12 नवंबर, 2017 को नई दिल्ली में इस्कॉन द्वारा आयोजित पूर्व पश्चिम सांस्कृतिक महोत्सव में भारत के उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया अभिभाषण

नई दिल्ली | नवम्बर 12, 2017

"कई बार यह सोचकर आश्चर्य होता है कि सत्तर वर्ष के एक व्यक्ति ने यह सब किया, प्रतिदिन केवल तीन-चार घंटे सोए और इतनी सारी पुस्तकों की रचना की जिनका विश्व की 82 भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।

लेकिन हमारा समय बेहद असाधारण है। आज एक ओर जहां विश्व विविध क्षेत्रों में तेजी से प्रगति कर रहा है, वहीं दूसरी ओर आतंकवाद, पर्यावरणीय क्षति, नशीली दवाओं की लत, नफरत, भूख और गरीबी के रूप में कई चुनौतियां भी हमारे सामने हैं।

ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में मुझे स्वामी प्रभुपाद का संदेश प्रासंगिक प्रतीत होता है। उनकी शिक्षाओं का सौंदर्य इस बात में है कि उन्होंने नस्ल, लिंग, जाति, धर्म या सामाजिक स्तर का कोई भेदभाव किए बिना हर किसी को भक्ति और सेवा के परचम तले एकजुट किया। कोई भी उन तक पहुंच सकता है और उनके आंदोलन में प्रत्येक व्यक्ति भाग ले सकता है।

यह भारतभूमि की शिक्षा का प्रभाव है कि हम बिना किसी पूर्वाग्रह या भेदभाव के हर व्यक्ति को अपना परिवार मानते हैं - वसुधैव कुटुम्बकम्।

स्वाभाविक है कि जब हम विश्व को एक परिवार माते हैं तो हम हर व्यक्ति की परवाह और चिंता करेंगे। स्वामी प्रभुपाद का जीवन इसका साक्षी है। उन्होंने न केवल आध्यात्मिक उपदेश दिए बल्कि औरों के कल्याण की भी उतनी ही चिंता की।

हजारों वर्षों से भारतीय सभ्यता के मुख्य सामाजिक ताने-बाने के मूल में सामुदायिक कल्याण की भावना भी रही है। हमारी महान सभ्यता ने ही विश्व को यह सुप्रसिद्ध उद्घोष दिया:

लोका: समस्ता सुखिनो भवंतु
सर्वे जना: सुखिनो भवंतु
सर्व जीव जंतु सुखिनो भवंतु

"संपूर्ण विश्व में प्रसन्नता और शांति हो। विश्व के सभी लोगों को प्रसन्नता और शांति मिले, सभी जीव जंतुओं को प्रसन्नता और शांति मिले।"

मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि उनके द्वारा आरंभ की गई परियोजना 'हरे कृष्णा फूड फॉर लाइफ' आज विश्व का सबसे बड़ा भोजन राहत कार्यक्रम है। अन्नामृत कार्यक्रम के तहत, इस्कॉन के सदस्य प्रतिदिन सरकारी विद्यालयों के 12 लाख छात्रों को मुफ्त भोजन मुहैया कराते हैं। जनजातीय देखभाल पहल के तहत, संगठन असम, त्रिपुरा, झारखंड, ओडिशा और पश्चिमी बंगाल के सुदूरवर्ती भागों में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान कर रहा है। ये सारी पहलें अत्यधिक सराहनीय है।

सामाजिक अवसंरचना के विकास में शिक्षा एक महत्वपूर्ण साधन है- क्योंकि इससे गरीबी और पिछड़ेपन का दुष्चक्र टूटता है।

दूसरी ओर संस्कृति सामाजिक अवसंरचना की संजीवनी शक्ति है। यह उन नैतिक मूल्यों को अनुप्राणित करती है जिनका आधुनिक जीवन शैली में क्षरण हो रहा है।

लेकिन मेरी दृष्टि में स्वामी प्रभुपाद की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि वह भारत की प्राचीन सभ्यता के आदर्श दूत थे। वे उन्हीं पारंपरिक मूल्यों के वाहक थे जिन्हें आप, उनके अनुयायी भारत के भीतर और विदेशों में प्रचारित-प्रसारित कर रहे हैं।

और उन्होंने इस कार्य को इतनी सफलतापूर्वक अंजाम दिया कि आज पाश्चात्य देशों के ऐसे सैकड़ों-हजारों व्यक्ति हैं जिनका दृष्टिकोण असाधारण रूप से भारतीय है और जिनकी जीवनशैली पूर्णत: वैदिक है।

ऐसी उचित ही है क्योंकि इस्कॉन के सात उद्देश्यों में से एक उद्देश्य है".....जीवन मूल्यों के असंतुलन पर नियंत्रण पाने तथा विश्व में वास्तविक एकता और शांति का लक्ष्य हासिल करने के उद्देश्य से सभी लोगों को आध्यात्मिक जीवन की तकनीक सिखाना।"

इस्कॉन जैसे आंदोलन भारत के भविष्य, हमारे युवाओं की सहायता कर रहे हैं ताकि वे बुराइयों से मुक्त, करुणामय और सेवाभावी जीवन अपना सकें। पिछले वर्ष इस आंदोलन को पचास वर्ष हो गए है।

15वीं शताब्दी के संत, श्री चैतन्य महाप्रभु ने सभी भारतीयों से परोपकार अर्थात् मानवजाति के कल्याण हेतु कार्य करने का आह्वान किया था। हमारे शास्त्रों में भी यही कहा गया है- "परोपकारार्थमिदम् शरीरम"(हमारा शरीर तभी उपयोगी है जब यह औरों की सेवा में काम आए)। श्री चैतन्य महाप्रभु के वंशज स्वामी प्रभुपाद ने इस प्रत्यक्ष आदेश को हृदय से स्वीकार किया और विश्व भर में भ्रमण कर भारत के सच्चे गौरव का प्रचार-प्रसार किया।

उन्होंने दुनिया भर में कृष्णभावनामृत का प्रसार किया है। यह भावनामृत प्रेम और सद्भावना का संवर्धन करता है और प्रत्येक मनुष्य को इस योग्य बनाता है कि वह अपने भीतर मौजूद दैवीय शक्तियों का अनुभव कर सके।

मैं एक बार फिर आपको धन्यवाद देता हूं कि आपने मुझे इतने सुंदर समारोह में आपके बीच आने के लिए आमंत्रित किया। मैं समाज सेवा के आपके भावी प्रयासों की सफलता की कामना करता हूं।
बहुत-बहुत धन्यवाद।
जय हिन्द।