11 अक्टूबर, 2017 को नई दिल्ली में भारतीय लोक प्रशासन संस्थान शासी निकाय की 63वीं वार्षिक आम बैठक में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया अभिभाषण

नई दिल्ली | अक्टूबर 11, 2017

इस ऐतिहासिक संस्थान की 63वीं वार्षिक आम बैठक (ए.जी.एम.) के अध्यक्ष के रूप में भाग लेते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। आई.आई.पी.ए. ने हाल ही में अपनी हीरक जयंती मनाई है। यह संस्थान परिवर्तनों को आत्मसात करते हुए, सुधारों की जांच करते हुए और अनुसंधान, मूल्यांकन और प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करते हुए छह दशकों से अधिक समय से भारतीय प्रशासन का साक्षी बना हुआ है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत में, लोक प्रशासन सदैव बदलावकारी प्रबंधन रहा है। समाज में, अर्थव्यवस्था में और राजनैतिक जीवन में बदलाव का कारक रहा है। भारत जैसे प्रमुख लोकतंत्र में जहां गरीबी और विविधता की विद्यमानता से उत्तरदायी एवं जवाबदेह शासन की अत्यधिक मांग है ऐसा होना सामान्य बात है। 21 अप्रैल, 2017 को आई.ए.एस. अधिकारियों के प्रथम बैच को संबोधित करते हुए, सरदार वल्लभ भाई पटेल ने औपनिवेशिक भारतीय सिविल सेवा से अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा तक हुए प्रशासनिक दृष्टि से महतवपूर्ण स्वातंत्रयोत्तर बदलावों को रेखांकित किया था। आईसीएस को न तो 'भारतीय' और न ही 'नागरिक' कहते हुए सरदार पटेल ने कहा था :

"......... आपके पूर्ववर्ती ऐसी पंरपराओं की देन थे जहां वे स्वयं को आम आदमी के दैनिक जीवन से अलग महसूस करते थे और उनके पृथक रहते थे। आपका यह परम कर्तव्य होगा कि आप भारत के आम आदमी को अपने जैसा समझनें या सही तरीके से कहा जाए तो आप ऐसा समझे कि आप उन्हीं में से एक हैं। और आपको सीखना होगा कि आप उन्हें छोटा न समझें अथवा उनकी अवहेलना न करें अन्य शब्दों में, आपको स्वयं को प्रशासन के लोकतांत्रिक तौर-तरीको के साथ ढालना होगा ............।"

औपनिवेशिक कमांड और नियंत्रणकारी व्यवस्था के बजाए भारत के आम आदमी की सेवा करने के दृष्टिकोण में बहुत बड़े बदलाव के लिए मानव संसाधन विकास और प्रशिक्षण हेतु अत्यधिक प्रयास करने होंगे। यह उन महत्वपूर्ण कारणों में से एक है जिसके लिए आई.आई.पी.ए. की स्थापना की गई।

हम पुन: बदलाव के मोड़ पर खड़े हैं क्योंकि हमें केन्द्रीय और राज्य सरकारों की नवोन्मेषी एवं नागरिकोंन्मुख योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए अपनी प्रशासनिक क्षमताओं को नये सिरे से तैयार करना है। हमें प्रौद्योगिकी की शक्ति का दोहन करना होगा और जनता की भलाई के लिए इसका उपयोग करना होगा। आज के युग के प्रशासकों को हमारे आन्तरिक माहौल की शक्तियों और कमजोरियों का बाह्य दबावों के खिंचाओं और दबावों के साथ सामंजस्य बिठाना होगा। उन्हें न केवल इसका संचालन करना होगा अपितु निष्पक्ष रूप से, ईमानदारी से और बलपूर्वक ऐसे बदलाव लाने में अपनी भूमिका निभानी होगी जो सामाजिक और आर्थिक रूप से स्वीकार्य हो।

यह गर्व का विषय है कि भारत की पंद्रह-वर्षीय विकास संबंधी कार्यसूची पूर्णत: संयुक्त राष्ट्र द्वारा नागरिकों को केन्द्र में रखकर बनाए गए वैश्विक संपोषणीय विकास लक्ष्यों के समनुरूपी है। यह हमारे देश की वृद्धि एवं विकास के लिए अत्यंत व्यापक ढांचा है। इसके दायरे में गरीबी को कम करने, भुखमरी उन्मूलन, सार्वजनिक स्वास्थ्य और कल्याण को बढ़ाने, बुनियादी शिक्षा प्रदान करने, स्वच्छ पानी और साफ-सफाई की व्यवस्था करने स्त्री-पुरुषों हेतु समान अवसर सुनिश्चित करने, स्वच्छ उर्जा के संवर्धन और हमारे शासन में विकास, रोजगार और समानता के लिए सतत प्रयास करने के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में प्रशासनिक प्रतिपादन, नीति निर्माण और विनियमन शामिल है।

देश में पर्यावरण पर आश्रित गरीबों के प्रति गहन चिंता दर्शाते हुए, भारत ने जलवायु परिवर्तन संबंधी पेरिस समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की संपुष्टि की। यह जवाबदेह विकास पद्धति का अनुपालन करने की दिशा में हमारे नये संकलप तथा भारत में गरीबों, विशेषकर तटीय क्षेत्रों, पहाड़ी क्षेत्रों और भारत के सभी बारह जैव-भौगोलिक अंचलों में बसी आर्थिक रूप से कमजोर आबादी को जलवायु से बचाव प्रदान करने के लिए हमारी दृढ़ प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इसके लिए बुद्धिमान और सुविज्ञ प्रशासनिक योग्यता की आवश्कयता है जिसे हमारे युवा अधिकारियों में अंतर्विष्ट करने की जरूरत है। मैं इस बात से अवगत हूं कि आई.आई.पी.ए. और इसी तरह के संस्थान इस प्रयास में संलग्न हैं और वे भविष्य में भी ऐसा करते रहेंगे।

तथापि, मुझे लगता है कि अपेक्षाकृत और भी ज्यादा प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।

हमें अपने राष्ट्र निर्माताओं के स्वप्न को साकार करके वास्तविकता के धरातल पर उतारने के लिए बहुत प्रयास करने होंगे। हमारे राष्ट्र निर्माताओं ने यह सोचा था कि जब हमें 'स्वराज' मिल जायेगा तो सभी समस्याएं स्वयंमेव हल हो जाएंगी। किंतु अब, हमारे समक्ष जनता के सभी तबकों को सुशासन प्रदान करके और उन तक पहुंच कर 'स्वराज' को 'सुराज' में बदलने का कार्य है। हमें अभी भी आम आदमी तक मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने में अत्यधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। निरक्षरता, खराब स्वास्थ्य, निम्न स्तरीय शिक्षा, स्वच्छ पेयजल एवं साफ-सफाई की सुविधाओं का अभाव, स्तरहीन शहरी आयोजना, पर्यावरणीय प्रदूषण पर अपर्याप्त ध्यान देना और ऐसे ही अनेक मुद्दे अभी भी शेष हैं। हमें क्रियान्वयन प्रक्रियाओं में तेजी लानी होगी जिससे कि हमारी सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों के वांछित लाभ समय पर जनता को मिल सकें।

हमें अपेक्षाकृत और ज्यादा 'दक्षता' और 'प्रभावकारिता' को अपना लक्ष्य बनाना चाहिए। हमें अपनी शासन व्यवस्था में 'मूल्यांकन' एवं सतत 'अधिगम' की संस्कृति विकसित करनी होगी।

मैं इसकी व्याख्या करता हूं। हम क्रियाकलापों और निविष्टियों पर ज्यादा ध्यान केन्द्रित करने के लिए प्रवृत्त होते हैं और अक्सर हम उसे नजरअंदाज कर देते हैं जिसे मैं सबसे महत्वपूर्ण पहलू मानता हूं अर्थात् उन लोगों पर हमारे कार्यों का परिणाम और प्रभाव जिनकी हम सेवा करने का प्रयास कर रहे हैं। हमें परिणामों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। हमें ईमानदारी से मूल्यांकन और अपनी प्रतिपादन प्रणाली में लगातार सुधार करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। हमें लगातार इस बात का आकलन करना चाहिए कि क्या हम निर्धारित समय और प्रस्तावित बजट की सीमा में अपने घोषित लक्ष्यों की प्राप्ति कर पाने में सफल हो पाए हैं। हमें अपनी कार्य दक्षता पर ध्यान देना चाहिए। हमें इस प्रश्न पर मनन करते रहना चाहिए कि क्या हमने सबसे अधिक लागत कुशल एवं ऊर्जाक्षम और संपोषणीय कार्यविधि अपनाई है या नहीं। क्या हम बिना समय लंघन या लागत-लंघन के परिणाम प्राप्त कर पाए हैं?

इसके लिए मूल्यांकन, मूल्यांकन के परिणामों से सीखने तथा मध्यावधि संशोधन करने के लिए शीघ्रता से कार्य करने की संस्कृति की आवश्यकता है। जब तक हमारी शासन पद्धतियों में इस प्रकार के अभिसंस्करण का निर्माण नहीं होगा, हम अपने बहुमूल्य और दुर्लभ संसाधनों को बर्बाद करते रहेंगे और अपनी जनता को कारगर ढंग से और दक्ष तरीके से सेवाएं प्रदान नहीं कर पायेंगे। समसामयिक प्रशासनिक व्यवस्था में इस महत्वपूर्ण तत्व के सृजन और सम्पूर्ण व्यवस्था को परिणाम आधारित प्रबंधकीय संस्कृति की दिशा में अग्रसर करने में आई.आई.पी.ए. की एक महत्वपूर्ण भूमिका है।.

आई.आई.पी.ए. से सरकार को संस्थागत सहायता, सभी स्तरों पर हमारे कार्यक्रमों को कार्यान्वित करने में अधिकारियों की सहायता करना, सफलता प्राप्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। मुझे प्रसन्नता है कि आई.आई.पी.ए. कार्यान्वयन से संबंधित प्रमुख मंत्रालयों जैसे आवासन और शहरी कार्य, उपभोक्ता मामले, इलेक्ट्रोनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग आदि को सहायक सेवाएं प्रदान करता है।

स्वच्छ भारत (शहरी और ग्रामीण), स्मार्ट शहर, कुशल भारत, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, डिजिटल इंडिया, अमृत (ए.एम.आर.यू.टी.), प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से सबके लिए आवास आदि जैसे कार्यक्रमों को क्रियान्वित करने में हमारे प्रशासन के स्वरूप, अभिवृत्तियों और क्षमता के संबंध में नई सोच की आवश्यकता है।

ये सभी योजनाएं सत्तर के दशक के विकासोन्मुख प्रशासन की पारम्परिक क्रियान्वयन पद्धतियों से परे हैं तथा सबसे कमजोर, हाशिये पर रहने वाले और अतिवंचित आबादी समूहों को केन्द्र में रखने वाले अन्त्योदय उपागम को ध्यान में रखते हुए दूरस्थ ग्रामवासियों तक पहुँचने के उद्देश्य के साथ और ज्यादा समन्वय की आवश्यकता है।

यह उपागम और ज्यादा समानुभूतिपूर्ण, जवाबदेह और समावेशी होना चाहिए। यह उपागम इस प्रकार का होना चाहिए जो महिलाओं, नि:शक्तजनों (दिव्यांगों) का ध्यान रखने वाला हो तथा इसके हृदय में, "सबका साथ, सबका विकास" सिद्धांत की भावना के साथ बिना किसी भेदभाव के समाज के सभी तबकों तक लोकतांत्रिक शासन के फायदों के पहुँचाने की वास्तविक प्रतिबद्धता होनी चाहिए।

न केवल कक्षा में बारंबर प्रशिक्षण देना अपितु क्षेत्र का बारम्बार दौरा करना और आई.आई.पी.ए. जैसे संस्थानों द्वारा केन्द्रीय मंत्रालयों एवं राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करना आज वक्त की जरूरत है। मैं इस संस्थान को केन्द्रीय और राज्य सरकारों के लगभग 4500 अधिकारियों को लगातार अधिगम के इन सामयिक क्षेत्रों में लगातार प्रशिक्षित करने तथा प्रत्येक वर्ष लगभग तीस शोध परियोजनाएं आयोजित करने के लिए बधाई देता हूँ।

हमारे मानव संसाधन विकास संबंधी प्रयासों में, शहरी प्रबंधन सबसे अग्रणी है क्योंकि भारत की 50 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या 2030 तक शहरों और शहरी क्षेत्रों में निवास करेगी। मुझे प्रसन्नता है कि आई.आई.पी.ए. में आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय का शहरी क्षेत्र का विचार मंच, शहरी सेवा केन्द्र है जो 1963 से प्रशिक्षण और अनुसंधान सहायता प्रदान कर रहा है। यह शहरों, सरकारी क्षेत्र और अर्ध नगर-पालिका अभिकरणों के महापौरों, आयुक्तों और अन्य वरिष्ठ पदाधिकारियों को शहरी वित्तीय एवं नगर-पालिका प्रबंध प्रशिक्षण प्रदान कर रहा है। आई.आई.पी.ए. में स्थित शहरी सेवा केन्द्र (सी.यू.एस.) ने भी बंगलुरु, गुरूग्राम और अहमदाबाद जैसे नगर निगमों में शहरी-प्रबंधन प्रतिवेदनों हेतु सराहनीय कार्य किया है।

मैं इस तथ्य से प्रोत्साहित हुआ हूँ कि आई.आई.पी.ए. प्रबंधन ने अपने पुराने ढाँचें को पुन: विकसित करने के लिए राष्ट्रीय भवन निर्माण निगम (एन.बी.सी.सी.) के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया है। नए ढाँचे को 21वीं सदी और आगामी कल की नई प्रशासन व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करने दीजिए जिसे आई.आई.पी.ए. अपने विगत और वर्तमान के ज्ञान-प्रबंधन और क्रियान्वयन के माध्यम से भावी सरकारों को प्रस्तुत कर पाने में सफल होगा। आई.आई.पी.ए. के वैश्विक तंत्र को अपने अंतर्देशीय अनुभव की अभिवृद्धि को प्रशासन के संबंधित क्षेत्रों में अच्छी साझा कार्य प्रणालियों को विकसित करने और उन्हें आपस में एक-दूसरे के बांटने में सक्षम बनना चाहिए।

सरदार पटेल ने जो बदलाव देखा तथा आई.आई.पी.ए. सोसाइटी के प्रथम अध्यक्ष, पंडित नेहरु द्वारा आरंभिक वर्षों में देखे गए स्वप्न आज बहुआयामी चुनौती है।

समकालीन भारत में इन विविध चुनौतियों का समाधान करने के लिए प्रौद्योगिकी आधारित सरकारी प्रक्रियाओं की आवश्यकता है।

यदि हमारे देश में निर्धनों में निर्धनतम और दूरस्थ हिस्सों मे बसे अंतिम मील तक - पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति को दी जाने वाली सेवाओं के प्रभाव को असरदार बनाना है तो सरकार को अपनी प्रभोत्पादकता और पहुँच में बहुत मुस्तैद होना चाहिए।

अधिकारियों और सम्पूर्ण प्रशासनिक प्रणाली को आज की विकास संबंधी अनिवार्यताओं को समझना होगा और प्रत्येक नागरिक की सेवा करने के साझे लक्ष्य की दिशा में इन प्रक्रियाओं को पुन:स्थापित करना होगा।

मुझे आशा है कि आई.आई.पी.ए. राज्य स्तरीय अन्य समान संस्थाओं के साथ मिलकर शासन सुधार की व्यापक कार्यसूची तैयार करेगा तथा केन्द्र में 'जनता' को रखकर एक शासन प्रणाली तैयार करेगा जिसके सफलता के मापदण्ड के रूप में 'परिणाम' तथा मार्गदर्शी सिद्धांत के रूप में 'सतत नवोन्मेषी प्रक्रियाएं' होंगी।

मैं आपको उच्च स्तरीय परिणाम देने के आपके प्रयासों के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूँ।

आशा है कि उत्कृष्ट संस्था के रूप में आई.आई.पी.ए. का गठन करने में आप अनवरत कार्य करेंगे, मौजूदा वास्तविकताओं के प्रति सदैव सजग रहेंगे, बदलते संदर्भों के प्रति मुस्तैद रहेंगे तथा भावी प्रवृतियों का पूर्वानुमान लगाने में पर्याप्त रूप से दूरदर्शी रहेंगे।
जय हिन्द!