10 दिसंबर, 2019 को नई दिल्ली में तीसरे लोकमत संसदीय पुरस्कार समारोह के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | दिसम्बर 10, 2019

“मैं आज शाम आप सभी के समक्ष उपस्थित होकर प्रसन्न हूँ।

मुझे खुशी है कि प्रतिष्ठित लोकमत समूह ने संसद में संसद सदस्यों के कार्य निष्पादन के लिए उन्हें सम्मानित करने के लिए यह पहल की है। लोकमत समूह के संस्थापक दर्डा परिवार, जिसमें स्वर्गीय श्री जवाहर लाल दर्डा जी स्वयं एक स्वतंत्रता सेनानी थे, राष्ट्रीय जीवन में नजदीक से जुड़े रहे हैं। लोकमत नाम लोकमान्य तिलक द्वारा दिया गया था क्योंकि उन्होंने स्वतंत्रता के लिए जनता की अकुलाहट व बेचैनी को निष्ठापूर्वक अभिव्यक्ति देने के लिए वर्नाक्युलर राष्ट्रवादी प्रेस पर विश्वास किया था। इसलिए यह उचित है कि आप प्रतिष्ठित सांसदों को सम्मानित कर रहे हैं, जो जनता के मुद्दों को स्पष्ट करते हैं और बेजुबानों को आवाज़ देते हैं।

मुझे यह जानकर खुशी हुई कि वरिष्ठ सांसद श्री शरद पवार जी और उनके समान अनुभवी सह अध्यक्ष, लोकसभा के पूर्व महासचिव डॉ सुभाष कश्यप जी के नेतृत्व में एक बहुत ही प्रतिष्ठित निर्णायक मण्डल ने पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं का चयन पांच वस्तुनिष्ठ मानदंडों - वाद-विवाद में भागीदारी, गैर सरकारी सदस्यों के विधेयकों की संख्या, प्रश्नों, उपस्थिति और सदस्य की समग्र छवि के आधार पर किया है।

मुझे विशेष रूप से खुशी है कि आपने महिला सांसदों के लिए दो पुरस्कार रखे हैं। मैं प्रतिष्ठित पुरस्कार विजेताओं को बधाई देता हूं, जिनका संसद सदस्यों के रूप में बहुत सम्मानजनक और विशिष्ट ट्रैक रिकॉर्ड है। उन्होंने संसदीय शिष्टाचार और शालीनता में, वाक्पटुता के साथ अपने विचारों की अभिव्यक्ति में, शासन में उनकी गहरी अंतर्दृष्टि और अनुभव और राष्ट्रीय हित के मामलों में उनकी दूरदृष्टि में उच्च मानक स्थापित किया है।

पुरस्कार प्राप्त करने वालों में डॉ मनमोहन सिंह जी और श्री मुलायम सिंह जी जैसे दिग्गज राष्ट्रीय नेताओं से लेकर डॉ सुगत रॉय और श्री तिरुची शिवा जैसे राष्ट्रीय दलों के प्रमुख नेताओं और श्रीमती बिप्लव ठाकुर, श्रीमती सुप्रिया सुले, श्रीमती कहकशां परवीन और डॉ भारती प्रवीण पवार जैसे प्रतिभाशाली महिला नेताओं जैसे प्रमुख नेता शामिल हैं जिन्होंने संसद सदस्यों के रूप में अपनी पहचान बनाई है।

बहनों और भाइयों,

हमने अपने शासन के लिए आवश्यक तंत्र के रूप में संसदीय लोकतंत्र को चुना है और पिछले सत्तर वर्षों में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के स्तंभों को,जो इसे आधार प्रदान करते हैं, मजबूत बनाकर इस प्रणाली का पोषण किया है।

सांसद और विधायक हमारी लोकतांत्रिक इमारत और व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वे लोगों की बढ़ती आकांक्षाओं और बदलती अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके पास जनता की आवाज़ को धैर्यपूर्वक सुनने और राष्ट्रीय विकास को आकार देने वाले विचारों को अभिव्यक्ति देने की जिम्मेदारी है।

संसद लोक नीतियों और राष्ट्र की स्थिति पर प्रामाणिक जानकारी का एक प्रधान स्रोत है। संसद में होने वाला वाद-विवाद जटिल राष्ट्रीय मुद्दों पर एक अंतर्दृष्टि प्रदान करता है और उनमें से प्रत्येक मुद्दे पर कई दृष्टिकोणों को व्यक्त करता है। यह लोक सूचना और शिक्षा का एक संस्थान है।

बहनों और भाइयों,

भारत लोकतांत्रिक शासन में एक महान प्रयोग है जिसके बारे में हमें सच में गर्व करने की आवश्यकता है।

हमारा देश अब विश्व का सबसे विशाल और विश्व का सबसे गतिशील, जीवंत लोकतंत्र है।

हम एक ऐसा लोकतंत्र हैं जिसने महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किए हैं और उन्हें प्राप्त करने के लिए प्रयासरत हैं।

हम एक ऐसा लोकतान्त्रिक देश हैं जहां महिलाओं को समान मतदान अधिकारों के साथ सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार पर आधारित लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई प्रतिनिधिक सरकार को चुना गया था।

इसके संघीय चरित्र ने एकीकृत देश के भीतर कई विविधताओं को समायोजित किया है।

हमारे संसदीय लोकतंत्र ने अब तक 103 बार संविधान में संशोधन करके हमारे लोगों की बदलती आकांक्षाओं को पूरा किया है।

राजनीतिक लोकतंत्र प्राप्त करने के पश्चात, उत्तरवर्ती सरकारों का लगातार प्रयास आर्थिक और सामाजिक लोकतंत्र प्राप्त करने का रहा है।

डॉ बी. आर. अम्बेडकर ने लोकतंत्र को "सरकार के एक ऐसे रूप और तरीके के रूप में परिभाषित किया जिसके द्वारा बिना रक्तपात के सामाजिक जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया जाता है।"

जिन क्रांतिकारी परिवर्तनों को हम पहले ही ला चुके हैं और जिन्हें आगे और लाने की जरूरत है, उन्हें संसद के माध्यम से और कार्यकारी और न्यायिक कार्यों के माध्यम से भी लाया जा रहा है।

संविधान सभा के अध्यक्ष, डॉ राजेंद्र प्रसाद ने अपने विदाई भाषण में कहा था कि ''संविधान चाहे जो भी प्रदान करे या न करे, देश का कल्याण देश को प्रशासित किए जाने के तरीके पर निर्भर करेगा। यह उन लोगों पर निर्भर करेगा जो इसे प्रशासित करेंगे। उन्होंने स्वीकार किया कि, "आखिरकार, एक यंत्र की तरह का संविधान निर्जीव चीज है। यह सजीव उन लोगों के कारण हो जाता है जो इसे नियंत्रित करते हैं और इसे संचालित करते हैं और भारत को आज ईमानदार लोगों के एक समूह से ज्यादा कुछ नहीं चाहिए जिनके लिए देश का हित अपने हित से पहले हो।"

बहनों और भाइयों,

हमारी राजव्यवस्था की गुणवत्ता विधायिकाओं, सरकार और न्यायपालिका को संभालने वाले लोगों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है।

यह आवश्यक है कि सांसद बिना किसी दुर्भावना या अशिष्टता के जनहित के मुद्दों पर वाद-विवाद, चर्चा और निर्णय करें।

कार्यपालिका, जनहित और राष्ट्रीय विकास को बढ़ावा देने के एकमात्र उद्देश्य के साथ नीतियों और कार्यक्रमों को समयबद्ध, किफ़ायती और परिणाम-उन्मुख तरीके से क्रियान्वयन करे।

यदि न्यायपालिका कानून और न्याय के महत्वपूर्ण मुद्दों पर संवैधानिक आदर्शों को ध्यान में रखते हुए निष्पक्ष निर्णय देती है, केवल तभी हम अपनी लोकतांत्रिक यात्रा में महत्वपूर्ण गुणात्मक प्रगति कर सकते हैं।

संसदीय लोकतंत्र में निर्वाचित सदस्यों को न केवल लोगों की इच्छा को प्रतिबिंबित करना चाहिए, बल्कि सरकार के साथ-साथ लोगों को भी मार्गदर्शन प्रदान करना चाहिए।

संसद सदस्यों को समाज और देश की भलाई के लिए सिद्धांतवादी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और लोकलुभावनवाद से बचना चाहिए।

जैसा कि डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था, “यदि हम केवल उस मत पर जनता की राय को दर्शाते हैं जिसका हमारे वोट जीतने से संबंध है, तो हम संसद में जो कहते हैं, वह बकवास, अनर्थक बातें और जन-फुसलाव की कला होगा। निर्णायक विचार यह नहीं होना चाहिए कि क्या हम वह करते हैं जो लोकप्रिय है बल्कि यह होना चाहिए कि क्या हम सही काम करते हैं।”

मतदाताओं से मेरा आग्रह रहा है कि अपने प्रतिनिधियों को उनके चरित्र, क्षमता, योग्यता, आचरण और प्रतिबद्धता के आधार पर चुनें। जाति, पंथ, आपराधिकता और नकदी की प्रधानता हमारे लोकतांत्रिक ताने-बाने को नष्ट कर देगी।

यहां तक कि सरकार संसद की सामूहिक सलाह पर निर्भर करती है। संसद को सरकार की रचनात्मक पहल का समर्थन करना चाहिए और चुनौतियां आने पर उनके समाधान का सुझाव देना चाहिए। जैसा कि तिरुक्कुरल कहते हैं, "एक शासक को अपने सहयोगियों का मूल्यांकन सावधानी से करना चाहिए और गुणी, परिपक्व और बुद्धिमानों लोगों का चयन करना चाहिए।" इसीलिए सांसदों को सदाचारी, परिपक्व और बुद्धिमान होना चाहिए ताकि वे सामूहिक रूप से एक ऐसा निकाय बन सकें जो राष्ट्र के भविष्य का सही दिशा में मार्गदर्शन करे।

हमारे जैसे देश में विचारों और मतों में अंतर तो होंगे। लोकतंत्र में, विचारों में अंतर ताकत का स्रोत हैं। वाद-विवाद के परिणामस्वरूप हमारी निर्णय लेने की प्रक्रिया हमारे जैसे विविधतापूर्ण राष्ट्र के लिए अधिक समावेशी और अधिक प्रासंगिक हो जाती है।

इसके लिए हमें सौहार्दपूर्ण वातावरण में, धैर्य के वातावरण में एक-दूसरे के दृष्टिकोण के प्रति सम्मानजनक समझ रखकर चर्चा करने की आवश्यकता है।

इसके लिए हमें गरिमापूर्ण आचरण करना चाहिए जो अन्य विधायी निकायों के लिए आदर्श के रूप में काम करे। सुविचारित वाद-विवाद एक परिपाटी बन जानी चाहिए।

बहनों और भाइयों,

सांसदों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाए रखने में मीडिया की भी प्रमुख भूमिका है। एक स्वस्थ लोकतंत्र और पारदर्शी एवं जवाबदेह संसद के लिए जागरूक नागरिक समूह का होना एक पूर्वापेक्षा है। लोकमत जैसे मीडिया घराने लोगों को जानकारी प्रदान कर और शिक्षित कर इस उत्तरदायित्व को सुनिश्चित कर सकते हैं। हमारे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में प्रमुख मुद्दों पर लोगों को जागरूक करने और सामाजिक भलाई को बढ़ावा देने और सामाजिक बुराइयों से छुटकारा पाने के लिए सकारात्मक वातावरण बनाने में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

पेड न्यूज और मिथ्या समाचार जैसी कुछ विपथन मीडिया में रहे हैं। मीडिया संगठनों पर कॉर्पोरेट प्रभाव और पत्रकारों और संपादकों के राजनीतिक विचार कभी-कभी समाचारों को प्रभावित करते रहते हैं। इन प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है।

बहनों और भाइयों,

हमारा देश कई क्षेत्रों में विकास के पथ पर अग्रसर है। हालाँकि गरीबी, अशिक्षा, लैंगिक भेदभाव और महिलाओं के खिलाफ अत्याचार जैसी कई सामाजिक चुनौतियाँ हैं जो प्रगति को बाधित कर रही हैं। हमें इन चुनौतियों का समाधान करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारे द्वारा चुने गए लोकतांत्रिक मार्ग का अक्षरशः पालन किया जाए और प्रत्येक नागरिक को विकास प्रक्रिया से लाभ मिले।

लोग सामाजिक पुनरुत्थान और राष्ट्र-निर्माण के लिए रचनात्मक अभियानों में भूमिका निभाने के इच्छुक हैं। संसद और संसदीय प्रक्रियाओं में जनता की आकांक्षाएं प्रतिबिंबित होनी चाहिए। वर्ष में होने वाली बैठकों की संख्या में वृद्धि किए जाने की आवश्यकता है। संसदीय समितियों को सक्रिय होकर संसद में होने वाले वाद-विवाद का प्रतिपूरक बनना चाहिए।

चूंकि हम लोकतांत्रिक उद्देश्यों और संवैधानिक आदर्शों को साकार करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं, अत: मेरा मानना है कि मीडिया और प्रतिनिधिक संसदीय संस्थानों को देश में लोकतांत्रिक जड़ों को मजबूत करने और रचनात्मक संसदीय बहस की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए अपने प्रयासों में समन्वय करना चाहिए। मैं लोकमत जैसे मीडिया समूहों द्वारा संसदीय लोकतंत्र में सभी हितधारकों के बीच एक स्वस्थ संवाद प्रक्रिया को सुगम बनाए जाने के प्रयास का स्वागत करता हूं।

मैं एक बार पुनः पुरस्कार विजेताओं को बधाई देता हूं और आशा करता हूं कि संसदीय लोकतंत्र में उनका योगदान अन्य सांसदों को उनके उदाहरण का अनुसरण करने के लिए प्रेरित करेगा।

जय हिन्द!"