12 अगस्त, 2020 को उपराष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में “नेताजी - इंडिया’ज़ इन्डिपेन्डन्स एंड ब्रिटिश आर्काइव्ज़” नामक पुस्तक का इसके हिंदी संस्करण सहित, विमोचन करने के बाद सभा में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | अगस्त 12, 2020

मुझे डॉ. कल्याण कुमार डे नेताजी सुभाष बोस-आईएनए ट्रस्ट के सदस्य द्वारा लिखित पुस्तक '' नेताजी- इंडियाज इंडिपेंडेंस एंड ब्रिटिश आर्काइव्स '' का विमोचन करते हुए खुशी हो रही है।

यह पुस्तक सामान्य रूप से भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और विशेष रूप से स्वतंत्रता संग्राम में नेताजी के योगदान पर बहुत सी प्रकाशित पुस्तकों में शामिल हो रहा एक मूल्यवान संकलन है।

नेताजी एक करिश्माई नेता तथा स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रणी व्यक्तित्वों में से एक थे। मातृभूमि के प्रति उनके देशभक्तिपूर्ण उत्साह और स्वचछंद प्रेम ने उन्हें प्रतिष्ठित भारतीय सिविल सेवा से त्यागपत्र देने और इंग्लैंड से भारत लौटने पर विवश किया, जहां उन्हें आईसीएस परीक्षा में सम्मिलित होने के लिए भेजा गया था।

स्वतंत्रता संग्राम में उनके द्वारा निभाई गई प्रमुख भूमिका सर्वविदित है। इसी प्रकार उनके जीवन के अन्य पहलू, जैसे स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए उनका दृष्टिकोण, यूरोप में उनका निर्वासन, अपनी गिरफ्तारी के बाद बचकर जर्मनी जाना; विभिन्न भाषाओं में आज़ाद हिंद रेडियो का संचालन तथा आईएनए का पुनरूत्थान भी सर्वविदित हैं।

एक मजबूत भारत के निर्माण के लिए उनकी परिकल्पना और विरासत को याद रखना महत्वपूर्ण है। भले ही स्वतंत्रता प्राप्ति के लक्ष्य के लिए कई अलग-अलग दृष्टिकोण थे, फिर भी परिकल्पना सामान्य थी। लगन और प्रतिबद्धता समान थी। देश के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान प्रकाशमान वाले सभी महान व्यक्तियों में अपनी मातृभूमि के लिए गहरी, अटूट श्रद्धा थी। वे साथी नागरिकों के दु:ख दर्द से सहज रूप से जुड़े तथा सभी लोगों के जीवन की बेहतरी सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहते थे।

नेताजी करिश्माई नेताओं के इस लंबे वंश का हिस्सा हैं।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उनका सक्रिय और साहसी नेतृत्व लोगों, विशेषकर युवाओं के लिए प्रेरणा का प्रमुख स्रोत बना रहेगा। उन्होंने आईएनए को पुनर्जीवित किया तथा उसे अत्यंत शक्तिशाली बना दिया। जैसा कि इस पुस्तक में दस्तावेजों से संकेत मिलता है, आईएनए के लिए जनता की सहानुभूति की बढ़ती लहर पर ब्रिटिश काफी चिंतित थे। जैसा कि 1945 में ब्रिटिश सरकार की खुफिया रिपोर्ट में उल्लेख किया गया था, "भारतीय राष्ट्रीय सेना के संबंध में स्थिति ऐसी है जिससे अशांति फैल सकती है।" स्पष्ट है, आईएनए को नेताजी का नेतृत्व मिलने से इसे एक विश्वसनीयता और महानता प्राप्त हुई जिससे ब्रिटिशों को इस संगठन के प्रति गंभीरता से सोचने पर मजबूर कर दिया। यह देश के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देने वाले मुख्य कारकों में से एक था।

आज अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस भी है। इस अवसर पर मैं युवाओं से नेताजी के जीवन से प्रेरणा लेने और नए भारत के निर्माण की दिशा में प्रयास करने का आह्वान करता हूं। स्वतंत्रता के सात दशकों के बाद भी देश विभिन्न मोर्चों पर बहुत सी चुनौतियों का सामना कर रहा है तथा युवाओं को नए भारत के निर्माण में जो गरीबी, निरक्षरता, भ्रष्टाचार, जाति, लिंग भेदभाव से मुक्त हो तथा जहां प्रत्येक भारतीय क लिए समान अवसर हो, अग्रणी होना चाहिए।

नेताजी का मजबूत व्यक्तित्व उनके विश्वास पर आधारित था कि संस्कृति, सभ्यता और देश के रूप में भारत का शानदार अतीत और उज्ज्वल भविष्य है। उन्हें भारत के सभ्यतागत मूल्यों, इतिहास और संस्कृति पर गर्व था और उन्होंने महसूस किया कि यह हमारे राष्ट्रीय गौरव और सामूहिक आत्म विश्वास का आधार है। उनका यह भी दृढ़ विश्वास था कि महान राष्ट्र अपना भाग्य निर्माण स्वयं करते हैं तथा उन्होंने लोगों में इस भावना को फिर से भरने की कोशिश की।

साथ ही उनका मानना था कि हमें अन्य समकालीन और अभिनव संस्कृतियों से खुद को अलग नहीं करना चाहिए तथा उनके संपर्क में आने से हमारी ताकत और दृढ़निश्चय बढ़ने में मदद मिलेगी।

बोस का यह दृढ़ विश्वास था कि हम सभी पहले भारतीय हैं और धर्म, क्षेत्र, जाति और भाषा के आधार पर उप-पहचान को प्राथमिक भारतीय पहचान पर हावी होने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

नेताजी का मानना था कि स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र के पल्ल्वित होने के लिए, हमारे नागरिकों को अनुशासन, जिम्मेदारी, सेवा और देशभक्ति के मूल्यों को आत्मसात करना चाहिए। भारत माता की अवधारणा एक विशिष्ट भारतीय सांस्कृतिक विरासत है। भारत की भलाई के लिए देशभक्ति और बलिदान, धर्म या विचारधारा के किसी भी अन्य विचार से ऊपर उठकर, हर भारतीय का एक अनिवार्य कर्तव्य है।

नेताजी ने एशिया के भविष्य की चिर स्थायी आशा थी। उनका मानना था कि एशिया सांस्कृतिक, धार्मिक, और ऐतिहासिक पारस्परिकता के माध्यम से आपसी भावना को साझा करता है, और भारत के सामाजिक, आर्थिक, विकासात्मक और रणनीतिक हित पूरे एशिया के साथ हुड़े हुए हैं। सामूहिक सुरक्षा और समृद्धि के लिए मजबूत सर्व-एशिया सहयोग की वकालत करते हुए, उन्होंने भारत के एशियाई ताकत और समृद्धि के मजबूत स्तंभ के रूप में कल्पना की थी।

नेताजी तथा उनके समय के अन्य नेताओं ने प्रत्येक भारतीय की छिपी क्षमताओं का बाहर निकाला। उन्होंने स्वतंत्रता को सुरक्षित करने के लिए आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता के अदम्य साहस और बलिदान की ताकतों को एकजुट किया। स्वतंत्रता के बाद, हम उसी प्रेरणा से राष्ट्रीय विकास कर रहे हैं।

प्रिय बहनों और भाइयों,

निस्संदेह, भारत ने स्वतंत्रता के बाद विभिन्न क्षेत्रों में अत्यधिक प्रगति की है और यह सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में उभरा है। दुर्भाग्य से, कोविड -19 महामारी ने गति को मंद कर दिया है और भारत और अन्य देशों की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। यह हम सभी के लिए अधिक दृढ़ता प्रदर्शित करने और वायरस को हराने और इसके कारण उत्पन्न चुनौती से पार पाने का समय है।

भारत अपनी युवा आबादी, जिसमें 35 वर्ष से कम आयु के 65 प्रतिशत हैं और 25 वर्ष से कम के 50 प्रतिशत हैं, के कारण कई देशों की तुलना में विशिष्ट रूप से धन्य है। इस पूरी जनसांख्यिकीय लाभ की क्षमता का पूरी तरह लाभ लेने और देश की प्रगति को गति प्रदान करने और सही मायने में आत्म निर्भर भारत का निर्माण करने के लिए विकास की शक्तियों का पूर्ण उपयोग करने की आवश्यकता है।

यह निश्चित है कि महामारी के बाद की दुनिया पहले जैसी नहीं होगी। जहां कोविड-19 के कारण भविष्य में इस तरह की महामारियों के प्रकोप को रोकने के लिए विश्व स्तर पर समन्वित और ठोस कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया गया है, वहीं, इसने भारत जैसे देशों के लिए वास्तव में आत्म-निर्भर बनकर एक लचीली अर्थव्यवस्था बनाने की तात्कालिकता को भी रेखांकित किया है।

आयातों पर निर्भरता कम करके, स्थानीय ब्रांडों और उत्पादों को बढ़ावा देकर, घरेलू विनिर्माण के माध्यम से उपभोग को बढ़ावा देने वाले विकास का निर्माण करके, विश्व स्तरीय बुनियादी ढांचे का निर्माण करके, भारतीय उद्योगों को विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाकर, व्यापार करने में आसानी सुनिश्चित करके, विदेशी निवेश को आकर्षित करके तथा भारत को एक पूर्ण स्वतंत्र तथा आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था में विकसित करके स्थानीय उत्पादों के लिए मुखर होना ही मूल उद्देश्य होना चाहिए। आत्म निभर व्यापार बाधाओं को खड़ा करने या संरक्षणवाद को बढ़ावा देने की बात नहीं करता, बल्कि भारत की अंतर्निहित शक्तियों को बाहर निकालता है तथा विभिन्न क्षेत्रों को विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाता है।

पिछले कई वर्षों से, भारत आईटी और फार्मास्युटिकल क्षेत्रों में एक अग्रणी शक्ति बन गया है। हमें विश्व स्तरीय चिकित्सा उपकरणों के निर्माण जैसे अन्य क्षेत्रों में पूरी तरह से क्षमता का भरपूर उपयोग करने की आवश्यकता है।

मुझे यह जानकर खुशी हुई कि सरकार ने हाल ही में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के उपायों के तहत 101 रक्षा वस्तुओं पर आयात प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है। तोपखाने की तोपों से लेकर राडार तक की वस्तुओं का आयात 2025 तक उत्तरोत्तर होगा। 10 अगस्त से शुरू होने वाले आत्म निर्भर सप्ताह का शुभारंभ भी स्वागत योग्य कदम है। समय की जरूरत है कि निजी क्षेत्र और अनुसंधान के माध्यम से शिक्षा क्षेत्रों सहित सभी हितधारकों द्वारा आत्म-निर्भर अभियान को प्रोत्साहित किया जाए।

समापन से पहले, मैं अपनी युवा पीढ़ी को भारत के इतिहास से अवगत होने की आवश्यकता पर बल देना चाहूंगा। ऐतिहासिक घटनाओं का एक व्यापक, प्रामाणिक और वस्तुपरक विवरण प्रदान करना समय की जरूरत है।

साथ ही, देश भर के स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा बलिदान और वीरता की कहानियों को पाठ्य-पुस्तकों में विशेष रूप से प्रदर्शित करवाया जाना चाहिए।

वर्तमान पुस्तक में कुछ दिलचस्प दस्तावेज हैं जो नेताजी द्वारा भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में दिए गए महान योगदान पर प्रकाश डालते हैं। मुझे यकीन है कि यह शोधकर्ताओं के साथ-साथ आम जनता के लिए भी उपयोगी होगा। मैं इस उपयोगी प्रकाशन के लिए लेखक और प्रकाशक को बधाई देता हूँ।

जय हिन्द!"