधान केवल क्षेत्रीय या स्थानीय आयामों में सरकारी कार्यक्रमों के मूल्यांकन पर ध्यान केंद्रित नहीं कर सकता है। मुझे खुशी है कि दुनिया भर में सामाजिक-आर्थिक और सामाजिक-राजनीतिक वातावरण में बदलाव के साथ आईसीएसएसआर ने समसामयिक मुद्दों पर तेजी से ध्यान केंद्रित करने के लिए अपने कार्यक्रमों और गतिविधियों को आवश्यकतानुसार ढाला है।

मुझे यह जानकर खुशी हुई कि आईसीएसएसआर ने पिछले 50 वर्षों के दौरान लगभग 6250 परियोजनाओं और 471 अनुसंधान कार्यक्रमों को मंजूरी दी है। इसे सामाजिक विज्ञान अनुसंधान में लगे विद्वानों की विभिन्न श्रेणियों के लिए 6015 डॉक्टोरल अघ्येतावृत्तियां, 2081 पोस्ट-डॉक्टोरल अध्येतावृत्तियां और अन्य अध्येतावृत्तियां प्रदान करने का गौरव प्राप्त है।

मुझे यह भी बताया गया है कि आईसीएसएसआर के प्रमुख प्रयोजनों में से एक, युवा शोधकर्ताओं और विश्वविद्यालय के शिक्षकों को डॉक्टरेट फेलोशिप और पोस्ट-डॉक्टोरल फेलोशिप प्रदान करके उन्हें प्रोत्साहित करना रहा है।

जैसा कि आप सभी जानते हैं अंतर्राष्ट्रीय सहयोग अनुसंधान की गुणवत्ता का एक प्रमुख निर्धारक कारक सिद्ध हुआ है और इस तरह के सहयोगी प्रयास अनुसंधान के प्रभाव को बढ़ाते हैं और जिसका परिणाम संयुक्त परियोजनाओं, उच्च गुणवत्ता वाले संयुक्त प्रकाशनों, अधिक उद्धरणों और विद्वानों के आदान-प्रदान में होता है।

मुझे बताया गया है कि इंडो-डच प्रोग्राम ऑन आल्टरनेटिव्स ऑफ डेवलपमेंट (आईडीपीएडी) आईसीएसएसआर द्वारा की गई ऐसी पहलों का सबसे अच्छा उदाहरण है जिसके अंतर्गत कई प्रकाशनों को भी सामने लाया गया। मुझे बताया गया है कि पिछले 50 वर्षों के दौरान इस कार्यक्रम के तहत 985 विद्वानों का आदान-प्रदान हुआ है।

मुझे यह जानकर खुशी हुई कि आईसीएसएसआर ने विभिन्न देशों में प्रतिष्ठित अनुसंधान परिषदों के साथ द्विपक्षीय ज्ञापन निष्पादित किया है।

जब आईसीएसएसआर जैसे अनुसंधान संस्थान नीति निर्माताओं को मूल्यवान अनुसंधान इनपुट प्रदान कर रहे हैं, ऐसे में सामाजिक विज्ञान के शोधकर्ताओं के लिए सामाजिक समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करना और समाधान ढूंढना महत्वपूर्ण है ताकि पूरा समाज ऐसे प्रयासों से लाभान्वित हो सके।

अब विकास और इसका उद्देश्य समावेशिता हासिल करना है। वंचितों तक पहुंच बनाना, गरीबों को धन प्रदान करना विश्व भर में नए मानदंड हैं। सतत विकास लक्ष्योंि को प्राप्ता करना, लोगों के स्वायस्य्ास की देखभाल करना, गरीबी को मिटाना, शहरी-ग्रामीण अंतर को समाप्तक करना और कृषि क्षेत्र और इस पर निर्भर अन्य क्षेत्रों के समक्ष चुनौतियों के लिए एक अभिनव और व्या वहारिक दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। शोधकर्ताओं को विश्व में व्यापक स्तर पर मौजूद गंभीर समस्याओं के समाधान के लिए लीक से हटकर और अभिवन समाधान खोजने चाहिए।

शोधकर्ताओं को बड़ी संख्या में मौजूद समस्याओं, पहलों और रुझानों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। इनमें से कुछ समस्याएं हैं भारतीय संघीय प्रणाली में रुझान, वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति, विदेश नीति और पड़ोसियों के साथ नीति, शहरी रूपांतरण, गांवों में परिवर्तन, स्मार्ट शहर बनाने की पहल, संसाधनों को बनाए रखना, शहरों को हरा-भरा करना, प्रवासन की प्रक्रिया और इसके निहितार्थ, सुरक्षा संबंधी मुद्दे, साइबर सुरक्षा, हमारी बौद्धिक परंपरा, कौशल और रोजगार, विकास और रूपांतरण के लिए प्रौद्योगिकी, शासन और ई-गवर्नेंस, विकास की समावेशिता, मेक इन इंडिया, भारत जैसे समाज में सार्वजनिक-निजी भागीदारी, खाद्य सुरक्षा, कृषि संबंधी समस्याएं, पर्यावरण समस्याएं, स्वच्छ भारत, स्वास्थ्य देखरेख और सब तक इसकी पहुंच, शिक्षा में समानता और गुणवत्ता, सब की पहुँच ज्ञान और नवाचार, पारिस्थितिकी तंत्र और सभी संभावित संस्थानों की गुणवत्ता में सुधार।

इन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण शोध नीति निर्माताओं और सरकार को निश्चित रूप से नई अंतर्दृष्टि प्रदान करेगा।

अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था: "आज हम जिन गंभीर समस्याओं का सामना कर रहे हैं, उनको पैदा करते समय जो हमारी सोच थी, उसी स्तर की सोच से इन समस्याओं को नहीं सुलझाया जा सकता"।

वर्तमान की चुनौतियों और भविष्य के लिए उभरती चुनौतियों के लिए रचनात्मकता, डिजाइन-थिंकिंग और एक समाधान खोजने वाली मानसिकता और सक्षमता की आवश्यकता है।

समाधान ऐसे होने चाहिए जो हमें एक अधिक समावेशी, स्थिर दुनिया की ओर ले जाएं।

जैसा कि मैंने पहले उल्लेख किया था, 1980 और 1990 के दशक में वैश्वीकरण की प्रक्रिया शुरू होने के बाद से दुनिया बहुत तेज गति से बदल रही है। पारस्परिक निर्भरता की सीमा भी बढ़ रही है और कोई भी देश आज अलग-थलग रहने के बारे में नहीं सोच सकता है। इस परस्पर निर्भर दुनिया में, हर किसी को एक दूसरे के अनुभव से सीखने और विश्व की सर्वोत्तम पद्धतियों को अपनाने के महत्व के बारे में पता है। अनुसंधान में तो यह सब और भी अधिक महत्वपूर्ण है। कोई भी शोध जो अंतरराष्ट्रीय कठोरता, कार्यप्रणाली और साक्ष्य संबंधित है उसका गुणवत्ता और प्रभाव में बेहतर होना तय है।

जब इस संस्था ने दुनिया के सबसे प्रसिद्ध संस्थानों के साथ समझौता ज्ञापन निष्पादित किए हैं तो मुझे देश में सर्वोत्तम सहयोगी व्यवस्थाओं में से एक को बनाने के लिए आईसीयूएसआर द्वारा किए गए प्रयासों की सराहना करनी होगी। इस तरह के सहयोगों ने भारतीय सामाजिक वैज्ञानिकों को दिशा प्रदान की है और सक्षम सामाजिक विज्ञान शोधकर्ताओं को भी महत्वपूर्ण दृष्टि प्रदान की है।

जैसा कि बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर ने कहा था, “एक विचार को प्रसार की उतनी ही आवश्यकता होती है जितनी एक पौधे को पानी की अन्यथा दोनों मुरझा जाएंगे और समाप्त हो जाएंगे ”। इसलिए मुझे खुशी है कि यह संस्थान सामाजिक समानता और लैंगिक संवेदनशीलता पर स्पष्ट रूप से ध्यान देने के साथ-साथ प्रतिभा को प्रोत्साहन दे रहा है और उत्कृष्टता को बढ़ावा दे रहा है।

प्रिय बहनों और भाइयों, अतीत के विपरीत आज विभिन्न क्षेत्रों के बीच बारीक अंतर लगभग समाप्त हो गए हैं। आज के शोधकर्ता स्वयं को केवल अपने क्षेत्र तक सीमित नहीं रख सकते और उन्हें अन्यग संबंधित क्षेत्रों की भी मूलभूत समझ होनी चाहिए। मुद्दे भी अब किसी विषय-विशेष से संबंधित नहीं रह गए हैं और कई विषयों तक इनका विस्तार है। एक अंतर-विषयात्मक तरीके से एक समग्र शोध दृष्टिकोण को अपनाने की आवश्यकता है।

उदाहरण के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यावरण सभी के लिए अत्यधिक चिंता के विषय हैं और इन्हें किन्हीं विशेष क्षेत्रों तक सीमित नहीं रखा जा सकता है।

विज्ञान और सामाजिक विज्ञान दोनों में नए अनुसंधान का क्षेत्र विशाल है और निश्चित रूप से युवा शोधकर्ताओं को विभिन्न क्षेत्रों में एक व्यापक दृष्टिकोण प्राप्त करने में मदद करेगा। जैव-प्रौद्योगिकी में उभरते क्षेत्र, आनुवांशिक इंजीनियरिंग, जैव-विविधता, नई सामग्री, सूक्ष्म-मशीनें, जैव-चिकित्सा सिमुलेशन और उपकरण, अंतरिक्ष में स्थायी मानव निवास सहित अंतरिक्ष अनुसंधान और प्रौद्योगिकी में नए वर्चस्व, और महासागरों में इसी प्रकार के नए कार्य, ऐसे कुछ उदाहरण हैं।

ऐसी पृष्ठभूमि में सामाजिक वैज्ञानिकों की भूमिका स्पष्ट रूप से सामने आने की आवश्यकता है। सामाजिक विज्ञान के ज्ञान की पर्याप्त जानकारी प्राप्त किए बिना कोई भी "ज्ञान समाज" में सफलतापूर्वक प्रवेश नहीं कर सकता है। अगर प्राकृतिक विज्ञान की तुलना कंप्यूटर से की जाए तो सामाजिक विज्ञान इसका साफ्टवेयर है।

सामाजिक विज्ञान अनुसंधान को नीति निर्माताओं के डाटा बेस या सूचना आधार को मजबूत करना चाहिए और उन्हें नीति में सुधार और कार्यान्वयन के लिए साक्ष्य-आधारित इनपुट प्रदान करना चाहिए। नीति निर्माताओं के साथ परस्पर संबंध से शोधकर्ताओं और नीति निर्माताओं दोनों के, मुद्दों की पेचीदगियों को समझने और यथार्थवादी समाधान प्रदान करने में, समक्ष बनने की उम्मीद है।

मुझे खुशी है कि आईसीएसएसआर महिला सशक्तीकरण, राष्ट्रीय एकीकरण, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की शैक्षिक स्थिति और अल्पसंख्यकों की स्थिति आदि विषयों पर राष्ट्रीय स्तर पर अध्ययन कर रहा है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा अक्टूबर 2018 में "इम्प्रेस" (इम्पेक्टफुल पालिसी रिसर्च इन सो‍शल साइंस) निश्चित रूप से आईसीएसएसआर के लिए एक महत्वपूर्ण सफलता है जिसे इसके कार्यान्वयन का कार्य सौंपा गया है क्योंकि वहां लगभग 1500 अनुसंधान परियोजनाएं होंगी।

यह योजना नीतिगत महत्व वाले महत्वपूर्ण समकालीन सामाजिक विज्ञान के मुद्दों पर उच्च गुणवत्ता वाले अनुसंधान आउटपुट के लिए सामाजिक विज्ञान में सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा को आकर्षित करने के लिए तैयार की गई है।

मुझे लगता है कि समय आ गया है कि सामाजिक वैज्ञानिक इसका लाभ उठाएं, अब तक किए गए कार्यों का गंभीरता से मूल्यांकन करें और आगे बढ़ें। हमें अनुसंधान के नए क्षेत्रों पर विचार करने की आवश्यकता है जो दुनिया के बाकी हिस्सों के लिए हमारी सामूहिक चिंता को ध्यान में रखते हुए एक राष्ट्र के रूप में हमारे लिए महत्वपूर्ण चिंता का विषय हैं। क्या हम अनुसंधान के नए क्षेत्र खोज सकते हैं?

आईसीएसएसआर के 50 वर्ष पूरे होने पर उपरोक्त मुद्दों का भारतीय परिप्रेक्ष्य में हल निकालने की और आईसीएसएसआर द्वारा इस कार्य में लाई गई गति को तेज़ करने की आवश्यकता है ताकि समाज और राष्ट्र के समग्रत: लाभ के लिए सामाजिक विज्ञान अनुसंधान को बढ़ावा दिया जा सके।

जय हिन्द!"